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कभी हरीफ़ कभी हम-नवा हमीं ठहरे (ग़ज़ल) Editior's Choice

कभी हरीफ़ कभी हम-नवा हमीं ठहरे,
कि दुश्मनों के भी मुश्किल-कुशा हमीं ठहरे।

किसी ने राह का पत्थर हमीं को ठहराया,
ये और बात कि फिर आईना हमीं ठहरे।

जो आज़माया गया शहर के फ़क़ीरों को,
तो जाँ-निसार-ए-तारीक़-ए-अना हमीं ठहरे।

हमीं ख़ुदा के सिपाही हमीं मुहाजिर भी,
थे हक़-शनास तो फिर रहनुमा हमीं ठहरे।

दिलों पे क़ौल-ओ-अमल के वो नक़्श छोड़े हैं,
कि पेशवाओं के भी पेशवा हमीं ठहरे।

'फ़राग़' रन में कभी हम ने मुँह नहीं मोड़ा,
मक़ाम-ए-इश्क़ से भी आश्ना हमीं ठहरे।


            

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