अंतिम विदाई (कविता)

प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब
दी हमें अंतिम विदाई

जब तुम्हारे नेत्र से प्रिये,
अश्रु की वो धार आई।
प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब,
दी हमें अंतिम विदाई।

​मौन होकर रह गया था,
वो मिलन का आख़िरी पल।
थे प्रकंपित अधर मेरे,
और नयन थे वो सजल।

इस हृदय की वीथिका से,
निर्झरी निर्झर बही थी।
अब मिलन होगा कभी न,
बात जब तुमने कही थी।

भाग्य ने भी मोड़ पर है,
जब विकट स्थिति बनाई।
प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब,
दी हमें अंतिम विदाई।

अब तुम्हारे साथ में प्रिये!
रात भर न बात होगी।
ज़िंदगी में बस तुम्हारी,
वो अधूरी याद होगी।

दूर तुमसे मैं रहूँगा,
पर हृदय में तुम बसोगी।
रात भर रोता रहूँगा,
तुम तो जीवन भर हँसोगी।

था लिखा जो हस्त रेखा,
में वही संताप पाया।
होंगे हम भी अलग ही,
ये हृदय न सोच पाया।

​काँपते हाथों ने तब भी,
याद तेरी थी छुपाई।
प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब,
दी हमें अंतिम विदाई।

पथ थके, पदचाप बिखरे,
और दिशाएँ रो पड़ी थीं।
सांत्वना देने हृदय को,
संग मेरे हो पड़ी थीं।

​अब दिवस की रोशनी में,
छाँव तेरी ढूँढ़ता हूँ।
तुम जहाँ से मुड़ गई थी,
उस ही पथ को पूजता हूँ।

कल्पना की वीथिका में,
चित्र तेरा ही रहेगा।
नयन से गिरता हुआ जल,
अब तो ये अविरल बहेगा।

इस विरह की क्रूरता ने,
प्रीत की प्रतिमा गिराई।
प्रिये! तुम्हारे नेत्र ने तब,
दी हमें अंतिम विदाई।


  • विषय : -  
लेखन तिथि : 2026
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