मैं उस की आँखों से छलकी शराब पीता हूँ (ग़ज़ल)


मैं उस की आँखों से छलकी शराब पीता हूँ
ग़रीब हो के भी महँगी शराब पीता हूँ

मुझे नशे में बहकते कभी नहीं देखा
वो जानता है मैं कितनी शराब पीता हूँ

उसे भी देखूँ तो पहचानने में देर लगे
कभी कभी तो मैं इतनी शराब पीता हूँ

पुराने चाहने वालों की याद आने लगे
इसी लिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ


रचनाकार : हसरत जयपुरी
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