लूट लिया, इस पल को किसी ने,
कोई हर पल, लुटाता रहा
अक्सर कल की चाह में, बशर,
अपना ये आज गँवाता रहा।
ना मिली, ना मिलेगी दौलत इतनी
कि आरज़ू, कम हो कभी
ख़र्च लिया ख़ुद पे, किसी ने इसे
कोई उम्र भर कमाता रहा।
यूँ तो जीवन, की कश्मकश में,
बैठा रूठ कर, है हर कोई
झुक कर किसी ने, बचाए रिश्तें
कोई उम्र भर, पछताता रहा।
ऐसे तो, हर किसी जीवन में,
सुर-ओ-साज, बिखरा है पड़ा
बाँध लिया समा, किसी ने यहाँ
बेबसी का गीत, कोई गाता रहा।
माना कि, सफ़र-ए-जिंदगानी,
मुश्किलों से लबालब, है हर पल
हँसकर काट लिया, किसी ने इसे
कोई ख़ुद को, बस रूलाता रहा।

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