ग़ैरों पे करम अपनों पे सितम
ए जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर
रहने दे अभी थोड़ा सा भरम
ए जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर
हम चाहने वाले हैं तेरे
यूँ हम को जलाना ठीक नहीं
महफ़िल में तमाशा बन जाएँ
इस तरह बुलाना ठीक नहीं
मर जाएँगे हम मिट जाएँगे हम
ए जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर
हम भी थे तिरे मंज़ूर-ए-नज़र
दिल चाहे तो अब इंकार न कर
सौ तीर चला सीने पे मगर
बेगानों से मिल के वार न कर
तुझ को तिरी बेदर्दी की क़सम
ए जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
सहयोग कीजिएप्रबंधन 1I.T. एवं Ond TechSol द्वारा
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें
