तुम से जीवन का क्षण-क्षण गुंजित,
कण-कण अनुरंजित है!
तुम मानस में स्वर-रूप-रंग-रस
बन कर लहराई हो,
अनदेखे अंतर्शतदल पर
परिमल बन कर छाई हो;
मेरे उर का सर्वस्व आज
उन नयनों में सस्मित है!
तुम से जीवन का क्षण-क्षण गुंजित,
कण-कण अनुरंजित है!
जब मुस्कानों के हंस दूत
संदेश हृदय का लाए,
पहचान प्राण को प्राण—
सहज मधुबंधन में बँध पाए!
दो पथिक अपरिचित दूरागत,
अंतर्चित चिर-परिचित है!
तुम से जीवन का क्षण-क्षण गुंजित,
कण-कण अनुरंजित है!

साहित्य और संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है। आपके द्वारा दिया गया छोटा-सा सहयोग भी बड़े बदलाव ला सकता है।
सहयोग कीजिएप्रबंधन 1I.T. एवं Ond TechSol द्वारा
रचनाएँ खोजने के लिए नीचे दी गई बॉक्स में हिन्दी में लिखें और "खोजें" बटन पर क्लिक करें
