निशा चली है स्वप्न ब्याहने
जलता दीपक मिले चाह में
झूठे मन से झूठे सपनों को मेरे आकार न दीजै
नहीं बात करनी मत कीजै।
बेशक मेरी प्रीत नकारो
प्रणय निमंत्रण तुम स्वीकारो
तुम्हें भुलाने को साकी से और कहेंगे मदिरा दीजै
नहीं बात करनी मत कीजै।
इससे ज़्यादा क्या खोना है
तुमको खोकर क्या पाना है
पत्थर में भी आँसू देखे पर कब निष्ठुर हृदय पसीजै
नहीं बात करनी मत कीजै।

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