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विधा/विषय " - नवगीत"

फँस गया ज़िला - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 22 मार्च, 2019
अकाल के पंजे में फँस गया ज़िला। छाती पीट रोए खेत। बहती नदी होती रेत। बदले में फ़ज़ल के धोखे का सिला। चीखें, रुद
कलमुँही रात है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 मार्च, 2019
हिरणों का झुंड है शेर की घात है! निरंकुशता से हो रही हत्याएँ! जीवन को क्यों डँसती हैं व्यथाएँ!! दिन हुए लिजलिजे क
घायल तटबंध हुए - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 25 मार्च, 2019
छूछी गागर से रीते संबंध हुए। रिश्ते सिक्कों से खनकते थे। बैठकर दिन टिकोरे चखते थे। उजड्ड लहरों से घायल तटबंध ह
टेसू के रुख़सार - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2019
आम हुए हैं मधुॠतु के मुख़्तार! दूर तक लहराती फ़सलें! दुख की दिखती नहीं नस्लें! लाल गुलाबी टेसू के रुख़सार! गंध को उ
चिड़ियों को डर लगे - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 29 मार्च, 2019
आज अपना घर भी पराया सा घर लगे! उनकी तो बात क्या सुर्खाब के पर लगे! अँधेरों के बाहुपाश रातों को जकड़े! जाल फ़रेबों का
चाँद-तारे दे रहे बधाईयाँ - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 2020
नव वर्ष में चाँद-तारे दे रहे बधाईयाँ। प्रात कपासी हुई तो दिन सुनहरे हों। घर-आँगन में ख़ुशी के ही ककहरे हों।। बात
पत्ते भारी लग रहे - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 3 अप्रैल, 2019
आड़ा है वक्त वृक्ष को पत्ते भारी लग रहे! पंछी का कलरव दहशत ने लील लिया! ॠतुओं का चक्र हुआ प्रदूषण ने कील लिया! भा
बाज़ार मदारी है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 11 अप्रैल, 2019
ग्राहक बना जमूरा है बाज़ार मदारी है! इच्छाएँ टँगी हुईं शो केस मे! अब रावण फिरें साधू के भेष मे! हर महीने सिर पर चढ़
पिटीशन लगती है पिशाचिका - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 11 अप्रैल, 2019
निराधार तथ्यों से लबरेज याचिका! मढ़ते आरोप होती संघाते हैं! मिर्च मसाला सी भरी हुई बातें हैं! वकील हुए ऐसे जैसे
लू लपट की शर शैया - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 12 अप्रैल, 2019
हम अँगूठा छाप हैं वे हैं बिल्कुल ठेठ! देशी भाषा में सम्मोहन! होता है इसका ही दोहन! पानी फिरा उम्मीद पर करे मटिय
महँगा न्याय - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 14 अप्रैल, 2019
बर्तन, भाड़े, घर गिरवी, कोर्ट खींचता खाल! मिलें प्रकरण पर तारीख़ें! घनचक्कर यहीं से सीखें! मुक़दमेबाजी हुई है अब ज
पाप पुण्य में हाथापाई - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 15 अप्रैल, 2019
पाप पुण्य में हाथापाई गुत्थम-गुत्था! खयानत औ गिरहकटी थाने की थाती! सोहबत में फ़रेब के नेकी फँस जाती! कोर्ट-कचहरी
आपदाओं का नाग - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 21 अप्रैल, 2019
जन-जीवन को लील गया आपदाओं का नाग! अतिवृष्टि, बाढ़ चक्रवात! पिघल रही मोमी रात! क्लेश के साबुन से निकला संतापों का
शीशम-सागौन - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 24 अप्रैल, 2019
घर-घर पहचाने है शीशम-सागौन! महिमा है इनकी भी कुछ कम नही! इमारती लकड़ी है बेदम नही! भोर उठी कर रही नीम का दातौन! हो
दुःखों का क़ाफ़िला - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 27 अप्रैल, 2019
चल रहा है दुःखों का क़ाफ़िला! ख़ुशियाँ हैं पानी का बताशा! अपिरिचित शहर में क्या शनासा! राजधानी खोने लगी जिला! चा
पोखर ठोंके दावा - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 25 अप्रैल, 2019
पड़ता है अब लू लपटों का जमकर चाँटा! सूरज ज्वालामुखी है किरने लावा! पोखर ठोंके कोर्ट में जल का दावा! ताल हुए डबरे
आग हुआ मौसम - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 3 मई, 2019
भट्टी की धधक रही आग हुआ मौसम! हवाएँ हैं, लपट है, लू है! गर्म तवे सी तपती भू है! ॠतुओं के दामन पे दाग हुआ मौसम! प्या
खेले दिनमान - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 28 मार्च, 2019
भोर हुई प्राची की गोद में खेले दिनमान! दिन उदय होते ही अँधेरा दूर हुआ! रात में नीड़ों में आराम भरपूर हुआ! दिन चढ
चाँद दूधिया - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 31 मार्च, 2019
बेचैन है चाँद दूधिया! निशानी दिया रूमाल की! यादें अधरों की गाल की! देहरी पर ख़्वाब मूंगिया! छूट गयी ऊँटी की शाम!
अलोनी है - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 7 सितम्बर, 2019
हिंदी सुघड़ सलोनी है! इसमें लालित्य भरा! मीठा साहित्य भरा!! हिंदी हुई मघोनी है! है संस्कृति का गहना! निर्झरिणी
चौमासे की देह - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2019
वसुधा के पाप यहाँ धोता है मेह। सड़कें गलियाँ और शिलाएँ हैं। लू से झुलसी हुईं फ़िज़ाएँ हैं।। लगा भिगोने सबको पावस
करते टीका - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 19 सितम्बर, 2019
उनको बिल्कुल आता नहीं सलीक़ा। घुटन भरे जीवन में खुला झरोखा। चारों खाने चित्त हुआ है धोखा।। घर से ज्यों ही निकल
गुलमोहर - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 28 अप्रैल, 2019
गुलमोहर मानो स्वर्ग का फूल! लबालब भरा है पराग! खुले मधुमक्खी के भाग! मधुका का छत्ता रहा है झूल! धधके अंगार सा रं
शनासाई - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 5 मई, 2019
ऐनाकोंडा रातें होंगे दिन कसाई! उमंगें मन की बासन धोतीं! है शादमानी अखियाँ रोतीं! अभिनंदन के बदले में है जग हँसा
बजतीं हैं फल्लियाँ - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 20 सितम्बर, 2021
जागे हैं खेतिहर अगहन में। जोतेंगे खेत बैल नहे हल। है साँझ लौटे चिड़ियों के दल।। पोई की पत्तियाँ अरहन में बजतीं
काँटों को ताज - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 21 सितम्बर, 2021
फूलों को घाव मिले काँटों को ताज। पुष्पित पल्लवित हो गया फ़रेब। अब विशेष गुण हो गया है ऐब।। पंछी भी भूल गए भरना पर
नदी की कहानी - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 6 अक्टूबर, 2019
कौतुकी हुई है नदी की कहानी। उद्गम से शुरू फिर चौड़ा है पाट। मिलते हैं रस्ते में नदिया औ घाट।। चूमें है चश्म मौजो
घोड़े हवाओं के - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 16 अक्टूबर, 2019
कतर दिए हैं पर वादे वफ़ाओं के। तन पर पड़ते जाड़े के कोड़े। हैं गद-गद अलाव थोड़े-थोड़े।। दौड़ रहे सरपट घोड़े हवाओं के। मं
वंशी के स्वर - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 16 अक्टूबर, 2019
कानों में गूँज रहे वंशी के स्वर। पंछी का दल उड़ चला आकाश में। गाछ को लता बाँधे हुए पाश में।। छाया सा सिमट गया अन
गलने वाले दीप - अविनाश ब्यौहार
  सृजन तिथि : 26 अक्टूबर, 2019
देखे पल पल भेष बदलने वाले दीप। चहल पहल सरगर्मी तो कूचे में है। सन्नाटा बजता मानो छूछे में है।। खड़े हुए पातों म

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