तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी (ग़ज़ल)

तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी रिहाई तो नहीं माँगी थी

मैं ने क्या जुर्म किया आप ख़फ़ा हो बैठे
प्यार माँगा था ख़ुदाई तो नहीं माँगी थी

मेरा हक़ था तिरी आँखों की छलकती मय पर
चीज़ अपनी थी पराई तो नहीं माँगी थी

अपने बीमार पे इतना भी सितम ठीक नहीं
तेरी उल्फ़त में बुराई तो नहीं माँगी थी


रचनाकार : हसरत जयपुरी
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