हे अरुणोदय के प्रथम अंशु!
हे निशा निमंत्रण के द्योतक!
हे मृदुभावों के कन्त हार!
हे दिग दिगंत के विद्योतक!
तुम प्रेम-विरह की अनुभूति,
तुम पथ-साथी खद्योत नवल।
तुम स्वयं कलश मधु का जीवन,
तुम मधुशाला का अमर कंवल।
तुम प्रणय-पत्रिका का परिचय,
तुम क्षण भर जीवन की आशा।
तुम शृंगारों का स्वप्न हार,
तुम नयन कोर की परिभाषा।
तुम जीवन की तरुणाई भी,
तुम लहरों का हो हृदयगान।
तुम विभावरी की काँति धवल,
तुम स्वयं व्यथाओं का निदान।
तुमने जीवन को जिया सदा,
तुमने जीवन को लिखा सदा।
तुमने कविता जीवंत किया,
हर शब्द शिखर पर दिखा सदा।
जो बीत गई सो बात गई,
ये शब्द तुम्हारे अमर हुए।
क्या भूलूँ क्या याद करूँ,
हर शब्द तुम्हारे भ्रमर हुए।
तुमने हिन्दी को अमर किया,
तुमसे हिन्दी का अंश रहे।
तुम सदा सूर्य सा नित चमको,
और नाम अमर 'हरिवंश' रहे।

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