साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3595
बरेली, उत्तर प्रदेश
1940
दूसरों को मिटाने की धुन में आदमी ख़ुद को यूँ मिटाता है जैसे चुभने की फ़िक्र में काँटा शाख़ से ख़ुद ही टूट जाता है
अगली रचना
पिछली रचना
साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें