यह जो स्वतंत्रता दिवस है।
कितने जीवन भूनने पर,
और कितने घर फूँकने पर,
दृशित यह वरदान हुआ।
सुभाष की आशा का,
बिस्मिल की भाषा का।
गुंजित सुगान हुआ।
टुकड़ों के,
ज़ख़्मों से थी,
आहत माँ भारती।
भरे मन से,
जन ने,
की थी आरती।
भारत की अक्षुण्णता का,
विघटन की पीड़ा का,
भान रहे।
सदा भारत की शान रहे।

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