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विधा/विषय " - ग़ज़ल"

ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल - अमीर ख़ुसरो
  सृजन तिथि :
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ, कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ। शबा
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं, और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं। आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़
मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा, ये पुल-सिरात अगर है तो चल के देखूँगा। सवाल ये है कि रफ़्तार किस की कितनी है, म
इक तरफ़ है भूक बैरन इक तरफ़ पकवान हैं - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 6 दिसम्बर, 2021
इक तरफ़ है भूक बैरन इक तरफ़ पकवान हैं, फ़ासले ना मिट सकेंगे दरमियाँ भगवान हैं। आज के रघुवंश की तकलीफ़ यारो है जुदा, साथ
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ, ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ। फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए, मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए। अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में, है जितन
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो - राहत इन्दौरी
  सृजन तिथि :
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो, ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो। राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं है
रूह की ताक़त - सुषमा दीक्षित शुक्ला
  सृजन तिथि : 10 जुलाई, 2020
तुम्हारे इश्क़ को ही पूजती हूँ, मगर तक़दीर से मैं जूझती हूँ। सजाया था कभी जो फूल लब पे, महक तेरी उसी में सूँघती हूँ।
आज टूटी सी भुजा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 13 अक्टूबर, 2019
आज टूटी सी भुजा है, यानि घायल अब शुजा है। एक दूजे के लिए हैं, राम हैं मानो कुजा है। ये बहारें हैं बलाएँ, गर बवंडर ही
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 23 सितम्बर, 2021 - 20 अक्टूबर, 2021
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है, इस क़दर कुछ न हुआ जो इश्क़ हुआ है। चेहरा एक निगाहों से न हटे जब, वास्ता आप भी समझो इश्
ख़ुशी तो हमेशा पलों के लिए है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 27 सितम्बर, 2019
ख़ुशी तो हमेशा पलों के लिए है, ग़ज़ल शायरी दिलजलों के लिए है। जहाँ रोज़ रिश्ते पराए हुए हैं, सुभीता रही तो खलों के लिए ह
समय की किसी से सगाई नहीं है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 26 सितम्बर, 2019
समय की किसी से सगाई नहीं है, निद्रा में निशा जो जगाई नहीं है। रहे झाँकते हैं गगन से सितारे, धरा पे न जाने भलाई नहीं ह
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 17 अक्टूबर, 2021
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू, हर गीत मेरी हर ग़ज़ल में शामिल है तू। है ख़ुश-नुमा ये ज़िंदगी मेरी आजकल, ये हे कि मेरे
होम करते हाँथ जलते - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 8 अक्टूबर, 2019
होम करते हाँथ जलते, चाँद उगता सूर्य ढलते। वे अदब से बोलते हैं, पर हमें शादाब खलते। ठूँठ सा इक वृक्ष है पर, फल वहाँ
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 25 सितम्बर, 2021
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं, चाय की सोहबत में दिल को शाद करते हैं। इस शब-ए-ग़म में क्या हम शब-ज़ाद करते हैं, ब
सुहाना है सफ़र अब तो - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 दिसम्बर, 2019
सुहाना है सफ़र अब तो, नहीं होगी ख़बर अब तो। जिसे नादान समझे थे, वही लगता जबर अब तो। ज़माना इस तरह बदला, डराता हर बशर अब
दिल उनका भी अब इख़्तियार में नहीं है - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 22 सितम्बर, 2021
दिल उनका भी अब इख़्तियार में नहीं है, क्यूँ रंगत अब उस रंग-बार में नहीं है। उनके दिल में तो इश्तियाक़ प्यार की है, पर
उड़ाने सभी आसमानो में है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 1 जनवरी, 2020
उड़ाने सभी आसमानो में है, आज पंछी सभी ठिकानो में है। आँगन में चुगते रहे सारा दिन, उनकी ज़िंदगी उन दानो में है। चुनाँ
ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे - रोहित गुस्ताख़
  सृजन तिथि : 4 जनवरी, 2020
ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे, लबों की ख़ामुशी का क्या करेंगे। मुहब्बत डायरी में लिख चुके हैं, अमाँ अब शाइरी का क्
मुश्किलों में मुस्कुराना सीख ले - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 17 अगस्त, 2021
मुश्किलों में मुस्कुराना सीख ले, और ख्वाबों को सजाना सीख ले। बेशरम है यदि यहाँ पर आदमी, इसलिए तूँ भी लजाना सीख ले।
चराग़ों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : सितम्बर, 2019
चराग़ों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है, अँधेरा मिट नहीं पाया उजालों की सियासत है। जहाँ तू सर पटकता है वहाँ बस एक पत्
कौन कहता है तुझे तू दीपकों के गीत गा - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : मई, 2021
कौन कहता है तुझे तू दीपकों के गीत गा, ज़ुल्मतों का दौर है तो ज़ुल्मतों के गीत गा। क्या ख़बर है फूल कोई खिल उठे इंसाफ़ का,
नाज़-ए-हुस्न से जो पहल हो गई - संजय राजभर 'समित'
  सृजन तिथि : 24 अगस्त, 2019
नाज़-ए-हुस्न से जो पहल हो गई, मौत भी आज से तो सरल हो गई। मोहिनी कमल नयनी बँधी डोर सी, सर्पिणी सी लिपट मय गरल हो गई। इश
न शिकवा ना शिकायत लाज़मी है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 13 मई, 2021
न शिकवा ना शिकायत लाज़मी है, मुहोब्बत बस मुहोब्बत लाज़मी है। दरख़्तों को मुनासिब सख़्तियाँ भी, गुलों को तो नज़ाकत लाज़म
चिराग़ों तले ही अँधेरा मिला है - मनजीत भोला
  सृजन तिथि : 20 मई, 2021
चिराग़ों तले ही अँधेरा मिला है, मिला जो भी भूका कमेरा मिला है। इमारत सदा ही बनाई हैं जिसने, उसे पुल के नीचे बसेरा मि
शाम को छः बजे - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 23 अगस्त, 2021
अंततः अब मिलना है उनसे मुझे, आज तक़रीबन शाम को छः बजे, सोच मन विचलित दिल ये कैसे सहे, तीव्र गति धड़कन शाम को छः बजे। दृग
वक़्त बहुत ही शर्मिंदा है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2 जनवरी, 2020
वक़्त बहुत ही शर्मिंदा है, आतंक अभी भी ज़िंदा है। फूल बहुत कोमल होता है, जैसे अब खार दरिंदा है। मैने जन गण मन से पूँछ
उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 8 जून, 2021
उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते, वो भी कभी यूँ मेरे क़स्बे से गुज़रते तो देखते। बस दीद की उनकी ख़ाहिश लेकर भ
इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
  सृजन तिथि : 4 जून, 2021
इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी, आज जा के देखा मुहब्बत कितनी बची हुई थी। आपसे जहाँ बात फिर मिलने की कभी हुई थी,
हम ज़माना भूल बैठे दिल लगाने के लिए - अभिनव मिश्र 'अदम्य'
  सृजन तिथि : 15 अगस्त, 2021
हम ज़माना भूल बैठे दिल लगाने के लिए, माँग हम सिंदूर से उसकी सजाने के लिए। रूठना नखरे दिखाना ये तभी अच्छा लगे, पास जब

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