प्रिये! तुम्हारे अश्रु दल जब,
अंजुरी को भेद पाए।
अंकुरण फिर लौट आए।
हो गया आँगन सहर्षित,
आश्रुओं ने जीत देखी।
पल्लवों के स्वप्न जागे,
मौन ने फिर प्रीत देखी।
आज फिर से नेह ने उस,
शून्य का है हेतु साधा।
आज फिर से उस प्रतीक्षा,
ने पुनः नव-सेतु बाँधा।
देखकर नव-सेतु बंधन,
शुष्क मरुथल की शिरा में,
प्राण के रस मुस्कुराए।
अंकुरण फिर लौट आए।
वेदना की धार ने फिर,
धैर्य का संयम है तोड़ा।
भाग्य की रेखाओं ने फिर,
नेह से है नेह जोड़ा।
धूल में सोए सपन अब,
पंख को खोले खड़े हैं।
आज फिर चातक यहाँ पर,
बूँद को पाने बढ़े हैं।
फिर यहाँ चातक के उस,
चिर कलित विश्वास के अब,
क्षण सुखद हैं जाग पाए।
अंकुरण फिर लौट आए।
धूल में सोई हुई जो,
गंध फिर से जाग आई।
सुप्त-से दीपक हृदय के,
पात्र में लौ जाग पाई।
प्रिये! तुम्हारी जलनिधि ने,
पतझड़ों में प्राण फूँके।
बन गई वो नीर रेखा,
वो सुमन जागे जो सूखे।
हर सुमन के जागने की,
वो मृदु आहट पुराने,
मोड़ पर हम देख पाए।
अंकुरण फिर लौट आए।

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