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कविता

एक साया आया - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 31 मई, 2022
मन में बेचैनी संग अनचाहा डर समाया था, उलझनों का फ़ैसला मकड़जाल जाने क्यों समझ से बाहर था। नींद आँखों से कोसों दूर थ
पछतावा - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
  सृजन तिथि : 13 मई, 2022
सत्पथ जीवन चल रे मानव, पुरुषार्थ सृजित नवकीर्ति गढ़ो। झूठ कपट छल लालच दानव, कर्मों पर पछतावा आप करो। बनो धीर साह
यही जीवन चक्र है - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 26 अप्रैल, 2022
जीवन क्या है यह समझाने नहीं ख़ुद समझने की ज़रूरत है अदृश्य से जीवन की शुरुआत पल-पल, छिन-छिन विकास की गति कितने रंग और
यारों ना करना क्रोध - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 13 मई, 2022
ख़ुशियों से भरा रहता है उन सब का जीवन, सकारात्मक सोच रखें एवं काबू रखतें-मन। काम क्रोध मद लोभ मात्सर्यो से जो रहें दू
मुझे गर्व है माँ तेरा बेटा हूँ - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 28 मई, 2022
पहली बार जब पलकें खोली, देखा मैंने तू हँस कर बोली, मेरे गालों को चूम-चूम कर, ममता मुझ पर लुटाई है। तेरे आँचल में पला
साहब हम मज़दूर हुए - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 1 मई, 2022
हम अँतड़ियों की सूखी हैं, हम ही रोटी वो रूखी हैं। हमको ईश्वर ने है ढाला, शायद मेहनत ने है पाला। जलती जेठ दुपहरी देख
तपिश - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 16 मई, 2022
भयंकर तपिश के दरमियाँ, ये जो शीतल जल है। यही तो बस आजकल, जीने का सम्बल है। उफ़ ये जलती फ़िज़ाएँ, अंधड़ की डरावनी सदाएँ।
शोर - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 15 मई, 2022
अश्रव्य शोर आर्तनाद हृदय का अरण्यनिनाद सम करता उत्पन्न विस्फोटक प्रभाव पसरता एकाकीपन भीड़ भाड़ के मध्य यद्य
शादियाँ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 6 मई, 2022
शादियाँ वास्तव में एक अनुबंध है दो परिवारों, दो दिलों का, जिसमें निभाई जाती हैं परंपराएँ, धारणाएँ, मान्यताएँ। निभ
नित जीवन रण मैं लड़ता हूँ - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 22 मई, 2022
हे! कालचक्र तुम सुनो आज, अस्तित्व मेरा क्या चुनो आज। मैं समरभूमि का एक बिगुल, बजता रहता हूँ नित ही खुल। हूँ कभी बाँ
संयुक्त परिवार हमारा - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 8 मई, 2022
बच्चों-जवानों बुज़ुर्गों से भरा है आँगन सारा, संस्कारो से जुड़ी हमारी जिसमें विचारधारा। तुलसी पूजन की हमारी यह पु
प्रकृति का सुकुमार कवि : सुमित्रानंदन पंत - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 20 मई, 2022
जयति जय हे! हिमालय पुत्र, बन मकरंद तुम निकले। हरित आँचल हिमानी से, बनकर छंद तुम निकले। प्रकृति के अंक तुम खेले, नदी
मृग व खग - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 10 मई, 2022
मृग के दृग में झाँकता खग, प्रेमिल नैनों में बसा है जग। मूक संवाद करें द्वय नयन, दृश्य अति मनोरम रहा लग। मधुमय भाषा
बच्चों को ख़ूब लुभाते आम - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 16 मई, 2022
खट्टे मीठे पीले आम, कितने हैं रसीले आम। सभी फलों के राजा हैं, सबसे ऊँची इनकी शान। आई गर्मी लेकर आम, सूझा ना कोई और क
नारी - रमेश चंद्र बाजपेयी
  सृजन तिथि : 12 मार्च, 1980
नारी है तो जग है, नारी है तो जीवन का सुंदरतम मग है। अबला नहीं हो तुम तुम तो हो सबला, बचपन में माँ-बाप का खिलौना और आ
परिस्थितियाँ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 2 मई, 2022
जीवन है तो परिस्थितियों से दो चार होना ही पड़ता है, अनुकूल हो या प्रतिकूल हमें सहना ही पड़ता है। बहुत ख़ुश होकर भी अ
जीवन का निष्कर्ष लिखा - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 17 मई, 2022
पग-पग जीवन गलियारों में, हमने भी संघर्ष लिखा। पीड़ाओं के प्रथम द्वार पर, जीवन का निष्कर्ष लिखा। लिखा भाग्य का सूख
क़लम की अभिलाषा - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 6 मई, 2022
चाह नहीं मैं लहू से अपने, प्रकृति का शृंगार लिखूँ। चाह नहीं मैं योद्धाओं की, लहू युक्त तलवार लिखूँ। चाह नहीं मैं र
उठो गरल विष के प्यालों - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 25 अप्रैल, 2022
हे युद्धभूमि के मतवालों, तुम उठो गरल विष के प्यालों। है युद्धभूमि ललकार रही, निज जीवन राह पुकार रही। फूको तुम बिग
जब तक है ज़िंदगी - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 26 अप्रैल, 2022
ज़िंदगी जब तक है गतिमान रहती है, न ठहरती है, न विश्राम करती है। सुख दुख, ऊँच नीच की गवाह बनती है। ज़िंदगी के गतिशीलन म
चिलचिलाती धूप - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 2 अप्रैल, 2022
इस चिलचिलाती धूप ने जीना किया दुश्वार है। गर्म लू जलती फ़िज़ाएँ, हर तरफ़ अंगार है। आँधियाँ लू के थपेड़े, मन बदन बेज़ा
हाँ मैं श्रमिक हूँ - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 1 मई, 2020
मैं श्रमिक हूँ हाँ मैं श्रमिक हूँ। समय का वह प्रबल मंज़र, भेद कर लौटा पथिक हूँ। मैं श्रमिक हूँ हाँ मैं श्रमिक हूँ।
जीवन की तृष्णा नहीं मिटी - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 30 अप्रैल, 2022
उठी आज मन गरल विपाशा, हृदय पुष्प को गला गई। जीवन की तृष्णा नहीं मिटी, अस्तित्व जीव का जला गई। गंतव्य से दोनों नयन ड
यही सोचकर आता हूँ - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 29 अप्रैल, 2022
जीवन में अभिलाषा लेकर, घूम रहा हूँ मैं मग में। पथ भी न जाने पथरीला, काँटे चुभते हैं पग में। फिर भी दीप जलाकर मैं, मध
धरती उगल रही है आग - आशीष कुमार
  सृजन तिथि : 29 अप्रैल, 2022
सूख गए हैं ताल तलैया उजड़े पड़े हैं मनोरम बाग़ पशु पक्षी तड़प रहे हैं धरती उगल रही है आग। पछुआ तन को जला रही है झुलस
करो आत्म तन का मंथन - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 22 अप्रैल, 2022
जीवन रूपी क्षीर सिन्धु में, करो आत्म तन का मंथन। रत्न चतुर्दश ही निकलेंगे, स्वयं करो इसका ग्रंथन। निज श्रम मंदरा
सीता - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 17 अप्रैल, 2022
जनक सुता सुकुमारी राम की अर्धांगिनी, सुंदर, सुशीला सिद्धांतों की पुजारिन। बेटी धर्म निभाया पिता का मान बढ़ाया प
मेरे राम - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 10 अप्रैल, 2022
दशरथ कौशल्या सुत राम अयोध्याधाम के राजा राम केकई के वनवासी राम हनुमान के सब कुछ राम। असुरों, राक्षसों के संहारक र
सैनिक की वेदना - सीमा 'वर्णिका'
  सृजन तिथि : 22 मार्च, 2022
विचलित साँसो की सरगम, नयनों के समक्ष बिखरा तम। असह्य वेदना आंतरिक द्वंद, धर्म व कर्तव्य का यह संगम। समय रेत सा फि
सुनो आज प्रस्तर की महिमा - राघवेंद्र सिंह
  सृजन तिथि : 13 अप्रैल, 2022
सुनो आज प्रस्तर की महिमा... हिन्द प्रान्त पर आदिकाल से, हुआ जहाँ प्रस्तर गुणगान। धरती ने पट खोल यहाँ पर, स्वयं किया

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