पुकार थी,
सो चुना शिखर।
पता चला—
राख पुकार,
बढ़े क़दम थे-झूठ।
पर शिखर,
सबसे करता न्याय,
न्याय—
लोगों का उचित।
लोग—
जो सीखा उन्होंने,
लिखा खड़िया से स्लेट पर,
रटा पहाड़े की तरह,
जैसे कुछ और नहीं,
इससे आगे,
सीखने को—
कि आनंद शिखरों पर।
हमसे बाहर,
हमारा यतीम आनंद।
घिसने का,
टूटने का आनंद।
अकेला कंधा,
जिसे कोई न हीं दबाता,
उसका आनंद।
मेरे बाहर तिरा आनंद,
जिसे—
लपक लेते लोग,
फिर कहते—
तुम्हारा,
सिर्फ़ तुम्हारा...।
जैसे—
सन्नाटे के आँसू,
मन में कुढ़ता छंद,
पत्थर पर माथे का ख़ून,
माँ की बढ़ती झुर्रियाँ...

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