तेरा प्रेम हलाहल प्यारे, अब तो सुख से पीते हैं।
विरह सुधा से बचे हुए हैं, मरने को हम जीते हैं॥
दौड़-दौड़ कर थका हुआ है, पड़ कर प्रेम-पिपासा में।
हृदय ख़ूब ही भटक चुका है, मृग-मरीचिका आशा में॥
मेरे मरुमय जीवन के हे सुधा-स्रोत! दिखला जाओ।
अपनी आँखों के आँसू से इसको भी नहला जाओ॥
डरो नहीं, जो तुमको मेरा उपालंभ सुनना होगा।
केवल एक तुम्हारा चुंबन इस मुख को चुप कर देगा॥

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