कविता

घोर अंधड़
प्रवीन 'पथिक'
हर दिन एक नया सबेरा लिए आता है। पर बात; वही पुरानी होती है। मन में घोर अंधड़, पुरानी स्मृतियाँ, वही विचार एक साथ कौंध�
दीप का अंतिम स्वप्न
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
सूर्य डूबा, साँझ ने जब रात का आँचल ओढ़ लिया, एक अकेला दीप तब भी अँधियारे से जोड़ लिया। बोला— "मुझमें कहाँ सामर्थ्य
अंतिम विदाई
राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब दी हमें अंतिम विदाई जब तुम्हारे नेत्र से प्रिये, अश्रु की वो धार आई। प्रिये! तुम्हार�
बेटियाँ
प्रमोद कुमार
छनन-छनन छुम सुनते ही दिल ख़ुश हो जाता है। देख सुखद भविष्य के सपने मन कहीं खो जाता है। सोन चिरईं-सा घर-आँगन बीच ठुमक-म�
सब चींटी है
बिंदेश कुमार झा
मेरे पैरों के नीचे एक छोटी-सी सुरंग थी, जहाँ चींटियों की फ़ौज में ग़ज़ब की उमंग थी। किसी के हाथ में फूल था, तो किसी के
गहरा सन्नाटा
प्रवीन 'पथिक'
कभी कोई रात इतनी उदास होती है जैसे ग़म के सागर में डूबी अन्यमनस्क, अपलक, अतीत में ढूॅंढ रही हो कुछ! जिसका चित्र मानस �
अपने आप से घबरा गया हूँ
हेमन्त कुमार शर्मा
अपने आप से घबरा गया हूँ, छाया से धूप में आ गया हूँ। मेरे अपने से कुछ सवाल थे, जैसे अँधेरे में मशाल थे। दूजों से बच चल�
अपने आप से घबरा गया हूँ
हेमन्त कुमार शर्मा
अपने आप से घबरा गया हूँ, छाया से धूप में आ गया हूँ। मेरे अपने से कुछ सवाल थे, जैसे अँधेरे में मशाल थे। दूजों से बच चल�
अंकुरण फिर लौट आए
राघवेंद्र सिंह
प्रिये! तुम्हारे अश्रु दल जब, अंजुरी को भेद पाए। अंकुरण फिर लौट आए। हो गया आँगन सहर्षित, आश्रुओं ने जीत देखी। पल्�
भ्रम
मदन लाल राज
प्याज छीलने वाले को संदेह था कि– छिलके के नीचे छिलका होगा। और प्याज को ये भ्रम है कि– छिलका परत दर परत होगा। एक छील
ज़िंदगीनामा
अमृत 'शिवोहम्'
ज़िंदगी क्या है? दिए की लौ का जलना? या तेज़ हवा में लौ का डगमगाना? या डगमगाती लौ को हथेलियों से बचाना? या बचाते-बचाते
छोड़ना
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
'छोड़ना' अति आवश्यक है, नयापन प्राप्त करने के लिए। जब फूल छोड़ते हैं डाली तो वे ईश्वर पर चढ़कर धन्य हो जाते हैं, ज�
तुम्हारे बाद
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
वचन के दीप जलाकर तुम, अँधियारा सौंप गई, सपनों की हर हरित डाल को, पतझारा सौंप गई, जिसे समझा था जीवन-सरिता का अंतिम तट म�
तुम्हारे बाद
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
वचन के दीप जलाकर तुम, अँधियारा सौंप गई, सपनों की हर हरित डाल को, पतझारा सौंप गई, जिसे समझा था जीवन-सरिता का अंतिम तट म�
फिर कविता के आँसू निकले
राघवेंद्र सिंह
प्रश्न अधूरे रहे अकिंचित, पृष्ठ वो सूने-सूने पिघले। स्याही को आभास हुआ तब, फिर कविता के आँसू निकले। सोच रही है अंत
सभी हैं
हेमन्त कुमार शर्मा
सभी हैं, कोई भी नहीं। बेकरारी, बेचैनी, कैसे कैसे इंतज़ारी के दुख, फिर से शून्य है, और अंक कोई भी नहीं, सभी हैं, कोई भी
मातृभाषा
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
मातृभाषा होती है माँ की तरह स्नेह देने वाली। जब जाता है इंसान किसी दूर-दराज़ इलाके में नौकरी की तलाश में, तो वहाँ �
अश्रु सर्वथा जीते होंगे
राघवेंद्र सिंह
अश्रु सर्वथा जीते होंगे, उत्कंठित स्वर हारा होगा। प्रणत दृष्टि से जब भी हे प्रिय! तुमने हमें निहारा होगा। अश्रु �
प्रेम की पगडंडी
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
चलो आज फिर एक पगडंडी चुनें, जहाँ पाँव से पहले दिल चल पड़ें। जहाँ शब्द ना हों, बस नयन बोलते, और चुप्पी में भी भाव छलक प�
आदमी झुकता वहीं है
प्रवीन 'पथिक'
आदतन आदमी झुकता वहीं हैं, जहाॅं उसने समय व्यतीत किया हो। समय, जो निरंतर आगे बढ़ता जाता है। हम बीते लम्हों में रुक ज�
सुना है गाँव में
हेमन्त कुमार शर्मा
सुना है गाँव में, सुबह के समय, कोयल अब भी कूकती है, टिटहरी सुर मिलाती है, गिनी चुनी चिड़ियाँ, चहचहाती हैं। और सुबह क
माशूका
प्रवीन 'पथिक'
बशर यूँ किसी से बेइंतहा मोहब्बत करता है। जिसके ख़्यालों में, शाम-ओ-सहर; जिसे पाने की चाहत में ताउम्र गुज़ार देता ह�
नई सड़क
मयंक द्विवेदी
जैसे सोलह शृंगार कर एक नवनवेली दुल्हन-सी जब गाँव में सड़क आती है बड़े-बुज़ुर्गों, बच्चों, युवाओं— सबके मन को भाती ह�
आत्मग्लानि
प्रवीन 'पथिक'
सोचता हूॅं, हार जाऊॅं उन लम्हों से, जिनसे लड़ते झगड़ते साल बीते। टूट कर बिखर गया जिनके लिए यूँ, हाथ खाली, हाल भी बदहा
स्त्री
संजय राजभर 'समित'
जेठ की दुपहरी में एक नव यौवना जिसके पीठ पर बंधा बच्चा है सिर पर ईंटे झुलसती हुई गर्म हवाएँ हैं, एक स्त्री कैसे झेल
छोटी-सी आशा
मदन लाल राज
बंजर धरती पर अंकुर क्या फूटा! उपजाऊ भूमि भी तिलमिला उठी। जब जुगनू की छोटी-सी आशा से अंधेरे में रोशनी झिलमिला उठी।
एक और अर्थ
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
कभी-कभी एक स्मृति अपना चेहरा उतारकर हमारी तरफ़ रख देती है, और हम समझते हैं ये हम हैं। पर वो हम नहीं— हमारी सम्भाव�
अधर पर सँवारूँ तुझे
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
साँझ की तीर पर बैठकर निहारूँ तुझे, स्वप्न की ओट से मैं पुकारूँ तुझे। भाव मेरे सिमटते रहें मौन में, शब्द बनकर अधर पर �
अवगुण सदा रहे हैं
हेमन्त कुमार शर्मा
अवगुण सदा रहे हैं, निश्चय भी सदा रहा। लाख बार गिर जाऊँ, फिर उठना है, मन में यह सदा रहा है, निश्चय भी सदा रहा है। भाव�
आदमी टूट जाता है
प्रवीन 'पथिक'
बहुत कुछ टूट जाता है, छूट जाता है; जब आदमी ख़ुद से रूठ जाता है। एक खालीपन से, उसका जीवन भर जाता है। जब वह खो जाता है, क�

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