साहित्य रचना : साहित्य का समृद्ध कोष
संकलित रचनाएँ : 3574
पश्चिम बर्धमान, पश्चिम बंगाल
1958
दो दिन की मुलाक़ात में दुनिया बदल गई थी। हम तुम में खो गए थे तुम मुझमें खो गई थी।। तन्हाईयों में पाकर किया प्यार मुझको जी भर पागल सा कर दिया था पागल सी हो गई थी।। है बात दोपहर की हम-तुम थे खोए-खोए जी भर रुलाया मुझको और ख़ुद भी रो रही थी।। कैसे रहेंगे हम-तुम होकर जुदा बता दो, हम तुमसे कह रहे थे तुम मुझसे कह रही थी।।
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