साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
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कटनी, मध्य प्रदेश
1966
चरखा अब चलता नहीं, खादी होती लुप्त। फ़ैशन ऐसा चल रहा, अंग दिख रहे गुप्त।।
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