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ग़ज़ल

इक सुब्ह है जो हुई नहीं है - अली सरदार जाफ़री
  सृजन तिथि :
इक सुब्ह है जो हुई नहीं है, इक रात है जो कटी नहीं है। मक़्तूलों का क़हत पड़ न जाए, क़ातिल की कहीं कमी नहीं है। वीर
दिल तुम्हारे दिल में अपना इक ठिकाना ढूँढ़ता है - सुशील कुमार
  सृजन तिथि : 23 अप्रैल, 2021
दिल तुम्हारे दिल में अपना इक ठिकाना ढूँढ़ता है, हो मिलन धरती का अंबर से बहाना ढूँढ़ता है। खो दिया अनमोल जीवन तुमको प
जल ओक में भरने लगी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : जनवरी, 2022
जल ओक में भरने लगी, वह आचमन करने लगी। जब भी हवा आँधी बनी, ये सृष्टि भी डरने लगी। होता अगर है कोसना, मुझमें दुआ झरने
इस तरह मिल कि मुलाक़ात अधूरी न रहे - कुँअर बेचैन
  सृजन तिथि :
इस तरह मिल कि मुलाक़ात अधूरी न रहे, ज़िंदगी देख कोई बात अधूरी न रहे। बादलों की तरह आए हो तो खुल कर बरसो, देखो इस बार
आँखों से जब ये ख़्वाब सुनहरे उतर गए - कुँअर बेचैन
  सृजन तिथि :
आँखों से जब ये ख़्वाब सुनहरे उतर गए, हम दिल में अपने और भी गहरे उतर गए। साँपों ने मन की बीन को काटा है इस तरह, थे उस क
इस वक़्त अपने तेवर पूरे शबाब पर हैं - कुँअर बेचैन
  सृजन तिथि :
इस वक़्त अपने तेवर पूरे शबाब पर हैं, सारे जहाँ से कह दो हम इंक़लाब पर हैं। हम को हमारी नींदें अब छू नहीं सकेंगी, जि
अश्क आँखों में कब नहीं आता - मीर तक़ी 'मीर'
  सृजन तिथि :
अश्क आँखों में कब नहीं आता, लोहू आता है जब नहीं आता। होश जाता नहीं रहा लेकिन, जब वो आता है तब नहीं आता। सब्र था एक
क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़ - मीर तक़ी 'मीर'
  सृजन तिथि :
क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़, हक़-शनासों के हाँ ख़ुदा है इश्क़। दिल लगा हो तो जी जहाँ से उठा, मौत का नाम प्या
आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं - मीर तक़ी 'मीर'
  सृजन तिथि :
आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं, तो भी हम दिल को मार रखते हैं। बर्क़ कम-हौसला है हम भी तो, दिलक-ए-बे-क़रार रखते हैं। ग़ैर ह
आसमाँ क्यों जल रहा है भाइयो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2022
आसमाँ क्यों जल रहा है भाइयो, झूठ सच को छल रहा है भाइयो। जो समय बेकार सा लगता रहा, वो समय अब ढल रहा है भाइयो। चाँद भी
ग़म छुपाते रहे मुस्कुराते रहे - एल॰ सी॰ जैदिया 'जैदि'
  सृजन तिथि : 22 सितम्बर, 2022
ग़म छुपाते रहे मुस्कुराते रहे, दिल फिर भी हम लगाते रहे। हमारी ये दिवानगी भी देखो, तुम को पाके हम इतराते रहे। दिल-ओ-
आदेश की अवहेलना - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 9 सितम्बर, 2022
आदेश की अवहेलना, औ है दिलों से खेलना। यदि मुश्किलों में ज़िंदगी, तब तो दुखों का झेलना। गर काम से तुम बच रहे, पापड
इक तरफ़ है प्यास दूजी ओर पानी का घड़ा - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 30 अगस्त, 2022
इक तरफ़ है प्यास दूजी ओर पानी का घड़ा, प्यास जूती पाँव की सिरमौर पानी का घड़ा। चाक से उतरा तो पागल जातियों में बंट ग
मज़लूम यहाँ हैं प्यार करें - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2021
मज़लूम यहाँ हैं प्यार करें, कुछ थोड़ा सा उपकार करें। गर इश्क़ हुआ है धोखा तो, फिर कैसे आँखें चार करें। गजरा तो बा
वक़्त बहुत ही झूठा निकला - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 20 जनवरी, 2022
वक़्त बहुत ही झूठा निकला, ख़ाक मनाएँ रूठा निकला। अर्जुन की जब बात चली तो, देखो द्रोण अँगूठा निकला। कविताओं में बा
आँख ने आँसू बहाए - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 20 जनवरी, 2022
आँख ने आँसू बहाए, तुम बहुत ही याद आए। एक झूठी कल्पना में, ख़्वाब रातों भर सजाए। यह सरासर ज़ुल्म होगा, प्यार में सब कु
तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है - अकबर इलाहाबादी
  सृजन तिथि :
तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है, बला के पेच में आया हुआ है। न क्यूँकर बू-ए-ख़ूँ नामे से आए, उसी जल्लाद का लिक्खा ह
मेहरबानी है अयादत को जो आते हैं मगर - अकबर इलाहाबादी
  सृजन तिथि :
मेहरबानी है अयादत को जो आते हैं मगर, किस तरह उन से हमारा हाल देखा जाएगा। दफ़्तर-ए-दुनिया उलट जाएगा बातिल यक-क़लम, ज
आह जो दिल से निकाली जाएगी - अकबर इलाहाबादी
  सृजन तिथि :
आह जो दिल से निकाली जाएगी, क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी। इस नज़ाकत पर ये शमशीर-ए-जफ़ा, आप से क्यूँकर सँभाली जाएगी।
कब वो सुनता है कहानी मेरी - मिर्ज़ा ग़ालिब
  सृजन तिथि :
कब वो सुनता है कहानी मेरी, और फिर वो भी ज़बानी मेरी। ख़लिश-ए-ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ न पूछ, देख ख़ूँनाबा-फ़िशानी मेरी।
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही - मिर्ज़ा ग़ालिब
  सृजन तिथि :
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही, मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही। क़त्अ कीजे न तअल्लुक़ हम से, कुछ नहीं है तो अदावत ही सही
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे - मिर्ज़ा ग़ालिब
  सृजन तिथि : 1816
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे। हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में, गुल
तम जहाँ में पल रहा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 7 नवम्बर, 2021
तम जहाँ में पल रहा है, रौशनी को छल रहा है। मैं करूँ तो क्या करूँ अब, आग है कुछ जल रहा है। सूर्य भी दिन भर चला औ, शाम हो
दी अगर सबने ढिलाई - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 25 जुलाई, 2022
दी अगर सबने ढिलाई, क्यों नहीं करते भलाई। लोग केवल ढूँढ़ते हैं, अब भलाई में बुराई। जन्म दिन में दीजिएगा, ढेर सी उन
रात भर चराग़ों की लौ से वो मचलते हैं - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 12 जुलाई, 2022
रात भर चराग़ों की लौ से वो मचलते हैं, नींद क्यों नहीं आती करवटें बदलते हैं। भीड़ क्यों जमा की है चाँद ने सितारों की,
बात में भी जान हो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 1 नवम्बर, 2021
बात में भी जान हो, रास्ता आसान हो। बाग़ ने अब ये कहा, कोकिला की तान हो। बुद्धि मानो है प्रखर, झोपड़ी में ज्ञान हो।
हमीं से दूर जाना चाहता है - प्रशान्त 'अरहत'
  सृजन तिथि : जून, 2021
हमीं से दूर जाना चाहता है, तभी वो पास आना चाहता है। नई दुनिया बनाई है वहाँ पर, वही मुझको दिखाना चाहता है। मुझे माल
ज़माने में नहीं कुछ बस तुम्हारा साथ काफ़ी है - प्रशान्त 'अरहत'
  सृजन तिथि : 7 मार्च, 2022
ज़माने में नहीं कुछ बस तुम्हारा साथ काफ़ी है, बिताने को अवध की शाम, ये सौग़ात काफ़ी है। इरादा है अभी मेरा क्षितिज तक स
जीवन तो इक अफ़साना है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 नवम्बर, 2021
जीवन तो इक अफ़साना है, मानव का फ़र्ज़ निभाना है। चाकू, कट्टा और कटारी, इन सबका पोषक थाना है। बूढ़ों का ज्ञान लगा अद्भ
ज़माना तो सितमगर है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि :
ज़माना तो सितमगर है, हवाओं का यहाँ डर है। जहाँ में बस झमेले हैं, अमन को चाहने घर है। डकैती पड़ गई होगी, अगरचे पास मे

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