आ गया भादों का पानी
काँस के फूलों को दुलारता
और चैत की सुलगती दोपहरी में
पड़ी है मन की चट्टान
एक दूब की हरियाली तक मयस्सर नहीं
तपो
इतना तपो ओ सूर्य
कि फट जाए
दरक जाए यह चट्टान
कि रास्ता बन जाए अंकुर फूटने का
जीवन
बीज से फूल तक
यात्रा बन जाए।

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
सहयोग कीजिएप्रबंधन 1I.T. एवं Ond TechSol द्वारा
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें
