कविता

यही बुद्ध हैं
सुरेन्द्र प्रजापति
एक शब्द जो बड़ी क्रूरता से उछाला गया घृणा की आग पर तपाया गया उड़ाया गया उपहास तीखे वचनों से दूरदुराया गया "दुर हटो! द�
न आदि न अंत
प्रवीन 'पथिक'
हर रोज़ एक वही विचार आता है मेरे मन में; उसी रंगीन चिड़िया की भाँति जो मेरे नीम के पेड़ पर लगे घोंसले में चुपके से आत�
अपनी हिन्दी
प्रवीन 'पथिक'
जब छोटा था, सीखा हिन्दी, हुआ बड़ा तो छोड़ चला। जिसकी छाया में पला बढ़ा, उसी से निज मुख मोड़ चला। हिन्दी हमारी माता ह
थोड़ी-सी रोशनी
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
पलकों पर ठहरी नमी अब शब्द नहीं खोजती, बस रिसती है अनकहे अपराध-भाव की तरह। भीतर का शोर इतना भारी हो गया है कि मौन भी
अधूरी कविताएँ
प्रवीन 'पथिक'
आख़िरी साँसों तक पूर्ण नहीं होता जीवन का उपन्यास। कुछ शेष रह जाती हैं, प्रेम कविताएँ; छंद नहीं बनते उस क्षण के, टूट �
ईश्वर और नैतिकता
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
ईश्वर है या नहीं, कोई नहीं जानता। कुछ ईश्वर के अस्तित्त्व को मानते हैं और कुछ ईश्वर के अस्तित्त्व को काल्पनिक कहक�
एक ख़ुशनुमा शाम
प्रवीन 'पथिक'
इसी नदी के किनारे एक ख़ुशनुमा शाम सूर्य लालिमा लिए छिप रहा था। संध्या के आँचल में, चिड़ियों का कलरव, झिंगुरों की झं�
तुम्हीं तो हो
प्रवीन 'पथिक'
हर सुबह मेरे ख़्वाबों में आकर मुझे अपनी सुगंधों से भर देने वाली तुम ही तो हो। तुम्हारा आहट पाकर ही तो, पंछी बोलते है�
दिशाहीन पथिक
प्रवीन 'पथिक'
कुछ विचित्र-सा हो गया हूॅं मैं! कुछ चकित, द्रवित, अन्यमनस्क-सा। स्मृतियाॅं पीछा नहीं छोड़ रही मेरा प्रश्न कभी उलझ क
स्मृति के झूंडों में
हेमन्त कुमार शर्मा
किसी ठिकाने का नहीं, बरबस आँखें छलक पड़ी। बादल घने थे हृदय पर, बूँदे पलकों से ढलक पड़ी। होश में कब था, और न होने की आ
आया है सावन
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
बादल उड़ते हैं जल लेकर, दो-एक? ना, पूरा दल लेकर। ज्यों पड़ी तप्त भू पर दृष्टि, करते शीतल, करके वृष्टि। लगता है आया पृ�
मौन का भी अर्थ है
श्वेता चौहान 'समेकन'
मौन का भी अर्थ है। ग़र समझ तुम जाओगे। शब्द से मौन का, निहितार्थ अधिक पाओगे। बात करती है नज़र भी, इनसे भी संवाद हो। चा
तुम चाँद की बातें करते हो
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
तुम चाँद की बातें करते हो, शहरों की सड़के ठीक नहीं, झरने पहाड़ जीव ये जंगल, क्या जीवन का प्रतीक नहीं। काट रहे हो जंग
जीवन एक पुस्तक
अजय कुमार 'अजेय'
जीवन अनुभव की किताब जिसमें कुछ रचनाऍं। सुख दुःख की रची इबारत शीर्षक विरत कथाऍं। जीवन में शीतलता लाती भोर हवा रव�
तू मेरी अन्तर्नाद बनी
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
तू सुरभित पुष्पों-सी कोमल, मैं तेरा मधुमास बना। तू जलती दीपक की लौ-सी, मैं उसका विश्वास बना। तू सागर की शांत लहर-सी,
मौन में प्रेम की वाणी हो तुम
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
जब नयन मौन होकर पुकारें तुम्हें, उन दृगों की कहानी हो तुम। छाँव बनकर मेरे पथ में चलो, इस धरा की रवानी हो तुम। शब्द ब
जंगल के पेड़
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
जंगल में लगे हुए हरे-भरे, समृद्ध पेड़ों को काटने के लिए आया लकड़हारा, लेकिन हुआ यूँ कि— पेड़ों ने दिखाई एकता और उस ल
काश!
प्रवीन 'पथिक'
बहुत दिन हुए उनसे मिले हुए, देखा नहीं बहुत दिनों से। बात तो फाल्गुन के पहले बयार से ही शुरू हुई थी। मिले, आषाढ़ के प�
शाश्वत-संबंध
प्रवीन 'पथिक'
कितने अरसे बीत गए! लड़ते-झगड़ते रूठते और मनाते हुए, ना तुम बदली! ना मैं ही बदला। वो संयोग पक्ष के लम्हें, आज भी यथाव�
जो पहले था आज नहीं है
बिंदेश कुमार झा
आसमान आज भी बरस रहा है, कल पानी बरसा रहा था, आज आग है। आसमान भी काला है, चंद्रमा भी सफ़ेद चादर ओढ़ा होगा, आज उसमें भी दा
अधूरे शब्द
प्रवीन 'पथिक'
धुंधलका होते ही बनने लगती विरह की कविताएँ एक छवि तैर जाती है ऑंखों में दिनभर की बेचैनी, आक्रोश, तपन केंद्रित हो जा�
जाल
मदन लाल राज
मकड़ी सिद्धहस्त है, ख़ुद जाल बनाने में। फिर तरकीब लगाती है, शिकार को फँसाने में। अपने रसायन से वो बेतोड़ जाल बुनत�
तू ज़िंदा है!
संजय राजभर 'समित'
उठ चल! और लड़ गर साँस लेता हुआ तू ज़िंदा है तो याद रख तुझे आगे बढ़ना ही पड़ेगा, गर थक गया है तो माँझी को देख गर अंधा है �
सिन्दूर के बदले
पवन कुमार मीना 'मारुत'
युद्ध यादें दे जाता है कड़वी-कड़वी यादें। ले जाता है साया दुधमुँहें बच्चों के सिर से बाप का। और दे जाता है सिन्दूर �
सहर को सहर नहीं कहता
हेमन्त कुमार शर्मा
परहेज़ करता है वह खिलखिलाने से, कि अपने मन की सरे-आम बताने से। यूँ चुप रहता है और आँखों से ख़ूब बोलता है, जाने क्या आत�
लिखूँ तो मैं लिखूँ क्या
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
लिखूँ तो मैं लिखूँ क्या? जो बोले, पर मौन रहे। जो जल जैसा हो थिर-थिर, पर भीतर ही भीतर बहे। जिसमें रूप न कोई दिखे, ना को�
शर्मिंदगी
राजेश राजभर
मौन हो! तुम कौन हो? क्यों छिपते हो, शर्मिंदगी की आड़ में। एक नारी ही तो "नग्न" हुई, आज भरे बाज़ार में! मौन हो! तुम कौन ह�
पहली बार बारिश
बिंदेश कुमार झा
पहली बार बारिश कहाँ हुई थी? मिट्टी की गोद में, गर्भ के विरोध में, वैज्ञानिकों के शोध में— नहीं मालूम। आख़िरी कब हो
आत्म विश्लेषण
बिंदेश कुमार झा
आसमान से पूछी गहराई, सोए समुद्र से उसकी लंबाई। तारों से उनकी गिनती, सूरज से उसकी परछाई। मिला जवाब तब मुझे, जब मैंने
कौन जीता है, कौन मरता है
बिंदेश कुमार झा
अनंत नभ के नीचे, अपनी गति से चलता है, निरंतर असफल प्रयास से जो नहीं ठहरता है। जो अश्रु नहीं, लहु पीता है, वही जीता है�

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