एक दिन मैंने
अपनी पत्नी के सामने
अपनी पत्नी के ग़ुस्से का अभिनय किया
हँसते-हँसते हो गई वह लहालोट
इस तरह एक स्त्री अपने ग़ुस्से पर हँसी
और उसकी हँसी से मासूमियत
हुई बेहद मोहक और अथाह
यहाँ एक विमर्श बनता है
कि अपने ग़ुस्से पर हँसते हुए एक स्त्री ने
एक पुरुष के ग़ुस्से का प्रतिकार किया
यह अलग बात है कि पुरुष उसे
ठीक से पहचान पा रहा है या नहीं

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
सहयोग कीजिएप्रबंधन 1I.T. एवं Ond TechSol द्वारा
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें
