सुना है गाँव में,
सुबह के समय,
कोयल अब भी
कूकती है,
टिटहरी सुर मिलाती है,
गिनी चुनी चिड़ियाँ,
चहचहाती हैं।
और सुबह के मौन को तोड़,
कहीं कोई श्वान भौंकता है।
आम के पेड़ बस नाम के बचे हैं,
कोयल फिर भी गाती है।
गाती है पीड़ा को,
कम होते वन,
पेड़ और गाँव को।
नंगे पैर ओंस भरी घास पर फिरना,
सैर करना अब विगत की बातें हैं।
सुना है गाँव में,
कोयल अब भी
कूकती है।
किसी खेत में मोर मिल जाता है,
जिसके पंख पवन की थिरकन लिए,
खिलखिला उठते हैं।
और बोलते हैं मौन को,
अन्तर के मौन को,
वन के अलोप होते पेड़ को,
जिसे नगर अजगर निगल रहा है,
आकाश को छुती सड़कें,
गाँव की कच्ची सड़क से मात खा जाती हैं।
सुना है गाँव में,
सुबह के समय,
कोयल अब भी कूकती है।

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