साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3619
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
सबको बहुत लुभाता है जाड़े का मौसम। महल, झोपड़ी, गाँव शहर हो। या फिर दिन के आठ पहर हो।। कभी कभी तो लगता है भाड़े का मौसम। कंबल, स्वेटर और रजाई। ठिठुरन की तो शामत आई।। लुटी धूप ने कहा दिन- दहाड़े का मौसम।
अगली रचना
पिछली रचना
साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें