साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3638
अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश
1938 - 2000
हँसते-हँसते होंठों की हँसी छीन लेते हैं लोग देखते-देखते आँखों की रोशनी बोलते-बोलते छीन लेते हैं शब्द बाक़ी रह जाता है एक लंबा इम्तिहान सब कुछ दाँव पर लग जाता है यक-ब-यक शुरू हो जाता है हार का सिलसिला यहाँ तक कि ख़ुद को भी हार जाना पड़ता है एक दिन कहाँ काम आता है ऐसे में कोई बच रहता है केवल रोज़-रोज़ का आत्मघात।
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