साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3574
कटनी, मध्य प्रदेश
1966
पूष को सूर्य किरण रही है बुहार! जाड़े में हैं जम गईं रातें! कंबल ऊनी शाल के नाते! बाग़ में मँडराते अलि की गुहार! है पहाड़ों पर कोहरा घना! पारा लुड़का मौसम अनमना! खिल रहे फूलों की सूर्य को जुहार!
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