कोरोना / देशभक्ति / सुविचार / प्रेम / प्रेरक / माँ / स्त्री / जीवन



विधा/विषय " - कविता"

ऐसा हमारा संविधान - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 7 जनवरी, 2022
हिन्दुस्तान का ऐसा हमारा संविधान, जिसका करतें है यहाँ सभी सम्मान। इस पर सब भारतवासी को विश्वास, लिखें है जिसे यह आ
नई प्रभात - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 10 फ़रवरी, 2000
निकला रवि हुआ प्रकाश, अँधकार का छुटा साथ। लिये नए अद्भुत विश्वास, आज चमकता दिनकर ख़ास। मंद गति में बहती सरिता, साथ
दूरियाँ - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 2 अक्टूबर, 2001
नयनों में है अश्रु जल, खिल रहा दिल में कमल। पर पूछ रहा ख़ुद से मैं प्रश्न, क्यूँ दूरियाँ भिगो देती नयन। जब वसंत ऋतु आ
जन्मदिन का उपहार - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 12 दिसम्बर, 2000
मेरे पास न धन है, न देने को उपहार। पर दिल से मैं दे रहा, ढेर सारा प्यार। गगन तुम्हारे क़दम चूमे, ये मेरी है फ़रियाद। त
हिन्दी का महत्व - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 20 अक्टूबर, 2001
सागर संगम नदियों का, जो जीवन पथ दर्शाती है। भाषाओं का संगम है हिन्दी, जो राष्ट्रभाषा कहलाती है। देश विभिन्नता का
इतिहास बदलना होगा - मयंक द्विवेदी
  सृजन तिथि : 31 दिसम्बर, 2021
कर्म रथ पर आरूढ़ हो, फिर नया सवेरा आएगा, जाग उठेगी क़िस्मत तेरी, सूर्य उदित हो जाएगा। दर्द सहे है तुमने कितने, कितनी र
सुभाष चन्द्र बोस - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2022
ऐ! स्वतंत्रता के मतवाले, तुमको मेरा शत् शत् प्रणाम। ऐ! भारत माँ के रखवाले, तुमको मेरा शत् शत् प्रणाम। आज़ाद हिंद से
सुभाष चंद्र बोस - रतन कुमार अगरवाला
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2022
जानकीनाथ और प्रभावती के पुत्र, सुभाष चंद्र थे स्वाधीनता सेनानी, आओ आज सुनाऊँ सबको मैं, सुभाष बोस की कहानी। माता पि
सुभाष चंद्र बोस - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 21 जनवरी, 2022
स्वतंत्रता संग्राम के सर्वोच्च नायक राष्ट्रवाद के बड़े उन्नायक बंगाली बाबू पिता जानकी नाथ बोस माँ प्रभावती दत्त
वरमाला - अंकुर सिंह
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
जयमाला पर जब तुम मिलोगी, तुम्हारे हाथों में वरमाला होगी। नज़र झुकाए प्रिय तुम होगी इशारों से हममें सिर्फ़ बातें हों
हे मात भारती! तुझे नमन है - चीनू गिरि गोस्वामी
  सृजन तिथि : 23 जनवरी, 2020
हे मात भारती तुझे नमन है, तुझको फूल चढ़ाते हैं। मातृ भूमि की रक्षा में हम अपना शीश चढ़ाते हैं।। हे मात भारती! तुझे नमन
मेरी प्रीत - प्रवीन 'पथिक'
  सृजन तिथि : 15 फ़रवरी, 2017
पता नहीं! इस समय क्या हो रहा है मेरे साथ? हर क्षण तेरी ही याद आती है। चाहें घर रहूँ; काॅलेज़ हो या फिर खेतों पर, कहीं भी
भारत की बिन्दी - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : जनवरी, 2021
मैं हिन्दी हूँ जननी जन्मभूमि मातृभाषा हूँ खड़ी बोली खड़ी होकर मर्यादित,अविचल‌ आधार हूँ मैं भारत का शृंगार हूँ।
बेहोशी से उबरना - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : 18 जनवरी, 2022
सच कभी नही मरता अब ये पुरानी बातें हो गई है कबीर ने उस ज़माने मे कितनी ही बातों को उधेड़ कर रख दिया है पर आज भी क्या आँख
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 14 जनवरी, 2022
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आप अग्रणी नेता, 1945 के बाद आप अचानक हो गए लापता। स्वतन्त्रता सेनानियों में सबसे मशहू
अग्निवृष्टि - मयंक द्विवेदी
  सृजन तिथि : 2021
रवि की प्रथम रश्मि, रश्मिकर, कर नव सृष्टि। उठा, जगा पुरुषत्व को, दुर्बलता पर कर, अग्निवृष्टि। सामने हो मृग मरीचिका,
काश! ऐसा होता! - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
  सृजन तिथि : 2021
काश! ऐसा होता! चंद दिनों के लिए तुम हमारे... और हम तुम्हारे स्थान ले लेते... तुम हमारी तरह पशु और हम तुम्हारी तरह मानव
परछाईं - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 8 जनवरी, 2022
वक्त कितना भी बदल जाए हम कितने भी आधुनिक हो जाएँ, कितने भी ग़रीब या अमीर हों राजा या रंक हों नर हो या नारी हों परछाईं
पैसा बोलता है - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 29 दिसम्बर, 2021
समय का पहिया तेज़ी से घूम रहा आँखें फाड़कर देखिए पैसा भी अब चीख़-चीख़कर बोलता है, आजकल पैसा रिश्तों को बहुत ख़ूबसूरती स
ख़ामोशियाँ तन्हाइयाँ - सुधीर श्रीवास्तव
  सृजन तिथि : 23 दिसम्बर, 2021
ख़ामोश है ख़ामोशियाँ तन्हा हैं तन्हाइयाँ। ये कैसी लाचारगी है कि ख़ामोश तन्हाइयों की ख़ामोशी नहीं टूटती, तन्हाइयों
जीवन का पतझड़ - डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
  सृजन तिथि : 19 जनवरी, 2022
जीवन कब रंग बदल ले कब ख़ुशियाँ ग़म में बदल दे समय का पहिया कब उल्टा घूम जाए जो न चाहो ऐसा कुछ हो जाए हँसती-खेलती ज़िंदग
बुज़ुर्ग कभी बोझ नहीं होते - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 3 मार्च, 2021
ये बुज़ुर्ग व्यक्ति कभी बोझ नहीं होते, ना समझ व्यक्ति इन्हें समझ न पाते। परिवार की ढाल बुज़ुर्ग बनकर रहते, सबको सही स
लॉकडाउन और मधुशाला - अजय कुमार 'अजेय'
  सृजन तिथि : 7 मई, 2020
नगर गाँव महानगर बंद, लटका जग भर में ताला। छाती पर मूँग को दलने, खुली फिर से मधुशाला।। लॉकडाउन की ऐसी तैसी, सोशल डि
प्रेम की परिभाषा - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 8 अगस्त, 1999
बुझा दीप हुआ अँधेरा, मेरे मन ने मुझसे पूछा क्या प्रेम है? क्यूँ हुआ अँधेरा? सागर से गहरा है जो, निल गगन तक फैला जो, व
कोरोना की कहानी - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 20 मार्च, 2020
चारो ओर मचा कोहराम है, ये कैसी बेचैनी है, ये कैसा तूफ़ान है। एक छोटा सा वायरस, खाँसी जिसकी पहचान है, कर देता साँस भी ज
दीवाली का दीया - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 22 मार्च, 2018
देखो आई नई दीवाली, लेकर जीवन में ख़ुशहाली। न घर न आँगन है खाली, चारों ओर है दीपक-बाती। आओ अपने हाथ फैलाओ, दुश्मन को भ
महाराणा प्रताप - गणपत लाल उदय
  सृजन तिथि : 16 मार्च, 2020
पिता जिनके राणाउदय सिंह, और दादो सा राणा सांगा थे। जयवन्ता बाई माता जिनकी, प्रताप महाराणा कहलाए थे।। शिष्टता, दृ
कम्बल - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 18 जनवरी, 2022
सर्द के दरमियाँ ये जो कम्बल है, ये तो शीत इलाक़ों का सम्बल है। उफ़ ये ठिठुरती फ़िज़ाएँ! कंपकपाती सर्द घटाएँ! कहीं बारिश,
आशा - दीपक झा 'राज'
  सृजन तिथि : 10 अक्टूबर, 2000
क्यूँ निराश होकर बैठ गए, यह तो पल भर की बाधा है। आगे तो बढ़कर दिखलाओ साथी, पग-पग पर जिज्ञासा है। शोषक तो सुशोभित हैं,
खिलौना - विनय विश्वा
  सृजन तिथि : 2020
सूखी रोटी ओढ़ना बिछौना सर्दी गर्मी साथ है रहना प्राणी जन के उदर भरते सत्ता के गलियारों में हम कठपुतली बन ग‌ए खिलौ

Load More

            

रचनाएँ खोजें

रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें