एकान्त
नमन शुक्ला 'नया'
जूठनें ना उठाई, न जूठा पिया। इसलिए दूर संसार ने कर दिया। मोह, संकोच, सम्बन्ध सब त्यागकर, आत्म सन्तोषवश सत्य ही कह सक�
पुरुष होना कहाँ आसान है
चीनू गिरि गोस्वामी
कहना जितना आसान तुम पुरुष हो, मगर पुरुष होना कहाँ आसान है! पुरुष के सिर पर है ज़िम्मेदारी सारी, पत्नी मेरा हक़ है तुम �
विरह गाते हो
ममता शर्मा 'अंचल'
जब मन होता है आते हो। जब जी चाहे तब जाते हो।। आते जाते बिना बताए, हमको अक्सर चौंकाते हो। या तो तुम मनमौजी हो जी, या �
निरपेक्ष
ममता शर्मा 'अंचल'
अब क्या लिखा है पत्र में तेरी मैम ने? ओह! पत्र नहीं मैसेज में? पत्रों के ज़माने अब कहाँ रहे! मैसेज आते-जाते हैं अब तो मोब
इसका पैमाना क्या होता है
ममता शर्मा 'अंचल'
सब की नज़रों से गिर जाना क्या होता है। बोलो गिरकर फिर उठ पाना क्या होता है।। कैसे कहा गिरा कोई सबकी नज़रों से, कहो ज़र�
जो धरती पर थे
ममता शर्मा 'अंचल'
जो धरती पर थे अब भी हैं धरती पर ही, उनसे सीखो क़दम जमाना क्या होता है।
धब्बे
ममता शर्मा 'अंचल'
मेरी दैवीय (मोटी सी) दैहिक संरचना को देख-देख कर कब मेरी बहन ने मुझे 'गोलू' और गोलू से 'गुल्लड़' की उपाधि से विभूषित कर डा�
नारी शक्ति: आदिशक्ति
सुधीर श्रीवास्तव
आदिशक्ति जगत जननी का इस धरा पर जीवित स्वरूप हैं हमारी माँ, बहन, बेटियाँ हमारी नारी शक्तियाँ। जन्म से मृत्यु तक कि
कम बोलें, मीठा बोलें
सुधीर श्रीवास्तव
एक आम कहावत है कि अधिकता हर चीज़ की नुकसान करती है, फिर भला अधिक बोलना इससे अछूता कैसे रह सकता है। हम सबको अपने आप की व�
छुटकी
सुधीर श्रीवास्तव
दिसंबर 2020 के आखिरी दिनों की बात है। सुबह सुबह एक फोन कॉल आता है। नाम से थोड़ा परिचित ज़रूर लगा, परंतु कभी बातचीत नहीं ह�
वतन से जुड़ो
नमन शुक्ला 'नया'
आज तक तुम जिए हो, कलह-स्वार्थ में, अब तनिक राष्ट्र के संगठन से जुड़ो। जाति, भाषा, धरम, प्रान्त सब भूल कर, हिन्द की पूज्
दिन प्यारे गुड़धानी के
अब्दुल मलिक ख़ान
तान तड़ातड़-तान तड़ातड़ पानी पड़ता पड़-पड़-पड़! तरपट-तरपट टीन बोलते, सूखे पत्ते खड़-खड़-खड़। ठुम्मक-ठुम्मक झरना ठ�
फूलों सा तुम खिलते रहना
समुन्द्र सिंह पंवार
नेकी के रास्ते पर चलते रहना, प्यार से आगे बढ़ते रहना। सफलता रुक नहीं सकती, मेहनत तुम करते रहना। राहों में हैं काँ�
बड़ा झमेला है
अविनाश ब्यौहार
गाँव लगे हैं ठीक शहर में- बड़ा झमेला है। दरका-दरका लग रहा आकाश। है चुभ रहा काँटों सा भुजपाश।। तारे तो हैं मगर स्�
दो बातों को सहना सीखो
अविनाश ब्यौहार
दो बातों को सहना सीखो। औ नदिया सा बहना सीखो।। कोई शख़्स गले पड़ जाए, बेबाकी से कहना सीखो। आलीशान महल दे डाला, इन मह�
सख़्त शहर नहीं क़बीले हैं
अविनाश ब्यौहार
सख़्त शहर नहीं क़बीले हैं। हरकत से ढीले-ढीले हैं।। लगे हुए जो घर के सम्मुख, कनेर वे पीले-पीले हैं। बादाम-दशहरी या चौ
चिड़िया
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
एक चिड़िया चमन में चहकने लगी, जनक अँगना बहारें महकने लगी। काँध बेटी चढ़े पग चले पग धरे, तात की लाड़ली ख़्वाब पूरे कर�
मरहम
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
ज़ख़्म बहुत गहरे हैं उनके, हर आँख यहाँ भीगी है। किस किसके आँसू पोछेंगे, मानवता ही ज़ख़्मी है।। मरहम ही कम पड़ जाएगा, तन
मेंहदी हाथ में झिलमिलाए सदा
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
मेंहदी हाथ में झिलमिलाए सदा। संग ख़ुशियाँ सुता की सुनाए सदा।। पत्तियाँ बाग़ से तोड़ के लाड़ली, हस्त प्रिय प्रेम दु�
शिवशरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'
विमल कुमार 'प्रभाकर'
हिन्दी साहित्य के सुविख्यात वरिष्ठ कवि, लेखक, आलोचक, सुधी सम्पादक शिवशरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' समकालीन साहित्य में
सौन्दर्यस्थली कालाकाँकर
विमल कुमार 'प्रभाकर'
प्राकृतिक सौन्दर्य की सुरम्यस्थली कालाकाँकर में मैंने अपने जीवन के सुखद दो वर्ष बिताएँ हैं। मैं बी.एच.यू से कालाक�
विश्वास
सैयद इंतज़ार अहमद
मंज़िल इतनी भी दूर नहीं, कि ख़ुद चल कर, उसे पा न सके, हालात हमारे, इतने न विकट कि अपनों को आज़मा न सके। थोड़ी कोशिश बस बाकी
नसीहत
सैयद इंतज़ार अहमद
दूसरों को दोष मत दो, अपनी कारदानियों का। ख़ुद से उपजाई, बे-तुकी परेशानियों का।। तुम ही तो ज़िम्मेदार हो अपनी विफलता�
मध्यम वर्ग
सैयद इंतज़ार अहमद
संघर्ष करते रहो, कयोंकि तुम मध्यम वर्ग हो, तुम किसके काम के हो, जो कोई तुमको सहारा देगा। तुम में से आगे निकल चुके, ज�
तुम्हारी कमी
प्रवीन 'पथिक'
राधिके! आज तुम्हारी कमी, महसूस हो रही है मन को। लगता कोई नहीं है मेरा, तुम्हारे सिवा। कभी डाँटना तो सुन लेती चुपचा�
जब यादें उनकी आती
प्रवीन 'पथिक'
जब यादें उनकी आती, आँखें-आँसू भर लाती। थी जब साथ वो मेरे, रहता दुःख अधिक घनेरे। आँखों में सपनें उनके, लेकर ख़ुशियाँ �
फागुन में
पारो शैवलिनी
उनकी यादें सताने लगे फागुन में। कोयलिया कूकी डारी पे लगा मुझे तुम बुला रही हो। बंशी सी माधुरी सूरों में सरगम डोर ब
यही सोचता हूँ
पारो शैवलिनी
लिखूँगा तुम पे ग़ज़ल, हर रात यही सोचता हूँ। बनेगी या नहीं कोई बात यही सोचता हूँ।। तुमसे कुछ कह ना सका इसका मलाल है मुझ
यही सच है
पारो शैवलिनी
यही सच है, कि- ज़िन्दगी है तो मौत भी होगी। फिर, मौत से डरना कैसा? बावजूद, हमने देखा है हर शख़्स को ताकते हुए दूर कहीं श�
आँखों में आँसू होठों पे नग़्मा
पारो शैवलिनी
आँखों में आँसू होठों पे नग़्मा दिल में उदासी, होगी क्या इससे बुरी हालात यही सोचता हूँ।
सौतेला
सुधीर श्रीवास्तव
माँ को रोता देख रवि परेशान सा हो गया। पास में बैठे गुम-सुम बड़े भाई से पूछा तो माँ फट पड़ी। उससे क्या पूछता है? मैं ही बत
जीवन में हर व्यक्ति को...
विमल कुमार 'प्रभाकर'
जीवन में हर व्यक्ति को अपना कीर्तिमान स्थापित करना पड़ता है। जीवन में परिश्रम ख़ूब करना चाहिए इससे जीवन निखरता है�
पुनः धर्मयुद्ध
मनोज यादव 'विमल'
बस काल-काल में अंतर है, और समय में थोड़ा परिवर्तन है। नही तो द्युत सभा तो आज भी जारी, और सत्ता का भरपूर समर्थन है। धृ
ख़्वाहिश है बोलता ही रहूँ
मनोज यादव 'विमल'
ख़्वाहिश है बोलता ही रहूँ। वहाँ तक, जहाँ तक धरती दम तोड़ती हो। वहाँ तक, जहाँ तक आकाश का किनारा हो। वहाँ तक, जहाँ तक किस�
प्रेयसी का ख़त
मनोज यादव 'विमल'
बंद लिफ़ाफ़े में आया, मेरी प्रेयसी का ख़त छुपते-छुपाते आया, मेरी प्रेयसी का ख़त। लिफ़ाफ़े की कोर-कोर कुंद हो गई थी लगता ह
महँगाई
कर्मवीर 'बुडाना'
गैस सिलेंडर महँगा क्या हुआ, बस्ती का हर चूल्हा अब सुर्ख़-ओ-राख़ हुआ। माँओं ने बड़ी कुशलता से सीख लिया था गैस चूल्हा चल�
मेरा मुस्तक़बिल नज़र आता हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
सुनकर ये मधुर धक-धक की आवाज़ ये सच मन में जागा है, हो न हो दिल रुपी सरिता में तेरे नाम का कंकड़ तसव्वुर ने फेंका है। तुम
तन्हाई को लगी हैं उम्र तो लगने दें
कर्मवीर 'बुडाना'
तन्हाई को लगी हैं उम्र तो लगने दें, ज़िंदा रहना हैं तो घर पर रहने दें। जिसने बेचा हैं ईमान दूकानदारी में, लानतें आएग
संघर्ष सफलता की कुंजी है
मधुस्मिता सेनापति
संघर्ष एक ऐसा अनुभव है, जो जीवन में आने वाली हर एक पड़ाव को पार करने के लिए एक मूल्यवान अस्त्र के तरह हमारे सामने आ खड
स्त्री तू ही क्यों?
मधुस्मिता सेनापति
स्त्री तू ही क्यों अपने शब्दों को मिटाकर अपने ही एहसास को मन में ही मार देती है...! स्त्री तू ही क्यों अपने भीतर की श
मज़दूर की क़िस्मत
समय सिंह जौल
ऊँचे कँगूरे किलों में, मीनार और महलों में, अपना ख़ून पसीना लगाता हूँ। संगमरमर से सुंदर दीवार सजाता हूँ।। शाम को चटन
टेक्नोलॉजी और शिक्षा
समय सिंह जौल
प्रौद्योगिकी विषय अंग्रेजी में टेक्नोलॉजी के नाम से जाना जाता है। यह एक ग्रीक शब्द "टेकनॉलाजिया" से लिया गया है जह�
मेरी प्रिय
समय सिंह जौल
तुझको ना देखूँ तो मन घबराता है, तुझ से बातें करके दिल बहल जाता है। मेरा खाना पानी भूल जाना, तुझे भूखी देखकर तुरंत खा�
प्रेम की फ़सल
रोहित गुस्ताख़
वक़्त के साथ सोहन भी बड़ा हो रहा था, जिस क़बीले में वो रहता था। वहाँ अक्सर लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौज लोग एक दूसरे को बिल्कुल न�
शाम ढले घर का रस्ता देख रहे थे
रोहित गुस्ताख़
शाम ढले घर का रस्ता देख रहे थे। कुछ क़ैद परिन्दे पिंजरा देख रहे थे।। सब बच्चे देख रहे थे खेल खिलौने, और मियाँ हामिद �
कोरोना योद्धाओं को सलाम
संस्कृती शाबा गावकर
कोरोना वैश्विक महामारी ने अब तक पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया है। दुनिया भर में इस वाइरस की वजह से संक्रमण तथ
शिक्षित बेरोज़गारी की समस्या
संस्कृती शाबा गावकर
"तड़प रही है भूखी जनता, विकल मनुजता सारी। भटक रहे है नवयुवक देश के, लिए उपाधियाँ भारी॥ काम नहीं, हो रहे निकम्मे, भारत क
उसकी अब रहबरी हो गई है
दिलशेर 'दिल'
उसकी अब रहबरी हो गई है। ज़ीस्त आसान सी हो गई है।। हर तरफ़ रोशनी हो गई है, शायरी जब मिरि हो गई है। अब अकेले नहीं चल सकू�
उसकी अब रहबरी हो गई है
दिलशेर 'दिल'
उसकी अब रहबरी हो गई है। ज़ीस्त आसान सी हो गई है।।
रोशनदान
मनोज यादव 'विमल'
खुली किताब से धूल झाड़ लो तो पूछो, नई सुबह का आग़ाज़ देख लो तो पूछो। कहीं कुछ भूल तो नही गए हो घबराहट में तुम, ज़रा भूल को �
आओ मिल कर पेड़ लगाएँ
गणपत लाल उदय
आओं सभी मिल कर पेड़ लगाएँ, पर्यावरण को साफ़ स्वच्छ बनाएँ। पेड़ो से ही मिलती है ऑक्सीजन, जिससे जीवित है जीव और जन।। �
संविदा शिक्षक का दर्द
शमा परवीन
मास्टर साहब हमारा बक़ाया कब दोगे? भाई दे दूँगा तनख्वाह आने दो। अगर आप हमारे मुन्ने को कुछ दिन पढ़ाये ना होते तो कसम स
बस यही कहानी है
शमा परवीन
पापा की परियों की बस यही कहानी है, आँखो मे है सपने और थोड़ा सा पानी है। जुनून है हौसला है आगे बढ़ने के लिए, इस लिए सब �
कहानी नहीं हैं
शमा परवीन
माना कि मुझमें अभी वो रवानी नहीं हैं, लेखनी निखार दे वो कहानी नहीं हैं। कोशिश भी ना करूँ गिर कर उठने की, इतनी कमज़ोर �
इश्क़ से गर यूँ डर गए होते
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
इश्क़ से गर यूँ डर गए होते। छोड़ कर यह शहर गए होते।। मिल गए हमसफ़र से हम वर्ना, आज तन्हा किधर गए होते। होश है इश्क़ में �
सौंदर्य
सतीश मापतपुरी
तुम खुले केश छत पे ना आया करो, शब के धोखे में चँदा उतर आएगा। बेसबब दाँत से होंठ काटो नहीं, क्या पता कौन बे-वक़्त मर जाए�
मन
रमेश चंद्र बाजपेयी
मन से उत्पन्न हुए कई विकार मन से बनी कितनी ही बातें, मन ही देता है अभिव्यक्ति जिसने दी कल्पना की सौग़ातें मन के लड्�
संघर्ष
सलिल सरोज
जीवन की शुरुआत के बारे में कोई निर्णायक सबूत नहीं है। हमने अनुमान और शोध किए हैं। हम सच्चाई के बहुत क़रीब आ गए हैं, या�
हे जगत जननी! तुझे प्रणाम
राम प्रसाद आर्य
गोद में बालक है, कर में बालटी, या सर में डलिया खाद गोबर, या है गट्ठा लकड़िया या घास भारी, सर पे इतना बोझ, उसके रोज़ है। प
जाने क्यों लोग
राम प्रसाद आर्य
जाने क्यों लोग राह से यों, भटक जाते हैं। जाने क्यों लोग...।। दर्द सह लेते हैं, दवा नहीं लेते हैं। दर्द सस्ता, दवा को म�
जलना उचित है
दीपक राही
उन सब धारणाओं का, जलना उचित है, जो करती है भेद, मनुष्य का मनुष्य से। मेरा जलना उचित नहीं, उन सब विचारों का, जलना उ�
जवानी
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
हँसाए जवानी रुलाए जवानी। अजी रंग कितने दिखाए जवानी।। मिले मुश्किलें ज़िंदगी में हमेशा, कि हर मोड़ पर आज़माए जवानी।
माँ कात्यायनी वन्दना
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
हे! मात! नत मस्तक नमन नित, वन्दना कात्यायनी। अवसाद सारे नष्ट कर हे, मात! मोक्ष प्रदायनी। हे! सौम्य रूपा चन्द्र वदनी, �
शारदे वन्दना
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
तुम्हें कर जोड़कर माँ शारदे प्रणाम करता हूँ। हमें सुरताल दो माता तुम्हारा ध्यान करता हूँ। मिटाकर द्वेष माँ मेरे ह
माँ अम्बे स्तुति
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
नमामि मातु अम्बिके त्रिलोक लोक वासिनी! विशाल चक्षु मोहिनी पिशाच वंश नाशिनी!! समस्त कष्ट हारिणी सदा विभूति कारिणी!
गणेश वंदना
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
पधारो देव शिवनंदन। करूँ मैं आपका वन्दन। न पूजा पाठ पूरा है। तुम्हारे बिन अधूरा है। प्रथम तुम पूज्य प्रथमेश्वर।
अवध में जन्मे हैं श्रीराम
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
हुए सब हर्षित हैं पुर ग्राम। अवध में जन्मे हैं श्रीराम। बज रहे ढोल नगाड़े साज। छा गईं घर घर ख़ुशियाँ आज। मचा है चहुँ
कृष्ण वन्दन
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
जय मोहन माधव श्याम हरे। मधुसूदन रूप ललाम धरे।। धर ध्यान करूँ विनती मन से। अँधियार मिटे इस जीवन से।। प्रभु निर्मल
आवारा परदेशी
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
मै आवारा परदेशी हूँ, मेरा नही ठिकाना रे, ओ मृग नयनों वाली सुन ले, मुझसे दिल न लगाना रे। जब तीर नज़र का किसी जिगर को पा�
क्या तुम मेरे हो
प्रवीण श्रीवास्तव
सर्वस्व त्याग किया मैंने, प्रेम भी, दुख भी, और वह अहसास भी जो कभी मन में था कि तुम मेरे हो, तुम मेरे हो। जीवन मे तुम्ह�
आशा दीप
सुषमा दीक्षित शुक्ला
आओ आशा दीप जलाएँ। अंधकार का नाम मिटाएँ।। फूलों से महकें महकाएँ, दुखियारों के दुःख मिटाएँ। रूह जलाकर ज़िंदा रहना,
सदा सुखी रहो बेटा
सुषमा दीक्षित शुक्ला
रिटायर्ड इनकम टैक्स ऑफिसर कृष्ण नारायण पांडे आज अपनी आलीशान कोठी में बहुत मायूसी महसूस कर रहे थे, क्योंकि उनकी दो �
जगत जननी दुर्गमा
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हे! माँ जगत जननी दुर्गमा, अब विश्व का कल्याण कर दे। हम सभी तो शिशु तुम्हारे, प्यार का आँचल प्रहर दे। हे! दयामयि हे! �
समर्पण
अभिषेक अजनबी
हम बुलाते रहे, वह भूलाते रहे। इश्क़ में ख़ूब जलते जलाते रहे।। वह हमें छोड़ करके चले ही गए, हम उन्हें आज तक गुनगुनाते �
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम। बनो तो मिरी शोअरा तुम।। ये सोना ये चाँदी ये हीरा, है खोटा मगर हो खरा तुम। तिरा ज़िक्र हर बज़�
नज़ारे
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
देखते ही खूबसूरत नज़ारे... एक चित्रकार उतार लेता है नज़ारों को कैनवास पर, एक फ़ोटोग्राफ़र क़ैद कर लेता है उन नज़ारों को कै
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
सुनो तो मुझे भी ज़रा तुम, बनो तो मिरी शोअरा तुम।
आबादी अवसर या अवसाद
परमजीत कुमार चौधरी 'सोनू'
आज जनसंख्या दिवस है यानी 11 जुलाई 2021। आज के दिन में ही उत्तर प्रदेश की सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण क़ानून की ड्राफ्ट पे�
सतत विकास में कहाँ हैं हमारा समाज?
परमजीत कुमार चौधरी 'सोनू'
हमारा देश और समाज निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर है और हमने काफी सारे उपलब्धियां भी हासिल की है। परंतु क्या हमारा समा�
क्या क्या देखा
अंकुर सिंह
बदला इंसान नही, हटा उसका मुखौटा देखा। मैने तो बदलते ज़ुबान अरु, पलटते इंसान को देखा।। भाई-भाई में जंग लड़ते देखा, प�
कोख का बँटवारा
अंकुर सिंह
रामनारायण के दो बेटों का नाम रमेश और सुरेश है। युवा अवस्था में रामनारायण के मृत्यु होने के बाद उनकी पत्नी रमादेवी �
कमी हैं एक दोस्त की
चीनू गिरि गोस्वामी
जो बिन कहे, मेरा हाल समझ ले! ख़ुद तो पागल हो, मुझे भी पागल कर दे! अल्फ़ाज़ कम, ख़मोशी ज़्यादा समझे! उदासी में भी हँसा दे,
मिलेगी एक दिन मंज़िल
ममता शर्मा 'अंचल'
मिलेगी एक दिन मंज़िल अभी यह आस बाक़ी है। अजी मकसद अभी तो ज़िंदगी का ख़ास बाक़ी है।। रहेगा कुछ दिवस पतझड़ उसे हँस कर गुज़ार�
तन पर यौवन
ममता शर्मा 'अंचल'
ओ रे बचपन! फिर से सच बन। मायूसी में, ख़ामोशी में, चिंताओं में, दुविधाओं में, निर्धनता में, नीरसता में, पीर भुलाकर कर �
मिलेगी एक दिन मंज़िल
ममता शर्मा 'अंचल'
मिलेगी एक दिन मंज़िल अभी यह आस बाक़ी है। अजी मक़सद अभी तो ज़िंदगी का ख़ास बाक़ी है।।
उपहार
सुधीर श्रीवास्तव
हमें जो मिला है ये मानव शरीर इस पर गर्व कीजिए, इसे ईश्वर से मिला ख़ूबसूरत उपहार समझिए। उपहार मिलने पर जैसे हम नाचत�
ख़ुद का निर्माण करें
सुधीर श्रीवास्तव
मानव जीवन अनमोल है, इस बात से इंकार कोई नहीं करता। परंतु यह भी विडंबना ही है कि ईश्वर अंश रुपी शरीर का हम उतना मान सम्
बात बिगड़ गई बात बताने में
रोहित गुस्ताख़
बात बिगड़ गई बात बताने में, यार हिचकते हाथ मिलाने में। चौकीदार चुरा ले गया जेबर, लोग बिजी थे फूल लगाने में। देखी दु
मुझे सब याद है
प्रवीन 'पथिक'
मुझे सब याद है! तपती ज़िन्दगी की उदास दोपहर में; तुम गुलाब की सुगंध की तरह; मेरी हृदय में समाई थी। अपने अलकों को बिख�
हारना हमको नहीं गवारा
गणपत लाल उदय
जिगर में हमारे आग हम रखते, बाँधे है कफ़न काल से न डरते। दहाड़ मारकर शिकार है करते, शेरों बीच रहे किसी से न डरते।। कठि
अपनी ज़िम्मेदारी समझो
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
अपनी ज़िम्मेदारी समझो, आदतें छोड़ क्यों नही देते,  समाज की धारा में बहो, बेइज़्ज़ती छोड क्यों नहीं देते। रात को लौटते
माँ की ममता
पुनेश समदर्शी
माँ की ममता जगत निराली, माँ के बिन सब खाली-खाली। अजब निराली छाया है, माँ का हाथ हो सिर पर जिसके, अनहोनी सब दूर को खिस�
जलता जाए दीप हमारा
अनिल मिश्र प्रहरी
मिट्टी के दीपों में भरकर तेल-तरल और बाती, तिमिर-तोम को दूर भगाने को लौ हो लहराती। मिट जाए भू का अँधियारा, जलता जाए
ह्यूमर उर्फ़ हास्य
अमृत 'शिवोहम्'
ह्यूमर; जी हाँ यही वह शब्द है जो सदा से प्रचलन में तो है, मगर जिसके बारे में अभी तक ज़्यादा लिखा नहीं गया है। अंग्रेजी �
कर्मवीर बनो
मधुस्मिता सेनापति
विधाता को क्यों कोसना जब कर्म पर हैं भरोसा विधाता ने सर्वांग सही सलामत दिए तो भाग्य पर क्यों रखते हो आशा...? बिना क�
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं। जिनपर किया भरोसा वो ही बदल गए हैं।। हालात हैं बुरे तुम वो छोड़कर चले हो, अरमान �
आओ इस धरा को हरित बनाएँ
संतोष ताकर 'खाखी'
आओ इस धरा को हरित बनाएँ एक एक पेड़ से कर शुरुआत, आओ क़सम ये खाएँ, यह सिलसिला बारंबार अपनाएँ, आओ इस धरा को हरित बनाएँ।
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
कुछ इश्क़ के दीवाने हमको भी छल गए हैं। जिनपर किया भरोसा वो ही बदल गए हैं।।
आने वाला कल अच्छा है
रमेश चंद्र बाजपेयी
मनसा, वाचा, कर्मणा से, सरसब्ज़ हैं आप, तो आने वाला कल अच्छा है। मन से परोपकार करना, मन से किसी दिल को सांत्वना देना, यह
जय हिन्द जय हिन्द की सेना
सतीश मापतपुरी
नहीं छोड़ना उस कायर को, सीमा पर जो चढ़ा सियार। आर-पार का करो फ़ैसला, मारो खींच गले तलवार।। सबक़ सिखाना होगा इनको, जो भारत
कर भला तो हो भला
अंकुर सिंह
"क्या हुआ मोहन, इतने उदास क्यों हो? तुम तो इंटरव्यू के लिए गए थे, क्या हुआ तुम्हारी नौकरी का?" -जाड़े के दिनों में मोहन �
दे दे मुझको तेरा हाथ
अंकुर सिंह
ना मुझे धन दौलत, ना मुझे स्वर्ग चाहिए। साथ रहो बस तुम मेरे, ऐसा प्यार भरा पल चाहिए।। नयनों में बसे हो बस एक दूजे के �
फ़रमान करें तो
अविनाश ब्यौहार
आओ हम संधान करें तो। सिर चढ़ता अभिमान करें तो।। गर नायाब ग़ज़ल लिखना है, रुक्न, बहर, अरकान करें तो। पैसों की लालच �
वक़्त सुन कुछ बोलता है
अनिल मिश्र प्रहरी
हर क़दम निर्भय बढ़ाना, दृष्टि मंज़िल पर गड़ाना, राह की उलझन अमित से मन विकल क्यों डोलता है? वक़्त सुन कुछ बोलता है।�
कैसी दुनिया
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
ईश्वर कैसी दुनिया है तेरी, यहाँ रोते लोग हज़ारों हैं। मंदिर में छप्पन भोग लगें, प्रभु फल मेवा भण्डारे चुगें, तरसते
किरदार
पुनेश समदर्शी
असली किरदार को कोई जानता नहीं, नक़ली किरदार के चर्चे बड़े हैं। सच्चे ग़रीब की कोई मानता नहीं, झूठे अमीर के साथ खड़े ह�
एकता की शक्ति
सुनील माहेश्वरी
मैं हूँ साथ खड़ा तेरे, फिर डरने की क्या बात, हौसला उम्मीद से कर लेंगे, ये नौका भी पार। तू बन तो सही हिम्मत मेरी, कर थोड़�
समय प्रबंधन
सुनील माहेश्वरी
मैं बहुत व्यस्त हूँ, या मेरे पास समय नहीं है, क्या ये वाक्य हमारे जीवन में बाधक है? यह एक बहुत ही दिलचस्प सवाल और समस्�
कामयाबी का परिणाम
विपिन दिलवरिया
एक छोटे से गाँव की बात है जहाँ चरनदास का परिवार रहता था जिसके दो बेटे राम और श्याम थे। राम और श्याम की माता कमला देवी
वह तो झाँसी वाली रानी थी
विपिन दिलवरिया
चलो सुनाऊँ एक कहानी जिसमें एक रानी थी, मुख से निकले तीखे बाण वो शमशीर दिवानी थी। थी वो ऐसी वीरांगना उसकी शौर्य भर�
सावन की बरसात
विपिन दिलवरिया
आया बरसात का मौसम झूमले, बादल आए झूम झूमके और बादलों को चूमले। ऋतु बदली गया ज्येष्ठ आषाढ़ साल का था इंतज़ार माह बद�
लेखनी
रतन कुमार अगरवाला
उम्र के इस गुज़रते पड़ाव में, लिखना जब शुरू किया मैने। लेखनी से हुई दोस्ती मेरी, ज़िंदगी का नया रूप जिया मैने। भावों
निशा चुभाती ख़ंजर
अंकुर सिंह
प्रेम रस में तेरे, भीगा मेरा मन। तुम हो प्रिये, साहित्य की रतन।। शब्दों की तुम, पिरोई हो माला हो। साहित्य की तुमन�
भोर की प्रतीक्षा में
प्रवीण श्रीवास्तव
सुधा गृह कार्य से निपटकर आराम करने की ही सोच रही थी कि अचानक किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी। मन ही मन कुढ़ती हुई सुधा दरवा�
माँ
राम प्रसाद आर्य
माँ ने मुझे जना, माँ ने मुझको पाला। माँ ने रखा मुँह में मेरे, भोजन का प्रथम निवाला।। माँ ने आँचल में ढककर, है मुझक�
अनेकता में एकता
सुनील माहेश्वरी
आओ यारो फिर से, आदर्शवादी स्वरूप की, शृंखला से जुड़ जाएँ। लोकाचारी निर्मित करके, एक नई कहानी लिख जाएँ। हर वक़्त की कश
माँ की परिभाषा
समय सिंह जौल
वह पढी लिखी नहीं, लेकिन ज़िंदगी को पढा है। गिनती नहीं सीखी लेकिन, मेरी ग़लतियों को गिना है।। दी इतनी शक्ति हर जिव्हा �
हिन्दी मेरी पहचान
पुनेश समदर्शी
आज हिन्दी है तो अपनी बात रख पाता हूँ, अंग्रेजी नहीं आती तो कहाँ पछताता हूँ। अपनी कहूँ तुम्हारी सुनूँ ये हुनर हिन्द
माँ की ममता
गणपत लाल उदय
तुम्हारे हर रुप को मेरा वन्दन है माँ, तेरे इन चरणों को मेरा प्रणाम है माँ। माँ तू ही यमुना और तुम ही जमुना, तुम ही गं�
सुन लो सारे
कर्मवीर 'बुडाना'
रफ़ कॉपी में रंग रखों तुम अब मुक़म्मल सारे, तुम्हें लिखना होगा पढ़ते रहना होगा गरचे स्कूल बंद हो सारे। रूह के लिबाज़
मोगरे का फूल
कर्मवीर 'बुडाना'
चश्म-ओ-गोश के तट पे चिड़िया चहचहाने आई, रिज़्क़ लाज़िम हैं, उठ ना, बख़्त कहता है। अब तक ना सजी मिरी सुब्ह-ओ-जीस्त, बग़ैर ति
हालात
दीपक राही
मौजूदा हालात का, क्या हम ज़िक्र करें, जो आने वाला है, उसकी फ़िक्र करें, पार्क भी यहाँ शमशान बने, पानी में है लाशें बहे
मददगार
सुधीर श्रीवास्तव
वर्तमान में समय और माहौल विपरीत है, हर ओर एक अजीब सा ख़ौफ़ फैला है, ख़ामोशी है, सन्नाटा है कब क्या होगा? किसके साथ होगा?
हमारी राय शुमारी अगर ज़रूरी है
दिलशेर 'दिल'
हमारी राय शुमारी अगर ज़रूरी है। हमे भी मुल्क की रखनी ख़बर ज़रूरी है।। हरा भरा हो अदब का चमन हमारा तो, हमारे घर में सुख़�
हौसला
समुन्द्र सिंह पंवार
ना रहता सदा अँधेरा, नित होता नया सवेरा, नित होती है प्रभात, और नित बदल रहे हालात। कर हौसले के साथ, अपनी ज़िंदगी की शुर�
अपनों का साथ
पुनेश समदर्शी
साथ अगर हो अपनों का, ये सौग़ातें क्या कम हैं, ख़ुशियाँ दूनीं हो जातीं, साथ में तुम और हम हैं। रिश्ता लम्बा रखना हो तो, �
एक मुलाक़ात ख़ुद से
रतन कुमार अगरवाला
औरों से तो सब मिलते हैं, ख़ुद से न होती मुलाक़ात। आज ख़ुद को ख़ुद से मिलाया, यह भी हुई नई एक बात। औरों का साथ ढूँढता हर को
मनोहर पहाड़
कमला वेदी
हरियाली के आँचल में बसती चलती साँसें मेरी, सुखद, शीतल समीर में उड़ती जाती आशाएँ मेरी। मनोहर पर्वत पहाड़ों में बस�
गाँव की हाट
अब्दुल मलिक ख़ान
देखो लगी गाँव की हाट, बड़े अनोखे इसके ठाट! लड्डू, सेब, जलेबी, चक्की सज धज कर बैठे थालों में लाल गुलाबी पान बोलते– हम�
साहित्यकारों की हर एक रचना...
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
साहित्यकारों की हर एक रचना, उनकी बेशकीमती सम्पत्ति व एक उपलब्धि है।
एक तुम जो छेड़ दो
कमला वेदी
एक तुम जो छेड़ दो हज़ारों तरंगे उत्पन्न हो जाए ह्रदयतल में, तुम जो करो निगहबानी शत् शत् कमल दल खिले अन्त:तल में, अपने �
मेरे पापा
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
शान मान और अभिमान हैं पापा। मेरे जीवन की पहचान हैं पापा। पापा है तो हर सपने अपने, हर मुश्किल का आसान हैं पापा। जर ज़�
अपनी अनुभूति
मधुस्मिता सेनापति
बदहवास है हवा की झोंके, यह ज़िंदगी के उलझे हुए नशा, यह संसार के अभावनिय स्थिति, और मनुष्य के मन में भरी हुई अनगिनत चाह
तुम मानव बनना भूले हो
मनोज यादव 'विमल'
तुम प्रश्न करना भूले हो, तुम संवेदना को भूले हो। तुम्हे इल्म नही इतना सा की तुम हुक़ूक़ माँगना भूले हो।। तुम सच बोल�
वसुंधरा
रतन कुमार अगरवाला
आसमान रूठ गया, हुई धरती लहूलुहान। जानवर भी रो रहें, पेड़ हुए निष्प्राण। पहाड़ मिट रहें, सुख रही नदियाँ। जाने कहा�
रुक ना जाना तू कहीं हार के
पुनेश समदर्शी
जीतता चल राह के हर दंश को तू मारके, रुक ना जाना तू कहीं हार के। तेरी मंज़िल तुझमें है ये तू जान ले, वीर तुझसा नहीं है ज�
यारों कोशिशें भी कमाल करती है
सुनील माहेश्वरी
यूँ ही नहीं मिल जाती मंज़िल, सिर्फ़ एक पल भर सोचने से, इंसान की कोशिशें भी कमाल करती हैं, यूँ ही नहीं मिलती रब की मेहरब�
नव वर्ष किरण
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
नव नूतन आशा रश्मि बिखरी दिशि चहुँओर, क्षितिज से आई सलज्ज मनभावन सी भोर। प्रफुल्ल उल्लिसित होकर तन मन महक उठा, नई र�
प्यार वही है
प्रवीन 'पथिक'
टूट गई तलवार मगर धार वही है, छूट गई मुलाक़ात मगर प्यार वही है। ऐसा कोई संयोग कहाँ, जिसमें छुपा वियोग न हो मिलता उसे
लॉकडाउन और बढ़ती बेरोज़गारी
संस्कृती शाबा गावकर
क्या कोरोना के फैलने के ख़ौफ़ से देशभर में लॉकडाउन की स्थिति पैदा कर बेरोज़गारी को जन्म दिया? दुनियाभर में फैले कोरोन�
गाँव में नई सोच
समय सिंह जौल
सीखा था जो शहर में सिखाना उसे चाहता हूँ, गाँव में एक नई सोच पैदा करना चाहता हूँ। पढ़े बेटा बेटी भविष्य उनका सँवारना च
डगमगाते क़दम
विपिन दिलवरिया
मैने डगमगाते क़दमों को देखा है, उन बूढ़ी हड्डियों  को लाठी का सहारा लेते देखा है। पाल-पोसकर बड़ा किया जिस औलाद को�
गुरुवर की महिमा
संतोष ताकर 'खाखी'
मस्तिष्क के कोने कोने में ज्ञान से रिक्त को, ह्रदय के क़तरा क़तरा भाव से रहित को, कर ज्ञान भाव से युक्त एक सार्थक उत्प�
यूँ न खेला करो दिल के जज़्बात से
सतीश मापतपुरी
यूँ न खेला करो दिल के जज़्बात से। ज़िन्दगी थक गई ऐसे हालात से।। रोज़ मिलते रहे सिर्फ़ मिलते रहे, अब तो जी भर गया इस मुल�
आप भी आ जाइए
सतीश मापतपुरी
कब तलक मैं यूँ अकेला इस तरह जी पाऊँगा। इस निशा नागिन के विष को कैसे मैं पी पाऊँगा। इस ज़हर में अधर का मधु रस मिला तो जा
नाम लिखा दाने-दाने में
अविनाश ब्यौहार
नाम लिखा दाने-दाने में। लुत्फ़ मिला करता खाने में।। सात सुरों की उड़ती खिल्ली, रेंक-रेंक कर है गाने में। उनने उल�
प्रेयसी के प्रति
प्रवीन 'पथिक'
प्रेम का सुखद पल अच्छा था! उन क्षणों में; जब मैं पास होता, बिल्कुल पास। बातों ही बातों में सब कुछ लुटा देता अपना ज्
मित्रता
प्रवीन 'पथिक'
जीवन में ग़म बहुत है, लेकिन है इक बात। सारे ग़म कट जाते हैं, यदि हो मित्र का साथ। यदि हो मित्र का साथ, सुख दुःख में काम
आम आदमी और कोरोना
प्रवीन 'पथिक'
यह जीवन जितना दुर्लभ है उतना ही जीना दुष्कर। हमारा देश विगत दो सालों से जिस विषम परिस्थितियों से गुज़र रहा है, उसका �
ओटीटी (ओवर-द-टॉप): एंटरटेनमेंट का नया प्लेटफॉर्म
सलिल सरोज
ओवर-द-टॉप (ओटीटी) मीडिया सेवा ऑनलाइन सामग्री प्रदाता है जो स्ट्रीमिंग मीडिया को एक स्टैंडअलोन उत्पाद के रूप में पे�
गुरु का महत्व
समय सिंह जौल
जल जाता है दीये की तरह जीवन रोशन कर जाता गुरु। ख़ुद रखे अँधेरा दीपक की तरह जीवन को प्रकाशित करता गुरु।। सड़क की तरह
संशय के दरवाज़े
अविनाश ब्यौहार
आँखें- सपने बग़ैर भग्न खंडहर लगतीं हैं। समय उलूक सा आज बोल रहा। संशय के दरवाज़े खोल रहा। उम्मीदें भी मन को- इक ठगि�
चाँद से चेहरे को तारों से सजा रखा है
प्रवीन 'पथिक'
चाँद से चेहरे को तारों से सजा रखा है। अपने प्रियतम को पलकों में छुपा रखा है।। भूल न पाऊँगा तुझको किसी भी सूरत में, �
पतंग की उड़ान
अंकुर सिंह
पतंग भरती जैसे उड़ान, बढ़ेगा वैसे मेरा मान। सफलता मेरे पंख होंगे, खुला होगा मेरा आसमाँ।। इरादे मेरे बुलंद होंगे,
सुन री हवा तू धीरे चल
विपिन दिलवरिया
सुन री हवा तू धीरे चल उसके सर से दुपट्टा सरक रहा है... सज सँवरकर निकली है वो यहाँ सारा चमन महक रहा है। सौन्दर्य ऐसे �
तुम ही हो
गौतम कुमार कुशवाहा
तुम ही अरमान हो मेरी, तुम ही जान हो मेरी। तुम ही दुश्मन, तुम ही दोस्त, तुम ही सारा जहान हो मेरी।। मेरे आँखों का तारा �
प्रकृति संरक्षण
संजय राजभर 'समित'
सुन बदरा रे! हैं विकल जीव सारे, शिथिल सब थके हारे। तप्त हलक अधरा रे! सुन बदरा रे! सूखे ताल-तलैया, अब कौन ले बलैया?
सत्य
संजय राजभर 'समित'
प्रेम राग बनी रहे, हर हाल में सच बोलिए। बात से कब क्या घटे, तकरार में रस घोलिए।। आसमाँ झुकता रहा, उस व्यक्ति के पग मे�
पूनम की चाँद
संजय राजभर 'समित'
सुहाग सेज पर बैठी, जब पूनम की चाँद। तब पूरी हुई मेरी, वर्षो की फरियाद।। आज जगत निहार रहा, कौन धनी है यार। घनी अमावस क
व्यथा धरा की
संजय राजभर 'समित'
चीख़ रही धरती। कौन सुने विनती।। दोहन शाश्वत है। जीवन आफ़त है।। बाढ़ कभी बरपा। लाँछन ही पनपा।। मौन रहूँ कितना!
इंतज़ार
संजय राजभर 'समित'
ग़ज़ब की छुअन थी रोमांचित था तन-मन, हया आँखों में थी आग दोनों तरफ थी। चुप्पी थी फिर भर न जाने क्यूँ हम दोनों रुके थे
वो बारिश का दिन
संजय राजभर 'समित'
वो बारिश का दिन, रहे लवलीन, काग़ज़ी नाव, अच्छे थे। हम बच्चों का दल, देखते कमल, लड़ते थे पर, सच्चे थे।। लड़कपन थी ख़ूब, कीच�
इन वादियों में
कमला वेदी
इन वादियों में आकर दिल मेरा बहल गया, बहार देखकर हर तरफ़, मेरा मन मचल गया। इन वादियों में... रंग बिरंगे पुष्पों को चूम त�
गुरु
कर्मवीर 'बुडाना'
गुरु अपने सभी शागिर्दों पर रहमतें बरसाता है अगरचे ज़ुबाँ से बरसे या मास्टरजी के दिव्य डंडे से। जिसने ये ईल्म, नेमते�
एक वृक्ष की पीड़ा
संजय राजभर 'समित'
मैं वृक्ष हूँ। प्रकृति का फेफड़ा हूँ, मैं निःसंदेह निःस्वार्थ भाव से प्रकृति के संचालन में अनवरत अथक संघर्ष करता ह
विश्वगुरु बनने की राह पर भारत
रतन कुमार अगरवाला
भारत सदा ही विश्वगुरु रहा है जिसका केंद्र बिंदु आध्यात्म रहा है। अध्ययन, आराध्य और आध्यात्म का समायोजन भारत को फिर
डर ही डर
राम प्रसाद आर्य
कोरोना का आतंक अभी कम हुआ नहीं, कि शुरू हो गया, कुदरत का ये द्वितीय क़हर है। गाँव हो या शहर, नदी या नहर, फँसी ज़िन्दगी, ड
नयापन की तलाश
मधुस्मिता सेनापति
मानव हैं हम हमें थोड़ा नहीं कुछ अधिक चाहिए रिश्ते अब हो चुके हैं पुरानी इसमें हमें परिवर्तन चाहिए...!! आज जो हैं उ�
साक्षी हो कर भी मुकर गए
संजय राजभर 'समित'
साक्षी हो कर भी मुकर गए, ज़मीर पल में क्यों बिसर गए। माँ-बाप भगवान लगते थे, आँखों से अब क्यों उतर गए। विडियो बनाने म�
शुरू नॉविल किया पढ़ना लगा वो रहबरी वाला
मनजीत भोला
शुरू नॉविल किया पढ़ना लगा वो रहबरी वाला, सफे दो चार पलटे थे कि निकला रहज़नी वाला। गुज़ारिश है यही चश्मा हमें धुँधला क�
मेरा सफ़र भी क्या ये मंज़िल भी क्या तिरे बिन
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
मेरा सफ़र भी क्या ये मंज़िल भी क्या तिरे बिन, जैसे हो चाय ठंडी औ तल्ख़ यूँ पिए बिन। दीद बिन आपके मेरी ज़िंदगी तो जैसे, यू
हक़ हैं हमें भी कहने दो
शमा परवीन
हक़ हैं हमें भी कहने दो, बेटी हूँ हमें भी शान से जीने दो। हम भी करेंगे ऊँचा काम मत रोको हमें, आगे बढ़ने दो, बेटी हूँ �
गहराई ज़िंदगी की
सुनील माहेश्वरी
ज़िंदगी खेल नहीं है, जितना सरल दिखती है, उतनी ही कठिन, प्रतीत होती है। हर वक़्त दिखता, जो गहरा समंदर है, कभी उलझो तो, क
मेहनत के साथ स्मार्ट वर्क ज़रूरी
सुनील माहेश्वरी
दोस्तों यह बहुत ही अच्छा और उचित सवाल है कि मेहनत तो हम बहुत करते हैं, लेकिन हमें मन मुताबिक़ सफलता का परिणाम हासिल न�
ज़िंदगी के रूप रंग
मधुस्मिता सेनापति
हर एक के लिए अलग रूप है ज़िंदगी किसी के लिए यह जन्नत है तो किसी के लिए जहन्नम है ज़िंदगी...! जहाँ बेरोज़गार के लिए रोज़गा
ख़ुशबू के जाम
अविनाश ब्यौहार
नदिया के घाट पर मेले की धूमधाम। लहरें मेले की ले रहीं बलैंया। औरतें घूमतीं शिशु को ले कैंया।। है चहल-पहल मेले की
जमकर भड़के हैं
अविनाश ब्यौहार
हरी भरी ज़रख़ेज़ भूमी, लीलतीं सड़कें हैं। हाइवा-डंपर जो हाईवे में चलते। धुँए से गाँव के परिवेश को छलते। साँप रेंगत�
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे
रोहित गुस्ताख़
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे, आज हसीनों पर शे'र कहेंगे। ज़िक्र क़यामत का होगा तो हम, उसकी अदाओं पर शे'र कहेंगे। ज़िक्�
मेरा सावन सूखा सूखा
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
विरह व्यथा की विकल रागिनी, बजती अब अंतर्मन में। कितनी आस लगा बैठे थे, हम उससे इस सावन में। बरस रहे हैं मेघा काले फि�
मिलन
संजय राजभर 'समित'
सावन ने ली जब अँगड़ाई, तब सुधि आई है मधुकर को। चौंक गई मैं उन्हें देखकर, लौटे पिया अचानक घर को। प्यासी नज़रें सबसे च
मान लो यार हमें नशा होगा
मनजीत भोला
मानलो यार हमें नशा होगा, बे-ख़ुदी में ख़ुदा कहा होगा। कल को नस्लें नई ये सोचेंगी, आदमी किस तरह रहा होगा। राज़ खोलें अ�
बात पुरानी ताने मार रही है
रोहित गुस्ताख़
बात पुरानी ताने मार रही है, याद किसी की ताने मार रही है। मेरे अंदर चीख़ रही ख़ामोशी, और उदासी ताने मार रही है। फैल गई
रिश्तों के मोल घट गए
विपिन दिलवरिया
एक खोली थोड़ा दु:ख था, सबका साथ बड़ा सुख था। माता-पिता और भाई-बहन हँसता खेलता परिवार बड़ा ख़ुश था ख़ूब कमाई धन दौलत, ज़िन�
पर्यावरण और गाँव
संजय राजभर 'समित'
योगी रोगी हो गए, कहाँ करे अब वास। दूषित पर्यावरण से, मुश्किल में है साँस।। अब कहाँ है पात हरे, सावन में भी पीत। मौसम
व्यथित मन
प्रवीन 'पथिक'
हृदय और भी हो जाता व्यथित! जब सर्वस्व हारकर, जाता तुम्हारे समीप; कर देती कंटकाकीर्ण, उर को मेरे अपने शब्दभेदी बाणो�
प्रिये, अब तुम आ जाओ
प्रवीन 'पथिक'
तड़प रहा हृदय ये मेरा, सूरत तो दिखला जाओ। साँझ हो रही मन मधुबन में, प्रिये, अब तुम आ जाओ। कितने दिवस यूँ चले गए, कितन�
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता
प्रवीन 'पथिक'
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता, मेरा हर दिन का मनाना प्यारा नहीं लगता। आख़िर कौन-सी बात है जो नापसंद है �
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता
प्रवीन 'पथिक'
तुम्हारा हर दिन का रूठना गंवारा नहीं लगता, मेरा हर दिन का मनाना प्यारा नहीं लगता।
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे
रोहित गुस्ताख़
इश्क़ के रस्तों पर शे'र कहेंगे, आज हसीनों पर शे'र कहेंगे।
बात पुरानी ताने मार रही है
रोहित गुस्ताख़
बात पुरानी ताने मार रही है, याद किसी की ताने मार रही है।
ख़ुद के दर्द से जाने कब से हूँ परेशाँ मैं
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
ख़ुद के दर्द से जाने कब से हूँ परेशाँ मैं, नींद से गिला क्या कि रात भर नहीं आती।
मुस्कुराहटें हमारी तो अब हुनर की बात है
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
मुस्कुराहटें हमारी तो अब हुनर की बात है, दर्द चीज़ है जो भी ये तो उम्र भर की बात है।
मेरा परिचय
अंकुर सिंह
वैशाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, दिवस कैलेंडर शुक्रवार। मध्यरात्रि में हुआ अवतरित, हर्षित हुआ पूरा परिवार।। सवा मन ल�
राखी भेजवा देना
अंकुर सिंह
बहन राखी भेजवा देना, अबकी ना मैं आ पाऊँगा। काम बहुत हैं ऑफिस में, मैं छुट्टी ना ले पाऊँगा।। कलाई सुनी ना रहें मेरी,
बुढ़ापा
विपिन दिलवरिया
तलवे घिस गए आने जानें में, उम्र गुज़र गई जिसे कमानें में। ज़िन्दगी भर जो कमाई इज़्ज़त, अपनें ही लगे उसे गँवाने में। प�
ज़हन होगा प्रखर अब तो
अविनाश ब्यौहार
ज़हन होगा प्रखर अब तो, सुहाना है सफ़र अब तो। यहाँ माहौल ऐसा है, सुख़न की है लहर अब तो। ख़ुशी से हैं लबालब पल, हुए उत्सव प
आज़ाद हिन्दुस्तान
मधुस्मिता सेनापति
यह ममता भरा देश हमारा, सबको प्यारा यह देश मेरा, विभिन्नता में एकता जिसका नाम है, हमारा देश यह भारत महान है। अपनी इस
लोरी
प्रवल राणा 'प्रवल'
मेरे लाल आजा सो जा, चंदा भी सो गया है। निंदिया बड़ी ही प्यारी तेरी राह तक रही है। तेरे इंतज़ार में तेरी माता भी जग रही ह
भ्रष्टाचार
प्रवल राणा 'प्रवल'
देश के सामने भ्रष्टाचार बहुत बड़ी समस्या है, भ्रष्टाचार के निषेध के लिए क़ानून है, लोगों को शिकायत भी करनी चाहिए। किन
जीवन
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
जीवन चक्र निरंतर चलता, एक-एक दिन घटता जाए। पैदा होते शिशु कहलाए, धीरे-धीरे बुज़ुर्गी पाए। अपना बचपन सच्चा बीता, म�
अडिग हौसला
सुनील माहेश्वरी
थोड़ा सा धैर्य रखा यारो, और थोड़ा सा विश्वास, माना परिस्थिति थी कठिन पर मन में थी गहरी आस। वो आस मैंने टूटने नहीं दी
आईना ज़िंदगी का
सुनील माहेश्वरी
हौसला है तो यारो, कुछ काम कर डालो, अपना वक़्त ज़िंदगी में, अपने नाम कर डालो। छोड़ दो ये दुनिया किसको क्या कहेगी, यदि �
तुम बिन जीवन कहाँ मिलेगा
ममता शर्मा 'अंचल'
तुम बिन जीवन कहाँ मिलेगा, गुलशन सा मन कहाँ मिलेगा। पल में राज़ी फिर नाराज़ी, यह परिवर्तन कहाँ मिलेगा। यौवन के दिल म�
ऐ घटा
राम प्रसाद आर्य
ज़रूरत पर नहिं शक्ल कभी तुम दिखलाते हो, ज़रूरत नहिं जब, ज़बरदस्ती नभ घिर आते हो। जाने क्यों निज बल पर इतना इतराते हो।।
छोटे दलों का गठबंधन
संजय राजभर 'समित'
यहाँ संख्या मंत्र, बने है यंत्र, इस लोकतंत्र, गीत चले। जैसी गति तेरी, वैसी मेरी, तेरी मेरी, मीत भले।। गठजोड़ ज़रूरी, क
विरह पीड़ा
संजय राजभर 'समित'
विरह पीड़ा में तप रहा था, अंतः में अनुराग लिए। कब के बिछड़े आज मिले हैं, हम सावन में प्राणप्रिये। हाड़ कँपाती शिश�
सुनो शिकारी
समय सिंह जौल
पहले तुम शिकारी की तरह जाल फैलाते हो। मेरी मजबूरी का फ़ायदा उठाकर पैसा सूद पर देकर मुझे जाल में फँसाते हो।। ब्या�
मैं
रतन कुमार अगरवाला
खोज रहा हूँ ख़ुद में ख़ुद को, न पाया कभी ख़ुद को खोज। न जाने कहाँ खो गया मैं? खोज ही रहा ख़ुद को रोज़। फँसा रिश्तों के भँवर
मेरी कविता
समय सिंह जौल
मेरी कविता स्वअनुभूति है, सहानुभूति नहीं। यथार्थपरक है, मनोरंजनपरक नही। मेरी कविता झकझोरती, झूठी झूमती नही। सच�
जीवन कुछ इस क़दर
मधुस्मिता सेनापति
जीवन कुछ इस प्रकार है कि वहाँ रहने के लिए ज़मीन है, छत के लिए आसमान है, खाने के लिए दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं, फिर भी, जी
सपनों के पंख फैलाओ
सुनील माहेश्वरी
ज़िंदगी मेरी है यारो, तो उम्मीद भी मेरी है, इसलिए आगे बढ़ने की ज़िद भी मेरी है। कोई साथ हो ना हो, कोई साथ दे ना दे, हार अ�
नव सृजन करो तुम
कमला वेदी
ख़ामोशी की तह में सिमट कर ना गुज़ारो ज़िंदगी, ग़ुंचा ग़ुंचा दिल खोलकर पुष्पों की तरह खिलो तुम। हँसते, गाते, खिलखिलात
एक बच्चे का मन
संजय राजभर 'समित'
"माँ क्या कर रही हो" "कुछ नही बेटा, दादा तुम्हारे बूढ़े हो गए हैं और आज कुछ मेहमान आ रहे हैं, तुम्हारा जन्मदिन है बेटा।
सफ़र से हमसफ़र
अंकुर सिंह
ये सीट मेरी है, विजयवाड़ा स्टेशन पर इतना सुनते अमित ने पीछे मुड़कर देखा तो एक हमउम्र की लड़की एक हाथ में स्मार्ट फोन
आधुनिक भाई
प्रवीन 'पथिक'
देखता हूँ, उन कृतघ्नों को, गले में शराब की बोतल उड़ेलते, भाग्य को सराहते, ख़ुशियाँ मना रहे हैं। याद आता है वह दुर्दि�
जब तेरी याद आती है
प्रवीन 'पथिक'
जब-जब आँखें नीर बहाए, सपनों में तुझको न पाए। यही सोचकर घबराए, कि तू उससे कहीं दूर न जाए। हृदय ये भाव जगाती है, जब तेर
आज बोलता है
पारो शैवलिनी
हे युग-पुरुष! ओ प्रेमचंद तेरी लेखनी के नींव पर है टीका हुआ हिन्दी साहित्य का मानसरोवर, जिसकी लहर से उठती उफान नव-ह�
जोकर
चीनू गिरि गोस्वामी
ठोकरें खाते गए और मुस्कुराते रहे, हम अपनी हिम्मत को आज़माते रहे! आदत ही ऐसी है हमारी तो साहब, हम दुश्मनों को भी गले लग
वो बुढ़िया
सलिल सरोज
वो बुढ़िया कल भी अकेली थी, वो बुढ़िया अब भी अकेली है। चेहरे की झुर्रियाँ पढ़ कर पता चलता है, उसने कितने सदियों की पीड़ा �
चाहे जितने भी हों ग़म हम हँस लेते हैं
ममता शर्मा 'अंचल'
चाहे जितने भी हों ग़म हम हँस लेते हैं, पलक भले रहती हों नम हम हँस लेते हैं। दूरी में भी नज़दीकी के ख़्वाब देखकर, ख़ुशी-ख़ु
आया शहर कमाने था बरकत के वास्ते
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
आया शहर कमाने था बरकत के वास्ते, लेकिन भटक रहे बद-क़िस्मत के वास्ते। कह के बुरा भला हमे बद-नाम कर दिया, ख़ामोश हम रहे थ
कर्मवीर मास्टर
कर्मवीर 'बुडाना'
मिरी मसर्रतों से गुफ़्तगू कर ज़ीस्त ने कुछ यूँ फ़रमाया हैं, ज्ञानमन्दिर में आकर हयात ने हयात को गले लगाया हैं। सोहबत
तेरा शैदा हैं कवि
कर्मवीर 'बुडाना'
मेरा आशियाना ढूँढती हैं तेरी आँखों का जलना, आओ, देखना शब कहेगी इस घर में चाँद रहता हैं। निगाहों को जब से तेरा दीद�
सावन पर भी यौवन
सुषमा दीक्षित शुक्ला
छमछम छमछम नाची है बरखा, झम झम बरसे रे पानी। देखो मिलन की रुत आई है, लिखने को प्रेम कहानी। मधुबन भी है मदहोशी में डूब
मौत का तांडव
सुषमा दीक्षित शुक्ला
दिख रहा मौत का कैसा तांडव, हाय ये किसने क़यामत ढाया। बेबसी क्यूँ कर दी कुदरत तूने, हाय कैसा ये कैसा क़हर छाया। मौत क�
प्रेम के रंग
सुषमा दीक्षित शुक्ला
होली खेलें श्याम यमुना जी के तीर, सखी चल ना सही यमुना जी के तीर। राधा रानी संग रास रचावें, गोरे बदन मा रंग लगावें। स�
अनुशासन से हो सोना कुंदन
सुषमा दीक्षित शुक्ला
अपने आपको मना कर पाने की सामर्थ्य के साथ ही गरिमा की समझ पैदा होती है यही अनुशासन की सीढ़ी है, यही सीढ़ी बनाती है सोने क
याचना
प्रवल राणा 'प्रवल'
वेदना के इन स्वरों को एक अपना गान दे दो, भटके हुए जो राहों से उनको भी ज्ञान दे दो। हम चले हैं राह पर यूँ लड़खड़ाते हुए
सफलता का रहस्य
रवि भूषण सिन्हा
दूसरों की ख़ूब सुनिए, उस पर मनन भी कीजिए ख़ूब। बात जो हो अपने काम की, उसे याद भी रखिए ख़ूब।। जीवन की जंग में, इसका कीजिए �
कोरोना
विजय कृष्ण
जगत विनाश करने को, मानव के प्राण हरने को, एक वायरस कही से आन पड़ा, कोरोना इसका नाम पड़ा। इसका स्वरूप विस्तार देख, उल�
अनाथ बच्ची
विपिन दिलवरिया
मैं मासूम थी, नादान थी, हर बात से अंजान थी, मेरा क़ुसूर क्या था? जो तूने मुझे छोड़ दिया, मैं तो नन्ही सी जान थी। बोझ सम�
बेटियों से जहान है
हरदीप बौद्ध
हम सबकी ऊँची शान हैं बेटी, दुनिया में सबसे महान हैं बेटी। बेटी ही मन का मीत है, जीवन का सुंदर गीत है। प्रेम करो सब ब�
वही तो भारत मेरा है
प्रवीन 'पथिक'
जहाँ आता बसंत-बयार, कोयल भी करती गुंजार। पपीहा की है पीन-पुकार, आल्हा की गूँजती झंकार। वही तो भारत मेरा है।। आदर्�
बात तो कर लिया करो
कमला वेदी
दूर ही सही प्रिये तुम कभी हमसे बात तो कर लिया करो। झूठा ही सही, मन रखने को, प्रेम से प्रेम का हिसाब कर लिया करो।। व्�
चलो साथियो संग संग चलो
कमला वेदी
चलो साथियो संग संग चलो, दीन दुखियों की गूँज बनते चलो। चलो साथियो... पहुँच गए हम चाँद सितारों तक, जो दब कर रह गए, उन्हे
सावन की घटाओं
कमला वेदी
सावन की घटाओं, धीरे धीरे बरसो। मंद मंद पवन संग, प्रीत का राग गाओ।। सजने लगी सुहागनें, हाथों में हरी हरी चूडियाँ, मे�
गाऊँ कैसे प्रेम तराने
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
टूट गया जब दिल का दर्पण, दर्द भरा गुज़रा है हर क्षण, याद कभी उसकी आती तो, पड़ते अश्रु बहाने। गाऊँ कैसे प्रेम तराने! पी�
हम ज़माना भूल बैठे दिल लगाने के लिए
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
हम ज़माना भूल बैठे दिल लगाने के लिए, माँग हम सिंदूर से उसकी सजाने के लिए। रूठना नखरे दिखाना ये तभी अच्छा लगे, पास जब �
पंद्रह अगस्त
अंकुर सिंह
पंद्रह अगस्त सैंतालीस को, कैलेंडर दिवस था शुक्रवार। मिली इस दिन हमें आज़ादी, खुला अपने सपनों का द्वार।। आज़ादी के �
इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
इक लगन तिरे शहर में जाने की लगी हुई थी, आज जा के देखा मुहब्बत कितनी बची हुई थी। आपसे जहाँ बात फिर मिलने की कभी हुई थी,
उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
उनकी अदाएँ उनके मोहल्ले में चलते तो देखते, वो भी कभी यूँ मेरे क़स्बे से गुज़रते तो देखते। बस दीद की उनकी ख़ाहिश लेकर भ�
तूफ़ानों से लड़ना सीखा है
विपिन दिलवरिया
अंदाज़ हमारा तीखा है, तूफ़ानों से लड़ना सीखा है। मेरा देश ज्वलंत रंग है, इसके आगे हर रंग फीका है। घर बैठा दुश्मन भी मे�
वीर सपूत
रतन कुमार अगरवाला
वीर सपूतों का जज़्बा था वह, जो लड़ गए सीमा पर शत्रु से। अपने प्राणों की परवाह न कर, टूट पड़े सरहद पर शत्रु पे। हथेली �
बचपन की यादें
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
यादें बचपन बड़ी सुहानी, जैसे बहता पानी धार। उछल कूद कर मौज मनाएँ, बच्चों का है ये संसार। बिचरण करते पंछी जैसे, बचप�
संस्कार
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
आँखों में भर आए आँसू, मान सम्मान कहाँ से पाएँ। आजीवन संस्कार सिखाए, अंत समय पर काम न आए। तेरे मेरे ख़्वाब वही हैं, ज�
शिक्षक
अंकुर सिंह
प्रणाम उस मानुष तन को, शिक्षा जिससे हमने पाया। माता पिता के बाद हमपर, उनकी है प्रेम मधुर छाया।। नमन करता उन गुरुव�
तिरंगे की आवाज़
रवि भूषण सिन्हा
हमारा तिरंगा कह रहा, मैं भारत की शान हूँ, देश के वीर सपूतों का, मैं एक अनूठा आन हूँ। देश के शहीदों का, मैं एक ज़िन्दा म�
अकेला आदमी
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
एक बंजारा रहे अकेला, न थी उसको कोई फ़िकर। बस करता था अपना काम, न जाने उसको कोई इंसान। कभी-कभी जब सोचे वो, क्यों होता ह
ऐसा बन्धन रक्षा बन्धन
गणपत लाल उदय
यह धागों का है एक ऐसा बन्धन, कहते है सब इसको रक्षा-बन्धन। अटूट प्रेम बहन-भाई का उत्सव, बहनें लगाती भाई तिलक-चंदन।। �
माँ तुम कभी थकती नहीं हो
विजय कृष्ण
माँ तुम कभी थकती नहीं हो। सुबह से लेकर शाम तक, घर हो या दफ़्तर, सबके आराम तक, बैठती नहीं हो, माँ तुम कभी थकती नहीं हो।
संकट जगाता मानवता
रवि भूषण सिन्हा
मानव पर जब संकट आता है, मानवता जाग जाता है। गली-गली या मुहल्ले हो बुरा वक़्त जब आता है। आँखों में खटकने वाला भी, आँखो�
शान्ति की तलाश
रवि भूषण सिन्हा
ढूँढता रहा इधर से उधर, पनाह शान्ति का। ढूँढते-ढूँढते तन्हा रह गया, पर पता नहीं कहीं शान्ति का।। किसी ने कहा वन में �
उपहार
सुधीर श्रीवास्तव
आज रक्षाबंधन का त्योहार था। मेरी कोई बहन तो थी नहीं जो मुझे (श्रीश) कुछ भी उत्साह होता। न ही मुझे किसी की प्रतीक्षा म�
जीवन की भूल
सुधीर श्रीवास्तव
माना कि भूल होना मानवीय प्रवृत्ति है जो हम भी स्वीकारते हैं। मगर अफ़सोस होता है जब माँ बाप की उपेक्षाओं उनकी बेक़द्
कोयल करे मुनादी
अविनाश ब्यौहार
अमराई में कोयल करे मुनादी। महुआ, टेसू, सेमल डरे डरे। झरबेरी के कोई कान भरे। मानो पीपल बना हुआ है खादी। ख़ुशियो�
वक़्त बहुत ही शर्मिंदा है
अविनाश ब्यौहार
वक़्त बहुत ही शर्मिंदा है, आतंक अभी भी ज़िंदा है। फूल बहुत कोमल होता है, जैसे अब खार दरिंदा है। मैने जन गण मन से पूँछ�
मुक्त आकाश
सुधीर श्रीवास्तव
घनघोर वारिश के बीच कच्चे जंगली रास्ते पर भीगता काँपता हुआ सचिन घर की ओर बढ़ रहा था। उसे माँ की चिंता हो रही थी, जो इस व�
रक्षा बंधन
रतन कुमार अगरवाला
कहने को तो रक्षा बंधन भाई बहन के स्नेह का त्यौहार है पर अध्यात्म रूप से देखें तो इस त्यौहार के दिन हम परमात्मा से उम�
नारी
संजय राजभर 'समित'
नारी सदैव देश, धर्म औ' आन परिचायिका। ममता, स्नेह वात्सल्य, दया, क्षमा साक्षात रूप। नारी नदी सी जीवनदायिनी है गति
भोला आदमी
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
आदमी तू बड़ा भोला है, बात बोले बड़बोला है। अच्छाई-बुड़ाई में भेद न जाने, आदमी तू बड़ा भोला है। न जाने तू सच्चाई, बस कहे
शाम को छः बजे
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
अंततः अब मिलना है उनसे मुझे, आज तक़रीबन शाम को छः बजे, सोच मन विचलित दिल ये कैसे सहे, तीव्र गति धड़कन शाम को छः बजे। दृग
चिराग़ों तले ही अँधेरा मिला है
मनजीत भोला
चिराग़ों तले ही अँधेरा मिला है, मिला जो भी भूका कमेरा मिला है। इमारत सदा ही बनाई हैं जिसने, उसे पुल के नीचे बसेरा मि�
न शिकवा ना शिकायत लाज़मी है
मनजीत भोला
न शिकवा ना शिकायत लाज़मी है, मुहोब्बत बस मुहोब्बत लाज़मी है। दरख़्तों को मुनासिब सख़्तियाँ भी, गुलों को तो नज़ाकत लाज़म
वर्षों बीत गए
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
वर्षों बीत गए तुम्हारी याद में, डूबती नैना उमरता हृदय भावुक मन लिए। कहाँ जाऊँ? किसको सुनाऊँ? मन का विरहा मन को सु�
हैवान
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
इन भोली सूरत के पिछे, है हैवान बसा क्या है? तुझको पता। भोली सूरत काले नैना, है चाल मस्त मौला, दिन को है बेवाक वो घूमे�
लड़कियाँ कहाँ गई
संजय राजभर 'समित'
लड़कों के झुण्ड में एक बच्ची खेलती थी लड़के लड़की को हराने के लिए हथकंडे अपनाते थे, लड़की होने का ताना देते थे लड
बहुत प्यारी होती हैं बेटियाँ
रतन कुमार अगरवाला
प्यार का पुष्पहार होती हैं बेटियाँ, बाप की दुलारी होती हैं बेटियाँ। घर का चिराग़ होती हैं बेटियाँ, फूल की ख़ुशबू होत�
माँ फिर से वापस आ जाओ
संजय राजभर 'समित'
हे! माँ फिर से वापस आ जाओ। लोरी मधुरिम कंठ सुना जाओ।। मात! दंतहीन, बलहीन हूँ मैं, अब अस्सी बरस का दीन हूँ मैं। बाँहे
नाज़-ए-हुस्न से जो पहल हो गई
संजय राजभर 'समित'
नाज़-ए-हुस्न से जो पहल हो गई, मौत भी आज से तो सरल हो गई। मोहिनी कमल नयनी बँधी डोर सी, सर्पिणी सी लिपट मय गरल हो गई। इश
तुझसे इश्क़ इज़हार करेंगे
अंकुर सिंह
मिलन प्रिये जब तुमसे होगा, दिल की हम तुम बात करेंगे। नयनों से हम नयन मिलाकर, तुझसे इश्क़ इज़हार करेंगे।। इक दूजे का �
राम पद वन्दन
प्रवीन 'पथिक'
राम नाम बचा कलयुग में, जीने का एक सहारा। इसके बिन व्यर्थ है जीवन, चाहे वैभव हो सारा। पौरुष, बाहुबल या साहस पर, होता ल
नाव घाट लगी
अविनाश ब्यौहार
नैतिकता की बात करें क्या मन में गाँठ लगी। कालोनी में मन-मुटाव का जंगल ऊगा है। मन में पश्चाताप लिए फिर सूरज डूबा ह�
बुझा दिए जाते हैं वो दिये
कमला वेदी
घने तिमिर में अकेले ही जलकर, जो चहुँ-दिशि रोशनी अपनी बिखेरते हैं, बुझा दिये जाते हैं अक्सर वो दिये, जो तूफ़ानों में ज�
ग़रीबी
मधुस्मिता सेनापति
ग़रीबी में पैदा हुए, क्या ग़रीबी में ही मर मिटेंगे। कितने ख़्वाब लेकर आए थे हम इस जहान में, क्या इस अधूरेपन में ही दम �
आओ मनाए ख़ुशियों का पर्व
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
आओ मनाए ख़ुशियों का पर्व, झूमें गाएँ इसमें सब। आओ जलाएँ उन दियों को, जो वर्षो पहले बूझ चूके थे। वजह क्या था, ग़लती किस
ज़िम्मेदारी
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
फ़ैशन करना वो क्या जानें, जिनपर घर की ज़िम्मेदारी। क्या जाने हम नेक अनाड़ी, महँगा फोन अपाचे गाड़ी। नही गया होटल में खा�
रक्षा बंधन
विपिन दिलवरिया
रक्षाबंधन पर्व की, एक अलग है बात। लाए यह परिवार में, ख़ुशियों की सौग़ात॥ पावन जग में पर्व यह, ख़ुशियाँ लाए द्वार। रक्�
कृष्ण जन्माष्टमी
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
विष्णु के दशावतार कृष्ण हैं, भाद्रपद अष्टमी जन्म लिया। निशा स्याह रात बारह बजे, कारागार में अवतरण लिया। प्रहरी स
तुम बिन कौन उबारे
सुषमा दीक्षित शुक्ला
गोवर्धन धारी हे! कान्हा, बन जाओ रखवारे, हे! कृष्णा हे! मोहन मेरे तुम बिन कौन उबारे। हर कोई है व्यथित यहाँ तो अपने दुः�
कान्हा
सुषमा दीक्षित शुक्ला
कान्हा कोई नाम नहीं, कोई व्यक्ति नहीं, कान्हा तो साक्षात परबृह्म हैं अजन्मा हैं अमर हैं अजर हैं। परन्तु वह जसुदा मइ
कृष्ण जन्माष्टमी
रतन कुमार अगरवाला
राधा गुनगुना रही मन में गान, सुना दो कान्हा मुरली की तान। जन्माष्टमी का दिन है आज, बज रहें मुरली, मृदंग और साज। हँ�
न ग़ुरूर बड़ा न शोहरत और धन
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
न ग़ुरूर बड़ा न शोहरत और धन, है सबसे बड़ा रिश्ता और अपनापन।
पूनम की रैन
कर्मवीर 'बुडाना'
बांडी की तरह लगते ज़हरीले गोल गोल मटमैले सुनहरे श्याम कैश, आँखें ठहर जाएँ, खुली की खुली रह जाए, ऐसे दिल पर आघात करत�
मुकम्मल जहान हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
मेहमाँ तिरे आने से जीवन में आया मिठास हैं, ये शादी का लड्डू जीवन में लाया उल्लास हैं। कहते हैं ये लड्डू जो खाए वो पछ
बदलता दौर
कर्मवीर 'बुडाना'
सो गया हूँ मोबाईल में वेब सीरीज देखकर, जगा दे सुब्ह, वो मंज़िल की पुकार कहाँ है। वर्तमान तो पढ़ रहा हैं स्माईल-ओ-यूट्य
कविता की सच्चाई
रवि भूषण सिन्हा
कविता मन से रची नहीं जाती, कविता कभी सीखी नहीं जाती। ह्रदय से उत्पन्न हुए भावों‌ को, सिर्फ़ कलमबद्ध की जाती है। सुर�
ख़ामोशी एक सदा
कर्मवीर 'बुडाना'
ख़ुशियाँ मोबाईल हो चली, पीपल तले ख़ामोशियाँ मिली। बेमतलब की बातें इतनी हुई, नफ़रतों को इससे हवा मिली। राजनीति ने अब
कौन कहता है तुझे तू दीपकों के गीत गा
मनजीत भोला
कौन कहता है तुझे तू दीपकों के गीत गा, ज़ुल्मतों का दौर है तो ज़ुल्मतों के गीत गा। क्या ख़बर है फूल कोई खिल उठे इंसाफ़ का,
चराग़ों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है
मनजीत भोला
चराग़ों की तो आपस में नहीं कोई अदावत है, अँधेरा मिट नहीं पाया उजालों की सियासत है। जहाँ तू सर पटकता है वहाँ बस एक पत्
ऐसा मेरा संविधान है
समय सिंह जौल
हर रंग ख़ुद में समेटे यह एकता की शान है। भारतीयों का मान है ऐसा मेरा संविधान है।। 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का उपहार सुजान है।
कू-ए-बुताँ तक फिरूँ आराम-ए-जाँ की ख़्वाहिश लिए
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
कू-ए-बुताँ तक फिरूँ आराम-ए-जाँ की ख़्वाहिश लिए, वर्ना मैं निकलूँ भी तो घर से कहाँ की ख़्वाहिश लिए।
स्वीकार करें मेरा प्रणाम
सीमा 'वर्णिका'
हे! दिव्य शक्ति माँ सरस्वती स्वीकार करें मेरा प्रणाम, दिव्य गुणों को धारण कर बन जाऊँ मैं देव समान। हे! ज्ञानदायन�
गंगा
सीमा 'वर्णिका'
भगीरथ की तपस्या का फल, शिव जटाओं के खुल गए बल। गंगा अवतरण हुआ धरती पर, प्रवाहित मोक्षदायी अमृत जल।। गंगोत्री हिमन�
मेघा ऐसे बरसो रे
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
तन मन भीग जाए, मेघा ऐसे बरसो रे। सुध बुध भूल बैठूँ, मेघा ऐसे बरसो रे। घनश्याम श्वेत किसी भी रंग में आओ, मैं रंग जाऊँ उ�
चिरैया का आशा संदेश
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
ओ चिरैया, क्या संदेश है तेरा चीं-चीं से, क्यों जी रहा मानव होठ सीं-सीं के। मैं तो बेज़ुबान हूँ, फिर भी देखो, संदेश है मे
हुआ शंखनाद
सीमा 'वर्णिका'
देश पर आई विपदा गहरी, हुआ शंखनाद जागो प्रहरी। शत्रु बैठे निगाहें टिकाए, नित नए आतंक फैलाए, चुनौतियाँ बढ़ती ही जाए,
सावन
सीमा 'वर्णिका'
नीलाम्बर में श्यामल घटा छाई, सावन की पहली बौछार आई। जून की गर्मी से तपी धरती ने, शुष्क उष्ण उर में शीतलता पाई। इंद�
विद्यालय जाना है
शमा परवीन
एक प्यारा सा गाँव था। उस गाँव मे प्यारा सा विद्यालय था। उस विद्यालय मे सोनू नाम का एक बालक पढ़ता था। वह प्रतिदिन वि�
शिक्षक दिवस
रतन कुमार अगरवाला
ज़िंदगी में सर्वप्रथम गुरु, हमारे माता पिता को नमन। उनके बाद आते शिक्षक, जिनका करूँ मैं अभिनंदन। "अ" से लेकर "अ:" तक, "�
रोटी की तलाश
पारो शैवलिनी
संसद अँधेरी गुफा बन गई है जहाँ से रोटी के लिए लगने वाली आवाज़, उसकी दीवार से टकरा कर वापस लौट आती है। सोचता हूँ वो �
गोकुल की पहचान
विपिन दिलवरिया
द्वापर युग में था हुआ, विष्णु रूप अवतार। हुए अवतरित कृष्ण थे, मथुरा कारागार॥ निशि वश हो वसुदेव जी, लेकर सिर पर श्य�
मुश्किलों में मुस्कुराना सीख ले
अविनाश ब्यौहार
मुश्किलों में मुस्कुराना सीख ले, और ख्वाबों को सजाना सीख ले। बेशरम है यदि यहाँ पर आदमी, इसलिए तूँ भी लजाना सीख ले।
गुरु महिमा
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
गुरु ज्ञान की ज्योति अनोखी, अंतस फैला तिमिर मिटाए। अनगढ़ मूढ़ शून्य शिष्य को, सघन शून्य महत्व सिखाए।। दीपक जैसा ज�
गुरु
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
शिक्षक वह जो करें मार्ग प्रशस्त, जिसके सीख से अज्ञान हो अस्त। जीवन को मिलता नव संगीत, वही सद्चरित और उन्नति का मीत।
गुरु की महिमा है बड़ी
विपिन दिलवरिया
गुरु की महिमा है बड़ी, दूर करे अज्ञान। गुरु की वाणी है अमृत, मृत में फूँके जान।।
शिक्षक का सच्चा स्वरूप
सुषमा दीक्षित शुक्ला
चरित्रवान शिक्षक बनने के लिए शिक्षक को अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान होना चाहिए। शिक्षक को चाहिए कि वह स्वयं के स्वर�
गुरु
सीमा 'वर्णिका'
धरती पर प्राणी का अवतरण, प्रथम गुरु मात पिता का वरण। अक्षर ज्ञान विज्ञान का प्रदाता, द्वितीय गुरु शिक्षक तेजवरण।
शिक्षक ही पंख लगाते हैं
सुषमा दीक्षित शुक्ला
तम-तोम मिटाते हैं जग का, शिक्षक धरती के दिनकर हैं। हैं अंक सजे निर्माण प्रलय, शिष्यों हित प्रभु सम हितकर हैं। शुच�
ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे
रोहित गुस्ताख़
ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे, लबों की ख़ामुशी का क्या करेंगे। मुहब्बत डायरी में लिख चुके हैं, अमाँ अब शाइरी का क्�
पिता और उनका अक्स
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
कहता नज़र आता है जब हर एक शख़्स, पिता से ही मिलते हैं तुम्हारे नैन और नक़्श। बार-बार नज़र आता है मुझमें, मुझे पिता का ही �
श्याम बिन राधा अधूरी
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
न जाओ छोड़कर मोहन, ये राधा रह न पाएगी। बहेंगे अश्रु आँखों से, अधर मुस्कान जाएगी। हुई क्या भूल मुझसे जो, दिया है ग़म हम�
उड़े हौसले की उड़ान
आशाराम मीणा
हर क़दम मंज़िल खड़ी है, तुम चलो दो क़दम। जो ठहरा नहीं चलता गया, मिल गया उसे हमदम। रुकना नहीं झुकना नहीं, आगे रखो हर क़दम�
मन में खटके बात
विपिन दिलवरिया
रीत यहाँ की देख के, मन में खटके बात। मनुज विवेकी कौन थे, जिसने बाँटी जात।। पीड़ा जग की देख के, मन में खटके बात। कौन कर�
देशभक्ति
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
तीन रंग का झंडा अपना, भारत माँ की शान है। कण-कण में ख़ुशहाली महके, भारत देश महान है। मर मिटने का जज़्बा सबमें, बलिदान�
अमर जवान
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
सरहद पर हैं मुस्तैद फ़ौजी, सोए जनता चैन। आधा सोए आधा जागे, हैं सीमा पर नैन।। कभी नहीं धीरज खोता है, गर्मी ठंड बरसात। क
कड़वी बात न बोलिए
संजय राजभर 'समित'
कड़वी बात न बोलिए, हो जाते हैं घाव। मधुर वचन बोलें सदा, पार लगेगी नाव।।
दंभ न कर तू जाति का
संजय राजभर 'समित'
दंभ न कर तू जाति का, लाल सभी का रक्त। मेल-जोल सबसे करें, क्षण भर का है वक़्त।।
अपना-अपना राग है
संजय राजभर 'समित'
अपना-अपना राग है, अपनी-अपनी पीर। समाजसेवी जो करे, वो ही सच्चा वीर।।
ढाँढस देना सीख है
संजय राजभर 'समित'
ढाँढस देना सीख है, सुने किसी के आह। चल पड़ती है ज़िंदगी, भरता है उत्साह।।
दीन अबलों की सुनिए
संजय राजभर 'समित'
दीन अबलों की सुनिए, करूणामय विलाप। अंतः में सुकून मिले, और कटे संताप।।
द्रोपदी का चीर हरण
सीमा 'वर्णिका'
द्युतक्रीड़ा में हार गए युधिष्ठिर, राज्य धन वैभव भाई बंधुवर। अंत में पंचाली दाँव लगाई, शकुनि चाल से मात खाए कुँवर�
ख़्वाहिशें
सीमा 'वर्णिका'
अंतहीन होती ख़्वाहिशें, अनकही दबी फ़रमाइशें। काश समझता दर्द कोई, झूठी हँसी की नुमाइशें। कलेजे में धँसा तीर सा, आँख�
हसीन सपना
पारो शैवलिनी
तन्हा-तन्हा पेड़ों के साए तले, यादें तुम्हारी लेकर सपने हम बीने।। रुक-रुक के चलना चल-चल के रुकना मुड़ना कभी-कभी, सा�
बहन-बेटियाँ
कर्मवीर 'बुडाना'
बेटियाँ हँसती हैं तो घर की दीवारें करती हैं बात, बेटियाँ दो दो घर सँवारें, चलती हैं बात। बहन बेटियों के लिए हर सीने
चाँद मिरा हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
मुबारक़ हो आसमाँ, तिरे हिस्से में हो हुजूम-ए-अंजूम-ओ-चराग़, तिरे सीने में रहे आफ़ताब पर चाँद मिरा हैं हो गया आग़ाज़। उन�
आज भी इंतज़ार है
प्रवीन 'पथिक'
आज सुबह-सुबह अचानक; उनकी याद मस्तिष्क में, मेघों सा छा गई। वो लम्हें, मुझे विस्मृत करना चाहती थी। जिन्हें, मैंने स�
अकेले में
प्रवीन 'पथिक'
अकेलेपन की गहन निशा में, अनिमेष देखता हूँ एक सपना कि, डूब रहा हूँ गहरी खोह में; पाताल की गहराइयों में, धँसता, निष्प्�
फिर से तुमको माँगूँगी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
आज कठिन व्रत धारण करके, फिर से तुमको माँगूँगी। नए जन्म के इंतज़ार में, जीवनपथ पर भागूँगी। जनम-जनम के तुम हो साथी, न�
श्री गणेश चतुर्थी
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
हाथ जोड़ वंदन करूँ, गौरी नन्दन गणेश। दुनिया भव बाधा हरो, हर लो‌ सकल क्लेश।। वक्र तुण्ड महाकाय प्रभू, सर्व देव आदि द�
हिन्दी! तू भारत की गंगा है
पारो शैवलिनी
माँ गंगे की कोख से जन्म लिया मैंने भारत के धर्म, कर्म, ज्ञान और त्याग के उस चौराहे पर जहाँ हमने सीखा आगे बढ़ना मात�
सन्नाटे का शोर
रतन कुमार अगरवाला
मध्यम हो रहा शाम को सूरज, पसर रहा अंधियारा शनैः शनैः, हो रही एक अजीब सी शांति, जंगल चारो ओर घने-घने। पेड़ करे गूँज स�
कोकिला
रतन कुमार अगरवाला
बदली-बदली सी है आज, जाने क्यूँ कोकिला की आवाज़? प्रकृति की जर्जर होती हालत, ख़त्म हो रही हरी भरी वादियाँ, नदियों का दू�
मानवता केवल मानवता
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
जाति धर्म के क्यों पीछे है पड़ता, इसमे केवल नेता ही जमता, उसी को शोभित है दानवता। मेरे लिए तो एक ही धर्म है... मानवता... �
सरस्वती वंदना
रवि भूषण सिन्हा
माँ तेरे पैरों पर, शब्दों का फूल चढ़ाता हूँ। तेरे सम्मुख,‌ अपनी लेखनी अर्पित करता हूँ। ह्रदय से मैं तुझे, नमन बार-बा
नव यौवन
सुषमा दीक्षित शुक्ला
नव यौवन की नवल राह पर, नवल स्वप्न की कलिका। नव्य नवेली नयन नशीली, नीरज मुख की मलिका। गज गामिनि वह दर्प दामिनी, कल-क�
समदर्शी
प्रवीन 'पथिक'
सुख दुःख क्या? मन के विकल्प! इसी विचार से, कायाकल्प। समभाव रहे, जिसका मन। पाते रहे सुख, निज जीवन। रहे सदा खुश, अपना
सिर्फ़! मैं ही कहूँगा?
प्रवीन 'पथिक'
जब भी तुम्हें देखता हूँ; तेरी छवि पहले से मोहक लगती है। संशय होता है तुमसे बात करने में; भय लगता है, अपने प्यार का इज
दुःख और सुख
मधुस्मिता सेनापति
दुःख में ही तो सुख का महत्व ज्ञात होता है, दुःख में ही तो शत्रु, मित्र का पहचान होता है। दुःख में ही तो सुख का महत्व
दो पल की ज़िंदगी
मधुस्मिता सेनापति
एक ख़्वाब है जो अक्सर अधूरा होता है, नई चाहत जग जाती है जब पिछला ख़्वाब पूरा होता है। आज जो नया हैं कल वह हो जाती है पु
बेबस ज़िन्दगी
प्रवीन 'पथिक'
मूक हो के ज़िन्दगी, बहुत कुछ कह जाती है, कभी देती ग़म तो, कभी ख़ुशी दे जाती है। नहीं है पता इसका, कहाँ है ठिकाना, कहाँ इ
हिन्दी भाषा: दशा और दिशा
सीमा 'वर्णिका'
हिंदी भाषा की आज दशा और दिशा, ज्यों दिवस संग मिश्रित हो जाए निशा। विविध देशज विदेशज भाषा का मेल, भाषा की ऐसी विकृति �
हिंदी
रतन कुमार अगरवाला
हिंदी है हिंद की पहचान, है यह हिंद का गौरव। हिंदी हिंद की राष्ट्रभाषा, भाषा यह बड़ी ही सौरभ। हिंदी से मिलता अपनापन
हिन्दी से प्यार करो
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हिंदुस्तान के रहने वालों, हिंदी से तुम प्यार करो। ये पहचान है माँ भारत की, हिंदी का सत्कार करो। हिंदी के विद्वानो�
हिंदी हमारे हिन्द की शान है
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
हिंदी ही हमारी मातृभाषा, हिंदी ही हमारी राष्ट्रभाषा, जननी संस्कृत से लेकर निकली, अपनी नई पहचान है। हिंदी हमारे हिन
हिंदी भाषा
विपिन दिलवरिया
भारत मेरा देश है, मिट्टी मेरी शान। कहो गर्व से देश की, हिन्दी है पहचान।। एक देश है विश्व में, भारत जिसका नाम। बसते ध�
हिन्दी हमारी भाषा
राम प्रसाद आर्य
हिन्दी से सरल, सरस नहिं, है कोई अन्य भाषा। पढने, पढा़ने इसको, हर राष्ट्र लगता प्यासा।। इसमें बसी हमारी मानव संस्क
हिन्दी भाषा
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
हिंदी की बिंदी ने कह दी, अक्षर अक्षर महत्व कहानी। हिंदी सुशोभित राजभाषा, स्वाधीन भारत की निशानी। हिंदी का सर्वोच�
हिन्दी भारतीयों की चेतना है
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हिन्दी भारत की आत्मा है, हमारी पहचान है, हिन्दी को उपेक्षित कर शिक्षा का सर्वांगीण विकास अधूरा है। हिन्दी को मातृ भ�
तू बन
संतोष ताकर 'खाखी'
तू किसी के ख़्वाबों की तावीज़ बन, शायरी बन, उसका मीर बन, उसका ख़ून भी लगे तेरे बिन बेरंग, दिल के हर ज़ख़्म को दे इक रंग, तू उ
विश्वकर्मा
रतन कुमार अगरवाला
जग का किया निर्माण जिन्होंने, करता हूँ मैं आज उन्हे प्रणाम। दुःख संसार के हर लिए जिन्होंने, सुखी वसुंधरा का किया न�
मजबूरी
समय सिंह जौल
अपने हाथ में डंडी लिए चुंबक उसमें बाँध लिए ढूँढ़ रहा कूड़े में टुकड़े लोहे के जैसे मछुआरा जाल बिछाकर पानी में छो�
उड़ाने सभी आसमानो में है
अविनाश ब्यौहार
उड़ाने सभी आसमानो में है, आज पंछी सभी ठिकानो में है। आँगन में चुगते रहे सारा दिन, उनकी ज़िंदगी उन दानो में है। चुनाँ
काँधे पर चढ़ी धूप
अविनाश ब्यौहार
पशु-पक्षी और पेड़ों ने जीवन में कितने रंग भरे। है दिवस के काँधे पर चढ़ी धूप। होगा सागर सरिताओं का भूप।। चलते हु
पर्दे के पीछे
सीमा 'वर्णिका'
शास्त्री मैदान खचाखच भरा था हिंदी पर परिचर्चा चल रही थी। "हिंदी हमारी मातृभाषा है। इसका भाव सौंदर्य अप्रतिम है," वि
काश! ऐसा कोई जतन हो जाए
पुनेश समदर्शी
काश! ऐसा कोई जतन हो जाए, जाति-धर्म का पतन हो जाए। फिर ना रहे आपस में भेदभाव, सारे जहाँ का एक वतन हो जाए। सभी में हो अपन�
सीखें सिखाएँ
सुधीर श्रीवास्तव
ये हमारा सौभाग्य और ईश्वर की अनुकंपा ही है कि हमें मानव जीवन मिला, तो ऐसे में हम सभी की ये ज़िम्मेदारी है कि हम इस चार �
श्राद्ध का भोजन
सुधीर श्रीवास्तव
कौआ बनकर मैं तुम्हारे घर की मुँडेर पर नहीं आऊँगा, अपने और पुरखों का सिर मैं झुकाने अब नहीं आऊँगा। मेरी ही कमाई से त�
भटक रहे पाँव
अविनाश ब्यौहार
सतरंगी इन्द्रधनुष बुन रहा आकाश। है मन ऐसे खिला-खिला जैसे पलाश।। बल्लियों सा उछलता है ये दिल। तय करना दूरी होता �
हाँ मैं मज़दूर हूँ
पुनेश समदर्शी
रहता अधिकतर अपने परिवार से दूर हूँ, चिंता रहती घर के ख़र्चे की हाँ मैं मज़दूर हूँ। करता जी-हुज़ूरी मालिक की मेरा काम च�
धन के सँग सम्मान बँटेगा
अंकुर सिंह
धन दौलत के लालच में, भाई भाई से युद्ध छिड़ा है। भूल के सगे रिश्ते नातों को, भाई-भाई से स्वतः भिडा़ है।। एक ही माँ की �
दिल उनका भी अब इख़्तियार में नहीं है
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
दिल उनका भी अब इख़्तियार में नहीं है, क्यूँ रंगत अब उस रंग-बार में नहीं है। उनके दिल में तो इश्तियाक़ प्यार की है, पर
प्राण-प्रिय
सलिल सरोज
अधरों पर कुसुमित प्रीत-परिणय, केशों में आलोकित सांध्य मधुमय। चिर-प्रफुल्लित कोमल किसलय, दिव्य-ज्योति जैसी मेरी प�
आया जन्मदिन बाबा भीम का
पुनेश समदर्शी
आया जन्मदिन बाबा भीम का, विश्व समूचा झूम रहा। बाबा भीम के त्याग, समर्पण, बहुजन अम्बर चूम रहा। बाबा भीम के जन्मदिवस
काश
रतन कुमार अगरवाला
काश ऐसा होता, काश वैसा होता, काश ये न होता, काश वो न होता। काश, "काश" से पूरी होती आस, बन गया "काश" सिर्फ़ सपनो का आकाश। का
कुछ पुरानी यादें
प्रवीन 'पथिक'
तेरी आँखो में चाहत के, चिन्ह वो अपने देखें हैं। अपनी हर ख़ुशी में, मुस्कान तुम्हारी पाई है। ग़मों की परछाई में, प्यार
लोग
सीमा 'वर्णिका'
दुनिया की ख़ुदग़र्ज़ी देखी, हर बातों पर मर्ज़ी देखी। तोहमत जड़ते दूसरों पर, देते दलील फ़र्ज़ी देखी। जो लोग बहुत क़ाबिल ह�
ग़रीब की बेटी
सीमा 'वर्णिका'
उलझे हुए बाल, रूखे ख़ुश्क गाल। सूनी सी आँखें, रोटी का सवाल। विद्यालय से दूर, श्रम को मजबूर। बासी दाल-भात, ताड़ना भ�
माँ
पारो शैवलिनी
माँ सब कुछ है। एक स्वर्णिम स्वर्ग है माँ जन्म से मृत्यु तक के सफ़र का। साथ रहते हुए पग-पग पर डगमगाती कदमों को संभाल�
सौदागर
सीमा 'वर्णिका'
चारों तरफ़ है ठगों का डेरा, अरे! सौदागर कहाँ का फेरा। मृगनयनी कंचन काया, सौंदर्य की अद्भुत माया, सम्मोहन बिखरा पाया
देशगीत
सीमा 'वर्णिका'
देश के पुजारियों, मिल के करो आरती दे कर संदेश यह, वसुंधरा पुकारती। भिन्न भिन्न धर्म है प्रदेश भी अनेक हैं, भिन्न रं�
दामाद
सुधीर श्रीवास्तव
बिटिया का पति दामाद होता है, समय की बात है कि दामाद कभी रसगुल्ला तो कभी दोधारी तलवार होता है। गिरगिट की तरह रंग बदल�
श्राद्ध दिवस
सुधीर श्रीवास्तव
आइए! फिर इस बार भी श्राद्ध दिवस की दिखावटी ही सही औपचारिकता निभाते हैं, सामाजिक प्राणी होने का कर्तव्य निभाते हैं�
ये कैसा श्रद्धा भाव
सुधीर श्रीवास्तव
इस समय पितृ पक्ष चल रहा है। हर ओर तर्पण श्राद्ध की गूँज है। अचानक मेरे मन में एक सत्य घटना घूम गई। रमन (काल्पनिक नाम) �
दान
सुधीर श्रीवास्तव
युगों युगों से चली आ रही दान की परंम्पराओं का समय के साथ बदलाव भी दिखा। देने से अधिक दिखाने का प्रचलन बढ़ा। थोड़ा दे�
शिक्षा
रतन कुमार अगरवाला
ज्ञान का भंडार है शिक्षा, ज़िंदगी का सम्मान है शिक्षा। देश का उत्थान है शिक्षा, हर व्यक्ति का अरमान है शिक्षा। शिक�
चाय की चुस्की
रतन कुमार अगरवाला
चाय की चुस्कियाँ काली ज़रूर होती है, पर बात काले और सफ़ेद के फ़र्क़ की नही जनाब, चाय की चुस्कियाँ होती बड़ी ही मस्त अलमस�
तुम्हे उर्मिला बनकर
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
हमे लखन सा वनवासी बन, घर से दूर बहुत जाना है, तुम्हे उर्मिला बनकर मेरी अवधपुरी में रहना होगा। मेरे जाने का वह पल भी �
क्या साथ मेरा दे सकोगी?
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
मुश्किलों से जो कभी मन हार थककर बैठ जाए, तब कहो सहगामिनी क्या साथ मेरा दे सकोगी? हाँ मुझे स्वीकार निर्मल, नेह का बं�
पिता
पुनेश समदर्शी
है पिता ही, जो कभी सपनों को मरने नहीं देता। हालात कितने भी हों विपरीत, मगर डरने नहीं देता।। लाख मुसीबतों में भी, मैं
आत्मविस्मृति
प्रवीन 'पथिक'
हम उस राह के हैं पथिक! जाते जिस पथ से, वहाँ तेरे पाँवों की आहट सुनाई देती! तेरी छनकती पायल; खनकती चूड़ियाँ; कानों की झ�
पर! कोई बात नहीं
प्रवीन 'पथिक'
वेदना जगी! हृदय में वेदना जगी। मार पड़ी! ग़मों की मार पड़ी। विरान हो गया; सारा संसार। फिर एक बार, बारिश के थपेड़ों �
सुहाना है सफ़र अब तो
अविनाश ब्यौहार
सुहाना है सफ़र अब तो, नहीं होगी ख़बर अब तो। जिसे नादान समझे थे, वही लगता जबर अब तो। ज़माना इस तरह बदला, डराता हर बशर अब
प्यासी है प्यास
अविनाश ब्यौहार
है अथाह जलराशि प्यासी है प्यास। ज्वार भाटा सौंदर्य है सागर का। दुःख सुनता कौन छूछी गागर का।। नखत हैं फिर भी स�
पतझर
अविनाश ब्यौहार
झरते पत्ते कर रहे, हम सबको आगाह। दुख पीता है नीर को, दुर्गम सुख की राह।। पतझर का मौसम हुआ, उजड़ा उजड़ा गाँव। मानो धर�
रेत का बिछौना
अविनाश ब्यौहार
लगता है मरुथल- रेत का बिछौना। दूर-दूर तक नहीं दिखता है जल। नज़र नहीं आ रहे पंछी के दल। व्यर्थ है यहाँ- हरियाली का
पिया परदेश
समय सिंह जौल
पिया क्यों गए विदेश। भेजा ना कोई संदेश।। पिया प्रियतम परदेश से पधारें। प्रेम पूजारिन पूछे प्यारे।। पल-पल न कटत
मिलने तुम आ जाना
अंकुर सिंह
नित्य नए षड्यंत्र देख, कब तक ख़ामोश रहूँ मैं? देख ज़ुल्म अन्याय को, कब तक इन्हें सहूँ मैं? अपने अनकहे दर्द को मैंने, ब�
नशा करे चेतना शून्य
सुधीर श्रीवास्तव
क्षण भर के आनंद के लिए अपना ही नहीं अपने परिवार का भी जीवन तो मत बिगाड़िए, तन का नाश, मन का विनाश चेतना को शून्य की ओर �
एक अधूरी दास्ताँ
सुनील माहेश्वरी
कितनी बातों की ख़ामोशी, उन्हें बतानी थी, हर एक अक्स की कहानी उन्हें बतानी थी। सुबह की इबादत और, शाम की अज़ान भी उन्हे
जिस घर जन्मी बेटी
राम प्रसाद आर्य
जिस घर जन्मी बेटी, उस घर ख़ुशियों की बौछार है। बेटी सम्मुख हर धन-दौलत, फीकी इस संसार है।। जिस घर जन्मी बेटी, उस घर रि
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है, इस क़दर कुछ न हुआ जो इश्क़ हुआ है।
पाँच अँगुलियाँ
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
कहावत है पाँचो अँगुलियाँ बराबर नहीं होती। इसी बात पर सभी अँगुलियों में विवाद हो गया। हर एक अँगुली अपनी उपयोगिता गि
मेरे पिता
समय सिंह जौल
मेरा अभिमान मेरा स्वाभिमान मेरा अनुशासन मेरा भाषण मेरे पिता। मेरा मान मेरा सम्मान मेरा प्यारा मेरा सहारा म
वृद्ध जनों की करो हिफ़ाज़त
सुषमा दीक्षित शुक्ला
धरती और गगन के जैसे, वृद्ध जनों के साए हैं। इन बूढ़े वृक्षों की हम सब, पल्लव नवल लताएँ हैं। इनके दिल से सदा निकलती, �
श्राद्ध व तर्पण
सीमा 'वर्णिका'
माह भादप्रद पितृपक्ष काल, श्राद्ध तर्पण करते हर साल। स्वपूर्वजों का ऋण चुकाते, सद्कर्मों से काटे पाप जाल। श्रद्
महात्मा गांधी
सीमा 'वर्णिका'
भारत में जन्मे हैं ऐसे रत्न अनमोल, परिवर्तित कर दिया जिन्होंने भूगोल। अगणित अनुयायी बने थे जिनके, संतवाणी मानते थ
अहिंसा के पुजारी
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
भूल गए सब पाठ अहिंसा, पल पल हिंसक हो जाते हैं। आगे निकलने की जल्दी है, ग़लत राह पर बढ़ जाते हैं। भूल गए बापू गांधी को,
उड़ान
रतन कुमार अगरवाला
काश मैं भी एक पंछी होता, घोंसले से ही भर लेता उड़ान। सारी ऊँचाइयों को लेता नाप, भरता मैं हौसलों की उड़ान। हौसले तो �
पिता ही करता ऐसा काम
रवि भूषण सिन्हा
चुप रह कर जो हर पल सोचे, मौन रहकर करे सब काम। सामने वाला जान भी न पाए, करे उसके हर ज़रूरतों का इंतज़ाम। ऐसा करने वाला को
लाल बहादुर शास्त्री
रतन कुमार अगरवाला
सीधा सच्चा जिनका था जीवन, कष्ट भरा जीवन था आजीवन। बाधाओं से था भरा उनका जीवन, कर्तव्य पथ पर टिके थे आजीवन। तपस्विय
वृक्ष लगाओ, पुण्य कमाओ
सुधीर श्रीवास्तव
पुण्य कमाओ या न कमाओ पहले अपना जीवन बचाओ, धरा की हरियाली न मिटाओ, अपने हाथों ही जीवन न गँवाओ। धरती को न वीरान करो, सड़
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं, चाय की सोहबत में दिल को शाद करते हैं। इस शब-ए-ग़म में क्या हम शब-ज़ाद करते हैं, ब�
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
गीत-ओ-नज़्में लिख उन्हें याद करते हैं, चाय की सोहबत में दिल को शाद करते हैं।
ख़ुदकुशी क्यूँ की?
सुषमा दीक्षित शुक्ला
27 वर्षीय रोहित सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर तैनात था, जिसका विवाह 2 वर्ष पूर्व ख़ूबसूरत दीपिका से हुआ था। दोनों का �
महालया
रतन कुमार अगरवाला
पितृ पक्ष को कहते विदा, देवी पक्ष का करते अभिनंदन। श्रीराम लंका युद्ध में जाने को तैयार, कर रहे देवताओं के संग माँ �
पितृपक्ष
रतन कुमार अगरवाला
हमारे पूर्वज हमें जब भी कभी याद आते, पावन पितृपक्ष हम तब तब हैं मनाते। अपनी जड़ों से हम करते यूँ मुलाक़ातें, संस्कार
कौन सुनेगा मेरी बात
रवि भूषण सिन्हा
असत्य, हिंसा और भ्रष्टों की टोली में, कौन सुनेगा मेरी बात। चेहरे-चेहरे से फ़रेबी कर रहा है, हर रिश्ते में छलावा हो र�
नवरात्रि
रतन कुमार अगरवाला
हर घर हुई आज घट की स्थापना, करेंगे माँ दुर्गा को विराजमान। नवरात्रि के होते पूरे नौ दिन, अलग अलग रूपों में माँ होगी �
लिखता हूँ
समय सिंह जौल
समाज में हो ऐसा बदलाव लिखता हूँ, मोहब्बत आए मुल्क में वो सैलाब लिखता हूँ। टूटती चुप्पियों की बन आवाज़ लिखता हूँ, वं�
अन्नदाता
समय सिंह जौल
चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर भोर हुए जग जाता है, लिए कुदाली कंधे पर अपने खेत पहुँच जब जाता है। धरा का चीर कर सीना नए अं�
तुम्हारा जो सन्देश आया
कमला वेदी
प्रिय! तुम्हारा जो सन्देश आया, जैसे बहारों का मौसम छाया। भीनी सी गंध श्वासों को भिगा गई, अनकहे सवालों ने हृदय में �
तू अविरल चलता जा
कमला वेदी
रे मानव! तू अविरल चलता जा, रे मानव! तू दीप सा जलता जा। पैरों के छालों से घबराना ना तुम कभी, तूफ़ाँ आएँगे राहों में डर
चमचमाती कारों से
अविनाश ब्यौहार
काली अमावस में दीप जलते हैं तारों से। पर्व है दीवाली का। रश्मियों के माली का।। बाज आ गए अब हम हैं उनके उपकारों �
है मर गया आँख का पानी
अविनाश ब्यौहार
है मर गया आँख का पानी, बाग सरीखी नष्ट जवानी। ख़ुशी मिली रस्ते में मुझको, दिखती थी वो कुबड़ी कानी। झुग्गी के ख़्वाबों
हाल है ये अब बुरा अब बुरी हर शय लगे
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
हाल है ये अब बुरा अब बुरी हर शय लगे, बिन तिरे महफ़िल बुरी ठीक पर ये मय लगे।
नफ़रत
रतन कुमार अगरवाला
नफ़रतों का फैला सैलाब, घनघोर है षड्यंत्र, हो रही ओछी राजनीति, ख़तरे में है गणतंत्र। स्वतंत्र राष्ट्र के हम, हैं नागरि�
उपहास
रतन कुमार अगरवाला
उठ जाग रे ए मानव, मत कर यूँ उपहास, युगों युगों से करता आया, कैसा यह विनाश? प्रकृति खो रही स्वरूप, मचाया तूने विध्वं�
नारी का नार्यत्व
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
स्त्री का स्त्रीत्व, नारी का नार्यत्व, ममता का ममत्व, बहिन का अपनत्व, जो इन सबका जानते महत्त्व, हृदय में उनके बसता �
बाग में चँदोवा
अविनाश ब्यौहार
फूलों का खिंचा हुआ बाग में चँदोवा। पंखों पर तितली के गंध की सवारी। है शेफाली के फूलों की छवि न्यारी।। गुलाबों
बहुत रास आया
अविनाश ब्यौहार
महानगर में हमनें घरौंदा बनाया। पर हमें गाँव खेड़ा बहुत रास आया।। ताल, अमराई, मेड़ रही है। पुरवा निगोड़ी छेड़ रही है।�
यम कुबेर की पूजा
अविनाश ब्यौहार
धनतेरस में होगी यम कुबेर की पूजा। खरींदें वाहन चाँदी, सोना। महल का जगमग कोना-कोना।। नक्षत्रों में हुआ है पुष्�
होम करते हाँथ जलते
अविनाश ब्यौहार
होम करते हाँथ जलते, चाँद उगता सूर्य ढलते। वे अदब से बोलते हैं, पर हमें शादाब खलते। ठूँठ सा इक वृक्ष है पर, फल वहाँ �
चावल उबला पीच रहा है
अविनाश ब्यौहार
चावल उबला पीच रहा है, माली पौधे सींच रहा है। क़ातिल सा अंधेरा देखा, एक किरण को भींच रहा है। सूरज ने बादल जब देखा, अप�
बरसात के रूप
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
लो आ गई पुरवाई लेकर फिर एक नई शुरुआत, वो भीगा-भीगा सा मौसम और मदमाती बरसात। लुकाछिपी करने लगी निष्ठुर धूप, जो लगाए ब�
झण्डा
सरिता श्रीवास्तव 'श्री'
भारत प्यारा देश हमारा, रखता जग में शान। तीन रंग झंडा लहराए, करता महत्व बखान।। प्रधानमन्त्री झण्डा फहराए, लाल किले
नारी शक्ति
पुनेश समदर्शी
उठो शेरनी संगठित होकर, फूलन को अब याद करो, अस्मत लूट रहे जो शातिर, उनको अब बर्बाद करो। करो सामना गद्दारों का, तुम व�
उपवास
सीमा 'वर्णिका'
नवरात्रि में उपवास का अनुष्ठान, माँ दुर्गा से शक्ति का मिले वरदान। शारीरिक मानसिक बल मिलता, नवरात्रि में व्रत का �
समंदर
रतन कुमार अगरवाला
बड़ा हुआ मैं खेलते खेलते, गाँव की उन पगडंडियों में। रस्सी कूदा करता था मैं, घूम घूम कर सारी गलियों में। कूद जाता थ�
नवरात्र का त्यौहार
रतन कुमार अगरवाला
आया नवरात्र का त्यौहार, बज रहे ढ़ोल नगाड़े, लूँ माँ का आशीष, माँ आयी है मेरे द्वारे। झूम रही सारी धरती, हर्षित हुआ यह चम
काम आई बहुत आज ये मय-कशी
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
काम आई बहुत आज ये मय-कशी, बे-असर है दवा, ये ज़हर है सही।
अद्वितीय भारतीय सेना
रवि भूषण सिन्हा
जिस देश की सेना का देख ‌अद्भुत साहस, बडे़ से बडे़ दुश्मनों के हौसले पस्त हो जाते हैं। बात हो जब देश के फौजों की जाँब�
नवरात्रि का संदेश
रवि भूषण सिन्हा
माँ दुर्गा हर वर्ष इस पावन भुमि पर‌ आती है, आते ही अपनी सवारी से कुछ संकेत ‌दे जाती है। नवरात्रि के हर्षोल्लास में अ
आपके लिए
सुधीर श्रीवास्तव
रीमा ससुराल से विदा होकर पहली बार मायके आई। मांँ बाप भाई बहन सब बहुत ख़ुश थे। हों भी क्यों न? अपनी सामर्थ्य से ऊपर जाक�
प्रकृति का आँचल
कमला वेदी
चहुँ दिशि किरनें बिखर गई हैं, निशाभर सोई लताएँ उठकर अब निखर गई है। शबनमी बूँदों ने निशाभर स्नान कराया, पवन ने प्�
दशहरा
रतन कुमार अगरवाला
सच्चाई की होती जीत सदा, झूठ की होती हार, राम-रावण युद्ध का, अंत है दशहरे का त्यौहार। सत्य की हुई जीत, झूठ का हुआ मुँह क�
विजयादशमी
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
विजय रावण पर श्रीराम की। विजय दुष्ट पर कृपानिधान की। विजय दानवता पर मानवता की। विजय अपावन पर पावनता की। विजय दुष�
नवरात्रि पर्व
सीमा 'वर्णिका'
नवरात्रि हिंदूओं का प्रमुख त्यौहार, उमंग व उत्साह से मनाता संसार। शक्तिदात्री माँ दुर्गा की करते पूजा, घर-घर सजता
विजयदशमी और नीलकंठ
सुधीर श्रीवास्तव
हमारे बाबा महाबीर प्रसाद हमें अपने साथ ले जाकर विजयादशमी पर हमें बताया करते थे नीलकंठ पक्षी के दर्शन भी कराते थे,
बेटी है तब
राम प्रसाद आर्य
बेटी है, तब माता है, बेटी है, तब बाप। बेटी है, तब पत्नी है, बेटी है, तब हम, आप।। बेटी है, तब रिश्ते हैं, बेटी है, तब परिव�
नया सवेरा फिर आया है
राम प्रसाद आर्य
उठो साथियों! निंद्रा त्यागो, नया सवेरा फिर आया है। नव उमंग, तरंग, रंग नव, मग नव, नव चेतन लाया है।। मुर्गे कुकडू़ कु �
मिसाइल मैन कलाम
पुनेश समदर्शी
मिसाइल निर्माण भारत में कलाम कर रहे, सारे देश विश्व के सलाम कर रहे। चीन, रूस, अमेरिका, लंका हिला दिया, कलाम जी ने वि�
धरोहर
सुधीर श्रीवास्तव
हम सबके लिए हमारे बुज़ुर्ग धरोहर की तरह हैं, जिस तरह हम सब रीति रिवाजों, त्योहारों, परम्पराओं को सम्मान देते आ रहे ह�
विजयपथ
सुधीर श्रीवास्तव
सच कड़ुआ होता है फिर भी अच्छा है, बुराई लाख गुणवान हो जाए सच्चाई से दूर रहता है। विजयपर्व का ढोंग करना क्यों अच्छा ल
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू, हर गीत मेरी हर ग़ज़ल में शामिल है तू। है ख़ुश-नुमा ये ज़िंदगी मेरी आजकल, ये हे कि मेरे
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
हर सम्त इन हर एक पल में शामिल है तू, हर गीत मेरी हर ग़ज़ल में शामिल है तू।
गलने वाले दीप
अविनाश ब्यौहार
देखे पल पल भेष बदलने वाले दीप। चहल पहल सरगर्मी तो कूचे में है। सन्नाटा बजता मानो छूछे में है।। खड़े हुए पातों म�
वंशी के स्वर
अविनाश ब्यौहार
कानों में गूँज रहे वंशी के स्वर। पंछी का दल उड़ चला आकाश में। गाछ को लता बाँधे हुए पाश में।। छाया सा सिमट गया अन�
घोड़े हवाओं के
अविनाश ब्यौहार
कतर दिए हैं पर वादे वफ़ाओं के। तन पर पड़ते जाड़े के कोड़े। हैं गद-गद अलाव थोड़े-थोड़े।। दौड़ रहे सरपट घोड़े हवाओं के। मं
बे-नियाज़ अब नहीं मिलेंगे
अविनाश ब्यौहार
बे-नियाज़ अब नहीं मिलेंगे, पतझर में गुल कहाँ खिलेंगे। नैतिकता का क़त्ल हुआ है, धरती, अंबर, शिखर हिलेंगे। नर्म-नर्म द
समय की किसी से सगाई नहीं है
अविनाश ब्यौहार
समय की किसी से सगाई नहीं है, निद्रा में निशा जो जगाई नहीं है। रहे झाँकते हैं गगन से सितारे, धरा पे न जाने भलाई नहीं ह
ख़ुशी तो हमेशा पलों के लिए है
अविनाश ब्यौहार
ख़ुशी तो हमेशा पलों के लिए है, ग़ज़ल शायरी दिलजलों के लिए है। जहाँ रोज़ रिश्ते पराए हुए हैं, सुभीता रही तो खलों के लिए ह�
तेरे बिना
कर्मवीर 'बुडाना'
तेरे बिना रो पड़ता हूँ तुझे राज़ी करने के लिए, तेरे बिना जीवन मानिंद जहन्नुम हैं। तू नहीं तो जीवन का हर सुख दुःख हैं।
भोर भी होगी
कमला वेदी
भोर भी होगी सूरज भी निकलेगा, चाँदनी सँग-सँग चाँद भी बहकेगा। पर ना खिलेंगे मिट गए जो फूल, मिट गए माटी में बन गए जो धूल
पगली
कमला वेदी
प्रेम रंग में रंगी एक शहज़ादी, मुहब्बत के हंसी रंग बुनती है। पुष्प बिछाती राह में उसके, काँटे ख़ुद के लिए चुनती है। �
ये कैसा अपनापन है
राम प्रसाद आर्य
कौन कहता है कि, बेटी तो पराया धन है? पूछो उससे कि तेरा, ये कैसा अपनापन है।। पूछो उससे कि.... अपनी जनी को ही तू पराया कैस
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
इश्क़ तो इश्क़ है सब को इश्क़ हुआ है, इस क़दर कुछ न हुआ जो इश्क़ हुआ है। चेहरा एक निगाहों से न हटे जब, वास्ता आप भी समझो इश्
दोस्ती
पुनेश समदर्शी
है दोस्ती ही जो सिखाती है, मुसीबत में साथ देना, दौड़कर गिरते हुए साथी के, हाथ में हाथ देना। जब कभी मुसीबत में, मैं उद�
माँ
पुनेश समदर्शी
माँ नहीं होती, तो मैं कहाँ होता, न तुम होते, न ये जहाँ होता। मुझे याद हैं वो रातें, माँ की लोरियाँ और बातें। रात में न
करवा चौथ
रतन कुमार अगरवाला
करवा चौथ पर सभी औरतें, कर रही अद्भुत शृंगार, कर रही माता करवा की अर्चना, मिलेगी माँ की कृपा अपरंपार। लड़कियाँ कर रही �
ख़ूबसूरती निहारती आईने
विपिन दिलवरिया
ख़ुशहाल थी मेरी ज़िन्दगी, कुछ भी ग़म नहीं था जीने में। हँसती इठलाती फिरती थी, कोई ख़ौफ़ नहीं था सीने में। पिता की लाडल�
उपहार
रतन कुमार अगरवाला
रोज़ आता यह भक्त, प्रभु तोरे दरबार, नहीं माँगा मैने आजतक, तुमसे कोई उपहार। सोचता हूँ, नहीं है मुझे, कोई भी अधिकार, कैस�
संसार की रीत निराली
कमला वेदी
संसार की रीत निराली कहीं क्रन्दन कहीं दीवाली। संसार की... कहीं रंगे मन रंगों में कहीं भटके मन होके वैरागी। संसार �
सिमटता गाँव
अंकुर सिंह
जीवन के तीस बसंतों को पार कर चुका हूँ, जब कभी एकांत में बैठ कर बीते हुए वर्षों का अवलोकन करता हूँ तो लगता हैं कि समय न�
देवी मइया
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मइया ऊँची है तोहरी अटरिया। कइसे आवउँ मै तोहरी नगरिया। 2 लहँगा मइ लाई चुनरिया हूँ लाई, बेलवा चमेलिया की माला बनाई, �
माई के मन्दिरवा भीतर
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मगिहौं वरदान माई के मन्दिरवा भीतर। 2 गइहौं गुनगान देवी के मन्दिरवा भीतर। 2 सोना न मगिहौं चाँदी न मगिहौं, घोड़ा न मगि
प्यारी मइया
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मइया री मइया ओ मोरी मइया। हम तोहरे बालक हैं तू प्यारी मइया। मइया री... 2 चन्दा के जैसो मुखड़ो है तेरो, नयनन मा ममता है �
सिंहनी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
स्वर्ण की ज़ंजीर बाँधे, स्वान फिर भी स्वान है। धूल धूषित सिंहनी, पाती सदा सम्मान है। आत्मनिर्भर स्वाभिमानी, शौर�
वृक्ष संरक्षण
राम प्रसाद आर्य
वृक्ष से मिलती हवा है साँस लेने के लिए हमको सदा। मधुर रसमय फल व शीतल छाँव, थक जाएँ यदा।। वृक्ष देते जल हमें, ईंधन जल
कवि भाव
राम प्रसाद आर्य
कवि भाव कविता में, नित भावुक कर देता है। हर अभाव-भाव उर नित, प्रभाव-भाव भर देता है।। कवि क़लम-सरासन, शब्द-बान, जब, तर�
जितनी बार पढ़ा है तुमको
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
एक प्रणय के संबोधन में हमने कितने नाम दिए। जितनी बार पढ़ा है तुमको उतने ही अनुवाद किए। डूबा रहता हूँ यादों में दृग
दिनमान
सीमा 'वर्णिका'
प्राची से रवि का हो रहा आगमन, ला रहा वह संग भोर भरा दामन। शीतल सुवासित बयार बहने लगी, मनमोहक पुष्पों से निखरा चमन। �
नवरात्रि: वैज्ञानिक महत्व
सीमा 'वर्णिका'
भारत धार्मिक त्यौहारों का देश, सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश। गूढ़ रहस्य तथा ज्ञान से परिपूर्ण, वेद, पुराण ग्रंथ में
श्री लाल बहादुर शास्त्री
सीमा 'वर्णिका'
भारतीय संस्कृति के वह परिचायक, नैतिक मूल्यों के सदैव रहे उन्नायक। भारत सुत श्री लाल बहादुर शास्त्री, जटिल समस्या�
मधुशाला
सीमा 'वर्णिका'
मेरे अंदर भी है एक मधुशाला, ख़्याल मेरे बने हैं साक़ीबाला। जज़्बात समंदर लेता हिलोरे, कलम परोसे काग़ज़ पर हाला। लम्हे �
नीर चक्र
सीमा 'वर्णिका'
वसुधा के अंकपाश में खेले नीर, सृजित जल तत्व से मानव शरीर। धरा गगन पर अठखेलियाँ करता, निराकार बहता फिरता पय अधीर। द
देश हमारा
सीमा 'वर्णिका'
विश्व बंधुत्व का राग छिड़ेगा, राष्ट्र प्रगति के सोपान चढ़ेगा। विश्वविजेता हो देश हमारा, सुंदर स्वच्छ यह परिवेश �
नारी
सीमा 'वर्णिका'
ईश्वर की अनुपम अद्भुत कृति, विनम्र सहनशील गुण प्रभृति। अपार अथाह प्रेम धारणी, पद गृहस्वामिनी नियति निर्भृति। न�
आज टूटी सी भुजा है
अविनाश ब्यौहार
आज टूटी सी भुजा है, यानि घायल अब शुजा है। एक दूजे के लिए हैं, राम हैं मानो कुजा है। ये बहारें हैं बलाएँ, गर बवंडर ही
नदी की कहानी
अविनाश ब्यौहार
कौतुकी हुई है नदी की कहानी। उद्गम से शुरू फिर चौड़ा है पाट। मिलते हैं रस्ते में नदिया औ घाट।। चूमें है चश्म मौजो
काँटों को ताज
अविनाश ब्यौहार
फूलों को घाव मिले काँटों को ताज। पुष्पित पल्लवित हो गया फ़रेब। अब विशेष गुण हो गया है ऐब।। पंछी भी भूल गए भरना पर�
बजतीं हैं फल्लियाँ
अविनाश ब्यौहार
जागे हैं खेतिहर अगहन में। जोतेंगे खेत बैल नहे हल। है साँझ लौटे चिड़ियों के दल।। पोई की पत्तियाँ अरहन में बजतीं
उपदा केवल खाम ख़याली है
अविनाश ब्यौहार
उपदा केवल खाम ख़याली है, सियासत में मंत्री मवाली है। अभिनन्दन जहाँ होना चाहिए, माहौल ने ताना दुनाली है। अटैची नोट
ख़्वाहिश का उठे जनाज़ा है
अविनाश ब्यौहार
ख़्वाहिश का उठे जनाज़ा है, ख़बर अख़बार की ताज़ा है। मूल सूद चुकता है फिर भी, बेजा है चूँकि तक़ाज़ा है। हम समझे उन्हे बे-अद�
आँसू की नदिया बही
अविनाश ब्यौहार
आँसू की नदिया बही, कोरोना की मार। मौत यहाँ तांडव करे, जीना है दुश्वार।।
अंतर्द्वंद
सुधीर श्रीवास्तव
लंबी प्रतीक्षा के बाद आख़िर वो दिन आ ही गया और उसने सुंदर सी गोल मटोल बेटी को जन्मदिन दिया। सब बहुत ख़ुश थे। यहाँ तक की
दोष किसका?
सुधीर श्रीवास्तव
आज रमा को अपनी भूल का बहुत पछतावा हो रहा था।आज रह रह कर कर उसे वह दिन याद आ रहा था, जब उसने माँ-बाप की चिंता में और पति क�
सबक़
सुधीर श्रीवास्तव
समय तेज़ी से निकल रहा है सबक़ सीखने की सीख दे रहा है, मगर हम मुग़ालते में जीते हैं, समय का उपहास उड़ाते रहते हैं। अब भी सम
राम फिर आ जाओ
सुधीर श्रीवास्तव
हे राम! एक बार फिर आ जाओ, अब और न इंतज़ार करवाओ। धरा पर पापियों का आतंक बढ़ रहा है, हर ओर काला नाग फन फैलाए खड़ा है। बहन ब�
जीव और प्राणी
सुधीर श्रीवास्तव
हर जीव, हर प्राणी का जीवन आधार है जल, जंगल, ज़मीन, मानव ही प्राणी कहलाते बाक़ी सब हैं जीव। कहते हैं चौरासी लाख योनियों
मातु-पिता यदि साथ हों
अविनाश ब्यौहार
मातु-पिता यदि साथ हों, तम में दिखे उजास। ईश्वर तो हैं बाद में, ये हैं दिल के पास।।
तुम्हारे इश्क़ को ही पूजती हूँ
सुषमा दीक्षित शुक्ला
तुम्हारे इश्क़ को ही पूजती हूँ, मगर तक़दीर से मैं जूझती हूँ। सजाया था कभी जो फूल लव पे, महक तेरी उसी में सूँघती हूँ। �
जीवन-धारा
सुषमा दीक्षित शुक्ला
तू बिखर गई जीवन-धारा हम फिर से तुझे समेट चले। हम फिर से... 2 मैं रोई थी घबड़ाई थी, उठ-उठ कर फिर गिर जाती थी। तू नागिन जैस�
संसार ने दिया क्या?
सुधीर श्रीवास्तव
ये सौभाग्य हमारा है कि हम इस संसार में आए, ख़ुशियों के सूत्रधार बने रिश्तों के आयाम बुने। पर हमनें संसार को क्या दि�
वक़्त चला जाएगा
सुधीर श्रीवास्तव
वक़्त कैसा भी हो भला कब ठहरा है? अच्छे दिन, सुनहरे पल भी आख़िर खिसक ही जाते हैं, कठिन से कठिन समय भी एक दिन चले ही जाते ह
जीवन संगिनी
पुनेश समदर्शी
बात तो तब हुई, जब वो मुस्कुराई। उससे पहले तो मैं, डरा हुआ था। बातों में अजीब सी, मधुरता थी उसके। ऐसा मीठा संवाद, पहले �
बोलीयों का प्रभाव
रवि भूषण सिन्हा
अपनी तरह की बोली बोलने का, है सबको आज़ादी। पर जो बोलता प्रभावी, वो दुनिया पर पड़ता भारी।। प्यार की बोली बोल कर, किजिए
शनासाई
अविनाश ब्यौहार
ऐनाकोंडा रातें होंगे दिन कसाई! उमंगें मन की बासन धोतीं! है शादमानी अखियाँ रोतीं! अभिनंदन के बदले में है जग हँसा
गुलमोहर
अविनाश ब्यौहार
गुलमोहर मानो स्वर्ग का फूल! लबालब भरा है पराग! खुले मधुमक्खी के भाग! मधुका का छत्ता रहा है झूल! धधके अंगार सा रं�
धनतेरस
सीमा 'वर्णिका'
अप्रतिम क्षण वह समुद्र मंथन का, भगवान धनवंतरि के आगमन का। कार्तिक मास कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, अमृत कलश के दिव्य दर्श�
दीपावली
सीमा 'वर्णिका'
जगमगा रही अमावस की रात, धरती पर आई तारों की बारात। दीपावली का पर्व सुहाना, मस्ती में झूमते गाते गाना। त्यौहार का म
दीया और दीपावली
रतन कुमार अगरवाला
आओ मिलकर दिवाली मनाएँ, हर कोने में दिए जलाएँ, धरती का अंधकार मिटाएँ, दीया जलाएँ, क़ंदील जलाएँ। आशाओं के दीप जलाएँ, नि�
धनतेरस के रंग
रतन कुमार अगरवाला
साँझ होंगी, आसमाँ में चमकेंगे, चाँद और हज़ारों सितारे, कार्तिक महीने के तेरहवें दिन, धन तेरस के बजेंगे नगाड़े। धन तेर�
त्यौहारों का मौसम
सुधीर श्रीवास्तव
त्यौहारों का मौसम आया सबकी व्यस्तता बढ़ाया, अभी करवा चौथ बीता है, अब धनतेरस, जमघंट के बाद दीवाली की तैयारी है, भैय्य
दीपावली का जश्न
शमा परवीन
दीपावली का जश्न मनाने का दिन है आज, अम्न-ओ-वफ़ा का दीप जलाने का दिन है आज। हरगिज़ न हो सके अब अँधेरा किसी के घर, ऐसी शम
संभलना सीखिए
शमा परवीन
लड़खड़ाते हैं क़दम तो फिर संभलना सीखिए, वक़्त के मानिंद अब ख़ुद को बदलना सीखिए। तुम सहारे ग़ैर के कब तक चलोगे इस तरह, च�
दादी माँ
समय सिंह जौल
रोज़ सवेरे स्कूल जाने हमें जगाती दादी माँ। अपने जीवन के अनुभव हमें बताती है दादी माँ।। रोज शाम को अच्छी सी कहानी �
दीप पर्व का सम्मान
सुधीर श्रीवास्तव
दीपों की लड़ियाँ सजाएँ आइए दीवाली मनाएँ, उल्लास भरा त्यौहार मनाएँ। एक दीप राष्ट्र के नाम भी जलाएँ भारतीयता के नाम �
करते टीका
अविनाश ब्यौहार
उनको बिल्कुल आता नहीं सलीक़ा। घुटन भरे जीवन में खुला झरोखा। चारों खाने चित्त हुआ है धोखा।। घर से ज्यों ही निकल�
चौमासे की देह
अविनाश ब्यौहार
वसुधा के पाप यहाँ धोता है मेह। सड़कें गलियाँ और शिलाएँ हैं। लू से झुलसी हुईं फ़िज़ाएँ हैं।। लगा भिगोने सबको पावस �
अलोनी है
अविनाश ब्यौहार
हिंदी सुघड़ सलोनी है! इसमें लालित्य भरा! मीठा साहित्य भरा!! हिंदी हुई मघोनी है! है संस्कृति का गहना! निर्झरिणी
है दुनिया पर नहीं भरोसा
अविनाश ब्यौहार
है दुनिया पर नहीं भरोसा, पानी पी पी कर है कोसा। घर में इतनी चहल पहल है, औ कुढ़ कर बैठा है गोशा। ऑफ़िस की मीटिंग में म�
गोवर्धन पूजा
सुधीर श्रीवास्तव
इंद्र को जब भ्रम हुआ अपने पर बड़ा अभिमान हुआ, गोवर्धन पर्वत की पूजा उन्हें तनिक न रास आई, भावावेश में मूसलाधार बारि�
अपनी भी दीवाली होती
रोहित गुस्ताख़
होता तेरे चेहरे का नूर, रात न फिर ये काली होती। जश्न मनाते साथ तुम्हारे, अपनी भी दीवाली होती। बैठे हैं हम मन को मार�
भाई दूज
रतन कुमार अगरवाला
भगवान सूर्यनारायण की पत्नी थी छाया, जन्मे यमराज और यमुना, यमुना भाई से करती थी अपार स्नेह, भोजन कराने की करती थी काम�
फ़ासले
रतन कुमार अगरवाला
उम्र ढलती गई, अंदाज़ बदलते गए, दिल से दिल के फ़ासले बढ़ते गए। जीना चाहते हैं सभी सुकून से, सुकून की ज़िंदगी के मायने बदल
वो फूल हैं हम
राम प्रसाद आर्य
अब ये मत पूछना, ऐ काँटों! कि कौन हैं हम। मामूली मत समझना हमें, गर मौन हैं हम।। मोहब्बत के मकरन्द में सने हैं, वो फूल
भैया दूज
सुधीर श्रीवास्तव
कार्तिक मास शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को भैया दूज होता है, इसी दिन चित्रगुप्त जी का पूजन भी होता है, भाई यम और बहन यम
आईना
अंकुर सिंह
"बेटा सुनील, मैंने पूरे जीवन की कमाई नेहा की पढ़ाई में लगा दी, मेरे पास दहेज में देने के लिए कुछ भी नहीं है।" शिवनाराय�
हृदय परिवर्तन
अंकुर सिंह
"अच्छा माँ, मैं चलता हूँ ऑफ़िस आफिस को लेट हो रहा है। शाम को थोड़ा लेट आऊँगा आप और पापा टाइम से डिनर कर लेना।" अंकित ने
मुझको हक़ दें दो
अंकुर सिंह
अपने दिल का हाल सुनाऊँ, मुझे अपना ऐसा पल दे दो। बिन हिचक कहें अपनी बातें। ऐसा तुम मुझको हक़ दें दो।। रहें संग जब हम द
छठ पूजा
रतन कुमार अगरवाला
आया छठ पूजा का महापर्व, सूर्यदेव की करें उपासना, सुबह और शाम, सूर्य देव की, करें अर्घ्य देकर अर्चना। सूर्य देव की बह�
दीया और बाती
रतन कुमार अगरवाला
मिट्टी का दीया, और रुई की बाती, युगों-युगों से दोनों, एक दूसरे के साथी। कहते हैं जलता दीया, पर जलती है बाती, दीया बनता
सुई-धागा
रतन कुमार अगरवाला
सुई तो होती छैल-छबीली, धागा सीधा-साधा, सुई करती रहती छेद, धागा सिलता जाता। सुई-धागे की प्रेम कहानी, बहुतों ने न जानी, �
गुनगुनी धूप
सुषमा दीक्षित शुक्ला
गुनगुनी धूप अब मन को भाने लगी, फिर से पीहर में गोरी लजाने लगी। 2 अब सुहानी लगे सर्द की दुपहरी, मौसमी मयकशी है ये जादू
आशादीप
सुषमा दीक्षित शुक्ला
आओ आशा दीप जलाएँ अंधकार का नाम मिटाएँ। 2 रूह जलाकर ज़िंदा रहना, जीवन की तो रीत नहीं। अंतिम हद तक आस न खोना, मानव मन की
परी लगे भैया को बहना
सुषमा दीक्षित शुक्ला
इस दुनिया में है सबसे प्यारा, भाई बहन का रिश्ता। परी लगे भैया को बहना, भैया लगे फ़रिश्ता। 2 इसमें न कोई ख़ुदग़र्ज़ी है, �
छठ पूजा
सीमा 'वर्णिका'
सूर्योपासना का अत्यानुपम त्योहार, वैदिक आर्य संस्कृति का है उपहार। मनाते पर्व धूमधाम से नर और नारी, राज्य उत्तर प
खोया बचपन
सीमा 'वर्णिका'
आ लौट चलें बचपन की ओर, जहाँ नहीं था ख़ुशियों का छोर। दिन-रात खेलकूद की ख़ुमारी, पढ़ाई कम और मस्ती पर जोर। वह ग्रीष्मा�
चाँद दूधिया
अविनाश ब्यौहार
बेचैन है चाँद दूधिया! निशानी दिया रूमाल की! यादें अधरों की गाल की! देहरी पर ख़्वाब मूंगिया! छूट गयी ऊँटी की शाम! �
मैं पिता जो ठहरा
विजय कृष्ण
मैं पिता जो ठहरा- प्यार जता नहीं पाया। बच्चे माँ से फ़रियाद किया करते थे, पापा को घूमने के लिए मना लो, ये मनुहार किया
ख़ाकी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हमें सुलाते जाग-जाग कर, जिनसे है आबाद वतन। जिनका धर्म त्याग सेवा है, उस ख़ाकी को कोटि नमन। शूरवीर ये सच्चे योद्धा, �
बाल दिवस
रतन कुमार अगरवाला
बाल दिवस मनाते हैं इस दिन, 14 नवंबर का दिन है आज, आज के दिन बच्चों में होता, एक अलग ही अंदाज़। स्कूलों में होते खेल-कूद, ब�
मासूमों की मुस्कान
सुषमा दीक्षित शुक्ला
कितनी निर्मल कितनी मोहक, है इन मासूमों की मुस्कान। गंगा की निर्मल धारा सी, है इन नादानों की पहचान। इनके बीच पहुँ�
लाल दुलारे
सुषमा दीक्षित शुक्ला
वो मेरे नयनों के तारे, जो मेरे दो लाल दुलारे। वो ग़ुरूर हैं अपनी माँ के, पापा के वो राज दुलारे। एक अगर है सूरज जैसा, द
खेले दिनमान
अविनाश ब्यौहार
भोर हुई प्राची की गोद में खेले दिनमान! दिन उदय होते ही अँधेरा दूर हुआ! रात में नीड़ों में आराम भरपूर हुआ! दिन चढ�
आग हुआ मौसम
अविनाश ब्यौहार
भट्टी की धधक रही आग हुआ मौसम! हवाएँ हैं, लपट है, लू है! गर्म तवे सी तपती भू है! ॠतुओं के दामन पे दाग हुआ मौसम! प्या�
पोखर ठोंके दावा
अविनाश ब्यौहार
पड़ता है अब लू लपटों का जमकर चाँटा! सूरज ज्वालामुखी है किरने लावा! पोखर ठोंके कोर्ट में जल का दावा! ताल हुए डबरे
दुःखों का क़ाफ़िला
अविनाश ब्यौहार
चल रहा है दुःखों का क़ाफ़िला! ख़ुशियाँ हैं पानी का बताशा! अपिरिचित शहर में क्या शनासा! राजधानी खोने लगी जिला! चा�
तुलसी विवाह
रतन कुमार अगरवाला
एक रूप लिया वृंदा का, दूसरे रूप में बनी नदी पदमा, वृंदा ने सहे कष्ट अतिरेक, संसार का उद्धार करने उतरी पदमा। पाकर श्र�
अपराधी है तो थाना है
अविनाश ब्यौहार
अपराधी है तो थाना है, कैसा खूँखार ज़माना है। हमको अनजाना शहर मिला, औ सारी रात बिताना है। हासिल करने की ख़्वाहिश में,
समय का सच
रवि भूषण सिन्हा
समय तो समय है, समय को कहाँ कोई रोक पाता है। समय, देखते ही देखते, समय पर आगे बढ़ जाता है।। दुनिया का हो कोई राजा या रंक,
गौमाता
सुधीर श्रीवास्तव
आज गोपाष्टमी है, आज हम गौमाता की पूजा, सेवा करते हैं, शायद औपचारिकता निभाते हैं। क्योंकि हम गायों को माँ मानते हैं
लक्ष्मीबाई
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मणिकर्णिका बन लक्ष्मिबाई, पग धरणि पर धर दिया। मानो स्वयं ही दुर्गमा ने, जन्म धरती पर लिया। सुघड़ता में लक्ष्मि जै
गुरु नानक जी
सुधीर श्रीवास्तव
कार्तिक मास में संवत पन्द्रह सौ छब्बीस को माँ तृप्ता के गर्भ से कालू मेहता के आँगन तलवंडी, पंजाब (पाकिस्तान) में �
बेटी
पुनेश समदर्शी
बेटी है जगसार सुनो, बेटी से संसार सुनो, बेटी ना हो जिस घर में, वो सूना है घर द्वार सुनो। अफ़सोस मुझे क्यों बेटी को, बेट�
डेंगू और मैं
पुनेश समदर्शी
डॉक्टर साहब ने बताया कि हमें हो गया डेंगू, हमने हँसते हुए डेंगू को दिखा दिया ठेंगू। डेंगू बोला कि मुझे हराएगा, बंदर
गंगा मइया
सुषमा दीक्षित शुक्ला
अमृत है तेरा निर्मल जल हे! पावन गंगा मइया। हम सब तेरे बालक हैं तुम हमरी गंगा मइया। माँ सब के पाप मिटा दो हे! पापनाशि�
राधे बिन गोविन्द कहँ
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
यदुनंदन ऋषिकेश प्रभु, बसे यमुन के तीर। राधा दौड़़ी गल मिली, भरी आँख में नीर।। भव्य मनोहर रूपसी, नीर भरी लखि नैन। कम�
भज रे मन बस प्रभु चरण
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
भजो रे मन बस प्रभु चरण, तज तन धन संसार को। पलभर का जीवन दुर्लभ यह, जग अर्पण कर परमार्थ को। भजो रे मन श्रीराम शरण नित,
चूड़ियाँ
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
माँ बहनें वधू तनया, खनकती हाथ चूड़ी से, प्रिया हँसती लजाती सी सजन मनहार चूड़ी से। लगा बिंदी सजी मेंहदी पहन चूड़ी चहकती
मेरे हमराज़ हो तुम
पारो शैवलिनी
हमसफ़र हमनसीं हमदम मेरे हमराज़ हो तुम मेरी साँसों में बसी मेरी ही आवाज़ हो तुम। तेरे ही दम से है बहार मेरी ज़िंदगी म�
फ़ोटो
रतन कुमार अगरवाला
हाथ लग गई बचपन की फ़ोटो, मिले कई लम्हें हँसते हुए। याद आ गए पुराने दोस्त, एक दूजे से गले मिलते हुए। याद आया गुज़रा वह �
लॉक लगा के रखना
अंकुर सिंह
चलो अब हम चलते है, ख़्याल अपना रख लेना। किए मुझसे वादे पूरे कर, मेरे यादों को बिसरा देना।। मेरे दिल के प्रेम उमंग तु�
आहत
सुधीर श्रीवास्तव
कितना आसान है किसी को आहत करना, जले पर नमक छिड़कना। पर ज़रा सोचिए कोई आपको यूँ आहत करेगा तब कैसा लगेगा? मगर हम सब आदत �
कौमी एकता
सुषमा दीक्षित शुक्ला
आपस मे अब युद्ध न करना, ऐ! भारत माता के लालों। बैरी देश हँसेंगे तुम पर, वो सोचेंगे लाभ उठा लो। आपस के मतभेद मिटा दो, म�
संत कबीर
पुनेश समदर्शी
संत कबीर के समाजवाद में ऊँचा ना कोई नीचा था, संत कबीर ने आजीवन वृक्ष समानता का सींचा था। ढोंग-पाखंड को कबीर ने आजीव�
संविधान
रतन कुमार अगरवाला
भीमराव आम्बेडकर की रचना हूँ मैं, कहने को राष्ट्र का सम्मान हूँ मैं। कहने को समानता का पोषक हूँ मैं, कहने को आवाज़ की �
मंगलमय सब काम
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
रोम-रोम तनु राममय, भक्त राम हनुमान। भोर भयो सुमिरन करूँ, मंगलमय सब काम।। रोग शोक परिताप सब, मिटे सकल संसार। आंजनेय
आओ जोड़ें दिल तार सखी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
दुर्गम दुखदाई राह बहुत, अतिजोरों से है हवा चली, घनघोर घटा छाई अम्बर, विकराल जलद सौन्दर्य घड़ी। है कठिन मार्ग विस्�
फागुन
अविनाश ब्यौहार
फूल, पत्तियाँ, फुनगियाँ, मधुॠतु में मदहोश। पवन झकोरे सुरभि को, लेते हैं आगोश।। फागुन होली से मिले, दे मीठा अहसास। स
असंतोष पैदा हुआ
अविनाश ब्यौहार
असंतोष पैदा हुआ, अस्थिर होगा देश। राजनीति के नाम से, आता है आवेश।।
चरखा अब चलता नहीं
अविनाश ब्यौहार
चरखा अब चलता नहीं, खादी होती लुप्त। फ़ैशन ऐसा चल रहा, अंग दिख रहे गुप्त।।
ठंडी का फैलाव
अविनाश ब्यौहार
मैंने देखा हर जगह, ठंडी का फैलाव। ठिठुर रही इस देह का, साथी बना अलाव।।
बात सुलह की क्या करें
अविनाश ब्यौहार
बात सुलह की क्या करें, खाए बैठे खार। दंदी-फंदी तत्व से, होता बंटाधार।।
नारी वेदना संवेदना
अजय कुमार 'अजेय'
माँ का दूध नौ माह, मनुआ तुझ पर उधार, एक दिवस में क्यूँ बंधे नारी जीवन उपकार। बड़ा सुंदर बड़ा अनूठा, भारत नारी आधार, सब�
ख़ामोशी
सुधीर श्रीवास्तव
आज आप सुबह से बहुत चुपचाप हैं। क्या बात है? तबियत तो ठीक है न? रमा ने अपने पति राज से पूछा। राज बोले- नहीं लखन की माँ। ब�
ख़ुद को ही सर्वश्रेष्ठ न समझें
सुधीर श्रीवास्तव
श्रेष्ठ या सर्वश्रेष्ठ होना हमारे आपके जबरन ख़ुद को घोषित करने की ज़िद कर लेने भर से नहीं हो जाता। परंतु ख़ुद को श्रेष�
पर्वों का संदेश
सुधीर श्रीवास्तव
छठ पर्व के साथ ही त्योहारों की शृंखला करवा चौथ, धनतेरस, दीवाली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, चित्रगुप्त पूजन, लक्ष्मी पूज�
संविधान दिवस
सुधीर श्रीवास्तव
आइए! मौका भी है दस्तूर भी है हमारे मन भरा फ़ितूर जो है, आज भी हम संविधान संविधान खेलते हैं, जब रोज़ ही हम पूरी ईमानदार
शब्दों का खेल
रतन कुमार अगरवाला
शब्दों के खेल बड़े अद्भुत, इनके जज़्बे बड़े निराले, कभी बहाते दुःख के सैलाब, कभी छलकाते सुख के प्याले। कभी मन कड़वे हो ज�
वापस आ जाना
अंकुर सिंह
मेरे बिन जब रहा न जाएँ, जुदाई मुझसे सहा न जाएँ। भूल हमारी तू-तू, मैं-मैं, एक आवाज़ लगाके जाना।। दिल में लिए मिलन की चा�
डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद
सुधीर श्रीवास्तव
जीरादेई सीवान बिहार में तीन दिसंबर अठारह सौ चौरासी में जन्मा था एक लाल, दुनिया में चमका नाम उसका, थे वो बाबू राजें�
झंडा दिवस
सुधीर श्रीवास्तव
आज सशस्त्र सेना झंडा दिवस है सात दिसंबर उन्नीस सौ उनचास को ये मनाया गया था पहली बार तब से सशस्त्र सेना झंडा दिवस द�
रघुवीर सहाय
सुधीर श्रीवास्तव
नौ दिसंबर उन्नीस सौ उनतीस लखनऊ में जन्में थे रघुवीर सहाय, उन्नीस सौ इक्यावन में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी
जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि
रतन कुमार अगरवाला
तीनों सेनाओं की संभाली थी कमान, नाम था उनका विपिन रावत, खो दिया राष्ट्र ने एक महान सपूत, एक युग का मानों हो गया अंत। द
व्यथा
अजय कुमार 'अजेय'
रसोई घर मे चल रहा, दाल-प्याज संवाद, प्याज ने पूछा कहो दाल बहन! क्या हाल? सुना है कि तुम वी॰वी॰आई॰ई॰ हो गई हो, आम आदमी क�
अग्निपथ
सीमा 'वर्णिका'
ज़िंदगी एक अग्निपथ है, मन की स्वयं से शपथ है। उस पार हिमगिरि शृंखला, बीच अनल जीवन रथ है। तरकश में अकाट्य तीर हों, रक�
मैं धरा हूँ
सीमा 'वर्णिका'
बाहों में सृष्टि घिरी सरित सिंधु व गिरि शेषनाग शीर्ष धरी मैं धरा हूँ। सौरमंडल का ग्रह वारि भू मय विग्रह द्वय ध्�
जनरल बिपिन रावत को श्रद्धांजलि
सुधीर श्रीवास्तव
नमन करता देश तुमको गर्व तुम पर देश को है, नम हैं आँखें भले हमारी विश्वास है कि तुम ज़िंदा हो। देश का कण-कण याद कर रहा �
हरिवंश राय बच्चन जी
सुधीर श्रीवास्तव
सत्ताइस नवंबर उन्नीस सौ सात को कायस्थ कुल में पैदा पिता प्रताप नारायण के घर मां सरस्वती देवी की कोख से प्रतापगढ़, उ
भारतीय संविधान
अजय कुमार 'अजेय'
संघात्मक संविधान हमारा एकात्मक से मेल, संघ, राज्य और समवर्ती सूची में क़ानूनी खेल। भारतीय संविधान सर्वोच्च क़ानून �
घुटन हो रही देश को
अविनाश ब्यौहार
घुटन हो रही देश को, दाम बनाए काम। दाँतों में उँगली दबा, बैठा हुआ अवाम।।
कालेधन की बात
अविनाश ब्यौहार
वर्तमान है कर रहा, कालेधन की बात। ऐसे धन ने बेच दी, दुल्हन जैसी प्रात।।
मानवता के बीज
अविनाश ब्यौहार
साहचर्य की भावना, आज हुई नाचीज़। बंजर धरती पर पड़े, मानवता के बीज।।
पानी जैसा रक्त
अविनाश ब्यौहार
अब हमको चुभने लगा, नागफनी सा वक्त। लगे बहाने लोग हैं, पानी जैसा रक्त।।
रिश्ते अब लगने लगे, कड़वी-कड़वी नीम
अविनाश ब्यौहार
रिश्ते अब लगने लगे, कड़वी-कड़वी नीम। एक समय में भरा था, इनमें प्यार असीम।।
दफ़्तर में होने लगे, बस तिकड़म के खेल
अविनाश ब्यौहार
दफ़्तर में होने लगे, बस तिकड़म के खेल। अफ़सर ऐसा लग रहा, हो जैसे राफेल।।
बुद्ध पूर्णिमा
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
था मन अशान्ति तज गेह को, निकल पड़ा सिद्धार्थ। बोधवृक्ष नीचे मिला, सत्य शान्ति परमार्थ।। दया धर्म करुणा हृदय, सदाचा
अनाघ्रात मधु यामिनी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
मुस्काती सुन्दर अधर, शर्मीली सी नैन। दंत पंक्ति तारक समा, मुग्धा हरती चैन।। मादकता हर भाव में, कर्णफूल अभिराम। सज
पंचतत्व
सीमा 'वर्णिका'
पंच तत्वों से निर्मित मानव शरीर, नभ, वायु, अग्नि, धरा तथा नीर। आत्मा ने जब तन में किया प्रवेश, जड़ चेतन हुआ मिला प्रा
ग़म उसका नहीं था
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
सुबह नींद देर से खुली ग़म उसका नहीं था रात को देर से सोया ग़म उसका भी नहीं था। वह कल मिला था अपने बरामदे मे चारपाई पे ब
न जाने क्यूँ
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
न जाने क्यूँ लोग मुझे नहीं समझते, मेरे अल्फ़ाज़ों को नहीं पढ़ते। मेरे तजुर्बे को उँगली दिखाते उम्र का बहाना करके, �
शीशम-सागौन
अविनाश ब्यौहार
घर-घर पहचाने है शीशम-सागौन! महिमा है इनकी भी कुछ कम नही! इमारती लकड़ी है बेदम नही! भोर उठी कर रही नीम का दातौन! हो�
आपदाओं का नाग
अविनाश ब्यौहार
जन-जीवन को लील गया आपदाओं का नाग! अतिवृष्टि, बाढ़ चक्रवात! पिघल रही मोमी रात! क्लेश के साबुन से निकला संतापों का
पाप पुण्य में हाथापाई
अविनाश ब्यौहार
पाप पुण्य में हाथापाई गुत्थम-गुत्था! खयानत औ गिरहकटी थाने की थाती! सोहबत में फ़रेब के नेकी फँस जाती! कोर्ट-कचहरी
महँगा न्याय
अविनाश ब्यौहार
बर्तन, भाड़े, घर गिरवी, कोर्ट खींचता खाल! मिलें प्रकरण पर तारीख़ें! घनचक्कर यहीं से सीखें! मुक़दमेबाजी हुई है अब ज
लू लपट की शर शैया
अविनाश ब्यौहार
हम अँगूठा छाप हैं वे हैं बिल्कुल ठेठ! देशी भाषा में सम्मोहन! होता है इसका ही दोहन! पानी फिरा उम्मीद पर करे मटिय�
मातृभाषा हिन्दी
अजय कुमार 'अजेय'
आओ संकल्प करें! मन से, हिन्दी का उत्थान करेंगे। पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण, हिन्दी के रंग में रंग देगें।। सकल विश्व
तुम करो राम से प्यार
अजय कुमार 'अजेय'
तुम करो राम से प्यार अमरत बरसेगा। तेरा हो जाए कल्यान अमरत बरसेगा। सूर्यकुल दशरथ के नंदन, माता कौशल्या अभिनंद
समानता का अधिकार
सुधीर श्रीवास्तव
सुनने कहने में कितना मीठा, प्यारा लगता है "समानता का अधिकार"। पर जरा धरातल पर आकर देखिए। हर क्षेत्र में सिर्फ़ विडंब�
लम्हे बुलाते हैं
सुधीर श्रीवास्तव
बीते हुए लम्हे आख़िर याद आ ही जाते हैं, सिर्फ़ याद ही नहीं आते ख़ूब गुदगुदाते भी हैं, कभी ख़ुशी से तो कभी ग़म से आँखें नम �
वो दरख़्त
कमला वेदी
कोई नहीं पूछता उसे क्योंकि वो आज ठूँठ हो गया सदाबहार मौसम के समक्ष वो लाचार बेचारा हो गया भूल गए लोग, कभी वो भी पत्�
प्रलोभन
रतन कुमार अगरवाला
बाहरी आकर्षण जिसे हिला नहीं सकते, बाहरी आडम्बर जिसे डिगा नहीं सकते, कर्त्तव्य पथ पर चलते सदा, बाहरी दबाव जिसे झुका �
मानसिकता
सुधीर श्रीवास्तव
पद्मा इन दिनों बहुत परेशान थी। पढ़ाई के साथ साथ साहित्य में अपना अलग मुक़ाम बनाने का सपना रंग ला रहा था। स्थानीय से ले
सहनशीलता
सुधीर श्रीवास्तव
कैसा जमाना आ गया है ज्यों ज्यों शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं, हमारी सहनशीलता दम तोड़ रही है हमा�
विजय दिवस
सुधीर श्रीवास्तव
शुरू हुआ जो युद्ध तीन दिसंबर उन्नीस सौ इकहत्तर को भारत पाकिस्तान के बीच में छुडा़ रहे थे सैनिक भारत के छक्के पाकि�
विजय दिवस
रतन कुमार अगरवाला
पढ़ता हूँ सन 1971 के वीरों की गाथा, गर्व से सीना फूल सा जाता है, रहने वाला हूँ इस वीर भूमि का, इस बात पर गर्व से मस्तक उठता �
पेश-ए-नज़र मेरे था दीशब एक वो रू-ए-रौशन
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
पेश-ए-नज़र मेरे था दीशब एक वो रू-ए-रौशन, गोया मह-ओ-अंजुम था उनके रू-सफ़ेदी से रौशन।
विजय दिवस
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
अरुणाभ शौर्य बलिदान वीर, वतन विजय गीत मैं गाता हूँ। जो भारत सीमा निशिवासर, कर नमन हृदय मददाता हूँ। कोख भारती पुल�
आख़िर हम कब सुधरेंगे?
अजय कुमार 'अजेय'
आख़िर हम कब सुधरेंगे? सच्चाई को कब समझेंगे? दूर-दूर तक नही है राहें, कब हम दो से एक बनेंगे? आख़िर हम कब सुधरेंगे? दर्पण
नव वर्ष
सीमा 'वर्णिका'
अभ्युदित हो रहा प्राची से, अंशुमाली लेकर नूतन विहान। नव वर्ष की पुनीत बेला में, अदृश्य शत्रुओं से हो परित्राण। व�
उलझी ज़िन्दगी
रवि भूषण सिन्हा
ज़माने से चाहा था मैं ख़ूब आराम करूँ, बेफ़िक्र हो जैसे चाहूँ समय बर्बाद करूँ। पर हुआ कि होश सम्भालते स्कूल पहूँचा, ह�
श्रद्धांजलि: बिपिन रावत
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सिसक रही माँ भारती, साश्रु वतन संतान। खोकर विपिन सपूत को, अमर शौर्य बलिदान।। आज पार्थ अवसान सुन, शोकाकुल जन देश। श�
उसकी हो सरकार
राम प्रसाद आर्य
गाँव इकाई देश की, इकाई गाँंव की घर-परिवार। हर घर-परिवार का ख़्याल रखे जो, बस उसकी हो सरकार।। हमें न प्यार न द्वेष किस
आर्यावर्त और हिंदी
अजय कुमार 'अजेय'
बहुभाषी है आर्यावर्त, हिन्दी भाषा सिरमौर। देवनागरी लिपिबद्ध, संस्कृत व्याकरण ठौर। उन्नत व्यापक सम्पूर्ण है, मात�
एहसास
सीमा 'वर्णिका'
मन की बंजर भूमि में दफ़न, मेरे एहसासों का चमन। अश्कों की बारिश बेअसर, शब भर भीगता रहा दामन। ख़ामोशी ने चादर तानी, क�
याद करें हम बहादुरों की क़ुर्बानियाँ
गणपत लाल उदय
इतना तो करना देश के सेनानियों पर अहसान, उनसे ही आन बान शान जो छोड़ गए पहचान। एक दीपक जला देना सभी क़ुर्बानियों के नाम
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हे! हिंदी के युग निर्माता, बारम्बार प्रणाम तुम्हें। हम सबको है गर्व आप पर, बारम्बार प्रणाम तुम्हें। हिंदी भाषा क
तिरंगा
अंकुर सिंह
तिरंगा है हमारी जान, कहलाता देश की शान। तीन रंगों से बना तिरंगा, बढ़ता हम सब की मान।। केसरिया रंग साहस देता, श्वेत
ख़ुद से ना दूर करो
अंकुर सिंह
रूठना हक़ तुम्हारा, मानना फ़र्ज़ हमारा। माफ़ कर दो अबकी, बिन तुम्हारे मैं हारा।। तुम जितनी रुठोगी, हम उतना मनाएँगे। �
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
सुधीर श्रीवास्तव
दौलतपुर ग्राम रायबरेली जनपद मे पाँच मई अठारह सौ चौसठ में पंडित रामसहाय द्विवेदी के पुत्र रुप में महाबीर प्रसाद द�
जीवन भी गणित
सुधीर श्रीवास्तव
हम और हमारे जीवन का हर पल किसी गणित से कम नहीं है, जीवन में जोड़ घटाव भी यहाँ कम कहाँ है, गुणा भाग का खेल तो चलता ही रह�
श्री राम नाम में बहुत जान
गणपत लाल उदय
श्री राम के नाम में बहुत जान, कोई लेता सुबह तो कोई शाम। नही था इनको कोई अभिमान, मर्यादा पुरुषोत्तम यह श्री राम।। ठ�
जनरल बिपिन रावत: इतिहास याद रखेगा
गणपत लाल उदय
इतिहास याद रखेगा आज, हुआ हेलिकॉप्टर क्रेश, कीर्ति पताका लहराता रहेगा, आपका देश-विदेश। यह कर्तव्यों की वेदी पहनकर, �
वैदिक शास्त्रों का सार
गणपत लाल उदय
वैदिक शास्त्रों में सार समाहित पढ़ता देश सारा, १८ अध्याय एवं ७०० श्लोक से ग्रन्थ बना प्यारा। हर समस्याओं का उत्तर
किताबें
सुषमा दीक्षित शुक्ला
इन किताबों की शख़्सियत, तो देख लो जनाब। बस ख़ामोशियाँ वजूद में, पर ज़ेहन में है इंक़लाब। ना बोलकर भी बोल देतीं, हर सवा�
शिकायत और रिश्ते
रतन कुमार अगरवाला
रिश्तों की गाँठे बंद पड़ी थी, यादों के संन्दुक में, खोला तो शिकायतों का पुलिंदा, आ गया हाथ में? कौन-कौन सी गाँठ खोलूँ, �
मेहंदी सात वचनों की
रतन कुमार अगरवाला
लाल-लाल मेहंदी से रच गई प्रियतमा की हथेलियाँ, लगाई जब पिया के नाम की मेहंदी, क़िस्मत ने ली अठखेलियाँ, रंग गयी पिया के �
ऑमिक्रोन वैरिएंट से रखना दूरी
गणपत लाल उदय
भैया मास्क बहुत ज़रूरी ऑमिक्रोन से रखना दूरी, वैक्सीनेशन करवाएँ अपना ये सबके लिए ज़रूरी। घर-परिवार और मित्रों को इस�
पिटीशन लगती है पिशाचिका
अविनाश ब्यौहार
निराधार तथ्यों से लबरेज याचिका! मढ़ते आरोप होती संघाते हैं! मिर्च मसाला सी भरी हुई बातें हैं! वकील हुए ऐसे जैसे �
बाज़ार मदारी है
अविनाश ब्यौहार
ग्राहक बना जमूरा है बाज़ार मदारी है! इच्छाएँ टँगी हुईं शो केस मे! अब रावण फिरें साधू के भेष मे! हर महीने सिर पर चढ़
सांता क्लॉज़ आया गिफ़्ट लेकर
गणपत लाल उदय
सर्दी की ऐसी इन ठंडी-ठंडी रातों में, गुनगुनाता और गीत गाता ही आता। हैप्पी मेरी क्रिसमस, हैप्पी क्रिसमस, कहता हुआ ढे
अटल
राम प्रसाद आर्य
अटल थे तुम, अटल हो तुम, अटल ही तुम नित रहोगे। यह सरल, वो राह मुश्किल, कविता तहत हमसे कहोगे।। ज़िंदा नहीं जग में भले त�
हे नारी! तू कितनी महान
अनिल भूषण मिश्र
हे नारी! तू कितनी महान, नहीं जग में कोई तेरे समान। धर्म, दया, लज्जा का पालन करती, सबके तन-मन का दुःख हरती, सदा प्रेम का
दीवाली आई
अनिल भूषण मिश्र
दीवाली आई दीवाली आई, ख़ुशियों की सौग़ात है आई। घर बाहर हुई ख़ूब सफ़ाई, दीवारों पर फिर से रंगत आई। दीवाली आई दीवाली आई।।
दो बूँद आँसुओं के
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
न दो बूँद आँसुओं के निकले, हैं कवलित हम अवसादन के, हैं मज़दूर बने मजबूरी बस, जल कटे मरे हो जाएँ चिथड़े। है दिशा दशा अव�
नारी का सम्मान
मोनी रानी
सौंदर्य से मत आँकिए, आँकिए उन्हें ज्ञान से। वह दान की कोई वस्तु नहीं। बेटी है, वो आपकी कहिए सबसे शान से। मौका उन्ह�
जगत जननी अम्बे माँ
मोनी रानी
ऐ माँ सुन ले आज मेरी गाथा तू। इतना भी बुरा दिन ना दिखाना, जिसे मैं सह ना सकूँ। इतनी बुद्धि दे हमें, जो अपने सारे ग़मों
बेपरवाह शराबी
रंजीता क्षत्री
शराबी का क्या काम? गाली-गलौज और अपनों का जीना करे हराम। शराबी की हालत कैसी? बिल्कुल नासमझ... पागल जैसी। शराबी के पीठ �
मंथरा
सुधीर श्रीवास्तव
आज ही नहीं आदि से हम भले ही मंथरा को दोषी ठहराते, पापी मानते हैं पर जरा सोचिए कि यदि मंथरा ने ये पाप न किया होता तो क�
विजयादशमी और दशानन
अजय कुमार 'अजेय'
जल गया रावण भूतल पर, जीवंत रहा ह्रदय के भीतर। झाडू-बुखारी हर घर-आँगन, कूड़ा-करकट हर सड़क पर।। जल रहा दशानन गाँव-शहर, ज�
जीवनदायिनी
अजय कुमार 'अजेय'
सबसे सुंदर सबसे प्यारा, प्रीत मीत संसार। घर-घर में होती है नारी, निश्छल पालनहार।। सुबह सबेरे नित्य जागकर, करती झा
अरुणिम उषा है खिली-खिली
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
पंखुड़ियों में सिमटी कलियाँ, अरुणिमा उषा है खिली-खिली। मुस्कान सुरभि यौवनागमन, मधुपर्क मधुर नव प्रीति मिली। श्
माँ
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
जन्मा जिसने कोख से, करा पयोधर पान। ममताँचल में पालकर, साश्रु नैन मुस्कान।। चारु चन्द्रिका शीतला, करुणा पारावार।
कुशल राजनीतिज्ञ थे वाजपेयी
गणपत लाल उदय
अपनें आदर्शों से बनाई जिन्होंने ख़ास पहचान, ऐसे कुशल राजनीतिज्ञ‌ थे वे प्रधानमंत्री महान। अटल जिनके इरादें एवं अ
तुम बिन कौन उबारे
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हे कान्हा हे मोहन मेरे, तुम बिन कौन उबारे। मेरे मोहन मेरे कृष्णा तुम ही एक सहारे। 2 इस धरती पर आकर कान्हा तुम भी तो र
इंसान नहीं हम पंछी हैं
सुषमा दीक्षित शुक्ला
इंसान नहीं हम पंछी हैं, हम ताल-मेल कर लेते हैं। 2 है कौन सिखाता ज्ञान हमें, पर मेल-जोल कर लेते हैं। 2 मिलजुल कर हम सब र�
मेरी हृदय कामना
अनिल भूषण मिश्र
हे विशाल उदार हृदय महामना, हो चहुँमुखी विकास आपका। ये है मेरी हृदय कामना। ये है मेरी हृदय भावना। थे मेरे कर्म कही�
ओ सनम
सुषमा दीक्षित शुक्ला
ओ सनम ओ सनम ओ सनम ओ सनम, तू ही दिल मे समाया सनम ओ सनम। तुझमे पाया ख़ुदाया सनम ओ सनम, आज जी भर जिया हूँ मैं सौ-सौ जनम। ओ सन�
इनका अस्तित्व कहाँ से आया
अनिल भूषण मिश्र
ये हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाया, इनका अस्तित्व कहाँ से आया, सोचो इन सबको कौन बनाया, किसने तुमको इन सब में भरमाया। उस
पत्ते भारी लग रहे
अविनाश ब्यौहार
आड़ा है वक्त वृक्ष को पत्ते भारी लग रहे! पंछी का कलरव दहशत ने लील लिया! ॠतुओं का चक्र हुआ प्रदूषण ने कील लिया! भा�
चाँद-तारे दे रहे बधाईयाँ
अविनाश ब्यौहार
नव वर्ष में चाँद-तारे दे रहे बधाईयाँ। प्रात कपासी हुई तो दिन सुनहरे हों। घर-आँगन में ख़ुशी के ही ककहरे हों।। बात �
मानवता का पतन
आशीष कुमार
शर्मसार हुई माँ वसुंधरा पाप पुण्य से आगे बढ़ा, क्षत-विक्षत हुआ कलेजा आँचल होने लगा मैला। कामी लोभी क्रोधी घमंडी �
हे स्त्री! तुम शक्ति की प्रतिमूर्ति
आशीष कुमार
तुम अष्टभुजा तुम सरस्वती, तुम कालरात्रि तुम भगवती, हे स्त्री! तुम शक्ति की प्रतिमूर्ति। ज्ञान का भंडार खोलती, शं�
मंज़िल पुकार रही है
आशीष कुमार
बना दो क़दम के निशान, कि मंज़िल पुकार रही है। थाम लो हाथों में हाथ, कि वक़्त की पुकार यही है। बनकर मुसाफ़िर चलते जाना, म�
मुक्ति संघर्ष
आशीष कुमार
पिंजड़े में क़ैद पंछी, करुण चीत्कार कर रहा। ऊपर गगन विशाल है, वह बंद पिंजड़े में रह रहा। टीस है उसके दिल में, तिल-ति�
अयोध्या की दीवाली
आशीष कुमार
चौदह वर्षों बाद हो रहा आगमन, राम लक्ष्मण संग जानकी का होगा अभिनंदन। सज रही अनुपम अयोध्या नगरी, जैसे सजती कोई अप्�
कवन सुगवा मार देलस ठोरवा
आशीष कुमार
कवन सुगवा मार देलस ठोरवा, ए रामा गजब भइले ना। कि आहो रामा सुगवा जुठार देलस केरवा, ए रामा गजब भइले ना। कतना जतनवा से
मेरे पापा मेरे सांता क्लॉज़
आशीष कुमार
क्रिसमस ईव है फिर से आई, ख़ुशियों की सौगात है लाई। नन्हे बच्चे चहक रहे हैं, सबके दिलों में है ख़ुमारी छाई। कोई चाहे प�
नव वर्ष का अभिनंदन
आशीष कुमार
हर्षोल्लास से सराबोर हुआ भारतवर्ष का कण-कण, शुभ मंगलमय नव वर्ष का अभिनंदन! अभिनंदन! गीत-संगीत से गूँजे उठा सुरम्य
नव वर्ष
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
तुम कहते हो! नया साल? पर नए साल सी बात नहीं है। प्राकृति सौन्दर्य सुवासित से, ये धरा सुसज्जित नही हुई। न कुसुम कहीं
सन् 2022
रतन कुमार अगरवाला
सन् 2022 का होगा आग़ाज़, होगा शुरू एक नया सफ़र, नई उड़ान का होगा अंदाज़, होगा नई आशाओं का मंज़र। बढ़ेंगे क़दम फिर मंज़िल की ओर, नवच
नव वर्ष अभिनंदन
गणपत लाल उदय
ख़ुशियाँ लेकर आया अब प्यारा नूतन वर्ष, झूमो-नाचो, गाओ सभी मनाओ यारों हर्ष। अब बीत गया वह वर्ष बनाया जिसने नर्क, सुख क�
अभिनंदन नव वर्ष तुम्हारा
गणपत लाल उदय
आओ नए वर्ष में यह संकल्प करे, बीती बातों को नज़रअंदाज़ करे। दिए जो ज़ख़्म हमें पुराने साल ने, मिलकर ख़ुशियों से उन्हें न�
आग़ाज़-ए-नववर्ष
गणपत लाल उदय
आओं मिलकर विदा करें यह कोरोना एवं साल, जिसने सबको बहुत रूलाया भूलेंगे ना हर हाल। निकल गया‌ ऐसा साल जो कोरोना से था भ
नव वर्ष दो हज़ार बाइस
सुषमा दीक्षित शुक्ला
दो हज़ार बाइस तुम आओ, जग में नूतन ख़ुशियाँ लाकर। परम पिता की सदा दुआ हो, जग की सुंदर बगिया पर। दो ख़ुशियों की शुभ सौग़ा�
नया साल दे रहा अनुभूतियाँ नई-नई
अभिषेक अजनबी
नया साल दे रहा अनुभूतियाँ नई-नई। आओ गढे़ं जग जीतने की नीतियाँ नई-नई। जो दबाए ख़्वाब उसे सरेआम कीजिए, मौन पड़े प्रेम
हैप्पी न्यू ईयर टू थाउजन ट्वेंटी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
टू थाउजन ट्वेंटी टू, टू थाउजन ट्वेंटी टू। हैप्पी हैप्पी ईयर न्यू हैप्पी हैप्पी ईयर न्यू 2 बस ख़ुशबू ही ख़ुशबू बिखर�
नव वर्ष: स्वागत और विदाई
सुधीर श्रीवास्तव
आइए हँसी ख़ुशी विदा करें दो हज़ार इक्कीस, न ईर्ष्या द्वेष नफ़रत करें, न कोई शिकवा शिकायत करें, जो बीत गया उसे लौटा नहीं
नव वर्ष का स्वागत
सुधीर श्रीवास्तव
आइए! नववर्ष के स्वागत की तनिक औपचारिकता निभाते हैं, बड़ी बेशर्मी से अंग्रेज़ी नव वर्ष बड़े उत्साह से मनाते हैं, भारती
अतीत की विदाई और स्वागत नव वर्ष
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
करें विदाई इक्कीस अतीत, जो कोरोना काल बना हो। स्वागत आगत नववर्ष लसित, सुखद प्रगति उल्लास नया हो। आओ नया साल मनाए
न जाने क्यों
कमला वेदी
न जाने क्या बात है सबको रवि रश्मियाँ भाती हैं प्रातः बेला की, न जाने मुझे क्यों भाती हैं चन्द्रमा की श्वेत किरणें,
क्यों लोग प्रेम के ही गीत लिखने लगे हैं
कमला वेदी
क्यों लोग प्रेम के ही गीत लिखने लगे हैं, आइने के सामने सजने सँवरने लगे हैं। क्यों नहीं दिखती उन्हें किसी की पीड़ा,
अकेला का बल
रवि भूषण सिन्हा
अकेला तू आया है अकेला ही तू जाएगा, ये कटुसत्य वचन न जाने कितनी बार। महापुरुषों ने अवतरित हो, हमें बार-बार समझाया है�
सारे रास्ते सुनसान है
चीनू गिरि गोस्वामी
सारे रास्ते सुनसान है, मंदिर भी वीरान है। क़ैद हो गई ज़िंदगी, हर इंसान परेशान है। ये कैसी बीमारी आई, ख़तरे मे सब की जान
जीवन एक व्यापार है
चीनू गिरि गोस्वामी
जीवन एक व्यापार है, धैर्य इसका आधार है। लाभ-हानि होती रहती है, धैर्य ना खोए वो ही समझदार है। जीवन एक व्यापार है। सु
सावित्रीबाई फुले: पहली महिला शिक्षिका
गणपत लाल उदय
भारत-भूमि पर किया जिसने ऐसा काम, माता सावित्री बाई फुले आपको प्रणाम। नारी सशक्तिकरण की तुम बनी मिशाल, गुरूओं में प�
निशिभर नींद नहीं आई
संजय राजभर 'समित'
पूर्वी बयार था मतवाला, छाई तन में अँगड़ाई। याद सताती रही तुम्हारी, निशिभर नींद नहीं आई। देख मुझको आधी रात में, ना�
अलविदा 2021
सुधीर श्रीवास्तव
अब तुम जा रहे हो न तनिक सकुचा रहे हो, लगता है बड़े बेशर्म हो गए हो। जाओ न हम भी कहाँ कम हैं तुम्हारे जाने से कुछ फ़र्क़ न�
आँखों का तारा
अजय कुमार 'अजेय'
पूस की कड़कड़ाती ठंडी काली स्याह रात में दूर एक बिंदु टिमटिमा रहा था। कुछ सूझ न रहा था। मैं अंदाज़े से रोशनी की ओर बढ�
रचना विधना
अजय कुमार 'अजेय'
देख तिहारी प्यारी दुनियाँ, मन ही मन हर्षाऊँ मैं। मन बगिया की कली बनूँ, लहर-लहर लहराऊँ मैं। सौंधी माटी महक रही है, क
ऊँचाई
अटल बिहारी वाजपेयी
ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ़ बर्फ़, जो कफ़न की तरह सफ़ेद और मौत क�
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती
गणपत लाल उदय
ये भी उन्नीसवीं शताब्दी के समाजिक सुधारक, महान देश-भक्त व आर्य समाज के संस्थापक। बचपन का नाम माता-पिता ने रखा मूलश�
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
राहत इन्दौरी
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो, ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो। राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं है�
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
राहत इन्दौरी
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो, ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।
भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
नारी शिक्षा की बन नव अरुणिमा, सामाजिक अवसीदना बहुत सही। अवरोध राह विविध संघर्ष अडिग, महिला नेतृत्व प्रखरा शिखर �
गुब्बारे
रतन कुमार अगरवाला
हवा जब भर जाती गुब्बारे के अंदर, उड़ जाता वह झट से ऊपर, कहता गुब्बारा हम से यही, झाँक लें ज़रा हम ख़ुद के अंदर। बाहर की नह�
रूठे यार को मनाऊँ कैसे?
अंकुर सिंह
रूठे को मैं कैसे मनाऊँ? होती जिनसे बात नहीं, यादों में मैं उनके तड़पू, उनको मेरा ख़्याल नहीं। कोई जाकर उन्हें बता द�
जन्म सफल हो जाएगा
अंकुर सिंह
मिला मानव जीवन सबको, नेक कर्म में सभी लगाएँ। त्याग मोह माया, द्वेष भाव, प्रभु भक्ति में रम जाएँ।। मंदिर मस्जिद या �
भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं
अटल बिहारी वाजपेयी
भारत ज़मीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कं�
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
अटल बिहारी वाजपेयी
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते सत्य का संघर्ष सत्ता से, न्याय लड़ता निरंकुशता से। अंधेरे ने दी चुनौती है, किरण �
पंद्रह अगस्त की पुकार
अटल बिहारी वाजपेयी
पंद्रह अगस्त का दिन कहता: आज़ादी अभी अधूरी है, सपने सच होने बाकी है रावी की शपथ न पूरी है। जिनकी लाशों पर पग धर कर आ�
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए
राहत इन्दौरी
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए, मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए। अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में, है जितन�
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए
राहत इन्दौरी
बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए, मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए।
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
राहत इन्दौरी
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ, ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ। फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल �
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ
राहत इन्दौरी
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ, ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ।
मन मथुरा दिल द्वारिका
कबीर
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि। दसवाँ द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछांणि।।
इक तरफ़ है भूक बैरन इक तरफ़ पकवान हैं
मनजीत भोला
इक तरफ़ है भूक बैरन इक तरफ़ पकवान हैं, फ़ासले ना मिट सकेंगे दरमियाँ भगवान हैं। आज के रघुवंश की तकलीफ़ यारो है जुदा, साथ �
ठंड में आई याद स्वेटर की
गणपत लाल उदय
ठंड में आई है मुझको याद स्वेटर की, जिसके बिना हमारी ठंड नही रुकती। इसमें हमारी माँ का प्यार, आशीर्वाद, जिसके बिन हम�
अजेय योद्धा: महाराजा सूरजमल
समुन्द्र सिंह पंवार
अजेय योद्धा कहती दुनिया सूरजमल महाराज तनै, जाट सुरमा युगों-युगों तक पूजै जाट समाज तनै। 13 फरवरी, 1707 का बड़ा पवित्र दि�
हम हिन्द के वीर जवान
समुन्द्र सिंह पंवार
हम हिन्द के वीर जवान, हमारा क्या कहना। नहीं कोई हमारे समान, हमारा क्या कहना।। नहीं किसी से डरते हैं हम, सदा आगे को ब�
गुरु जी
समुन्द्र सिंह पंवार
तुझको शीश झुकाता गुरु जी, तुम हो ज्ञान के दाता गुरु जी। तुम ही ब्रम्हा और विष्णु, महेश, तुम ही भाग्य विधाता गुरु जी�
मित्र
शमा परवीन
"अरे तुम यहाँ बैठे हो मित्र! मैं तुम से मिलने तुम्हारे घर गया था।" "पढ़ाई करने के लिए यही जगह अच्छी लगती है। यहाँ मैं �
कोहिनूर है आचरण
अविनाश ब्यौहार
कोहिनूर है आचरण, सोना हुआ स्वभाव। संयम से जीवन चले, सिमट गया बिखराव।।
सौ-सौ उठे बवाल
अविनाश ब्यौहार
भावों की संकीर्णता, पैदा करे मलाल। इक छोटी सी बात पर, सौ-सौ उठे बवाल।।
माँ
चीनू गिरि गोस्वामी
ईश्वर की सबसे सुन्दर रचना माँ, धरती पर ईश्वर का रूप है माँ, अम्मा, जननी, माता, महतारी माँ, भिन्न-भिन्न नामों से जानी ज�
ऐ मौत तेरा डर नहीं
चीनू गिरि गोस्वामी
ऐ मौत तेरा डर नहीं, यहाँ कोई अमर नहीं। मौत ही अटल सत्य है, बाक़ी दुनियाँ मिथ्या है। ऐ मौत तेरा डर नहीं। मुझे डर तो ज़ि�
स्वामी विवेकानन्द
गणपत लाल उदय
स्वामी विवेकानंद ऐसे गुरुवर के शिष्य, पढ़ लेते चेहरा देखकर ही जो भविष्य। भुवनेश्वरी देवी माता विश्वनाथ थे पिता, १
इस दुनियाँ में झूठ
अविनाश ब्यौहार
मकड़जाल सा है बुना, इस दुनियाँ में झूठ। मौसम का आघात है, गईं बहारें रूठ।।
बारिश है दुल्हन बनी
अविनाश ब्यौहार
बारिश है दुल्हन बनी, मेघ रचाते ब्याह। पावस में मिटने लगी, जेठ मास की दाह।।
धूल, धुआँ, आँधी चले
अविनाश ब्यौहार
धूल, धुआँ, आँधी चले, नदी छोड़ती कूल। पावस रही सुधारती, गर्मी की यह भूल।।
चिड़ियों को डर लगे
अविनाश ब्यौहार
आज अपना घर भी पराया सा घर लगे! उनकी तो बात क्या सुर्खाब के पर लगे! अँधेरों के बाहुपाश रातों को जकड़े! जाल फ़रेबों का
शीत ऋतु का आगमन
आशीष कुमार
घिरा कोहरा घनघोर गिरी शबनमी ओस की बुँदे, बदन में होने लगी अविरत ठिठुरन। ओझल हुई आँखों से लालिमा सूर्य की, दुपहरी �
पूस की ठंड
सुधीर श्रीवास्तव
जब भी आती है पूस की ठंड सब कुछ अस्त व्यस्त कर जाती जीवन उलझा जाती। इंसान हो या पशु पक्षी सब बेहाल हो जाते, ठंड से बचन
आने वाला पल
सुधीर श्रीवास्तव
आने वाला पल तो आकर ही रहेगा, जैसे जाने वाला पल भी भला कब ठहरा है? क्योंकि आने वाला पल अगले पल के साथ ही बीता हुआ हो ज�
पश्चाताप की अग्नि
सुधीर श्रीवास्तव
स्तब्ध रह गया धरा गगन मौन हो गए जन के बोल, निष्ठुर ईश्वर तूने खेला क्यों ऐसा अनचाहा खेल। माना तू करता रहता है ऐसे न�
ज़िंदगी
समुन्द्र सिंह पंवार
कभी प्यार, कभी जंग है ज़िंदगी, कभी हसीन कभी बेरंग है ज़िंदगी। बड़ी मुश्किल से मिलती है ये तो, पल-पल रंग बदलती है ये तो।
करियो नारी का सत्कार
समुन्द्र सिंह पंवार
करियो नारी का सत्कार, है ये नारी सृजन हार। है ये नारी जग की जननी, इस बिन सृष्टि नहीं चलनी। इस बिन सूना है संसार, करि�
पश्चाताप
प्रवीन 'पथिक'
हार गया मैं! सोचता था; ख़ुश रखूँगा, अपनों को, संगी-साथियों को, अपरिचितों को। सपना था पूरा किया भी सपनों को, पर! न कर पा
विश्व हिंदी दिवस
सुधीर श्रीवास्तव
हिंदी की लोकप्रियता को लेकर समूचे विश्व में 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिंदी प्रेमियों के लिए इस दि
स्वामी विवेकानंद जी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
महावीर पुरुषार्थ सबल पथ, मति विवेक रथ यायावर था। चिन्तक ज्ञानी वेदान्तक सच, शक्ति उपासक महा प्रखर था। नवतरंग न�
स्वामी विवेकानन्द
सुषमा दीक्षित शुक्ला
स्वामी विवेकानन्द जी थे, युग पुरुष मानव महान। अल्पायु में ही पा लिया था, अनुपम अलौकिक दिव्य ज्ञान। राष्ट्र का जग �
स्वामी विवेकानंद
सीमा 'वर्णिका'
धार्मिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों का हुआ था ह्वास, चारित्रिक व नैतिक सिद्धांतों का बना था परिहास। सनातन धर्म-मूल्यो
स्वामी विवेकानंद
सुधीर श्रीवास्तव
हमारा देश अनेक महान विभूतियों से सदियों से भरा पड़ा है, जिनसे हम अनवरत प्रेरणा पाते आ रहे हैं। सीखते आ रहे हैं। यही न�
स्वामी विवेकानंद के विचार
सुधीर श्रीवास्तव
युवा सन्यासी तत्वदर्शी स्वामी विवेकानंद के विचारों का आप भी अनुसरण तो कीजिए, स्वामी जी के विचारों पर चिंतन मनन क
स्वामी विवेकानंद जयंती
रतन कुमार अगरवाला
सो रहा था संसार सम्पूर्ण, हो कर मूढ़ मति अज्ञान, अवतरित हुए भारत की धरा पर, हमारे विवेकानंद महान। दिग्भ्रमित विश्व व�
स्वामी विवेकानंद
सुधीर श्रीवास्तव
भारतीय अध्यात्म का परचम जिसनें दुनिया में फहराया, बारह जनवरी अठारह सौ तिरसठ कोलकाता बंगाल भूमि पर कायस्थ कुल मे�
कर्तव्य पथ
विजय कृष्ण
जब मैं अपने काम से घर लौटा, सूरज भी मेरे साथ थक कर चल पड़ा। बच्चे जैसे इंतज़ार करते हैं, छुट्टी की घंटी बजने का, प्रकृ�
बचपन और गाँव
विजय कृष्ण
बचपन में गाँव हमेशा दस किलोमीटर दूर लगता था, न कम न ज़्यादा। एक तो बुद्धि दस वर्ष से ज़्यादा न थी और दूसरे दस का नोट बहु
युवा दिवस और स्वामी विवेकानंद जी का संदेश
सुधीर श्रीवास्तव
महज़ 39 साल की जीवन यात्रा में ही स्वामी विवेकानंद जी न केवल भारत के आध्यात्मिक गुरू बने, बल्कि दुनिया भर को अध्यात्म �
हवलदार है हम
गणपत लाल उदय
कई कहानियों का किरदार है हम, और पेशे से एक हवलदार है हम। भारतीय सेना की पतवार है हम, चार्ज होल्डर व चौकीदार है हम।।
जय जवान, जय किसान
समुन्द्र सिंह पंवार
भारत माँ के पूत महान, जय हो जवान और किसान। एक देश की रक्षा करता, एक पेट देश का भरता। इनसे ज़िंदा है हिंदुस्तान, जय हो
मन को युवा कीजिए
आशीष कुमार
जिंदगी भर रब से बस यही दुआ कीजिए, ढलते यौवन की फ़िक्र छोड़िए अपने मन को युवा कीजिए। कर्तव्य पथ पर चलकर ही मुक्ति मि�
अन्तर्द्वन्द
प्रवीन 'पथिक'
कभी कभी, एक अजीब अन्तर्द्वंद! झकझोर देता मन औ मस्तिष्क को। घोर अवसाद मेघ बन, अच्छादित होता जीवन में, कर देता गत�
प्याज और लहसुन
अविनाश ब्यौहार
सरकार नें खींचा अर्थव्यवस्था का कैसा ख़ाका। प्याज और लहसुन ने डाला जनता की जेब में डाका।।
मकर संक्रांति
रतन कुमार अगरवाला
आया मकर संक्रांति का पावन उत्सव, सूर्यदेव हुए उत्तरायन, करते सूर्य की अर्चना इस दिन, और माँ गंगा में करते स्नान। कर�
मकर संक्रांति है सुख व समृद्धि पर्व
गणपत लाल उदय
लो आया नव-वर्ष का पहला त्योहार, संक्रांति पर्व लाया है ख़ुशियाँ अपार। हल्की-हल्की चल रही ये ठंडी हवाएँ, हमारी तरफ़ स�
मेरा मुझ में कुछ नहीं
कबीर
मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मेरा।।
मकर संक्रांति शुभदा जग हो
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
उत्तरायण की अरुणिमा भोर, मकर संक्रांति शुभदा जग हो। उद्यम जीवन साफल्य सुपथ, चहुँ कीर्ति प्रभा जग सुखदा हो।। नव श
मकर संक्रान्ति
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मकर संक्रान्ति आज फिर से है आई, लोहड़ी व पोंगल की लख-लख बधाई। एकता का मधुर ये है संदेश लाई, जो रसोई घरों में है खिचड़ी �
नारी का शृंगार
कमला वेदी
नारी का शृंगार है पति और उसकी संतति जिनसे उसके जीवन में रूप है, रस है, गंध है पग-पग पर पुष्प और पल-पल इन्द्रधनुषी रं�
मकर संक्रान्ति का महत्व
सुधीर श्रीवास्तव
हिंदू धर्म ने माह को दो पक्षों में बाँटा गया है कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष, वर्ष को भी दो भागों में बाँट रखा है पहला उ
इस बार नहीं चूकूँगा
पुनेश समदर्शी
ठान लिया अब मैंने मन में, बिगुल नया फूकूँगा, चूक रहा था मैं अब तक, इस बार नहीं चूकूँगा। कहाँ-कहाँ ग़लती की, समझ गया हूँ
विरान ज़िन्दगी
प्रवीन 'पथिक'
अब तक तो दुनिया हसीन थी, पल भर में क्या हो गया। जिसको चाहा था वर्षो से, दो पल में मुझसे खो गया। जिसको कितना प्यार दिय�
गीत नहीं गाता हूँ
अटल बिहारी वाजपेयी
बेनक़ाब चेहरे हैं दाग़ बड़े गहरे हैं टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ गीत नहीं गाता हूँ। लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शी
गीत नया गाता हूँ
अटल बिहारी वाजपेयी
टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात प्राची में अ�
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ
अटल बिहारी वाजपेयी
सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल रूई से धुँधलके में मील के पत्थर पड़े घायल ठिठके पाँव ओझल गाँव जड़ता है न ग�
मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा
राहत इन्दौरी
मोहब्बतों के सफ़र पर निकल के देखूँगा, ये पुल-सिरात अगर है तो चल के देखूँगा। सवाल ये है कि रफ़्तार किस की कितनी है, म�
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं
राहत इन्दौरी
काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं, और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं। आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़�
कवि हृदय
विनय विश्वा
कवि 'मन' को है संवेदनाएँ बेधती शर, शूल घाव बन कर है चुभती। रो पड़ी है कलम उनकी धार में कवि मन बोझिल हुई भावनाओं के भा�
चक्कर में
विनय विश्वा
क्यों पड़े हो चक्कर में सब अपने है चक्कर में कोई नहीं है टक्कर में सब बदते है खद्दर में। कोई कहता इसको डालो कोई कह�
श्रम प्रेम
विनय विश्वा
ज्येष्ठ की तपती भरी दोपहरी श्याम सलोनी रुप सुनहरी माथे पे है पगड़ी धारी गुरु हथौड़ा हाथ है भारी। मुख मंडल की छटा
मानव परिकल्पना
विनय विश्वा
ये दुनिया सूरज, चाँद, तारे है अनंत ब्रह्माण्ड न्यारे। मानव की है परिकल्पना अधूरी बार-बार करते वो सिद्धि पूरी। कभ�
मातु यश गाऊँ मैं
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
माँ हो तुम ममता का आँचल, माँ बैठ सदा सुख पाऊँ मैं। अश्रुपूरित भींगे नयनों से, तुझे नमन पुष्प चढ़ाऊँ मैं। तू जननी अन�
छँटे रात्रि फिर सबेरा
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
चहल पहल फिर से शुरू, जीवन नया प्रभात। सजी रेल से पटरियाँ, गमनागम सौगात।। फँस जनता जज़्बात में, नतमस्तक सरकार। कोरो
निराला का पत्र जानकीवल्लभ शास्त्री के नाम
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
भूसामंडी, हाथीखाना, लखनऊ 5-09-68 प्रिय जानकीवल्लभ जी, अभी-अभी आपका पत्र मिला। हिंदी से आपको प्रेम होगा–कोई फ़र्ज़-अदा�
दीन
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
सह जाते हो उत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्न, हृदय तुम्हारा दुर्बल होता भग्न, अंतिम आशा के कानों में स्पंदित
महगू महगा रहा
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
आजकल पंडितजी देश में बिराजते हैं। माताजी को स्वीजरलैंड के अस्पताल, तपेदिक के इलाज के लिए छोड़ा है। बड़े भारी नेत
अधूरा ख़्वाब
अजय कुमार 'अजेय'
मेरी तन्हाई में ख़्वाब तेरे, गर रोज़-रोज़ दस्तक देते। चाहत के झरोखे से बाहर, दो बिंदु ताँक-झाँक में रहते।। मेरे कंपित
दिल की पतंग
आशीष कुमार
ना जाने किससे डोर मेरी जुड़ी जा रही है, मेरे दिल की पतंग देखो उड़ी जा रही है। लहजा तो ऐसा है कि सड़क पर मचलती कोई कुड�
प्रेम
दीपक झा 'राज'
सरिता से पूछा सागर ने तुम मुझ में क्यों मिल जाती हो, मंद-मंद मुस्काते हुए अपना अस्तित्व खो जाती हो। प्रेमी ने पूछ�
मातृभूमि के प्राण प्रणेता
रंजीता क्षत्री
कह रहा इतिहास– अंग्रेज आए थे भारत में, ना डरी झाँसी की रानी, अंग्रेजों को रण में धूल चटा दिए। भाग जाओ ओ गोरे लोगों, म
हो जीवन उजियार
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
मार्ग सुलभ है पाप का, बड़ा भयावह अन्त। दुर्गम राहें धर्म का, सत्य विजय भगवन्त।। कठिन परीक्षा सत्य की, बलि लेती अविर�
नवनीत माला
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
चले गेह नित मातु से, पिता चले परिवार। गुरु गौरव समाज का, चले देश सरकार।। कारण सब हैं नव सृजन, चाहे देश समाज। निर्मा
सुबह-सवेरे
अजय कुमार 'अजेय'
सुबह-सवेरे आँगन को मेरे चिड़िया, चूँ-चूँ कर चहकाती है। भोर हुआ उठ जाग मुसाफ़िर, क्यूँ निदिया तुझे सताती है।। बीती र�
अकेलेपन से एकांत की ओर
अजय कुमार 'अजेय'
'अकेलापन' कठोर सज़ा, 'एकांत' एक है बरदान। एक जैसे दिखने वाले, अंतर ज़मीन आसमान। एकल छटपटाहट घबराहट, एकांत लाभ शांति आ�
कहाँ गए भरत समान भाई
गणपत लाल उदय
आज कहाँ गऐ ऐसे भरत समान भाई, यह भाई की भाई जो होते थे परछाईं। आदर्शों की‌ मिशाल थे ऐसे वो रघुराई, महिमा जिनकी तुलसी द
श्रीलंका की एक लड़की
प्रवीन 'पथिक'
तेरी हस्त लेखनी से खुदे, तमिल भाषा में मेरा नाम; मेरी पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर; आज भी सजीव है। जब भी देखता हूँ, उन स्वर
प्यार वो फूल है
चीनू गिरि गोस्वामी
प्यार वो फूल हैं– जो एक बार खिल जाए तो, उम्र भर महकता रहता हैं। ये कभी मुरझाता नही, सदाबहार हैं, हर मौसम मे खिला रहता
क्या कभी ऐसा होगा?
चीनू गिरि गोस्वामी
क्या कभी ऐसा होगा? मैं तुम्हें सोचू और तुम आ जाओ! क्या कभी ऐसा होगा? मैं तुम्हें सोचू और तुम्हें ख़बर हो जाएँ। क्या �
सपने
सुधीर श्रीवास्तव
सपने देखिए सपने देखना अच्छी बात है, पर सपनों को पंख भी दीजिए, उड़ने के लिए खुला आकाश दीजिए। सपनों को दायरे में न बाँध
असमय विदाई
सुधीर श्रीवास्तव
प्रकृति की व्यवस्था में भी बहुतेरी विडंबनाएँ हैं, यह विडंबनाएं भी कभी-कभी होती बहुत दुखदाई होती हैं। माना कि आना-
हे पार्थ! सदा आगे बढ़ो तुम
आशीष कुमार
हे पार्थ! सदा आगे बढ़ो तुम, कर्तव्य पथ पर डटो तुम। मुश्किलों का सामना करो, तूफ़ान के आगे भी अड़ो तुम। हे पार्थ! सदा आग�
पंडित बिरजू महाराज
गणपत लाल उदय
घुँघरूओं की झनकार एवं मीठी आवाज़, काशी की शान और कथक की पहचान। नर्तक शास्त्रीय गायक पंडित बिरजू महाराज, 7 वर्ष में �
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल
अमीर ख़ुसरो
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ, कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ। शबा
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल
अमीर ख़ुसरो
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ, कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ।
ख़ुसरो रैन सुहाग की
अमीर ख़ुसरो
ख़ुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग। तन मेरो मन पीउ को, दोउ भए एक रंग।।
सावन आया
अमीर ख़ुसरो
बेटी तेरा बावा बुट्टा री—के सावन आया। अम्मा मेरे भाई को भेजो जी—के सावन आया। बेटी तेरा भाई तो बालारी—के सावन आया�
माँ की ममता
दीपक झा 'राज'
नज़र खुली तो तुझको देखा, तुझ में मैंने जग को देखा। ईश्वर अल्लाह तू ही है माँ, तुझ में मैंने रब को देखा। तेरा रात भर ज�
जनता का तंत्र गणतंत्र
दीपक झा 'राज'
जनता का जो तंत्र है, वही गणतंत्र है। भेदभाव की जगह नहीं अब, वंशवाद की लहर नहीं अब, जनता ही अब मालिक है, जनता ही सरकार �
जन्मदिन और केक
अजय कुमार 'अजेय'
जन्मदिन शुभकामना का मर्म समझ नहीं आया। शुभचिंतको, परिचितो का संदेश समझ न आया। घट रही है ज़िंदगी, ख़ुशी का अतिरेक क्य�
परिणय सूत्र
विनय विश्वा
देखा-देखी प्रथम चरण हौ दूजा है बरियाती तिजा में दुलहिन घरे आई निज संसार छोड़ी आई। एक भरोसा तुझसे है प्रिये तू संस�
खिलौना
विनय विश्वा
सूखी रोटी ओढ़ना बिछौना सर्दी गर्मी साथ है रहना प्राणी जन के उदर भरते सत्ता के गलियारों में हम कठपुतली बन ग‌ए खिलौ�
पगड़ी
अविनाश ब्यौहार
उपदा रसवंत नार सी तगड़ी है! दयानत फ़ज़ीलत की पगड़ी है!!
छुरी
अविनाश ब्यौहार
नेता जी सफ़ेदपोश हैं! कालेधन के कोश हैं!! उनकी नियत बुरी है! देश के लिए मीठी छुरी है!!
गृहस्थी
अविनाश ब्यौहार
एक महिला अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी पर अकड़ी! तो उसने सीधा सा उत्तर दिया- मैडम! मुझे तो याद है केवल नून-तेल-लकड�
जमादार भाया
अविनाश ब्यौहार
वे उलटे छुरे से मूंड़ते हैं क्योंकि उनके रोम-रोम में भ्रष्टाचार है समाया! इसीलिए ऐसे व्यक्ति को कहेंगे बेकारी �
खेल
अविनाश ब्यौहार
अलादीन भ्रष्टाचार को समझता रहा खेल! वह तब अवाक् रह गया जब रिश्वत के आगे उसका चिराग़ हो गया फ़ेल!!
आशा
दीपक झा 'राज'
क्यूँ निराश होकर बैठ गए, यह तो पल भर की बाधा है। आगे तो बढ़कर दिखलाओ साथी, पग-पग पर जिज्ञासा है। शोषक तो सुशोभित हैं, �
कम्बल
सुषमा दीक्षित शुक्ला
सर्द के दरमियाँ ये जो कम्बल है, ये तो शीत इलाक़ों का सम्बल है। उफ़ ये ठिठुरती फ़िज़ाएँ! कंपकपाती सर्द घटाएँ! कहीं बारिश,
महाराणा प्रताप
गणपत लाल उदय
पिता जिनके राणाउदय सिंह, और दादो सा राणा सांगा थे। जयवन्ता बाई माता जिनकी, प्रताप महाराणा कहलाए थे।। शिष्टता, दृ
दीवाली का दीया
दीपक झा 'राज'
देखो आई नई दीवाली, लेकर जीवन में ख़ुशहाली। न घर न आँगन है खाली, चारों ओर है दीपक-बाती। आओ अपने हाथ फैलाओ, दुश्मन को भ
कोरोना की कहानी
दीपक झा 'राज'
चारो ओर मचा कोहराम है, ये कैसी बेचैनी है, ये कैसा तूफ़ान है। एक छोटा सा वायरस, खाँसी जिसकी पहचान है, कर देता साँस भी ज�
प्रेम की परिभाषा
दीपक झा 'राज'
बुझा दीप हुआ अँधेरा, मेरे मन ने मुझसे पूछा क्या प्रेम है? क्यूँ हुआ अँधेरा? सागर से गहरा है जो, निल गगन तक फैला जो, व�
नकेल
अविनाश ब्यौहार
रोज़-ब-रोज़ हम बदअमली रहे हैं झेल! रफ़्ता-रफ़्ता कोई भ्रष्टाचार पर डाले नकेल!!
शासन व्यवस्था
अविनाश ब्यौहार
कर्मचारी मंडल आचरण से कृष्ण नहीं कंस हो गया है! इसीलिए बदशऊर शासन व्यवस्था का भ्रंश हो गया है!!
सरकारी काम
अविनाश ब्यौहार
देश में बदकारी देखकर उनकी आँख हो गई सजल! वे सरकारी काम सरकारी तौर पर कर देते हैं ये है उनका फ़ज़ल!!
खोज
अविनाश ब्यौहार
हमारा देश समस्याओं का देश है और मैने नई समस्या खोजी है! यह हमारे लिए फ़ीरोज़ी है!!
गौं
अविनाश ब्यौहार
हमनें सोचा था निकलेगा गौं! लेकिन बोया गेहूँ उपजा जौ!!
लॉकडाउन और मधुशाला
अजय कुमार 'अजेय'
नगर गाँव महानगर बंद, लटका जग भर में ताला। छाती पर मूँग को दलने, खुली फिर से मधुशाला।। लॉकडाउन की ऐसी तैसी, सोशल डि
बुज़ुर्ग कभी बोझ नहीं होते
गणपत लाल उदय
ये बुज़ुर्ग व्यक्ति कभी बोझ नहीं होते, ना समझ व्यक्ति इन्हें समझ न पाते। परिवार की ढाल बुज़ुर्ग बनकर रहते, सबको सही स
जीवन का पतझड़
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
जीवन कब रंग बदल ले कब ख़ुशियाँ ग़म में बदल दे समय का पहिया कब उल्टा घूम जाए जो न चाहो ऐसा कुछ हो जाए हँसती-खेलती ज़िंदग�
ख़ामोशियाँ तन्हाइयाँ
सुधीर श्रीवास्तव
ख़ामोश है ख़ामोशियाँ तन्हा हैं तन्हाइयाँ। ये कैसी लाचारगी है कि ख़ामोश तन्हाइयों की ख़ामोशी नहीं टूटती, तन्हाइयों �
पैसा बोलता है
सुधीर श्रीवास्तव
समय का पहिया तेज़ी से घूम रहा आँखें फाड़कर देखिए पैसा भी अब चीख़-चीख़कर बोलता है, आजकल पैसा रिश्तों को बहुत ख़ूबसूरती स�
परछाईं
सुधीर श्रीवास्तव
वक्त कितना भी बदल जाए हम कितने भी आधुनिक हो जाएँ, कितने भी ग़रीब या अमीर हों राजा या रंक हों नर हो या नारी हों परछाईं
काश! ऐसा होता!
डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
काश! ऐसा होता! चंद दिनों के लिए तुम हमारे... और हम तुम्हारे स्थान ले लेते... तुम हमारी तरह पशु और हम तुम्हारी तरह मानव �
अग्निवृष्टि
मयंक द्विवेदी
रवि की प्रथम रश्मि, रश्मिकर, कर नव सृष्टि। उठा, जगा पुरुषत्व को, दुर्बलता पर कर, अग्निवृष्टि। सामने हो मृग मरीचिका,
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
गणपत लाल उदय
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आप अग्रणी नेता, 1945 के बाद आप अचानक हो गए लापता। स्वतन्त्रता सेनानियों में सबसे मशहू�
बेहोशी से उबरना
विनय विश्वा
सच कभी नही मरता अब ये पुरानी बातें हो गई है कबीर ने उस ज़माने मे कितनी ही बातों को उधेड़ कर रख दिया है पर आज भी क्या आँख�
भारत की बिन्दी
विनय विश्वा
मैं हिन्दी हूँ जननी जन्मभूमि मातृभाषा हूँ खड़ी बोली खड़ी होकर मर्यादित,अविचल‌ आधार हूँ मैं भारत का शृंगार हूँ।
मेरी प्रीत
प्रवीन 'पथिक'
पता नहीं! इस समय क्या हो रहा है मेरे साथ? हर क्षण तेरी ही याद आती है। चाहें घर रहूँ; काॅलेज़ हो या फिर खेतों पर, कहीं भी
ना माँ से बढ़के है जग में कोई
समुन्द्र सिंह पंवार
ना माँ से बढ़के है जग में कोई। सेवा कर दिल से जगे क़िस्मत सोई।। तेरे लिए कष्ट उठाती है माँ, तुझे दुनिया में लाती है मा�
मेरा गाँव
समुन्द्र सिंह पंवार
मेरा गाँव है पावन धाम। बार-बार मैं करूँ प्रणाम।। पेड़-पौधों से घिरा हुआ है, धन-धान्य से भरा हुआ है, सुख-सुविधा यहाँ त
हे मात भारती! तुझे नमन है
चीनू गिरि गोस्वामी
हे मात भारती तुझे नमन है, तुझको फूल चढ़ाते हैं। मातृ भूमि की रक्षा में हम अपना शीश चढ़ाते हैं।। हे मात भारती! तुझे नमन �
वरमाला
अंकुर सिंह
जयमाला पर जब तुम मिलोगी, तुम्हारे हाथों में वरमाला होगी। नज़र झुकाए प्रिय तुम होगी इशारों से हममें सिर्फ़ बातें हों
सुभाष चंद्र बोस
सुधीर श्रीवास्तव
स्वतंत्रता संग्राम के सर्वोच्च नायक राष्ट्रवाद के बड़े उन्नायक बंगाली बाबू पिता जानकी नाथ बोस माँ प्रभावती दत्त
सुभाष चंद्र बोस
रतन कुमार अगरवाला
जानकीनाथ और प्रभावती के पुत्र, सुभाष चंद्र थे स्वाधीनता सेनानी, आओ आज सुनाऊँ सबको मैं, सुभाष बोस की कहानी। माता पि�
सुभाष: भारत माँ का लाड़ला
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सदा अथक संघर्ष ने, माँ भारत के त्राण। आत्मबल विश्वास दे, कर सुभाष निर्माण।। भारत माँ का लाडला, महावीर सम पार्थ। मे�
सुभाष चन्द्र बोस
सुषमा दीक्षित शुक्ला
ऐ! स्वतंत्रता के मतवाले, तुमको मेरा शत् शत् प्रणाम। ऐ! भारत माँ के रखवाले, तुमको मेरा शत् शत् प्रणाम। आज़ाद हिंद से�
इतिहास बदलना होगा
मयंक द्विवेदी
कर्म रथ पर आरूढ़ हो, फिर नया सवेरा आएगा, जाग उठेगी क़िस्मत तेरी, सूर्य उदित हो जाएगा। दर्द सहे है तुमने कितने, कितनी र�
टेसू के रुख़सार
अविनाश ब्यौहार
आम हुए हैं मधुॠतु के मुख़्तार! दूर तक लहराती फ़सलें! दुख की दिखती नहीं नस्लें! लाल गुलाबी टेसू के रुख़सार! गंध को उ
घायल तटबंध हुए
अविनाश ब्यौहार
छूछी गागर से रीते संबंध हुए। रिश्ते सिक्कों से खनकते थे। बैठकर दिन टिकोरे चखते थे। उजड्ड लहरों से घायल तटबंध ह�
कलमुँही रात है
अविनाश ब्यौहार
हिरणों का झुंड है शेर की घात है! निरंकुशता से हो रही हत्याएँ! जीवन को क्यों डँसती हैं व्यथाएँ!! दिन हुए लिजलिजे क�
फँस गया ज़िला
अविनाश ब्यौहार
अकाल के पंजे में फँस गया ज़िला। छाती पीट रोए खेत। बहती नदी होती रेत। बदले में फ़ज़ल के धोखे का सिला। चीखें, रुद�
हिन्दी का महत्व
दीपक झा 'राज'
सागर संगम नदियों का, जो जीवन पथ दर्शाती है। भाषाओं का संगम है हिन्दी, जो राष्ट्रभाषा कहलाती है। देश विभिन्नता का �
जन्मदिन का उपहार
दीपक झा 'राज'
मेरे पास न धन है, न देने को उपहार। पर दिल से मैं दे रहा, ढेर सारा प्यार। गगन तुम्हारे क़दम चूमे, ये मेरी है फ़रियाद। त�
दूरियाँ
दीपक झा 'राज'
नयनों में है अश्रु जल, खिल रहा दिल में कमल। पर पूछ रहा ख़ुद से मैं प्रश्न, क्यूँ दूरियाँ भिगो देती नयन। जब वसंत ऋतु आ
नई प्रभात
दीपक झा 'राज'
निकला रवि हुआ प्रकाश, अँधकार का छुटा साथ। लिये नए अद्भुत विश्वास, आज चमकता दिनकर ख़ास। मंद गति में बहती सरिता, साथ �
ऐसा हमारा संविधान
गणपत लाल उदय
हिन्दुस्तान का ऐसा हमारा संविधान, जिसका करतें है यहाँ सभी सम्मान। इस पर सब भारतवासी को विश्वास, लिखें है जिसे यह आ�
बेटियाँ
सुषमा दीक्षित शुक्ला
बेटियाँ शब्द एक प्रतीक है, अहसास है मर्यादा का, गहन अपनत्व का, माता के ममत्व का, पिता के दायित्व का। ये बेटियाँ गंग�
शजर-ए-ग़ज़ल से लाया हूँ एक शे'र फ़रियाद कर
कर्मवीर 'बुडाना'
शजर-ए-ग़ज़ल से लाया हूँ एक शे'र फ़रियाद कर, क़ीमत इश्क़ होगी मैं बेच दूँगा ख़ुद को बर्बाद कर। सारे जहाँ की तबस्सुम इक तिरे
ये वक़्त जो खिसक रहा हैं चाँद की उड़ान में
कर्मवीर 'बुडाना'
ये वक़्त जो खिसक रहा हैं चाँद की उड़ान में, उत्सुकता की चादर फैली हैं कवि के मकान में। दिख रही हैं बारिश की धारा बहते �
सारी उम्र ज़ाया कर दी यूँ ही पढ़ने पढ़ाने में
कर्मवीर 'बुडाना'
सारी उम्र ज़ाया कर दी यूँ ही पढ़ने पढ़ाने में, मुठ्ठीभर लम्हात हसीं थे जो गुज़रें मुस्कराने में। खेल के मैदान में वो च�
सुबह का मुख
कर्मवीर 'बुडाना'
जनवरी की ये भीगी-भीगी शबनमी सहर, ये कड़कड़ाता, ठिठुराता और लुभाता मौसम, ये बहती सर्द और पैनी हवाओं की चुभन, इस पर तिरा �
गणतंत्र दिवस
रतन कुमार अगरवाला
गणतंत्र दिवस का पर्व आया, राष्ट्र ध्वज चारों ओर फहराया, "जन गण मन" गुनगुनाने का, देखो यह पावन दिन आया। 26 जनवरी 1950 का दि�
26 जनवरी अमर रहे
आशीष कुमार
युगों-युगों तक यह शुभ दिन हर भारतीय को स्मरण रहे, गूँजता रहे फ़िज़ा में नारा 26 जनवरी अमर रहे। गणतंत्र हुआ भारत इस दिन
हमको नशा है
गणपत लाल उदय
हमको नशा है अपनें वतन के ध्वज का, भारत के प्यारे अपने इस संविधान का। राष्ट्रीय-गीत और हमारे राष्ट्रीय-गान का, हिन्�
मतदान करें
सुषमा दीक्षित शुक्ला
अपने हक़ की ख़ातिर यारों, लोक तंत्र बलवान करें। जागरूक हो जाओ यारों, आओ हम मतदान करें। संविधान सर्वोपरि होता, आओ सब �
छब्बीस जनवरी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
आई है फिर से देश में छब्बीस जनवरी, लाई है नव संदेश ये छब्बीस जनवरी। इस ही पवित्र दिवस को था लोकतंत्र का मन्त्र सजा।
हवाई जहाज़ बनी साईकिल
रवि भूषण सिन्हा
ज़िंदगी कैसे-कैसे कहाँ से कहाँ ले जाती है, जुनूनी मेहनत भी कहाँ से कहाँ पहुँचाती है। ये उनसे पूछो जिससे किसी ने सोचा
गणतन्त्र दिवस
गणपत लाल उदय
आया राष्ट्रीय दिवस ये गणतंत्र दिवस, संविधान दिवस शौर्य सम्मान दिवस। चारों और देखो सब की भीड़ लगी है, जनता सब और स्�
जीवन का नाम है बेटियाँ
जयप्रकाश 'जय बाबू'
घर की रौनक और परिवार की शान है बेटियाँ, माँ बाप की पहचान और अभिमान है बेटियाँ। बिना जिसके वीरान खंडहर सी है ये दुनिय
ज़िंदा हो तो नज़र आओ
जयप्रकाश 'जय बाबू'
ज़िंदा हो? ज़िंदा हो! तो नज़र आओ। आँखें चार करो नज़र मिलाओ, ज़िंदा हो? ज़िंदा हो! तो नज़र आओ। बचपन के संग खिलखिलाना, बूढ़�
लोक आस्था का पर्व छठ
डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
"छठी मैया आइतन आज..." छठ पर्व के आगमन होते ही यह गीत भारतवर्ष के कई राज्यों में विशेष रूप से बिहार, उत्तरप्रदेश और झार�
निराला संसार
दीपक झा 'राज'
संसार बडा निराला है, यह मात्र मधु का प्याला है। जो भौतिक सुख में डूब गया, वह इस सत्य को भूल गया। उसको आगे भी जाना है, �
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा
सुनील माहेश्वरी
करी थी हमने भी कोशिश, ज़िंदगी को समझने की, पर असल बात तब जानी, जब अपने ही छोड़ जाने लगे, असल दुःख भी तभी हुआ, और असल सुख
अटल सत्य
दीपक झा 'राज'
चलो आज मैं तुम्हें, जीवन का सत्य सुनाता हूँ। जो अंधकार फैला है जग में, उसका रहस्य बताता हूँ। सागर में उठती हैं लहर�
नवभोर
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सूर्यदेव अनुपम कृपा, मिले सकल संसार। रोगमुक्त सुन्दर धरा, सुखदा पारावार।। भव्या रम्या मनोहरा, श्वेताम्बर जगदम्�
धूमिल छाया
प्रवीन 'पथिक'
धूमिल पड़ गई वो छाया! कभी ख़ुशियाँ थी फैलाती; फूलों-सा थी महकाती; नीरव करके जीवन को, मिट गई कभी थी साया। धूमिल पड़ गई �
बेटियों को पढ़ने दो
गणपत लाल उदय
आज बेटियों को सब पढ़ने दो, और आगे इनको भी बढ़ने दो। खिलने दो और महकने भी दो, अब पढ़ाई से वंचित न होने दो।। इनको बनकर �
बेशक नहीं पसंद वो नफ़रत न हम रखेंगे
मनजीत भोला
बेशक नहीं पसंद वो नफ़रत न हम रखेंगे, बस प्यार की वफ़ा की चाहत न हम रखेंगे। ग़मगीन हैं फ़ज़ाएँ दहशत है खलबली है, इस बेरहम ह
हिंदी बने राष्ट्र भाषा
अंकुर सिंह
हमारा हो निज भाषा पर अधिकार, प्रयोग हिंदी का करें इसका विस्तार। निज भाषा है निज उन्नति का कारक, मिटे निज भाषा से हम�
भविष्य की कल्पना
दीपक झा 'राज'
क्यों खोये हो सपनो में, रात चाँदनी तकने में। वह तो मात्र भ्रम है भाई, जो न मिलेगा जीवन में। क्यों खोए हो सपनो में, रा
एहसास
दीपक झा 'राज'
आज मुझे हुआ एहसास, मैंने किया नहीं प्रयास। कल तक मैं था बड़ा महान, आज बन गया हूँ अंजान। क़िस्मत ने भी छोड़ा हाथ, केवल अस
आभार अर्धांगिनी
अंकुर सिंह
हम बस प्रिय! प्रिय नहीं, हम क़दम-क़दम के साथी हैं। हम बस दो जिस्म नहीं, हम जन्मों-जन्म के साथी है।। तुम ही हो मेरी सब ख़ु
कामयाबी
अंकुर सिंह
ठाकुर वंशीलाल हीरापुर गाँव के बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, साथ में क्षेत्र के कई गावों में ठाकुर साहब की सामाजिक और
हमारा गणतंत्र हमारा संविधान
सुधीर श्रीवास्तव
26 जनवरी का दिवस प्यारा है आज गणतंत्र दिवस हमारा, हमारा संविधान है सबसे प्यारा हमारा भारत सबसे प्यारा। 1947 तक हम आज ह�
न समय कम न काम ज़्यादा
सुधीर श्रीवास्तव
समय का रोना नहीं रो रहा हूँ, बस ईमानदारी से बयाँ करता हूँ, जीने की फ़िक्र नहीं है मुझे ज़िंदा रहने के रास्ते तलाशता हू�
हमारा गणतंत्र
सुधीर श्रीवास्तव
26 जनवरी, 1930 से 15 अगस्त, 1947 को आज़ादी प्राप्त होने तक 26 जनवरी को ही स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता था। चूंकि 26 जनवरी, 1930 को भारत�
ग़म के साए
अविनाश ब्यौहार
आँखों की बंजर ज़मीन पर आँसू ऊग गए। ग़म के साए भाग्य की डाली पर लटके। संगी-साथी दे रहे झटके पर झटके।। जो भी रवि की भा�
कोरोना से बचना है तो
अविनाश ब्यौहार
कोरोना से बचना है तो मास्क लगाएँ! जीवन रक्षा की ख़ातिर दो गज की दूरी! साबुन-सेनेटाइजर होता है ज़रूरी!! है लाज़मी कुछ �
बेटी नित रत्नाकर समझो
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
बोझ नहीं सम्मानित बेटी, स्नेहिल नित रत्नाकर समझो। सारे जग मुस्कान है बेटी, मृदुल छाँव ममतांचल समझो। जीवन की पह�
पत्ता गोभी
कर्मवीर 'बुडाना'
मिरे दर पर हुजूम में, साथी कोई पुराना आया हैं। आज़ीज़ों की बज़्म में, क़त्ल का फ़रमान आया हैं। मोहब्बत के खेल में, जाम त�
चुप्पी तोड़नी होगी
समय सिंह जौल
हाँक दिए जाते हो ढोर डंगरो की तरह एक ही लाठी से लाठी पर राजनीति का रंग लगा हमको बहलाकर कराते दंगा। धर्म और सांप्र�
सैनिक
समुन्द्र सिंह पंवार
न हँसता है, न रोता है, वो रातों को न सोता है, जो जीता है अपने देश के लिए, ऐसा तो केवल सैनिक ही होता है। वो धीर है, गम्भी�
धैर्य न खोना तुम
समुन्द्र सिंह पंवार
आँसू से मुँह न धोना तुम, जीवन में धैर्य न खोना तुम। हर दिन सपने उन्नति के, दिल की मिट्टी में बोना तुम। हर पल है अनमोल
जय जवान
अनिल भूषण मिश्र
हे अरिमार्ग के रोधक सतत सुरक्षा के बोधक। तुम धीर वीर निर्भीक कहलाते हो, मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण लगाते हो�
मज़दूरों का दुर्भाग्य
अनिल भूषण मिश्र
थे मजबूर परिवार पालने के वास्ते, तय किया हज़ारों मील के रास्ते। अजनबी शहर में थे अपरिचित अनजान, अपनी मेहनत के सिवा न
जैसे शेरों की माँद खलक
अविनाश ब्यौहार
जैसे शेरों की माँद खलक, होता चंदा के पास फ़लक।। हैं हरि दर्शन के प्यासे हम, मिल जाए उनकी एक झलक। यदि झुग्गी से पूछे�
जाड़े का मौसम
अविनाश ब्यौहार
सबको बहुत लुभाता है जाड़े का मौसम। महल, झोपड़ी, गाँव शहर हो। या फिर दिन के आठ पहर हो।। कभी कभी तो लगता है भाड़े क�
न्यायालय की नौकरी
अविनाश ब्यौहार
न्यायालय की नौकरी करके पड़ गए हम झूठे से! मानो बाँध दिया हो कसाई के खूँटे से!!
झाँसी की रानी
गणपत लाल उदय
पिता का नाम था मोरोपन्त तांबे, व माता थी इनकी भागीरथी बाई। पति नरेश गंगाधर राव नवलकर, मनु से हुई झाँसी रानी लक्ष्मी
अभिनन्दन माँ भारती
गणपत लाल उदय
अभिनन्दन है माँ भारती तुम्हारा, जन्म हुआ जो भारत वर्ष हमारा। तुम ही सारे इस जगत की माता, अवतरित हुएँ यहाँ स्वयं विध
सांसारिक आकर्षण
प्रवीन 'पथिक'
ज़िन्दगी में, बहुत-सी चीज़ें मिलती हैं ऐसी जो अपने उन्मदित व्यवहार से आकर्षित कर निज-राहों से, सन्यासियों की भाँत�
प्रेम की परिकल्पना
प्रवीन 'पथिक'
'प्रेम' शब्द जितना मोहक, अनुभूत व हृदयग्राह्य है उतना ही इसकी अभिव्यक्ति गूढ़, शब्द-सीमा से परे और अधूरी है। प्रेम क�
दुनिया का इतिहास पूछता
अटल बिहारी वाजपेयी
दुनिया का इतिहास पूछता, रोम कहाँ, यूनान कहाँ? घर-घर में शुभ अग्नि जलाता। वह उन्नत ईरान कहाँ है? दीप बुझे पश्चिमी गगन
आओ मर्दो, नामर्द बनो
अटल बिहारी वाजपेयी
आओ मर्दो, नामर्द बनो! मर्दों ने काम बिगाड़ा है मर्दों को गया पछाड़ा है झगड़े-फ़साद की जड़ सारे जड़ से ही गया उखाड़ा है मर
नशा
प्रेमचंद
ईश्वरी एक बड़े ज़मींदार का लड़का था और मैं एक ग़रीब क्लर्क का, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी। हम द�
मुक्ति-मार्ग
प्रेमचंद
सिपाही को अपनी लाल पगड़ी पर, सुंदरी को अपने गहनों पर और वैद्य को अपने सामने बैठे हुए रोगियों पर जो घमंड होता है, वही क
अतीत
प्रेमचंद
अतीत चाहे दु:खद ही क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं।
हमारे राष्ट्रपिता
गणपत लाल उदय
महात्मा गांधी कहलाएँ राष्ट्रपिता हमारे, आत्मशुद्धि शाकाहारी प्रेरणा देने वाले। सादा जीवन व उच्च विचार रखने वाल�
ख़ामोशियों की आवाज़
सुषमा दीक्षित शुक्ला
सच तो यह है कि ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं, बस उनकी आवाज़ सुनने वाले कान होने चाहिए। ख़ामोशियों की आवाज़ कानों के बजाय आत्मा
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
भूमंडल में गूँज रही है, ऋषिवर बापू की गाथा। था वह मनुज हिमालय सा, नहीं झुका जिसका माथा। भय का बिलकुल नाम नहीं था, सत�
श्रेष्ठ कौन
दीपक झा 'राज'
मानव श्रेष्ठ नहीं है कोई, श्रेष्ठ बनाते हैं गुण-अवगुण। जिसको दस ने श्रेष्ठ है समझा, वह बन जाता उनका झंडा। पर जैसे ह�
आदर्श परिवार
दीपक झा 'राज'
ऐसा एक परिवार हो, सुख दुख का संसार हो। भाई बहन में प्यार जहाँ हो, जन्नत जैसा स्वर्ग वहाँ हो। माता-पिता हो देव की मूर�
सरिता और जीवन
दीपक झा 'राज'
जीवन एक सरिता है, जिसका अंत भी निश्चित है। कभी उमंगे, कभी तरंगे, कभी रुकाव भी निश्चित है। जीवन एक सरिता है। यह कभी �
ईश्वर की महिमा
दीपक झा 'राज'
जिसका जग में कोई नहीं, जो सब से अज्ञान। भक्ति के सागर में डूबो, बन जाओगे महान। एक हरि ही तो हैं तेरे, बाक़ी सब अनजान।
गुरु महिमा
अनिल भूषण मिश्र
गुरु-शिष्य का है प्यारा नाता, आदि काल से यह सबको भाता। गुरु हैं देते ज्ञान विलक्षण, करते अपने शिष्यों का संरक्षण। �
गौ माता
गणपत लाल उदय
यह गाय कहलाती है गौ माता, इतिहास में जिसकी कई गाथा। ख़ुद के बच्चें को भूखा रखकर, पिलाती है जगत को दूध माता।। गाय हमा�
बसंत
अनिल भूषण मिश्र
हे ऋतुराज प्रकृति भूषण बसंत! तुम लाए धरा पर ख़ुशियाँ अनंत। बागों में अमराई महकी, डालों पर चिड़ियाँ चहकी। सज गया है ध�
गणतंत्र दिवस
सीमा 'वर्णिका'
गणतंत्र दिवस का हुआ आगमन, गूँजायमान हुए धरती और गगन। कोहरे की सर्द चादर सिमट गई, बहने लगी सुखमयी बसंती पवन। भारतव�
प्रियतम
सीमा 'वर्णिका'
प्रियतम तुम पतंग मैं डोर हूँ, प्रेम पावन मौली का छोर हूँ। नियति प्रदत सम्बन्ध हमारा, हृदयारण्य में विचरित मोर हूँ�
ऋतुराज बसंत
सीमा 'वर्णिका'
ऋतुराज बसंत पावन पर्व आया, प्रकृति में ख़ुशी व उल्लास छाया। परिमलित शीत बयार संचरित हो, सुप्तस्थ हृदयाग्नि को है भ�
युवा शक्ति
सीमा 'वर्णिका'
आह्वान कर युवा शक्ति का स्वदेश ने तुम्हे पुकारा है, भूख ग़रीबी भ्रष्टता मिटाना अब संकल्प तुम्हारा है। अदम्य शक्�
नवप्रभात नवचेतना
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सोमदेव की कृपा से, शीतल भाव विचार। उषाकाल की लालिमा, करे सुखद संसार।। श्रवण मनन चिन्तन सदा, मौन बने नित शक्ति। सम�
वधू
रतन कुमार अगरवाला
बड़े चाव से बनी थी दुल्हन, आई पिया के घर आँगन, अपनों को छोड़ बनाने आई थी, ससुराल को अपना प्रांगण। अरमान सब छूट गए पीछे, न�
माँ
ब्रजेश कुमार
माँ प्यार है, दुलार है, ममता की फुहार है। माँ सहेली है, मित्र है, माँ का प्रेम सबसे पवित्र है। माँ लोरी है, छंद है, सं
दर्द
ब्रजेश कुमार
दिल में दर्द भरा है इतना, कोई सहे भी तो सहे कितना। गैर तो ख़ैर गैर ही थे, अपनों ने भी कहाँ समझा अपना। मैं तो अपनों ही स�
वह आज भी बच्चा है साहब
जयप्रकाश 'जय बाबू'
वह आज भी बच्चा है, नन्हा सा मासूम सा, वही जिसे कहते है लोग, कोरा सा काग़ज़ सा। मिला मुझे भगवान को, साँचे में ढालते हु
सुभाष एक सितारे थे
अजय कुमार 'अजेय'
भारत सौंधी माटी में महके, सुभाष एक सितारे थे। आज़ादी आंदोलन चमके, नेताजी एक धुव्रतारे थे।। जिनकी आज़ाद हिंद फ़ौज से,
अकेले हम अकेले तुम
सुधीर श्रीवास्तव
हमारे अपने विचार हैं हमारी अपनी सोच है, पर सच यही है कि न हमारा कोई है न हम किसी के हैंं। हम कल भी अकेले थे आज भी अकेल
बाल मज़दूर
दीपक झा 'राज'
बंद करो यह अत्याचार, बच्चे मिलते नहीं बाज़ार। वो भी एक मानव ही हैं, जिनको देना है अधिकार। बंद करो यह अत्याचार, बच्चे
नई शताब्दी
दीपक झा 'राज'
नई शताब्दी का हुआ आगमन, खिल उठा मानव का जीवन। नया उल्लास है, नूतन वर्ष, सारे जग में फैला है हर्ष। प्रवेश हुआ विज्ञा�
नया मार्ग
दीपक झा 'राज'
कठिन राह के दुर्गम मार्ग पर, जाना है तो जाओ। नई उमंग और नई तरंग, लेकर वापस आओ। अपने ख़ुशी के इस अवसर पर, अतीत के ग़म भू�
हे वीणा वादिनी स्वागत बारंबार है
आशीष कुमार
हम बच्चों को सबसे प्यारा वसंत पंचमी त्यौहार है, हे वीणा वादिनी शारदे मैया स्वागत बारंबार है। निर्मल मन से मूर्ति
ये मिठाइयाँ
सुषमा दीक्षित शुक्ला
कितनी प्यारी ये मिठाइयाँ, जैसे यौवन की अँगड़ाइयाँ। जैसे बचपन के सहेलियाँ, जैसे नानी की पहेलियाँ। अति सेवन से होती �
सरस्वती वन्दना
अनिल भूषण मिश्र
हे ज्ञानदायिनी बुद्धिदायिनी माँ सरस्वती तुम हो कितनी महान, नहीं कोई कर सकता इसका बखान। त्रिभुवन तुम्हारी आभा से �
विश्व प्रसिद्ध अजमेर दरगाह का उर्स
गणपत लाल उदय
सारे विश्व में प्रसिद्ध है अजमेर दरगाह का उर्स, देश और विदेशों में सबको होता जिसका हर्ष। स्मार्ट सिटी अजमेर में लग
माँ शारदे को प्रथम नमन
गणपत लाल उदय
हम वंदन करते सर्व प्रथम तेरे नाम का, पूजा-पाठ हम करते सरस्वती मात का। आ जाओ मेरे कंठो में मातेश्वरी शारदा, हृदय विर�
राम युगों युगों में आते है
मयंक द्विवेदी
राम युगों युगों में आते है मर्यादा की बन परिभाषा आदर्शो की बन पराकाष्ठा राम युगो युगो में आते है। पिता के वचन निभा
बसंत एक नज़रिए अनेक
सुषमा दीक्षित शुक्ला
बसंत का नाम आते ही ज़ेहन में उभरते हैं बसन्त ऋतु के कई चेहरे कई रंग, बस निर्भर करता है लोगों का अलग अलग नज़रिए से मधुमास
सरस्वती वंदना
आशीष कुमार
हे वीणा धारिणी देवी! अंधियारा दूर कर दो, मैं हूँ अज्ञानी माता विद्या बुद्धि का वर दो। हे श्वेत वस्त्र धारिणी! मनो�
देखो वसंत आया है
ब्रजेश कुमार
वन-उपवन में फूल खिले, सुगंध लगे बिखराने। मकरंद की चाह लिए, मधुकर लगे मँडराने। भौंरों की मधुर गुंजन ने, सबका मन हर्ष
बसंत
सुधीर श्रीवास्तव
ऋतुराज बसंत जब आता है, संग माँ सरस्वती को लाता है। माघ मास शुक्ल पक्ष को, बसंत पंचमी भी साथ लाता है। माँ धवलधारिणी, �
नशा
दीपक झा 'राज'
उठ रहा धुँआ जल रहा परिवार, लेकिन मौन बैठकर देख रहा संसार। क्यों जानकर हम बन जाते अनजान, गुटका, खैनी, मदिरा का करते �
करो तैयारी
दीपक झा 'राज'
रात चाँदनी बीत चुकी कठिन राह पर जाना है, गहरे सागर में छिपे मोती का पता लगाना है। जीवन के इस सरगम से संगीत नया बनान�
तू सज-धज के नज़र आती हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
शफ़क़ की पैरहन ओढ़ें शाम जब मिरे मस्कन आती हैं, सुर्ख़ मनाज़िर में तू दुल्हन बनी सज-धज के नज़र आती हैं। तन्हा रात हैं, शोख़ �
वर्तमान बहुत बचकाना है
अविनाश ब्यौहार
एक खंडहर जिसमें बना हुआ तहख़ाना है! आस पास की उड़ती ख़बरों ने पहचाना है!! दरवाज़े इतिहासों के पृष्ठ पलटते हैं! अब आँग�
पुरवाई कुछ बोल रही है
अविनाश ब्यौहार
पुरवाई कुछ बोल रही है- पछुआ सुनती है! हरियाली ने भरपूर जीवन पाया है! बूँदें बरस रहीं बादलों की माया है!! पावस की श�
रोने से भी क्या होगा?
हरदीप बौद्ध
ग़म हैं आज हज़ारों यारों, पर रोने से भी क्या होगा? करनी हैं गर ख़्वाहिशें पूरी, तो सोने से भी क्या होगा? प्रेम किया है प्
आलोचक
हरदीप बौद्ध
सुनो! आलोचकों मेरी ख़ामोशी ही अनगिनत सवालों का जवाब है। तुम करते रहो प्रतिकार मुझे अच्छा लगता है, आपका खीझना व्यव�
दया के सागर
समुन्द्र सिंह पंवार
हे दीन-दयालू दया के सागर नाम तेरा सुखदाई है। अपने भक्त जनों की तुमने हर पल लाज बचाई है।। ऋषि, मुनि, सन्यासी, योगी गु�
मेरा भारत देश महान
समुन्द्र सिंह पंवार
मेरा भारत देश महान, नहीं इससे बढ़िया देश कोई। ये बिल्कुल स्वर्ग समान, नहीं इससे बढ़िया देश कोई।। बात के पक्के, दिल के
शोर चारों ही तरफ़ देख सवालों का है
मनजीत भोला
शोर चारों ही तरफ़ देख सवालों का है, आज दुश्मन ये नया कौन उजालों का है। आग चूल्हों में न हो पेट मगर भर देगा, एक फ़नकार य�
श्रद्धांजलि: स्वर कोकिला लता मंगेशकर
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
अस्ताचल लतिका लता, सुरभि गीत संसार। देशरत्न सुर कोकिला, भवसागर से पार।। प्रीत गीत संगीत की, सामवेद प्रतिरूप। अवत�
श्रद्धांजलि के दो शब्द लताजी की याद में
रतन कुमार अगरवाला
सुरों का सजाया अनुपम संसार आपने, हिन्दी साहित्य को दिए कितने ही नगमे। हिन्दी गीत संगीत को मिली आपसे नई पहचान, विश्�
भारत रत्न लता मंगेशकर
गणपत लाल उदय
स्वर कोकिला और महान थी गायिका, भारत वर्ष की शान ऐसी वो पुण्यात्मा। आवाज़ से बनाई जिसने ऐसी पहचान, गवाह है जिसका धरत
ढूँढ़ता हूँ
अजय कुमार 'अजेय'
पल-पल बदलते रिश्तों में, प्यार ढूँढ़ता हूँ। समुन्दर से खारे पानी में, गंगधार ढूँढ़ता हूँ।। दुश्वारियाँ बोझिल सफ़र, �
मधुरिम मन के
प्रवीन 'पथिक'
मधुर-मधुर तुम, मधुरिम मन के, आलंबन मेरे जीवन के। तुम्हें देख ही तृप्त हो जाते, प्यासे सपने मेरे नयन के। अधर है तेरे �
देखो फिर आया बसंत
सुधीर श्रीवास्तव
देखो फिर आया बसंत सबके मन को हर्षाया बसंत नव कोपलें पनप रही है, फूलों की चादर पसर रही है, महक उठा है जनमन जीवन पुलकि�
प्रकृति का क़हर
सुधीर श्रीवास्तव
प्रकृति ने हमें हर व्यवस्था दी, हमें हर सुख सुविधाएँ दी, हमें रहने खाने जीने के हर साधन उपलब्ध कराए, हमारी हर सुविध
कोशिश कर
समय सिंह जौल
ऐ मनुज! तू आगे बढ़ राहों में बाधा से ना डर लक्ष्य के सफ़र पर चल तुझमें है सफलता पाने का बल चल आगे बढ़ तूफ़ाँ से ना डर जि
फूल और भौंरे
रवि भूषण सिन्हा
बाग में खिले फूल, भौंरों को बुला रहा। अपनी रमणीक सौंदर्य से, हम सबको लुभा रहा। अपने रंग-बिरंगे रंग से, बग़ीचे को मन�
काश मैं भी एक टेडी बीयर होता
आशीष कुमार
काश मैं भी एक टेडी बीयर होता साल में एक दिन ही सही मगर सब का डियर होता, सब देते मुझे अपने दिल में जगह सबको मुझे खोने क�
काश मैं भी एक गुलाब होता
आशीष कुमार
काश मैं भी एक गुलाब होता तो उनके दिल की सल्तनत का नवाब होता, महका देता उनके मन का कोना-कोना इस गुलाब की तरह मैं भी ला�
हे कृष्णा साँवरे
चीनू गिरि गोस्वामी
प्यारे तू सब जानता है, प्यारे तू सब देखता है। तूने तक़दीर लिखी है, मेरी इसमें क्या ख़ता है। मैंने तो वो ही किया है, तू �
चले गुलेल
अविनाश ब्यौहार
हो गया है थाने का अपराधी से मेल। उजाले का ख़ून हो गया। पहरुए अफ़लातून हो गया।। जीवन लगता है मानो शतरंज का खेल। क�
हुई दफ़्तर में बंदरबाँट
अविनाश ब्यौहार
अफ़सर-बाबू में साँट-गाँठ! योजनाएँ सब हैं लंबित! बदअमली महिमा मंडित!! उन्हें बुके है हमको डाँट! सबसे बड़ा रुपैया �
स्वागत ऋतुराज का
अविनाश ब्यौहार
कर रहा माघ स्वागत- ॠतुराज का। टेसू, सेमल, गुलमोहर। होता है लुब्ध हर बशर।। कोयल बाँचे समाचार- आज का। आम्रकुंज ह�
अपने महबूब से आज इज़हार करना है
आशीष कुमार
लेकर आया हूँ अँगूठी और गुलाब उनके लिए, उनके क़दमों में झुक कर उनसे इज़हार करना है। चाहत नहीं मुझे अब किसी चीज़ की बस उ�
अनन्त ज्ञान का भण्डार शिक्षक
गणपत लाल उदय
शिक्षक वही है जो सदमार्ग का रास्ता दिखाएँ, अँधकार से उभारे व ज्ञान का प्रकाश दिखाएँ। उसके मनमस्तिष्क में ज्ञान की
संघर्ष
रतन कुमार अगरवाला
जलते रहे ज़लज़ले में भी, खरे उतरे संघर्षों की शमशीर पर, तूफ़ान से भी न घबराए, टिके रहे तटस्थ यथार्थ की ज़मीन पर। सूरज के उ
पुस्तक
अजय कुमार 'अजेय'
जिसने हमें बचपन में काकाहारा सिखाया, ईकाई-दहाई पढ़ाया, अक्षर ज्ञान कराया। जिससे ज्ञानार्जन कर रोज़गार था पाया, जीव�
गुलों की छाँव
अविनाश ब्यौहार
बाग में पड़ रहे हैं तितली के पाँव! फूलों में हैं ख़ुशबुएँ आकर बसी! बबूल की है बाग से रस्साकसी!! तैरता है हवा में स�
मौसम अनमना
अविनाश ब्यौहार
पूष को सूर्य किरण रही है बुहार! जाड़े में हैं जम गईं रातें! कंबल ऊनी शाल के नाते! बाग़ में मँडराते अलि की गुहार!
पुलवामा के अमर शहीद
सुषमा दीक्षित शुक्ला
पुलवामा के अमर शहीदों, तुमको भुला नहीं सकते। त्याग और बलिदान तुम्हारा, उसको भुला नहीं सकते। वैलेंटाइन डे के दिन
फूल मुस्कुराते हैं
डॉ॰ कुमार विनोद
मुस्कुराने के लिए ज़रूरी नहीं पूरी तरह विज्ञापन में उतर जाना इन्सान के लिए तनाव रहित मस्तिष्क और पेट में अनाज का �
हम इनसान हैं...
मंगलेश डबराल
हम इनसान हैं, मैं चाहता हूँ इस वाक्य की सचाई बची रहे।
सोने से पहले
मंगलेश डबराल
सोने से पहले मैं सुबह के अख़बार समेटता हूँ दिन भर की सुर्ख़ियाँ परे खिसका देता हूँ मैं अत्याचारी तारीख़ों और हत्�
प्रभाती
रामधारी सिंह 'दिनकर'
रे प्रवासी, जाग, तेरे देश का संवाद आया। (1) भेदमय संदेश सुन पुलकित खगों ने चंचु खोली; प्रेम से झुक-झुक प्रणति में प
संत रविदास जी
सुधीर श्रीवास्तव
माघ मास की पूर्णिमा को रविवार के दिन जन्में प्रसिद्ध प्रमुख संतों में एक संत रविदास जी का जन्म काल विभिन्न विद्वान
मस्जिद सों कुछ घिन नहीं
रैदास
मस्जिद सों कुछ घिन नहीं, मंदिर सों नहीं पिआर। दोए मंह अल्लाह राम नहीं, कहै रैदास चमार।।
रैदास प्रेम नहिं छिप सकई
रैदास
रैदास प्रेम नहिं छिप सकई, लाख छिपाए कोय।। प्रेम न मुख खोलै कभऊँ, नैन देत हैं रोय।।
जनम जात मत पूछिए
रैदास
जनम जात मत पूछिए, का जात अरू पात। रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहिं जात कुजात।।
ब्राह्मन कोय न होय
रैदास
ऊँचे कुल के कारणै, ब्राह्मन कोय न होय। जउ जानहि ब्रह्म आत्मा, रैदास कहि ब्राह्मन सोय।।
पीआ राम रसु पीआ रे
रैदास
पीआ राम रसु पीआ रे। (टेक) भरि भरि देवै सुरति कलाली, दरिआ दरिआ पीना रे। पीवतु पीवतु आपा जग भूला, हरि रस मांहि बौराना र�
अब कैसे छुटै राम रट लागी
रैदास
अब कैसे छुटै राम रट लागी। (टेक) प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग−अंग बास समानी। प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चि
प्रेम पंथ की पालकी
रैदास
प्रेम पंथ की पालकी, रैदास बैठियो आय। सांचे सामी मिलन कूं, आनंद कह्यो न जाय।।
रैदास हमारौ राम जी
रैदास
रैदास हमारौ राम जी, दशरथ करि सुत नाहिं। राम हमउ मांहि रहयो, बिसब कुटंबह माहिं।।
रैदास सोई सूरा भला
रैदास
रैदास सोई सूरा भला, जो लरै धरम के हेत। अंग−अंग कटि भुंइ गिरै, तउ न छाड़ै खेत।।
संत शिरोमणि रविदास महाराज
गणपत लाल उदय
सन्त शिरोमणि कहलाएँ महाराज रविदास, कोने-कोने में जानें जाते रविदा नाम रैदास। रोहिदास रेमदास रुइदास रौदास रायादा
संत रविदास
सीमा 'वर्णिका'
माघ पूर्णिमासी का बना दिन ख़ास, माँ कलसा पिता थे श्री संतोख दास। काशी नगर में चँहु ओर दिव्य प्रकाश, माँ कलसा के घर जन�
आदमी लगने लगा है कोई हौआ
अविनाश ब्यौहार
मंडराते खतरे ज्यों चील औ कौआ! कतर ब्योंत है आपसदारी में! पूरे मौक़े हैं रंगदारी में!! ज़हरीले नाते हैं मानो अकौआ! �
फलीभूत होती आशाएँ
अविनाश ब्यौहार
कृष्ण पक्ष का, शुक्ल पक्ष है। फलीभूत होती आशाएँ। निष्फल होती हैं कुंठाएँ।। खुला झरोखा, वही कक्ष है। भाग्य हुआ
उम्मीद पर करने लगी संवेदना हस्ताक्षर
अविनाश ब्यौहार
उम्मीद पर करने लगी संवेदना हस्ताक्षर। हैं ख़्वाब आँखों के पखेरू हो गए। विश्वास के पर्वत सुमेरू हो गए।। आशा अँगू
कालिख अँधेरों की
अविनाश ब्यौहार
चेहरे पर रातों के कालिख अँधेरों की। आँगन में उतरे हैं धूप के पखेरू। उम्र ढली उड़ जाते रूप के पखेरू।। आई याद मेड़
माँ का प्यार
दीपक झा 'राज'
रात भर जाग कर सुलाया है मुझे, अपने हाथों से खिलाया है मुझे। गिर कर संभलना, समझाया है मुझे, ज़िन्दगी को जीना, सिखाया है
हमारी ज़िंदगी
दीपक झा 'राज'
रास्ते कई हैं ज़िंदगी में, पर चलना हमे है। सपने कई हैं ज़िंदगी में, पर चुनना हमे है। मुश्किलें बहुत है ज़िंदगी में, पर
इश्क़
दीपक झा 'राज'
इश्क़ इबादत है, तो ख़ता क्या है। हमने इश्क़ किया है, बता दो की सज़ा क्या है। यूँ ही नहीं बना था ताजमहल, हमारी माशूक़ा मुमत
कोरोना का अंधकार
ब्रजेश कुमार
दुनिया में छाया कोरोना का अंधकार है, चारों दिशाओं में इसने मचाया हाहाकार है। मानव की कोई भूल या प्रकृति की मार है, �
नारी
ब्रजेश कुमार
नारी के बिना सृष्टि की रचना असंभव है,  इस से ही जग में जीवन का उद्भव है। प्रकृति के कण-कण में है नारी का अंश, फिर भी क�
ग़रीब आदमी हूँ
आशीष कुमार
ग़रीब आदमी हूँ, मयस्सर नहीं सूखी रोटी भी जो मिलता है हलक में डाल लेता हूँ। जी तोड़ मेहनत करता हूँ, पूरे परिवार का बोझ
छत्रपति वीर शिवाजी
गणपत लाल उदय
पूरी ज़िन्दगी करता रहा वह संघर्ष वीर मराठा, नाम था जिसका छत्रपति शिवाजी महाराजा। महान उनको बनानें में समर्थ रामद�
फ़ौजी की आत्मकथा
रतन कुमार अगरवाला
मैं हूँ फ़ौजी भारत का, देश पर मर मिटने का है अरमान, राष्ट्र सुरक्षा ही मेरा प्रण है, यही है मेरी पहली पहचान। चाहे राजस�
रिश्ता दोस्ती का
दीपक झा 'राज'
सोया नही हूँ दोस्तों के लिए, कुछ लिखता हूँ, दोस्तों के लिए। यूँ तो ग़मज़दा है ज़िंदगी, पर रोया नही हूँ दोस्तों के लिए।
मौसम रंगीन हो गया
अविनाश ब्यौहार
सूरज ने धूप से कहा मौसम रंगीन हो गया। अब चलने लगी हैं चुलबुली हवाएँ। आपस में पेड़ जाने क्या बतियाएँ।। मधुप जो ह
नारी की समाज में नारायणी भूमिका
सुधीर श्रीवास्तव
सृष्टि निर्माण और उसके अबाध संचालन के केंद्र में नारी है, ईश्वर के बाद सांसारिक धुरी नारी ही है। नारी सिर्फ़ सृजक भर
चुक गया दिन
अज्ञेय
‘चुक गया दिन’—एक लंबी साँस उठी, बनने मूक आशीर्वाद— सामने था आर्द्र तारा नील, उमड़ आई असह तेरी याद! हाय, यह प्रतिदि�
साहित्य तुम्हारी तुम्हीं से...
अज्ञेय
साहित्य तुम्हारी तुम्हीं से पहचान और गहरी करता है।
क्या सोच रहे हो?
अज्ञेय
अकेले बैठना, चुप बैठना— इस प्रश्न की चिंता से मुक्त होकर बैठना कि ‘क्या सोच रहे हो?’—यह भी एक सुख है।
काँपती है
अज्ञेय
पहाड़ नहीं काँपता, न पेड़, न तराई, काँपती है ढाल पर के घर से नीचे झील पर झरी दिए की लौ की नन्ही परछाईं।
सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान
अज्ञेय
हे महाबुद्ध! मैं मंदिर में आई हूँ रीते हाथ : फूल मैं ला न सकी। औरों का संग्रह तेरे योग्य न होता। जो मुझे सुनाती
सोन-मछली
अज्ञेय
हम निहारते रूप, काँच के पीछे हाँप रही है मछली। रूप-तृषा भी (और काँच के पीछे) है जिजीविषा।
मैं जी गया
विनय विश्वा
आज जीने का आधार मिल गया कल तक भटकता-फिरता था आज जीवन के साथ चलने का ईनाम मिल गया एक नन्हा बीज मिल गया। कितना स्वार्
बसन्त की श्रुति
विनय विश्वा
संक्रमण का दौर बड़ा ख़तरनाक होता है, पर एक संक्रमण ऐसा हैं जो जीवन-रंग में बहार-गुबार भर देता हैं। धरती धारण करती है�
सफ़र
दीपक झा 'राज'
चल पड़े तन्हा सफ़र पर, मंज़िल का नहीं ठिकाना है। बीच भँवर में नाव फँसी है, पास नहीं किनारा है। कहाँ जाए, हम किसे बुलाए,
रिश्ते
दीपक झा 'राज'
कैसे हैं ये रिश्ते, बनते और बिगड़ते रिश्ते। कभी पास तो कभी दूर, मिलने को हैं मजबूर। न जाने क्यों कुछ पूछते हैं रिश्त�
उठ हुंकार भर
मयंक द्विवेदी
कुछ पहर की ढकी सी अमावस की चाँदनी, कुछ क्षण धुँधली निस्तेज ग्रहण की दोपहरी, चन्दा, सूरज ढक पाई? देखो फिर निकल आई। दुख
छत्रपति शिवाजी
रतन कुमार अगरवाला
19 फ़रवरी सन् 1630 आज के दिन, शिवनेरी में हुआ छत्रपति का जन्म, जीजाबाई और शाह भोसले के लाल ने, मुगलों के विरुद्ध लिया प्रण�
हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
राहत इन्दौरी
हौसले ज़िंदगी के देखते हैं, चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं। नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है, ख़्वाब अगली सदी के देखते ह
वसंत के नाम पर
रामधारी सिंह 'दिनकर'
(1) प्रात जगाता शिशु वसंत को नव गुलाब दे-दे ताली; तितली बनी देव की कविता वन-वन उड़ती मतवाली। सुंदरता को जगी देखकर जी �
हौसले ज़िंदगी के देखते हैं
राहत इन्दौरी
हौसले ज़िंदगी के देखते हैं, चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं।
प्रेम सकल श्रुति-सार है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
प्रेम सकल श्रुति-सार है, प्रेम सकल स्मृति-मूल। प्रेम पुरान-प्रमाण है, कोउ न प्रेम के तूल॥
प्रेम प्रेम सब ही कहत
भारतेंदु हरिश्चंद्र
प्रेम प्रेम सब ही कहत, प्रेम न जान्यौ कोय। जो पै जानहि प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोय॥
बड़े की होत बड़ी सब बात
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बड़े की होत बड़ी सब बात। बड़ो क्रोध पुनि बड़ी दयाहू तुम मैं नाथ लखात॥ मोसे दीन हीन पै नहिं तौ काहे कुपित जनात। पै �
सखी मन-मोहन मेरे मीत
भारतेंदु हरिश्चंद्र
सखी मन-मोहन मेरे मीत। लोक वेद कुल-कानि छांड़ि हम करी उनहिं सों प्रीत॥ बिगरौ जग के कारज सगरे उलटौ सबही नीत। अब तौ ह�
बात बिनु करत पिया बदनाम
भारतेंदु हरिश्चंद्र
बात बिनु करत पिया बदनाम। कौन हेतु वह लाज हरै मम बिना बात बे-काम॥ आजु गई हौं प्रात जमुन-तट आयो तहं घनस्याम। पकरि मो�
चूरन अमल बेद का भारी
भारतेंदु हरिश्चंद्र
चूरन अमल बेद का भारी। जिस को खाते कृष्ण मुरारी॥ मेरा पाचक है पचलोना। जिसको खाता श्याम सलोना॥ चूरन बना मसालेदार�
चने जोर गरम
भारतेंदु हरिश्चंद्र
चने जोर गरम। चने बनावैं घासीराम। निज की झोली में दुकान॥ चना चुरमुर चुरमुर बोलै। बाबू खाने को मुंह खोलै॥ चना खावै
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?
भारतेंदु हरिश्चंद्र
आज बड़े आनन्द का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे आ
छत्रपति शिवाजी
सुधीर श्रीवास्तव
माता जीजाबाई पिता शाह जी के घर उन्नीस फ़रवरी, सोलह सौ तीस को शिवनेरी, महाराष्ट्र के मराठा परिवार में जन्मा था एक बाल
छत्रपति शिवाजी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
वीर शिवाजी की गाथाएँ, बचपन से सुन आए हैं। भारत के उस महापुरुष की, अनुपम शौर्य कथाएँ हैं। नैनों में जलती थी ज्वाला,
ऐ बसन्त!
सुषमा दीक्षित शुक्ला
जाने पहचाने से लगते हो, ऐ! स्वर्णिम सुंदर प्रिय बसन्त। पाषाण युगों से आज तलक, देखे हैं तुमने युग युगांत। तुम परिवर
कवि
मंगलेश डबराल
कवि को कविता के बाहर और भीतर दोनों जगह एक साथ रहने का जोखिम उठाना होता है
मैं देख रहा हूँ
अज्ञेय
मैं देख रहा हूँ झरी फूल से पँखुरी —मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते। मैं चुप हूँ : वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
आशा
प्रेमचंद
आशा निर्बलता से उत्पन्न होती है, पर उसके गर्भ से शक्ति का जन्म होता है।
इंसान बनो
अटल बिहारी वाजपेयी
इंसान बनो, केवल नाम से नहीं, रूप से नहीं, शक्ल से नहीं बल्कि हृदय से, बुद्धि से, ज्ञान से बनो।
हिम्मत करना...
अज्ञात
हिम्मत करना एक पल को खोना है, हिम्मत नहीं करना ख़ुद को खोना है।
लखि वसन्त कवि कामिनी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
खिली मंजरी माधवी, प्रमुदित वृक्ष रसाल। हिली डुली कलसी प्रिया, हरित खेत मधुशाल॥ वासन्तिक पिक गान से, मुदित प्रकृत
दुख ने मुझको
केदारनाथ अग्रवाल
दुख ने मुझको जब-जब तोड़ा, मैंने अपने टूटेपन को कविता की ममता से जोड़ा, जहाँ गिरा मैं, कविताओं ने मुझे उठाया, हम �
धूप
केदारनाथ अग्रवाल
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आई बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गई है, जैसे दो हमजोली सखि
खेत का दृश्य
केदारनाथ अग्रवाल
आसमान की ओढ़नी ओढ़े, धानी पहने फ़सल घँघरिया, राधा बन कर धरती नाची, नाचा हँसमुख कृषक सँवरिया। माती थाप हवा की पड़त
लिया-दिया तुमसे मेरा था
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
लिया-दिया तुमसे मेरा था, दुनिया सपने का डेरा था। अपने चक्कर से कुल कट गए, काम की कला से हट हट गए, छापे से तुम्हीं नि
सखि वसंत आया
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
सखि, वसंत आया। भरा हर्ष वन के मन, नवोत्कर्ष छाया। किसलय-वसना नव-वय-लतिका मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका, मधुप-वृंद �
गीत गाने दो मुझे तो
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
गीत गाने दो मुझे तो, वेदना को रोकने को। चोट खाकर राह चलते होश के भी होश छूटे, हाथ जो पाथेय थे, ठग— ठाकुरों ने रात ल�
तोड़ती पत्थर
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
वह तोड़ती पत्थर; देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर— वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्व
सच है
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
यह सच है :— तुमने जो दिया दान दान वह, हिंदी के हित का अभिमान वह, जनता का जन-ताका ज्ञान वह, सच्चा कल्याण वह अथच है— यह
बदलीं जो उनकी आँखें
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
बदलीं जो उनकी आँखें, इरादा बदल गया, गुल जैसे चमचमाया कि बुलबुल मसल गया। यह टहनी से हवा की छेड़छाड़ थी, मगर, खिलकर स�
खिलौनेवाला
सुभद्रा कुमारी चौहान
वह देखो माँ आज खिलौनेवाला फिर से आया है, कई तरह के सुंदर-सुंदर नए खिलौने लाया है। हरा-हरा तोता पिंजड़े में गेंद �
राखी की चुनौती
सुभद्रा कुमारी चौहान
बहिन आज फूली समाती न मन में। तड़ित आज फूली समाती न घन में॥ घटा है न झूली समाती गगन में। लता आज फूली समाती न बन में॥
झाँसी की रानी
सुभद्रा कुमारी चौहान
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की क़ीमत सबने �
खोई संस्कृति
रवि भूषण सिन्हा
कहाँ खो गई हमारी संस्कृति, जिसमें भरी हुई थी सभ्य-सभ्यता। जहाँ न थी पैसों की भुख, न होती थी अकेले की सुख। जहाँ कद�
मुझे याद मत करना
दीपक झा 'राज'
मेरे मरने पर तुम रोया ना करो। मैं था ही कब, मेरे जाने का अफ़सोस किया न करो। ये शरीर तो मिट्टी का ही था, इसे मिट्टी में �
नदी है उफान पर
अविनाश ब्यौहार
होने लगी झमाझम बारिश नदी है उफान पर। बिजली कड़क रही है बादल काले-काले हैं। कुछ नहीं है खंडहर में, मकड़ी के जाले है�
पराए दुख दर्द भी संलग्न हो गए
अविनाश ब्यौहार
पराए दुख दर्द भी संलग्न हो गए। कष्टों ने तिनके से घोंसला बनाया। पीड़ा का एक शहर, कोलाहल छाया।। आदमकद आईने तक भग�
बाहर कदमों की आहट
अविनाश ब्यौहार
बाहर कदमों की आहट! खुला जंगला भोर हुई! प्रेयस् हुआ हिलोर हुई!! कुत्तों की है गुर्राहट! किरण दरीचे से झाँके! धूप �
जीवन आपाधापी है
अविनाश ब्यौहार
जीवन आपाधापी है! अलापेंगे अपनी राग! हुई व्यर्थ की दौड़ भाग!! वैभवशाली पापी है! चुप अख़बारों की सुर्खी! ख़ुशियों क
ग़रीबी
रतन कुमार अगरवाला
बातें करते ग़रीबी की, खुद बैठकर महलों के अंदर, कभी तो घूमो ग़रीब की बस्ती में, देखो उनकी गुज़र बसर। मोहताज़ है वह एक एक रो
अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
गणपत लाल उदय
मानव जीवन में भाषा का है बड़ा ही महत्व, २१ फ़रवरी को मनाते जिसका हम उत्सव। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस होता इस रोज़
गुरु और चेला
सोहन लाल द्विवेदी
गुरु एक थे और था एक चेला, चले घूमने पास में था न धेला। चले चलते-चलते मिली एक नगरी, चमाचम थी सड़कें चमाचम थी डगरी। म�
मातृभूमि
सोहन लाल द्विवेदी
ऊँचा खड़ा हिमालय आकाश चूमता है, नीचे चरण तले झुक, नित सिंधु झूमता है। गंगा यमुन त्रिवेणी नदियाँ लहर रही हैं, जग�
एक जुट तेरे क़बीले हो गए
मनजीत भोला
एक जुट तेरे क़बीले हो गए, आज क्यों पत्थर लचीले हो गए। खेलकर आए हो होली ख़ून से, यार तुम कितने रँगीले हो गए। आइनों को त
फूलते पलाश
अविनाश ब्यौहार
फूलते पलाश! चैती हवा! अक्षत जवा!! हर्षित आकाश! पकते बेर! फ़सलें हेर!! चमकता उजास! झूमते वन! उमंगी तन!! अंकुरित हु�
ट्रेन का तन्हा सफ़र
दीपक झा 'राज'
तन्हा इस सफ़र में, तुम्हारी याद आती है। जो आँखे बंद कर लूँ तो, तुम्हारी तस्वीर आती है। वो तुम्हारा मुस्कुरा कर, ज़�
रंगों का त्यौहार
गणपत लाल उदय
लो आया फिर रंगों का त्यौहार, गीत ख़ुशी के सब गावो मल्हार। पक्के रंगों से होली नहीं खेलना, गुलाल लगाकर मनाना त्यौहा�
सौंदर्य
रतन कुमार अगरवाला
आज सहसा ही मन में ख़्याल आया कि विषय “सौंदर्य” पर कुछ जानकारी प्रद लिखने की कोशिश करूँ। हिन्दी व्याकरण के अनुसार “स�
शिव स्तुति
रवि भूषण सिन्हा
बम बम बम बोले हम, हे बाबा भोलेनाथ, हे जटाधारी नाथ‌। डम डम डम तेरी डमरू बाजे, भक्तों की है यही पुकार। हे बाबा भोलेना�
हे! नारी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हे! नारी तुम तो हो सब पर भारी। तुम अनुपम हो सबसे न्यारी। तुम कुछ भी व्यर्थ नहीं होने देती, सहेजती हो संभालती हो, ढक�
पिया बिसराये
सुषमा दीक्षित शुक्ला
अब ना सखी मोहे फागुन सुहाए, अब तो सखी मोहे पिया बिसराये, अब तो सखी मोहे पिया बिसराये। अब नहीं करते पिया मीठी बतिया
प्रतिभा
संतोष ताकर 'खाखी'
ख़ुद को आईने में देखकर बताया कर, तू क्या चीज़ है अहसास जताया कर। मिट्टी की बनी सिर्फ़ एक मूरत नहीं हैं तू, प्रतिभा भरी �
परिवर्तन जीवन कला
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सबको शुभ प्रातर्नमन, मंगल हो शुभकाम। हर्षित पौरुष जन धरा, भक्ति प्रीति हरि नाम॥ हरित ललित कुसुमित प्रकृति, निर्म�
अच्छे नसीब
संतोष ताकर 'खाखी'
मैं समझती हूँ सारी मजबूरियों को, मैंने देखा है क़रीब से बढ़ती दूरियों को, मुश्किलों के वक्त में भी मैंने ख़ुशियाँ बा
हिन्द की आवाज़
दीपक झा 'राज'
जाग उठा है हिंदुस्तान, कश्मीर उन्हें हम नहीं देंगे। अगर घुसने की कोशिश की, तो चीर तुम्हे अब हम देंगे। सारा देश अब �
फगुनाई ठौर है
अविनाश ब्यौहार
फागुन के रंगों में एक रंग और है! रंग है मधुमास का! हताशा में आस का!! उड़ती हवाइयों में, रंग है परिहास का!! गंध का हि
ज्योति भारत
सुमित्रानंदन पंत
ज्योति भूमि, जय भारत देश! ज्योति चरण धर जहाँ सभ्यता उतरी तेजोन्मेष! समाधिस्थ सौंदर्य हिमालय, श्वेत शांति आत्मा
जन्मभूमि
सुमित्रानंदन पंत
जननी जन्मभूमि प्रिय अपनी, जो स्वर्गादपि चिर गरीयसी! जिसका गौरव भाल हिमाचल, स्वर्ण धरा हँसती चिर श्यामल, ज्योति ग
यथार्थ का दर्पण जिस प्रकार...
सुमित्रानंदन पंत
यथार्थ का दर्पण जिस प्रकार जगत की बाह्य परिस्थितियाँ हैं, उसी प्रकार आदर्श का दर्पण मनुष्य के भीतर का मन है।
हिमालय
रामधारी सिंह 'दिनकर'
मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्, पौरुष के पुंजीभूत ज्वाला! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के द�
पुलवामा के शहीद
अविनाश ब्यौहार
पुलवामा के शहीद थे देश की आँख के तारे! चमनबंदी, पल्लवन है लगन! आँसू करते हैं शत शत नमन!! सिर पर कफ़न हमेशा बाँधे लगत
सभ्यता की प्राचीर
विनय विश्वा
दो देश नहीं लड़ते दो विचार नहीं लड़ते लड़ते हैं दो जज़्बात जो जज नहीं करते अपनी ही बात। लड़ना ही है तो लड़ो अपनी अह्म, ईर
चन्द्रशेखर आज़ाद
गणपत लाल उदय
लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रशेखर थे आज़ाद, महान क्रांतिकारियों में एक चंद्रशेखर है आज़ाद। देश के प्रति अट
महानायक श्री चन्द्रशेखर आज़ाद
सुषमा दीक्षित शुक्ला
वह मातृभूमि के अमर लाल, भारत माँ के सच्चे सपूत। आज़ाद चन्द्रशेखर महान, युग पुरुष कहूँ या देवदूत। भारत माता भी गर�
वीर जवान
दीपक झा 'राज'
इस पार खड़ा तैयार खड़ा, शत्रु तेरे द्वार खड़ा। आने दे घुसपैठी को, लहू में उफान लिए हूँ खड़ा। चैन से वो सो सके, बिना नीं�
मानव जीवन
दीपक झा 'राज'
कौन हैं हम, क्यों हैं हम? इसका जवाब ढूँढ़ते हैं हम। जैसा देखते हैं हम, जैसा सोचते हो तुम। वही हूँ मैं और वही हो तुम।
प्रेमवृष्टि
दीपक झा 'राज'
आज धरा सौंधी हो गई, रिमझिम सी बौछार हो गई। नव अंकुर का जन्म हुआ, प्रेम युगल में संधि हो गई। संग में जो पवन चली, मन म
अधूरापन
सुधीर श्रीवास्तव
जीवन में अधूरापन हमेशा ही रहता है, मिलता रहे चाहे जितना मगर अधूरा ही लगता है। क्यों हमें संतोष जो नहीं होते कभी �
मैं भारतीय हूँ
सुधीर श्रीवास्तव
हाँ मैं भारतीय हूँ भारत की मिट्टी में जन्मा पला बढ़ा जवान हुआ, भारत की मिट्टी हमें सुहाती है धर्म संस्कृति सभ्यता
ठान लो तुम लक्ष्य कोई
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
छोड़कर सारे बहाने, स्वप्न को दे दो उड़ाने। ठान लो तुम लक्ष्य कोई, पथ नहीं दुष्कर लगेगा। कर्म पर रहना अडिग बस, व्यर्थ
दायित्व
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
है नहीं आसान, घर दायित्व, निज सिर पर उठाना। सच कहूँ! मुश्किल बहुत दो, वक्त की रोटी चलाना।। ख़र्च हम करते रहे अब, तक प�
समय की क़ीमत जानो
समय सिंह जौल
इसको मत बर्बाद करो, सदा समय पर काम करो। समय पर सोना, समय पर जागना, समय पर खाना, समय पर खेलना, आज का काम न टालना॥ सम�
महाशिवरात्रि
रतन कुमार अगरवाला
जटा में जिनके बसती माँ गंगा, गले में रहते शेषनाग, शिव का आशीर्वाद जिसे भी मिलता, उसके बड़े ही भाग। अनाथों के कहलातें �
बम बम भोले
सुषमा दीक्षित शुक्ला
डम डम डम डम डमरू बोले, हे! बम भोले बम बम भोले। जय महाकाल जय प्रलयंकर, जय नीलकंठ जय जय शंकर। तुम रोम-रोम के बासी हो, तु
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
बशीर बद्र
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया, जिस को गले लगा लिया वो दूर हो गया। काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के, दीवा�
देवों के देव महादेव
गणपत लाल उदय
दर्शन तो करके ही जाएँगे चाहे बाधाएँ हो कहीं, टूटकर बिखरना तो हमने कभी सीखा ही नहीं। भोले को पाने के लिए शोले का रास्
शिव गौरा परिणय शुभ पावन
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
महा शिव शंकर त्रिभुवनेश्वर, द्वादश ज्योतिर्लिंगराज रे। रामेश्वर नव पीत वसन सज, चले शैलेश्वर हिमराज रे। विश्व�
चिराग़ और शमा
दीपक झा 'राज'
चिराग़ की लौ बुझने लगी, अँधेरा अपना ख़ौफ़ फैलाने लगी। तभी दूर एक शमा जली, कौन था, क्या पता चला। यह जीवन है, उसकी ही कहा
रफ़्तार
सुधीर श्रीवास्तव
जीवन में रफ़्तार बहुत मायने रखती है, कभी कम, कभी बहुत कम तो कभी ज़्यादा और ज़्यादा पर रफ़्तार पर नियंत्रण सबसे ज़्यादा ज़
रोज़ यूँ तो ज़िन्दगी मिलती रही
मनजीत भोला
रोज़ यूँ तो ज़िन्दगी मिलती रही, साथ लेकिन बेबसी मिलती रही। चाँद सूरज तो रहे बस ख़ाब में, असलियत में तीरगी मिलती रही।
रंगों में डूब गई होली
अविनाश ब्यौहार
रंगों में डूब गई होली! हवाओं में उड़ रहा गुलाल! रंगोत्सव में धुलता मलाल!! नशीली-नशीली है बोली! फूले टेसू फूले कन�
मन विजय
मयंक द्विवेदी
सीमाएँ क्या होती है? असीमित बन बहना होगा। अनन्त है तेरी परिभाषाएँ, प्रबल है तेरी अभिलाषाएँ, कदम सुदृढता से रखना हो
संकल्प
मयंक द्विवेदी
नव वर्ष के प्रांगण में संकल्पों के बंधन में बंधनें को क्या तैयार हो? लड़ने को क्या तैयार हो? कोरी-कोरी बातों से, थो�
बेमौल माज़ी
कर्मवीर 'बुडाना'
शामों की सुर्ख़ फ़ज़ाओं में तुझसे मुख़ातिब हुआ कभी, माहताब ने भी तिरे दूधिया अक्स को उतरने दिया कभी। शबे-पहर तन्हाई ने
कोई बात दबी हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
तेरे नूरानी बदन पे कसक कोई सजी हैं, तुझसे मिलकर कह दूँ होठों में कोई बात दबी हैं। मिन्नतें तमाम अज़ीज़ों की मेरे स�
श्री चित्रगुप्त भगवान स्तुति
रवि भूषण सिन्हा
हे लेखनी-मसि भाजन भगवन, हे धर्मराज भगवन। तुझको पीताम्बर अर्पण, तुझको पुष्प माला अर्पण। हे श्री चित्रगुप्त भगवान
ये तो नहीं कि ग़म नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ये तो नहीं कि ग़म नहीं, हाँ मिरी आँख नम नहीं। नश्शा सँभाले है मुझे, बहके हुए क़दम नहीं। कहते हो दहर को भरम, मुझ को
जीवन में साहित्य ज़रूरी
अजय कुमार 'अजेय'
जीवन में साहित्य ज़रूरी, वैविध्यता के साथ ज़रूरी। सतत एकरस लेखन से, ज्ञान-विकास में आती दूरी।। बीज अंकुरित करती धर�
तू ख़ुद में प्रेम बन जा
संतोष ताकर 'खाखी'
मन में हैं जो पाले तू, मन से मन में भर जा तू, क्यों कहता है पल-पल प्यार है उससे इसके मायने ज़्यादा है कुछ ख़ास नहीं यहाँ
तू तो सब समझता है ऐ मेरे मौला
शमा परवीन
तू तो सब समझता है ऐ मेरे मौला, दिल नही मानता है ऐ मेरे मौला। आती है याद दोस्ती हमे यूँ ही, मन मेरा हारता है ऐ मेरे मौल�
भोर हुई
अविनाश ब्यौहार
पूरब में दिनकर मुस्काया, भोर हुई! आँगन में गौरइया चहकी! चलती हुई हवा है महकी!! खेतों ने हल गले लगाया, भोर हुई! पग�
जीवन का सच
दीपक झा 'राज'
जीना है तो इस पल में जी लो, कल का नहीं भरोसा है। ग़म सहकर जो ख़ुशियाँ ली है, किसने उसको देखा है। कल क्या होगा नहीं पता, �
नील कण्ठ सुनते सबकी पुकार
गणपत लाल उदय
भोले बाबा के दरबार दर्शन को आतें अनेंक नर नार, जटा से बहे गंगा की धार महिमा आपकी अपरंपार। नीलकण्ठ सुनते सबकी पुकार �
शायरी का मक़सद
फ़िराक़ गोरखपुरी
शायरी का मक़सद हम जो कुछ भी समझें उसका हक़ीक़ी मक़सद बुलंद-तरीन विजदानी कैफ़ियात और जमालियाती शुऊर पैदा करने के अलावा क�
किताबों की दुनिया
फ़िराक़ गोरखपुरी
किताबों की दुनिया मुर्दों और ज़िंदों दोनों के बीच की दुनिया है।
आधी रात
फ़िराक़ गोरखपुरी
1 सियाह पेड़ हैं अब आप अपनी परछाईं ज़मीं से ता-मह-ओ-अंजुम सुकूत के मीनार जिधर निगाह करें इक अथाह गुम-शुदगी इक एक कर
स्त्रियों आपको वंदन हमारा
गणपत लाल उदय
समस्त स्त्रियों आपको वंदन है हमारा, गाँव और शहर आपसे लगता प्यारा। मंगलकारी होता घर आगमन तुम्हारा, महकता हर घर होत�
नारी एक ज्वाला
सुधीर श्रीवास्तव
ममता की मूर्ति नारी सृष्टि क्रम को गतिमान रखती नारी ममता, दया करुणा की प्रतिमूर्ति त्याग की देवी नारी, स्व को भूल �
त्राहिमाम
अजय कुमार 'अजेय'
तुम हो जग के पालनहारे। ब्रहां, विष्णु, महेश हमारे।। हे आपदा प्रबंध प्यारे। सबहु तेरी कृपा सहारे।। सूनी सड़क गली च�
अशांति का सबब
रवि भूषण सिन्हा
जानता है सब जग में, शांति ही सुख का कारक है, अहम भरी सोच ही, विध्वंसकारी युद्ध का विचारक है। जियो और जीने दो का सच, हम �
महाविनाश
अविनाश ब्यौहार
उस देश के माथे पर है लिखा हुआ महाविनाश। बम-मिसाइलों से भू-भाग उठा थर्रा। मृतप्राय हुआ जमीन का जर्रा-जर्रा।। समय
स्वागतम् ऋतुराज का
अविनाश ब्यौहार
ठंड की ऋतु का अवसान हो गया। सर्द हवा, कुहरा है। जाड़ा तो दुहरा है।। बस कुछ दिन का मेहमान हो गया। स्वागतम् ऋतुरा
ये भरी आँखें तुम्हारी
कुँअर बेचैन
जागती हैं रात भर क्यों ये भरी आँखें तुम्हारी! क्या कहीं दिन में तड़पता स्वप्न देखा सुई जैसी चुभ गई क्या हस्त-र�
मैं अभी तक भी नदी हूँ
कुँअर बेचैन
मैं अभी तक भी नदी हूँ धूप ने मुझको जलाया धूल फेंकी आँधियों ने कूल ने आँखें तरेरीं आग दी भरकर दियों ने चीर, खिंचक
गीत के जितने कफ़न हैं
कुँअर बेचैन
ज़िंदगी की लाश ढकने के लिए गीत के जितने कफ़न हैं हैं बहुत छोटे रात की प्रतिमा सुधाकर ने छूई पीर ये फिर से सिता
कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ
कुँअर बेचैन
कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ, तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ। चारों तरफ़ हवाओं में उस की महक तो है, मुरझ�
गगन में जब अपना सितारा न देखा
कुँअर बेचैन
गगन में जब अपना सितारा न देखा, तो जीने का कोई सहारा न देखा। नज़र है, मगर वो नज़र क्या कि जिस ने, ख़ुद अपनी नज़र का नज�
बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो
कुँअर बेचैन
बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो, बस एक तुम पे नज़र है हमारे साथ रहो। हम आज ऐसे किसी ज़िंदगी के मोड़ पे हैं, न कोई रा�
बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो
कुँअर बेचैन
बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो, बस एक तुम पे नज़र है हमारे साथ रहो।
काल्पनिक समाज
अविनाश ब्यौहार
सारी कालोनी के लोग यह जानते थे कि वह परिवार बहुत ही सुसभ्य और सुसंस्कृत है। यह सब देखकर उनके परिवार के प्रति मेरी ज�
ये ऐसा क्यूँ होता है?
सुषमा दीक्षित शुक्ला
ये ऐसा क्यूँ होता है! यादों के बक्से में, बन्द हो जाता है, हर रोज़ एक नया दिन! पल हर पल कुछ न कुछ, बस यूँ ही आस पास! ख़्वाब�
धूम धड़ाका होली में
सुषमा दीक्षित शुक्ला
धूम धड़ाका भँग चढ़ेगी, होली में फिर भइया। जीजा साली देवर भौजी, करेंगे ता ता थइया। मोटू पतलू लंबू छोटू, सब झूमेंगे र�
अग्नि देश से आता हूँ मैं
हरिवंश राय बच्चन
अग्नि देश से आता हूँ मैं! झुलस गया तन, झुलस गया मन, झुलस गया कवि-कोमल जीवन, किंतु अग्नि वीणा पर अपने दग्ध कंठ से गात�
चाँदनी फैली गगन में
हरिवंश राय बच्चन
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में। दिवस में सबके लिए बस एक जग है, रात में हर एक की दुनिया अलग है, कल्पना करने लगी अब र�
मेरी क़ीमत घटाती जा रही हो
प्रशान्त 'अरहत'
मेरी क़ीमत घटाती जा रही हो, मुझे अपना बनाती जा रही हो। तुम्हें मैं चाहता था भूल जाना, मग़र अब याद आती जा रही हो। नहीं
अटूट बंधन
अविनाश ब्यौहार
पति-पत्नी का रिश्ता सामंजस्य की डोर से बंधा होता है। उनमें अक्सर तूँ-तूँ मैं-मैं, नोंक-झोंक होती थी। लगता था सारा पा�
युद्ध
रतन कुमार अगरवाला
दाँव पर लग रही मानवता, युद्ध का हुआ आग़ाज़, बमों और मिसाइलों के बीच, आत्मा करें करुण आवाज़। परिवार उजड़ रहे, बच्चे बिलख र�
भारति जय विजयकरे
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
भारति, जय, विजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे! लंका पदतल शतदल गर्जितोर्मि सागर-जल, धोता शुचि चरण युगल स्तव कर बहु-अर्थ-भरे�
ग्राम श्री
सुमित्रानंदन पंत
फैली खेतों में दूर तलक मखमल की कोमल हरियाली, लिपटीं जिससे रवि की किरणें चाँदी की सी उजली जाली! तिनकों के हरे-हरे त
व्यथित हृदय
सुभद्रा कुमारी चौहान
व्यथित है मेरा हृदय-प्रदेश चलूँ उसको बहलाऊँ आज। बताकर अपना दुख-सुख उसे हृदय का भार हटाऊँ आज॥ चलूँ माँ के पद-पंकज
दोस्तों को आज़माना सीख ले
अविनाश ब्यौहार
दोस्तों को आज़माना सीख ले, ख़्वाब में है घर बनाना सीख ले। ये पराया सा शहर है भाइयो, इस शहर में आबदाना सीख ले। ज़िंदगी �
झूठे हैं सब लोग यहाँ
अविनाश ब्यौहार
झूठे हैं सब लोग यहाँ दुनिया भी ये झूठी है। मछली सागर की अभी गहराई नाप रही। हाईवे को देखकर पगडंडी काँप रही।। पहनी
हम जान गए साधो दरबार सियासी है
मनजीत भोला
हम जान गए साधो दरबार सियासी है, बातें तो अदब की हैं किरदार सियासी है। इक नर्सरी वाले ने हमको ये बताया था, कुछ पौध है�
पतझड़ देते है संदेशे
डॉ॰ कुमार विनोद
रंग गुलालों के मौसम ने ढेरों ख़ुशियाँ लाई है। पतझड़ देते है संदेशे फागुन की ऋतु आई है।। पेड़ों पर पत्तों के किसलय को�
रंगों का त्योहार
विपिन दिलवरिया
रंग-बिरंगे रंग है, रंगों का त्योहार। घर में लाता है ख़ुशी, होली का त्योहार॥ होली का त्योहार है, रंग प्यार के संग। चल�
होली आई रे
रतन कुमार अगरवाला
होली आई रे बरसाने वालों, देखो रंग बिरंगी होली आई, लेकर रंग बिरंगी पिचकारियाँ देखो, होली की मस्ती छाई। उड़ रहे रंग आसम
होली के सातों रंग जीवन में बिखर जाएँ
अविनाश ब्यौहार
हैं टेसू, सेमल और आम निखर-निखर जाएँ। डूब गया ख़ुद में तन्हा है महानगर। लोगों की पीड़ा की मिलती नहीं ख़बर।। होली के �
होली की आई बहार
राम प्रसाद आर्य
चली फागुन की मन्द-मन्द फुहार, कि होली की आई बहार। भीगे प्रेम-रस बाल, बृद्ध नर-नार, कि होली की आई बहार।। कान्हा धरे अ�
रंगमयी झाँकी में रंग-पंचमी मनातें
गणपत लाल उदय
आओं मिलकर हम-सब खेलें रंगों से ये होली, फाल्गुन के महिनें में ‌करें आओं हम ठिठोली। भर भरकर‌ मुट्ठी गुलाल फेंक रही द�
आमंत्रण
रामचंद्र शुक्ल
दृग के प्रतिरूप सरोज हमारे उन्हें ज्याति जगाती जहाँ। बल बीच कलंब-करबित कूल से दूर छटा छहराती जहाँ। घन अंजनवर्ण ख�
कोई सागर नहीं
भवानी प्रसाद मिश्र
कोई सागर नहीं है अकेलापन न वन है एक मन है अकेलापन जिसे समझा जा सकता है आर-पार जाया जा सकता है जिसके दिन में सौ बा�
गीत-फ़रोश
भवानी प्रसाद मिश्र
जी हाँ हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूँ, मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ, मैं क़िसिम-क़िसिम के गीत बेचता हूँ! जी, माल देखिए, दा�
कविता क्या है?
रतन कुमार अगरवाला
कविता क्या है? समाज का एक दर्पण कविता, मन में उद्वेलित हो रहे भावों का शाब्दिक अर्पण कविता। साहित्य को समृद्ध करती �
राधा कृष्ण की होली
आशीष कुमार
फागुन महीना है मस्त मस्त आला, निकला है रंगने गोकुल का ग्वाला। हाथों में उसके कनक पिचकारी, जाएगी बच के कहाँ बृजबाला�
प्यारी क़िस्मत
ममता शर्मा 'अंचल'
अहा! अहा! क्या प्यारी क़िस्मत, जागी ख़ूब हमारी क़िस्मत। मिली मुहब्बत उनकी जब से, लगती है सुखकारी क़िस्मत। महक कहाँ है
सिपाही
रमेश चंद्र बाजपेयी
हमें गर्व है, उन वीर सपूतों पर, जो माँ की ममता पिता का प्यार, घर का मोह छोड़, फ़ौज में जाते है। हमें स्वाभीमान है, वीर �
जिस्म को चादर बनाया ही नहीं
प्रशान्त 'अरहत'
जिस्म को चादर बनाया ही नहीं, रात भर दीपक बुझाया ही नहीं। ज़िंदगी में जो सिखाया वक़्त ने, वो किताबों ने सिखाया ही नहीं
अमर शहीद
सुषमा दीक्षित शुक्ला
भारत माता के अमर लाल, भारत माँ के सच्चे सपूत। सुखदेव, राजगुरु, भगत सिंह युग पुरुष कहूँ या देवदूत। भारत माता भी गर्
शहीद भगत सिंह
गणपत लाल उदय
आज़ादी के मतवाले ऐसे भगत पर हमें है नाज़, कृतज्ञ राष्ट्र कर रहा शहीद सेनानी तुमको याद। रोगंटे खड़े कर दे ऐसे विचारो�
मैं कौन हूँ?
सीमा 'वर्णिका'
मैं कौन हूँ? एक अनुत्तरित प्रश्न सदा से, क्या मैं हूँ... चर्म आवरित एक अस्तित्व मात्र, या हूँ मैं... प्रभुता अस्मिता
शहादत
रतन कुमार अगरवाला
आ गया तेईस मार्च का दिन, कूच करने की आई घड़ी, देख देख माँ भारती की हालत, भगत के मन में बोझिलता बढ़ी। साँसे रुद्ध हो रही, भ
वासंती गहने
अविनाश ब्यौहार
अमराई ने पहने वासंती गहने। महुआरी ले रही बलैयाँ। चम्पा सी महकी हैं छैयाँ। पुरवाई बार बार दे रही उलहने। टेसु श
सशंकित-चित्त
प्रवीन 'पथिक'
चिर परिचित दो आँखें, मुझे अपनी ओर बुलाती हैं। पास जाता तो, छुप जाती अँधेरी दीवारों के बीच। एक आहट, जिन्हे रोज़ महसूस
समता की अधिकारी 'नारी'
आशीष कुमार
लड़ रही लड़ाई अपनी गर्भ से ही अस्तित्व की पहचान की घर से लेकर बाहर तक हर एक मुद्दे पर ख़ुद को स्थापित की है अपनी मेह�
कुल्हाड़ी
आशीष कुमार
तीखे नैन नक्श उसके जैसे तीखी कटारी रुक-रुक कर वार करती तीव्र प्रचंड भारी असह्य वेदना सह रहा विशाल वृक्ष काट रही ह�
न बुझी आग की गाँठ
केदारनाथ अग्रवाल
न बुझी आग की गाँठ है सूरज : हरेक को दे रहा रोशनी— हरेक के लिए जल रहा— ढल रहा— रोज़ सुबह निकल रहा- देश और काल को बदल र
होली का हुड़दंग
सुधीर श्रीवास्तव
आइए होली का स्वागत करते हैं ख़ूब हुड़दंग करते हैं, रंग अबीर गुलाल उडा़ते हैं, मौक़े का फ़ायदा उठाते हैं रंग की आड़ मेंं त
भावों संग होली के रंग
सुधीर श्रीवास्तव
होली रंगों का त्योहार है आपस में मिलने जुलने शिकवा शिकायतें मिटाने का गुझियों संग मिठास बाँटने का ख़ूबसुरत होली त
जब जिसने है अपकार किया
अविनाश ब्यौहार
जब जिसने है अपकार किया, कुछ भी हो अंगीकार किया। थोड़ी सी राहत माँगी थी, पर उनने है इंकार किया। युद्ध अगर हल ही होग�
कविता
अजय कुमार 'अजेय'
कविता मुहब्बत की ज़ुबान है। कविता बलिदान शौर्य गान है।। घृणा उकसावे से दूर, मानवता से भरपूर, साहित्य की यह सच पहचा�
सोने की एक लता तुलसी बन
केशव
सोने की एक लता तुलसी बन क्यौं करणों सु न बुद्धि सकै छ्वै। केशवदास मनोज मनोहर ताहि फले फल श्रीफल से ब्बै॥ फूलि सरोज
चरण धरत चिंता करत
केशव
चरण धरत चिंता करत, नींद न भावत शोर। सुबरण को सोधत फिरत, कवि व्यभिचारी चोर॥
जो कहौं केशव सोम सरोज
केशव
जो कहौं केशव सोम सरोज सुधासुर भृंगन देह दहे हैं। दाड़िम के फल शेफलि विद्रुप हाटक कोटिक कष्ट सहे हैं॥ कोक, कपोत, कर�
पानी को क्या सूझी
भवानी प्रसाद मिश्र
मैं उस दिन नदी के किनारे पर गया तो क्या जाने पानी को क्या सूझी पानी ने मुझे बूँद-बूँद पी लिया और मैं पिया जाकर प�
चल हंसा वा देस
कबीर
चल हंसा वा देस जहँ पिया बसै चितचोर। सुरत सोहासिन है पनिहारेन, भरै टाढ़ बिन डारे॥ वहि देसवाँ बादर ना उमड़ै रिमझिम ब
चंदा जनि उग आजुक राति
विद्यापति
चंदा जनि उग आजुक राति। पियाके लिखिअ पठाओब पाति॥ साओन सएँ हम करब पिरीति। जत अभिमत अभिसारक रीति॥ अथरा राहु बुझाए�
पीन पयोधर दूबरि गता
विद्यापति
पीन पयोधर दूबरि गता। मेरु उपजल कनक लता॥ ए कान्ह ए कान्ह तोरि दोहाई। अति अपरुब देखलि राई॥ मुख मनोहर अधर रंगे। फु�
सज़ा
अविनाश ब्यौहार
उसने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया। काॅल लेटर मिलने के पश्चात उसने परीक्षा मेरिट मे पास की। उसे नियुक्ति प्रमाण प
दिल के घाव कभी तो भर जाएँगे
रोहित गुस्ताख़
दिल के घाव कभी तो भर जाएँगे, पर नज़रों से लोग उतर जाएँगे। हम सच की कुटिया के बाशिंदे हैं, झूठ अगर बोले तो मर जाएँगे।
एक प्यार का बाग़ लगाया कुछ दिन पहले
ममता शर्मा 'अंचल'
एक प्यार का बाग़ लगाया कुछ दिन पहले, ख़ूब सँवारा और सजाया कुछ दिन पहले। आने लगे बहुत शैलानी रोज़ घूमने, उनमें से कुछ क�
ख़ुद से मिलने की ज़िद कर के
ममता शर्मा 'अंचल'
ख़ुद से मिलने की ज़िद कर के, बैठी हूँ नज़दीक भँवर के। आज सुकूँ से क़दम बढ़ रहे, खिलता है दिल, रोज़ निखर के। दोपहरी भी ठंडी �
कन्या भ्रुण हत्या
अभिषेक अजनबी
ना गुड़िया को मारो मैया उसको बाहर आने दो। ना पिछड़े में क़ैद करो आज़ादी दो आज़ादी दो।। आज़ादी के कारण ही कल्पना जी �
मेरी निजी ज़ुबान है, हिन्दी ही दोस्तों
शमा परवीन
मेरी निजी ज़ुबान है, हिन्दी ही दोस्तों, मेरे लिए महान है, हिन्दी ही दोस्तों। जो भी लिखूँ वही पढूँ, देखो तो ख़ासियत, हम
आँखें
रमेश चंद्र बाजपेयी
आँखें जता देती है कि तुम ख़ुश हो या हो अवसाद में। आँखों से होता है, उजागर कि तुम विनोद में रमे या हो विवाद में। आँख�
समरस जीवन सहज हो
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
अरुणिम आभा भोर की, खिले प्रगति नवयान। पौरुष परहित जन वतन, सुरभित यश मुस्कान॥ नवयौवन नव चिन्तना, नूतन नवल विहान। न�
होली आई रे
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
रंग बरसे होली फाल्गुनी बयार आई रे, सब ख़ुशियों रंगों की थाल सजाई रे। शान्ति प्रेम सौहार्द्र आपसी भेंट सजाकर लाई रे,
पापा तो पापा ही होते
गणपत लाल उदय
यह पापा तो हम सब के पापा ही होते, स्वयं से भी ज़्यादा हमारा ध्यान रखतें। ‌ हमें ज़िन्दगी जीने की यह कला बताते, कभी को
रैन भए दिन तेज छिपै अरु
गंग
रैन भए दिन तेज छिपै अरु सूर्य छिपै अति-पर्ब के छाए। देखत सिंह छिपै गजराज, सो चंद छिपै है अमावस आए। पाप छिपै हरिनाम ज
मात कहै मेरो पूत सपूत है
गंग
मात कहै मेरो पूत सपूत है, भैन कहै मेरो सुंदर भैया। तात कहै मेरो है कुलदीपक, लोक में लाज रु धीरबँधैया। नारि कहै मेरो
पान पुराना घी नया
गंग
पान पुराना घी नया, अरु कुलवंती नारि। चौथी पीठि तुरंग की, स्वर्ग निसानी चारि॥
जीवन यह पूर्ण विराम नहीं
राघवेंद्र सिंह
शून्यकाल के पुलिनों पर, जीवन थमने का नाम नहीं। जीवन हो सकता अल्पविराम, जीवन यह पूर्ण विराम नहीं।। जीवन लहरों की उ�
आज की रात बड़ी शोख़ बड़ी नटखट है
गोपालदास 'नीरज'
आज की रात बड़ी शोख़ बड़ी नटखट है आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी, आज तो तेरे ही आने का यहाँ मौसम है आज तबियत न ख़यालो�
मेरा कितना पागलपन था
गोपालदास 'नीरज'
मेरा कितना पागलपन था! मादक मधु-मदिरा के प्याले जाने कितने ही पी डाले पर ठुकराया उस प्याले को, जिससे था मधु पीना सी
जितना कम सामान रहेगा
गोपालदास 'नीरज'
जितना कम सामान रहेगा, उतना सफ़र आसान रहेगा। जितनी भारी गठरी होगी, उतना तू हैरान रहेगा। उस से मिलना ना-मुम्किन है,
अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई
गोपालदास 'नीरज'
अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई, मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई।
सितारों से उलझता जा रहा हूँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
सितारों से उलझता जा रहा हूँ, शब-ए-फ़ुर्क़त बहुत घबरा रहा हूँ। तिरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ, जहाँ को भी समझता जा रह
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे
बशीर बद्र
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे, मुक़द्दर में चलना था चलते रहे। मिरे रास्तों में उजाला रहा, दिए उस की आँखों में जलते र�
इंद्रधनुष के सात रंग
रतन कुमार अगरवाला
इंद्रधनुष के सात रंग, कराते प्रकृति से साक्षात्कार, इन्हीं सात रंगों से मिलता, जीवन के सप्तचक्रों को आकार। हरेक रं
म्हारों राजस्थान
गणपत लाल उदय
यह रंग-रंगीलो है म्हारों राजस्थान, शूरवीरा को प्यारो यह राजस्थान। 33 ज़िला रो यह म्हारों राजस्थान, क्षेत्रफल में ब�
आदमियत होने की शर्त लिखता हूँ
विनय विश्वा
मैं कविता लिखता हूँ इसलिए लोग कहते हैं कवि हूँ पर, मैं एक आदमी हूँ आदमियत होने की शर्त लिखता हूँ जहाँ पर्त खोलने क�
बेटियाँ एक पीढ़ी बनाती
विनय विश्वा
रातों की रानी ने जीवन में उजाला ला दिया ख़ुद को श्रम, संयम से साधा वो अपने हुनर का लोहा मनवा लिया। अरे ये तो लड़की है!
आई होली आई
ब्रजेश कुमार
राग है, रंग है, बज रहा मृदंग है, उल्लास है, उमंग है, मच रहा हुड़दंग है। अलमस्त मौसम ने है ली अँगड़ाई, ख़ुशियों के रंग लि
रोज़ जोश-ए-जुनूँ आए
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
रोज़ जोश-ए-जुनूँ आए, साथ बख़्त-ए-ज़बूँ आए। अब भला क्या सुकूँ आए, हाँ भला अब ये क्यूँ आए। हाल क्या है कहे क्या अब, जब क�
गुनाह तो नहीं है मोहब्बत करना
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
गुनाह तो नहीं है मोहब्बत करना, मगर हाँ जब करो इसकी अज़्मत करना। ये इश्क़ प्यार मोहब्बत जो भी बोलो, है अर्थ तो ज़माने क�
प्रेम में संघर्ष
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
1 संघर्ष प्रेम में है . . .  प्रेम की घड़ी में सेकंड . . . मिनट . . . घण्टे का नहीं― दिनों का काँटा होता है।  अभागों के लिए तो म�
वो चुपके से बोल गए
ममता शर्मा 'अंचल'
वो चुपके से बोल गए, झट मिसरी सी घोल गए। हमने जब भी सच पूछा, दे बातों में झोल गए। अबतक छुपी मुहब्बत में, करते टालमटो�
संभावनाएँ
कुँवर नारायण
लगभग मान ही चुका था मैं मृत्यु के अंतिम तर्क को कि तुम आए और कुछ इस तरह रखा फैलाकर जीवन के जादू का भोला-सा इंद्रज�
कविता के बहाने
कुँवर नारायण
कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने बाहर भीतर इस घर, उस घर कविता के पंख लगा उड
दुनिया जैसी है...
कुँवर नारायण
दुनिया जैसी है और जैसी उसे होना चाहिए के बीच कहीं वह एक लगातार बेचैनी है।
आधुनिक युग
कुँवर नारायण
आधुनिक युग हर चिंतनशील प्राणी से एक नई तरह की ज़िम्मेदारी की माँग करता है जिसका बहुत ही महत्त्वपूर्ण संबंध हमारे सो
वर वनिता
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
वर वनिता है नहीं अति कलित कुंतल वाली। भुवन-मोहिनी-काम-कामिनी-कर-प्रतिपाली। विधु-वदनी, रसभरी, सरस, सरहोरुह-नयनी। �
मौन
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
बैठ लें कुछ देर, आओ, एक पथ के पथिक-से प्रिय, अंत और अनंत के, तम-गहन-जीवन घेर। मौन मधु हो जाए भाषा मूकता की आड़ में, मन
जब मैं नहीं रहूँगा
प्रवीन 'पथिक'
जब मैं नहीं रहूँगा, रहेंगी एक अज्ञात चिंता। जो तुम्हे सताएगी; बिसरे पलों को याद दिलाएँगी; पर, वो खो जायेंगे किसी गह�
हार जीत
सुधीर श्रीवास्तव
हार हो या जीत ये है हमारी प्रीत, जैसा करें विचार वैसे ही व्यवहार। हार सिर्फ़ हार नहीं है अपना विचार भी है, जीत कोई अन
नव संवत
सुषमा दीक्षित शुक्ला
नव संवत की बेला आई, कलियों ने ओढ़ी तरुणाई। श्वासों की शाखों पर देखो, सुंदर पुष्प गुलाब खिले हैं। मादकता मधुबन में फ
कहीं फ़र्श तो कहीं रंगे मन
सुषमा दीक्षित शुक्ला
होली की वो मधुमय बेला, बीत गई कुछ छोड़ निशानी। गली मोहल्ले रँग-रँग है, रंग हुआ नाली का पानी। दीवारों पर रँग जमा है, चे
नवरात्रि महापर्व
शमा परवीन
मनभावन पावन लगा, नवरात्रि महा पर्व। करते आएँ हैं सदा, हम सब इस पर गर्व॥ हम सब इस पर गर्व, चेतना नई जगाएँ। रख कर नौ उपव�
तापत्रय
अविनाश ब्यौहार
सरकारी कार्यालय यानि सार्वजनिक स्थल। उसमें अप्रतिम सौंदर्य था। वह आशुलिपिक थी। वहाँ तरह तरह के लोग आते थे। कुछ की
हिंदी सुघड़ सलोनी है
अविनाश ब्यौहार
हिंदी सुघड़ सलोनी है! इसमें लालित्य भरा! मीठा साहित्य भरा! हिंदी हुई मघोनी है! है संस्कृति का गहना! निर्झरिणी �
हे अष्ट भुजाओं वाली
गणपत लाल उदय
हे अष्ट भुजाओं वाली माँ अम्बे रानी, माता आदिशक्ति कृपा करो भवानी। इस सारे संसार को‌ आप ही चलाती, तुम्हारे अनेंक है
नए वित्त वर्ष का हुआ आग़ाज़
रतन कुमार अगरवाला
नए वित्त वर्ष का हुआ आग़ाज़, होगा एक नया अंदाज़, नववर्ष की इस बेलि पर, लिखेंगे नए कुछ अल्फ़ाज़। ज़िन्दगी को देंगे नया एक मो�
नव वर्ष की पहली किरण
रतन कुमार अगरवाला
हिमगिरी का मस्तक सजेगा, निकलेगी नव वर्ष की पहली किरण, सुबह की किरण गिरकर धरा पर, छू लेगी माँ भारती के चरण। मिटेगा जब �
अमर राष्ट्र
माखनलाल चतुर्वेदी
छोड़ चले, ले तेरी कुटिया, यह लुटिया-डोरी ले अपनी, फिर वह पापड़ नहीं बेलने, फिर वह माला पड़े न जपनी। यह जाग्रति तेर�
बलि-पंथी से
माखनलाल चतुर्वेदी
मत व्यर्थ पुकारे शूल-शूल, कह फूल-फूल, सह फूल-फूल। हरि को ही-तल में बंद किये, केहरि से कह नख हूल-हूल। कागों का सुन कर�
राष्ट्रीय वीणा
माखनलाल चतुर्वेदी
यह गुंजार कहाँ से आई चौंक पड़ा, मैं बोल उठा, कँपने लगा हृदय, हरि जाने मैं भय-विह्वल डोल उठा! 'फिर कुछ बजा', सोच कर मन �
पुष्प की अभिलाषा
माखनलाल चतुर्वेदी
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ। चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥ चाह नहीं, सम्राटों
माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा'
राघवेंद्र सिंह
हुई प्रफुल्लित भारत धरिणी, काव्य रत्न का जन्म हुआ। हिन्दी का उपवन है महका, स्वयं पुष्प का जन्म हुआ। त्याग तपस्या �
मगिहौं वरदान
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मगिहौं वरदान माई के मन्दिरवा भीतर, गइहौं गुनगान देवी के मन्दिरवा भीतर। सोना न मगिहौं चाँदी न मगिहौं, घोड़ा न मगिहौ
कोशिश कर
समय सिंह जौल
ये मनुज तू आगे बढ़ राहों में बाधा से ना डर लक्ष्य के सफ़र पर चल तुझमें है सफलता पाने का बल चल आगे बढ़ तूफ़ाँ से ना डर ज�
नूतन हिन्दू वर्ष नमन हो
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
है चैत्र शुक्ल है प्रतिपदा शुभ, सनातन नववर्ष शुभ मुदित हो। पूजन कर नवरात्र चैत्र में, कीर्ति सुखद मुस्कान हर्ष हो�
मैं कौन हूँ?
सुधीर श्रीवास्तव
बड़ा कठिन है यह कह पाना कि मैं कौन हूँ? प्रकृति का अंश मात्र या ईश्वर का दूत हूँ, या फिर चलता फिरता मात्र एक आकार हूँ
नमन तुझे माँ भारती
राघवेंद्र सिंह
प्रशस्त पुण्य पंथ पर, असंख्य दीप प्रज्ज्वलित। सुमेरु मेरु का शिखर, है दीप्तिमान नव वलित। प्रमोद मोद मन सुमन, सकल
कवि कविता नहीं लिखता
राघवेंद्र सिंह
कवि कविता नहीं लिखता, प्रशस्ति पत्र पाने को। कवि कविता नहीं लिखता, सिंहासन छत्र पाने को। नहीं वह चाहता, कोई, उर मा�
अंतर्विरोध
प्रवीन 'पथिक'
हृदय के पिछले आँगन से, उठा था एक गुब्बार। जो मानस के पन्नों को, उड़ा के ले गया था सुदूर निर्जन वन में। जहाँ अज्ञात च�
स्त्री मन
सीमा 'वर्णिका'
स्त्री वस्तुतः कौन पाषाण मूर्त रूप में विलोकित क्यों... प्रायः पुरूष में प्राण प्रतिष्ठित दुर्वासा मुनि के कोप
मोहक मधुमय आई होली
सीमा 'वर्णिका'
मोहक मधुमय आई होली, घूम मचाती इत-उत डोली। मस्ती में डूबा बरसाना, होली खेलें राधा कान्हा, सखियाँ करती ख़ूब ठिठोली, �
जी हाँ, लिख रहा हूँ...
नागार्जुन
जी हाँ, लिख रहा हूँ... बहुत कुछ! बहोत-बहोत!! ढेर-ढेर-सा लिख रहा हूँ! मगर, आप उसे पढ़ नहीं पाओगे... देख नहीं सकोगे उसे आप!
बहुत दिनों के बाद
नागार्जुन
बहुत दिनों के बाद अबकी मैंने जी भर देखी पकी-सुनहली फ़सलों की मुस्कान —बहुत दिनों के बाद बहुत दिनों के बाद अबकी �
प्यार के सौजन्य से
कुँवर नारायण
वृक्ष से लिपटी हुई क्वाँरी लताएँ, दो नयन मानो अपरिमित प्यास के संदर्भ में काली घटाएँ, कौंधती नंगी बिजलियाँ, उर्व
प्यास वाले दिन
अविनाश ब्यौहार
लगे सताने झोपड़ियों को भूख औ प्यास वाले दिन। धूप है दिवस को कचोटने लगी। जब-तब लू हवा को टोंकने लगी।। जीवन में जब�
किस पर है दुख भारी दुनिया
ममता शर्मा 'अंचल'
किस पर है दुख भारी दुनिया, क्या सच है बतला री दुनिया। दुख है तो कारण भी होगा, ठीक-ठीक समझा री दुनिया। कह दे जो महसूस
राम नाम मधुशाला हो
अंकुर सिंह
माफ़ी माँगों तुम भूलों की, छोड़ तन सभी को जाना हैं। साँसे अपनी पूरी करके, पंचतत्व में मिल जाना है।। दुनिया का बुद्
गाऊँ सियाराम भजन
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
आज जन्मदिवस रघुनायक रघुवर, चैत्र शुक्ल नवमी तिथि नमन करूँ। सच्चिदानंद मनोहर अवतार हरि, कौसल्या दशरथ नंदन चित्त ध�
रामनवमी
सुधीर श्रीवास्तव
आज ही जन्में राम अवध में चैत्र मास नवमी तिथि शुक्ल पक्ष में, विष्णु अवतारी राम बसे कण-कण में। मानव रूप में जन्मे मग�
मर्यादा पुरुषोत्तम
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हे! राम तुम्हारी धरती पर, अब सत्य पराजित होता है। चहुँओर दिखे अन्याय यहाँ, नित रावण पूजित होता है। तुमने तो कुटुं�
माँ शेरावाली
गणपत लाल उदय
माँ शेरा वाली, तेरी महिमा है निराली। सारें जग की तुम महारानी, कोई तेरे दर से ना जाएँ खाली।। तेरे रूप है अनेंक, ध्�
नवरात्रें में लगते माँ जगरातें
गणपत लाल उदय
हे! जगत-जननी मातें अम्बे कल्याणी, मनोंकामना पूरी करती हो नारायणी। शेर की सवारी आप करती महारानी, आप है गोरी एवं काली
राम नवमी का त्यौहार
गणपत लाल उदय
धूम-धाम से मनाया जाता राम नवमी त्यौहार, इस दिन ही लिया भगवान विष्णु ने अवतार। बढ़ गया था धरती पर राक्षसों का अत्याच�
राजा रामचन्द्र जी
गणपत लाल उदय
त्रेतायुग में आप पधारें स्वयं नारायण नर-रूप, चैत्र शुक्ला नवमी का दिन प्यारी थी वह धूप। राजा दशरथ जिनके पिता कौशल्
प्रेम
मंगलेश डबराल
वह कोई बहुत बड़ा मीर था जिसने कहा था प्रेम एक भारी पत्थर है कैसे उठेगा तुझ जैसे कमज़ोर से मैने सोचा इसे उठाऊँ टुकड़�
अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं
राहत इन्दौरी
अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं, घर के हालात घर से पूछते हैं। क्यूँ अकेले हैं क़ाफ़िले वाले, एक इक हम-सफ़र से पूछते हैं�
दमदार दावे
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
जो आँख हमारी ठीक-ठीक खुल जावे। तो किसे ताब है आँख हमें दिखलावे। है पास हमारे उन फूलों का दोना। है महँक रहा जिससे ज
किताब की चाहत
संतोष ताकर 'खाखी'
एक चिड़िया सी चहकती है, मन के कोने-कोने को भाती है, किताबें हैं यह जो हर पल गुनगुनाती है। हर किसी को आती नहीं बातें र�
उत्साह
रामचंद्र शुक्ल
दुःख के वर्ग में जो स्थान भय का है, आनंद वर्ग में वही स्थान उत्साह का है। भय में हम प्रस्तुत कठिन स्थिति के निश्चय से
भगवान महावीर जयंती
रतन कुमार अगरवाला
“जीयो और जीने दो” था जिनका मुलमंत्र, उन महावीर को नमन, प्रेम, अहिंसा और सत्य के थे पुजारी, उन महावीर प्रभु का वंदन। “�
वो महामानव
गणपत लाल उदय
वन्दन करतें बाबा आपको हम सब बारम्बार, दिलाया आपने ही हमें मौलिकता अधिकार। समाजिक शैक्षणिक और आर्थिक अधिकार, समान
शिक्षित बनो संगठित रहो संघर्ष करो
गणपत लाल उदय
भारत-वर्ष को देकर गएँ है वो बाबा संविधान, युगों-युगों तक याद करेंगा आपकों हिंदुस्तान। सबसे अलग वो कर गुज़रें रचा ऐ�
धन्य
अविनाश ब्यौहार
प्रातिभ की सर्विस लगे जुमा-जुमा एक साल बीता था कि उसके माता पिता को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। वे अपनी जात बिरा�
कह रही कलम वह अभागी
राघवेंद्र सिंह
देखो वह क्षुब्ध पड़ी है, और क्लांत भाव में रहती। प्रिय के विलाप में देखो, वह हृदय वेदना सहती। बह रही धार अश्रु की, �
हिंदू नव वर्ष और नवरात्रि
सुधीर श्रीवास्तव
हिंदू नव वर्ष यानी संवत्सर आता है संग में नवरात्रि पर्व भी साथ लाता है। हम अपने वास्तविक नव वर्ष का भरपूर स्वागत क�
महावीर हनुमान
सुषमा दीक्षित शुक्ला
जय महावीर हनुमान प्रभू, अब संकट सारे दूर करो। हे! अंजनि सुत मारुति नन्दन, है संकट मोचन नाम तेरो। तब देवों के दुःख �
मातृशक्ति
अनिल भूषण मिश्र
हे! मातृशक्ति तुम्हारा स्वागत अभिनन्दन है, स्पर्श तुम्हारा शीतल सुखद पावन चन्दन है। तुमसे ही जग रोशन है, तुमसे ह�
फ़ैसला
संजय राजभर 'समित'
जो परंपराएँ तुझे कूप मंडूक बनाती है उसे छोड़ दे। जो अभिवादन तुझे नीच का अहसास कराए उसे छोड़ दे। जो संस्कृति त
जानवर कौन?
संजय राजभर 'समित'
“बैल तू जानवर है बैठ मत उठ! चल खिंच हल सूरज सिर पर चढ़ आया है वरना तुझे मार पड़ेगी” हलवाहा पसीने से तर-ब-तर बोला।
सच्चाई
गोरख पांडेय
मेहनत से मिलती है छिपाई जाती है स्वार्थ से फिर मेहनत से मिलती है।
आँखें देखकर
गोरख पांडेय
ये आँखें हैं तुम्हारी तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर इस दुनिया को जितनी जल्दी हो बदल देना चाहिए।
इंक़लाब का गीत
गोरख पांडेय
हमारी ख़्वाहिशों का एक नाम इंक़लाब है, हमारी ख़्वाहिशों का सर्वनाम इंक़लाब है, हमारी कोशिशों का एक नाम इंक़लाब ह�
समय का पहिया
गोरख पांडेय
समय का पहिया चले रे साथी समय का पहिया चले! फ़ौलादी घोड़ों की गति से आग बर्फ़ में जले रे साथी! समय का पहिया चले! रात
कविता और प्रेम
गोरख पांडेय
कविता और प्रेम—दो ऐसी चीज़ें हैं, जहाँ मनुष्य होने का मुझे बोध होता है।
तो कितना अच्छा होता
प्रवीन 'पथिक'
चाय के साथ बिस्कुट बोरते हुए, सोचा कि; कोई एक दूसरे से लग इतना मुलायम हो जाता; और चू जाता चाय की प्याली में; खो कर अपन�
धरती की चिट्ठी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हे! इंसान हे महामानव!! तुम्हें एक बात कहनी थी। मैं मायूस धरती, लिख रही हूँ, आज एक ख़त तुम्हारे नाम। मैं ठहरी तुम्हारी �
सुन बदरा रे!
संजय राजभर 'समित'
सुन बदरा रे! हैं विकल जीव सारे, शिथिल सब थके हारे। तप्त हलक अधरा रे! सुन बदरा रे! सूखे ताल तलैया, ले अब कौन बलैया?
ऐसी भीषण गर्मी
गणपत लाल उदय
कर लिया है गर्मी ने अभी से यह विकराल रूप, ऐसी भीषण गर्मी से यें शक्लें हो रहीं है कुरूप। तप रहीं है धरा एवं सभी प्राण�
नमन तुझे माँ शारदे
राघवेंद्र सिंह
नमन तुझे माँ शारदे... हिमाद्रि तुंग के शिखर, है चंचला दमक रही। वो शुभ्र रश्मियों से ही, है रज चरण चमक रही। हैं चहुँ �
सुनो आज प्रस्तर की महिमा
राघवेंद्र सिंह
सुनो आज प्रस्तर की महिमा... हिन्द प्रान्त पर आदिकाल से, हुआ जहाँ प्रस्तर गुणगान। धरती ने पट खोल यहाँ पर, स्वयं किया
राम चरित निराला
अविनाश ब्यौहार
दुनिया में लगा है राम चरित निराला। भ्रात प्रेम के अलावा पितृ भक्ति है। जानकी-सीता आलौकिक शक्ति है।। द्वापर में
जीवन से लुप्त दयानत है
अविनाश ब्यौहार
जीवन से लुप्त दयानत है, उपदा पाने की उज्लत है। कितनी बार उन्हें समझाया, पर उनकी भद्दी आदत है। हथियारों की होड़ लग�
ऋतुएँ बदल रहीं हैं
अविनाश ब्यौहार
हवाओं के मुख से लपटें निकल रहीं हैं। किनारों से दूर नदी सूखकर- काँटा हुई है। जलती धूप पत्तों के गाल पर- चाँटा हुई �
सैनिक की वेदना
सीमा 'वर्णिका'
विचलित साँसो की सरगम, नयनों के समक्ष बिखरा तम। असह्य वेदना आंतरिक द्वंद, धर्म व कर्तव्य का यह संगम। समय रेत सा फि�
मेरे राम
सुधीर श्रीवास्तव
दशरथ कौशल्या सुत राम अयोध्याधाम के राजा राम केकई के वनवासी राम हनुमान के सब कुछ राम। असुरों, राक्षसों के संहारक र�
जिसका उदय होना निश्चित है...
अज्ञात
जिसका उदय होना निश्चित है, उसके लिए प्रकृति भी रास्ता बना देती है।
प्रेम करने वाले का प्रेम अधूरा नहीं रहता
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
प्रेम करने वाले का प्रेम अधूरा नहीं रहता। साथ पा कर करे या साथ खो कर, वह प्रेम पूरा ही करता है।
सीता
सुधीर श्रीवास्तव
जनक सुता सुकुमारी राम की अर्धांगिनी, सुंदर, सुशीला सिद्धांतों की पुजारिन। बेटी धर्म निभाया पिता का मान बढ़ाया प�
करो आत्म तन का मंथन
राघवेंद्र सिंह
जीवन रूपी क्षीर सिन्धु में, करो आत्म तन का मंथन। रत्न चतुर्दश ही निकलेंगे, स्वयं करो इसका ग्रंथन। निज श्रम मंदरा�
धरती उगल रही है आग
आशीष कुमार
सूख गए हैं ताल तलैया उजड़े पड़े हैं मनोरम बाग़ पशु पक्षी तड़प रहे हैं धरती उगल रही है आग। पछुआ तन को जला रही है झुलस
मछली बोली जल ही जीवन
अविनाश ब्यौहार
मछली बोली जल ही जीवन समझें औ समझाएँ। हो रहा जल का दुरुपयोग था अकूत भंडार। सपने सेना उज्जवल भविष्य के है बेकार।।
यही सोचकर आता हूँ
राघवेंद्र सिंह
जीवन में अभिलाषा लेकर, घूम रहा हूँ मैं मग में। पथ भी न जाने पथरीला, काँटे चुभते हैं पग में। फिर भी दीप जलाकर मैं, मध�
होने लगी झमाझम बारिश
अविनाश ब्यौहार
होने लगी झमाझम बारिश नदी है उफान पर। बिजली कड़क रही है बादल काले-काले हैं। कुछ नहीं है खंडहर में, मकड़ी के जाले है�
जीवन की तृष्णा नहीं मिटी
राघवेंद्र सिंह
उठी आज मन गरल विपाशा, हृदय पुष्प को गला गई। जीवन की तृष्णा नहीं मिटी, अस्तित्व जीव का जला गई। गंतव्य से दोनों नयन ड�
हाँ मैं श्रमिक हूँ
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मैं श्रमिक हूँ हाँ मैं श्रमिक हूँ। समय का वह प्रबल मंज़र, भेद कर लौटा पथिक हूँ। मैं श्रमिक हूँ हाँ मैं श्रमिक हूँ।
चिलचिलाती धूप
सुषमा दीक्षित शुक्ला
इस चिलचिलाती धूप ने जीना किया दुश्वार है। गर्म लू जलती फ़िज़ाएँ, हर तरफ़ अंगार है। आँधियाँ लू के थपेड़े, मन बदन बेज़ा�
प्यारी माँ
सुषमा दीक्षित शुक्ला
चंदन जैसी माँ तेरी ममता, तेरी मिसाल कहाँ दूँ माँ। जनम मिले गर फिर धरती पर, तेरा ही लाल बनूँगा माँ। तूने कितनी राते�
धुँधलके में
अविनाश ब्यौहार
धूप की चादर बिछी हुई है दिन के पलके में। झूम-झूम के पावस बिल्कुल न बरसा। ताल-झरना-खेत लगा जल को तरसा।। कोई रात के
कटी-कटी है
अविनाश ब्यौहार
एक है माँ कितने बेटों के बीच बँटी है। पिता गए तो सारा घर ही टूट गया है। बुरा समय ख़ुशियों को आकर कूट गया है।। थी म�
जब तक है ज़िंदगी
सुधीर श्रीवास्तव
ज़िंदगी जब तक है गतिमान रहती है, न ठहरती है, न विश्राम करती है। सुख दुख, ऊँच नीच की गवाह बनती है। ज़िंदगी के गतिशीलन म�
उठो गरल विष के प्यालों
राघवेंद्र सिंह
हे युद्धभूमि के मतवालों, तुम उठो गरल विष के प्यालों। है युद्धभूमि ललकार रही, निज जीवन राह पुकार रही। फूको तुम बिग�
क़लम की अभिलाषा
राघवेंद्र सिंह
चाह नहीं मैं लहू से अपने, प्रकृति का शृंगार लिखूँ। चाह नहीं मैं योद्धाओं की, लहू युक्त तलवार लिखूँ। चाह नहीं मैं र
जीवन का निष्कर्ष लिखा
राघवेंद्र सिंह
पग-पग जीवन गलियारों में, हमने भी संघर्ष लिखा। पीड़ाओं के प्रथम द्वार पर, जीवन का निष्कर्ष लिखा। लिखा भाग्य का सूख�
परिस्थितियाँ
सुधीर श्रीवास्तव
जीवन है तो परिस्थितियों से दो चार होना ही पड़ता है, अनुकूल हो या प्रतिकूल हमें सहना ही पड़ता है। बहुत ख़ुश होकर भी अ
नारी
रमेश चंद्र बाजपेयी
नारी है तो जग है, नारी है तो जीवन का सुंदरतम मग है। अबला नहीं हो तुम तुम तो हो सबला, बचपन में माँ-बाप का खिलौना और आ�
प्रेम युगल जीएँ कुछ लम्हें
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
कुछ पल तेरे संग बिताएँ, स्वप्निल दुनिया साथ रचाएँ। जिए साथ हम बन हमजोली, नवजीवन आलोक जगाएँ। अन्तर्मन अवसाद भुला�
बच्चों को ख़ूब लुभाते आम
आशीष कुमार
खट्टे मीठे पीले आम, कितने हैं रसीले आम। सभी फलों के राजा हैं, सबसे ऊँची इनकी शान। आई गर्मी लेकर आम, सूझा ना कोई और क�
मृग व खग
सीमा 'वर्णिका'
मृग के दृग में झाँकता खग, प्रेमिल नैनों में बसा है जग। मूक संवाद करें द्वय नयन, दृश्य अति मनोरम रहा लग। मधुमय भाषा �
प्रकृति का सुकुमार कवि : सुमित्रानंदन पंत
राघवेंद्र सिंह
जयति जय हे! हिमालय पुत्र, बन मकरंद तुम निकले। हरित आँचल हिमानी से, बनकर छंद तुम निकले। प्रकृति के अंक तुम खेले, नदी
संयुक्त परिवार हमारा
गणपत लाल उदय
बच्चों-जवानों बुज़ुर्गों से भरा है आँगन सारा, संस्कारो से जुड़ी हमारी जिसमें विचारधारा। तुलसी पूजन की हमारी यह पु�
माँ मेरी है प्रेरणा
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
ममता करुणा हृदय तल, स्नेह सुधा उर पान। माँ जननी धरती समा, तू जीवन वरदान॥ क्षमा दया जीवन कला, तू जीवन सुख छाव। सुख द�
नित जीवन रण मैं लड़ता हूँ
राघवेंद्र सिंह
हे! कालचक्र तुम सुनो आज, अस्तित्व मेरा क्या चुनो आज। मैं समरभूमि का एक बिगुल, बजता रहता हूँ नित ही खुल। हूँ कभी बाँ�
शादियाँ
सुधीर श्रीवास्तव
शादियाँ वास्तव में एक अनुबंध है दो परिवारों, दो दिलों का, जिसमें निभाई जाती हैं परंपराएँ, धारणाएँ, मान्यताएँ। निभ�
शोर
सीमा 'वर्णिका'
अश्रव्य शोर आर्तनाद हृदय का अरण्यनिनाद सम करता उत्पन्न विस्फोटक प्रभाव पसरता एकाकीपन भीड़ भाड़ के मध्य यद्य�
ये दलीलें और ये इल्ज़ाम यानी
प्रशान्त 'अरहत'
ये दलीलें और ये इल्ज़ाम यानी, वो करेगी अब मुझे बदनाम यानी। बेवजह जो मशवरा देते रहे हैं, अब करूँगा दूर से प्रणाम यानी
तपिश
सुषमा दीक्षित शुक्ला
भयंकर तपिश के दरमियाँ, ये जो शीतल जल है। यही तो बस आजकल, जीने का सम्बल है। उफ़ ये जलती फ़िज़ाएँ, अंधड़ की डरावनी सदाएँ। �
सलोने चाँद आ
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मैं तुझे दर्पण बना लूँ, ऐ! सलोने चाँद आ। प्यार के दो क्षण चुरा लूँ, ऐ! सलोने चाँद आ। चाँदनी को है ख़ुमारी, रात का भी नृ�
मैं एक पत्रकार हूँ
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मैं एक पत्रकार हूँ, मैं एक पत्रकार हूँ। समाज का हूँ आईना, अवाम का ग़ुबार हूँ। कहाँ पे क्या सही हुआ, कहाँ पे क्या ग़लत �
साइकिल
पारो शैवलिनी
साइकिल चलाना व्यायाम करने और परिवहन पर पैसे बचाने का एक शानदार तरीक़ा है। साइकिल चलाना बच्चों और वयस्कों समेत महिल�
साहब हम मज़दूर हुए
राघवेंद्र सिंह
हम अँतड़ियों की सूखी हैं, हम ही रोटी वो रूखी हैं। हमको ईश्वर ने है ढाला, शायद मेहनत ने है पाला। जलती जेठ दुपहरी देख�
लगे चटोरे दिन
अविनाश ब्यौहार
मैंने देखा मैंने पाया लगे चटोरे दिन। रबड़ी सी धूप लगती कलाकंद सी छाँव। है शहर की सरहद में उकड़ू बैठा गाँव।। दुर
दो जहाँ की हसीं जज़ालत है
नवीन नाथ
दो जहाँ की हसीं जज़ालत है, ख़ुल्द से बड़के ख़ूबसूरत है। मुल्क रब की निगाहों सा दिल-जू, पाक एकता की पाक मूरत है। दिल
स्याह रजनी को हरा कर
सीमा 'वर्णिका'
कौमुदी थिरके धरा पर, स्याह रजनी को हरा कर। साँझ ले आती उदासी, चाहतें लेती उबासी। छोड़ कर हम को अकेले, नींद बैरन है �
स्कूल चलें हम
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
आओ हम सब बच्चे भारत, नौनिहालों साथ स्कूल चलें। अ आ इ ई क ख ग घ पाठ ज्ञान, हम भारतीय इन्सान बनें। ज्ञानोदय नव भोर कि�
मुझे गर्व है माँ तेरा बेटा हूँ
आशीष कुमार
पहली बार जब पलकें खोली, देखा मैंने तू हँस कर बोली, मेरे गालों को चूम-चूम कर, ममता मुझ पर लुटाई है। तेरे आँचल में पला �
यारों ना करना क्रोध
गणपत लाल उदय
ख़ुशियों से भरा रहता है उन सब का जीवन, सकारात्मक सोच रखें एवं काबू रखतें-मन। काम क्रोध मद लोभ मात्सर्यो से जो रहें दू
यही जीवन चक्र है
सुधीर श्रीवास्तव
जीवन क्या है यह समझाने नहीं ख़ुद समझने की ज़रूरत है अदृश्य से जीवन की शुरुआत पल-पल, छिन-छिन विकास की गति कितने रंग और �
पहली मुहब्बत
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
हृदय पत्रिका पर प्रणय की कहानी, नहीं भूल पाया वो यादें पुरानी। हमारी हक़ीक़त थी वो, पहली मुहब्बत थी वो। नयन से नयन ज�
अभी बाक़ी है
सुषमा दीक्षित शुक्ला
तू मुझमें अभी बाक़ी है, तू मुझमें कहीं बाक़ी है। ये तेरा ही तो साया है , ये अब भी मेरा साथी है। ये तेरा ही तो जलवा है, ये
बढ़े जा रहे हैं
संजय राजभर 'समित'
बढ़े जा रहे हैं, चले जा रहे हैं। सद गुरू कृपा बिन, फँसें जा रहे हैं। चकाचौंध माया, ठगे जा रहे हैं। दिखावे की रिश्त
मधुऋतु में लुटा रहा प्यार
अविनाश ब्यौहार
पुष्पों का ऋतु से अभिसार हो रहा। आज कई रंगों मे खिले कचनार। है ढाक मधुऋतु में लुटा रहा प्यार।। बगीचा- फूल का ब�
पछतावा
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सत्पथ जीवन चल रे मानव, पुरुषार्थ सृजित नवकीर्ति गढ़ो। झूठ कपट छल लालच दानव, कर्मों पर पछतावा आप करो। बनो धीर साह
जय बजरंगी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
जय महावीर जय बजरंगी, तेरा ही एक सहारा है। विपदा के बादल छाँटो प्रभु, तेरे बिन कौन हमारा है। प्रभु रोग शोक अवसाद हर�
एक साया आया
सुधीर श्रीवास्तव
मन में बेचैनी संग अनचाहा डर समाया था, उलझनों का फ़ैसला मकड़जाल जाने क्यों समझ से बाहर था। नींद आँखों से कोसों दूर थ�
अग्निवीर
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
हम अग्निवीर सीमा प्रवीर, बलिदान राष्ट्र पथ जाते हैं। हम शौर्यवीर गंभीर धीर, स्वाभिमान विजय रण गाते हैं। हम महाज
अँधियारी रातें
अविनाश ब्यौहार
अँधियारी रातें हैं करती रहीं रुदाली। चाँद तारे बहुत ही ग़मगीन दिखे। बात करें भारत की तो चीन दिखे।। छिछोरी हरकत
दर्द
रतन कुमार अगरवाला
दिल के दरवाज़े पर हुई एक दस्तक, किसी के सिसकने की आ रही थी आवाज़, टटोला अंदर तो पाया मैंने, निकल रहे थे कुछ दर्द भरे अल्फ़
हे! हिन्द धरा के वीर पुत्र
राघवेंद्र सिंह
हे! हिन्द धरा के वीर पुत्र, बलिदान तुम्हारा लिखता हूँ। निज शब्द सुमन की स्याही से, सम्मान तुम्हारा लिखता हूँ। तुम
पंख को आसमाँ चाहिए
अविनाश ब्यौहार
पंख को आसमाँ चाहिए, ज़िंदगी को जहाँ चाहिए। धूप निकली हुई है यहाँ, औ उसे आस्ताँ चाहिए। दीप जलने लगे हैं अगर, पर्व को
सजन स्वप्न में आए थे
संजय राजभर 'समित'
धीरे-धीरे नहा उठी थी, जब अहसास कराए थे। सखी रात की बात बताऊँ, सजन स्वप्न में आए थे। जब ज़ुल्फ़ों को सहलाकर वो, खींच बा
चाँदनी
अवनीत कौर 'दीपाली'
नभराज तारकेश्वर ने तारिका नक्षत्रों की सभा बुलाई चन्द्रप्रभा रानी श्वेत पोशाक में सज कर आई शीतल सौम्य हवा भी स्व
छवि विमर्श
अवनीत कौर 'दीपाली'
तेरे जाते क़दमों के निशान समंदर की रेत पर, आज भी नज़र आते है उन राहों पर बिखरे मेरे अरमाँ तेरे क़दमों में मिले, आज भी न
किनारा
अर्चना मिश्रा
मैं स्तब्ध हूँ या मौन हूँ समझ नहीं आता कौन हूँ? जब अपनी ही जड़े उखड़ने लगे भेदभाव बढ़ने लगे होके, चुपचाप खड़ी हो
सबका जीवन आनंदमय बना दे
रविंद्र दुबे 'बाबू'
मिले मुंडेर पर, सोंधी-सोंधी ताज़ी हवा का, ये झोंका जो, कभी धूप खिले, कभी छाँव बने कुदरत ने रंग बिखेरा जो। आसमान में, ह�
पुत्र का संदेश
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
ओ चतुर कागा! हमारे गाँव जाना। पुत्र का संदेश उस माँ को सुनाना। मातु से कहना कि उसका सुत कुशल है, याद वो करता उन्हें �
गुनाह का गीत
धर्मवीर भारती
इन फ़ीरोज़ी होंठों पर बर्बाद मेरी ज़िंदगी! गुलाबी पाँखुरी पर एक हल्की सुरमई आभा कि ज्यों करवट बदल लेती कभी बरसात
कवि और कल्पना
धर्मवीर भारती
कल्पने उदासिनी— न मेघदूत वेश में किसी सुदूर देश में किसी निराश यक्ष का प्रणय-संदेश ला रही न आज स्वप्न में सने मृ
डरने में उतनी यातना नहीं है...
धर्मवीर भारती
डरने में उतनी यातना नहीं है जितनी वह होने में जिससे सबके सब केवल भय खाते हों।
वस्तुतः यह सारा जीवन...
धर्मवीर भारती
वस्तुतः यह सारा जीवन रसमय अनुभूतियों की सार्थक शृंखला न होकर—असंबद्ध क्षणों की भँवर है, जिसकी कोई दिशा नहीं।
पधारें आँगन राजा इन्द्रराज
गणपत लाल उदय
पधारें हमारे आँगन राजा-इन्द्रराज, सुस्वागतम् आपका यहाँ महाराज। आएँ जो आप छाई यह ख़ुशहाली, अब पूर्ण होंगे सभी के सा�
है मुबारकबाद मेरी ज़िंदगी ख़ुशहाल रखना
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
लाल जोड़े को पहनकर जा रही हो तुम गली से, है मुबारकबाद मेरी ज़िंदगी ख़ुशहाल रखना। कर रहीं थी प्रेम पर तुम प्राण भी अपने
नेह में संदेह होगा
कुँअर बेचैन
देह आकर्षण बनी तो नेह में संदेह होगा! देह को सौंदर्य सींचे और सबकी दृष्टि खींचे दीखती हो देह सम्मुख आँख खोले, आँ
स्वयं धरा पुकारती
राघवेंद्र सिंह
प्रचण्ड चण्ड है पवन, बनी है अग्नि ज्वाल सी। धधक उठी है ये धरा, भुजंग के कराल सी। प्ररोह नव हैं सो गए, वो मार्तंड तेज़
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
कैफ़ी आज़मी
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो, क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो। आँखों में नमी हँसी लबों पर, क्या हाल है क्या दिखा रहे हो
बहारो मेरा जीवन भी सँवारो
कैफ़ी आज़मी
बहारो मेरा जीवन भी सँवारो, कोई आए कहीं से यूँ पुकारो। तुम्हीं से दिल ने सीखा है तड़पना, तुम्हीं को दोश दूँगी ऐ नज़ा
शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा
कैफ़ी आज़मी
शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा, कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा। पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था, जिस्म जल
किसान
कैफ़ी आज़मी
चीर के साल में दो बार ज़मीं का सीना दफ़्न हो जाता हूँ गुदगुदाते हैं जो सूरज के सुनहरे नाख़ुन फिर निकल आता हूँ अब न
बहारो मेरा जीवन भी सँवारो
कैफ़ी आज़मी
बहारो मेरा जीवन भी सँवारो, कोई आए कहीं से यूँ पुकारो।
शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा
कैफ़ी आज़मी
शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा, कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा।
जब यार देखा नैन भर
अमीर ख़ुसरो
जब यार देखा नैन भर, दिल की गई चिंता उतर, ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाय कर। जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया, हक�
दिया जलता रहा
गोपालदास 'नीरज'
जी उठे शायद शलभ इस आस में रात भर रो रो, दिया जलता रहा। थक गया जब प्रार्थना का पुण्य, बल, सो गई जब साधना होकर विफल, जब
पथरीला शिल्प
नागार्जुन
उन्नीसवीं शताब्दी की कुलीन बुर्ज़ुआ के सुसज्जित बगीचे वाले कोठी के विशाल बरामदे में पंक्तिबद्ध वे नग्न प्रतिम�
सिपाही
माखनलाल चतुर्वेदी
गिनो न मेरी श्वास, छुए क्यों मुझे विपुल सम्मान? भूलो ऐ इतिहास, ख़रीदे हुए विश्व-ईमान!! अरि-मुंडों का दान, रक्त-तर्�
शशिधर बम बम
रविंद्र दुबे 'बाबू'
तिलक विजय सज गंग लट जट सट। हर हर सब पर बम बम बम बम॥ कंठ पर विषधर विष पिय जमकर। बम बम बम बम हर हर बम बम॥ सरपट करतल अप
ज़माना तो सितमगर है
अविनाश ब्यौहार
ज़माना तो सितमगर है, हवाओं का यहाँ डर है। जहाँ में बस झमेले हैं, अमन को चाहने घर है। डकैती पड़ गई होगी, अगरचे पास मे�
मैंने देखा एक ज़माना
अविनाश ब्यौहार
मैंने देखा एक ज़माना, पड़ा सिरफिरों को समझाना। गौरैया आँगन में केवल, ढूँढ़ रही अनाज का दाना। एक शख़्स को देख रहा हू�
जीवन तो इक अफ़साना है
अविनाश ब्यौहार
जीवन तो इक अफ़साना है, मानव का फ़र्ज़ निभाना है। चाकू, कट्टा और कटारी, इन सबका पोषक थाना है। बूढ़ों का ज्ञान लगा अद्भ�
नारी शक्ति
अवनीत कौर 'दीपाली'
नारी हूँ मैं, ख़ुद में ही मैं शक्ति हूँ। जीवन की हैं शक्ति मुझसे, हर जीवनी की हैं मुक्ति मुझसे, हर शक्ति का रूप हैं मु
ज़िंदगी
अवनीत कौर 'दीपाली'
बे-बाक, बे-हिचक हो कर लिखती हूँ, मैं ज़िंदगी की दास्ताँ, कुछ ज़ख़्म नासूर हो रीस्तें रहें। ज़िंदगी भर ना मिली नासूर ज़ख़्म
गुरु महिमा
रविंद्र दुबे 'बाबू'
गुरु ज्ञान का अमृत, जिसका न कभी अंत। अज्ञानता गुरुवर, करते हरण-हरण॥ दीप ज्ञान का जलाए, अंधकार को मिटाए। नमन वंदन गु
भूमिपुत्र
सुषमा दीक्षित शुक्ला
खेतों से जो रत्न उगलते, कृषकों का सम्मान करो। भूमिपुत्र हैं ये पालक हैं, जय किसान कह मान करो। ख़ून पसीना बहा बहाकर,
बिन पानी के धरती सूनी
डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
हमें जिलाए रखता पानी, है जीवन आधार। बिन पानी के धरती सूनी, सूना यह संसार।। भोजनादि के लिए ज़रूरी, पानी का उपयोग। साफ़
रोटी की भूख
डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
झारखण्ड के कोयलांचल में जीने की ललक... चंद रोटियों को तलाशती है किसी कोयले की टोकरी में कि गुम हो गई हो काली अँधिया
खोज
विनय विश्वा
शब्दों को ढूँढ़ता है की मंज़िल को ढूँढ़ता है, हर घड़ी मेरा दिल अभिव्यक्ति को ढूँढ़ता है। यादों को ढूँढ़ता है की ख़्वाबों
तुम आग पर चलो
गोपाल सिंह नेपाली
1 अब वह घड़ी गई कि थी भरी वसुंधरा वह घड़ी गई कि शांति-गोद थी धरा जिस ओर देखते न दीखता हरा-भरा चहुँ ओर आसमान में घना धु
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
गोपाल सिंह नेपाली
मेरा धन है स्वाधीन क़लम राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लम जिसने तलवार शिवा को दी रोशनी उधार दिवा को दी �
दीपक जलता रहा रात भर
गोपाल सिंह नेपाली
तन का दिया, प्राण की बाती, दीपक जलता रहा रात भर। 1 दुख की घनी बनी अँधियारी सुख के टिमटिम दूर सितारे उठती रही पीर की ब
है दर्द दिया में बाती का जलना
गोपाल सिंह नेपाली
तुम रुककर राय न दे डालो साथी, कुछ दूर अभी आगे तुमको चलना 1 तुम आज उमर के फूल चढ़ाते हो तुम समझे हो, ज़िंदगी बढ़ाते हो
निवेदन
नरेश मेहता
जब तुम मुझे अपमानित करते हो। तब तुम मेरे निकष होते हो। प्रभु से प्रार्थना है। वह तुम्हें निकष ही रखे।
चंद्रोदय
नरेश मेहता
जाऊँगा, चंद्रोदय हो लेने दो— वन में नदी को ऐसे अकेले छोड़कर कैसे चला जाऊँ? जाऊँगा, पर चंद्रोदय हो लेने दो। चंद्रो�
नाम-वृक्ष
नरेश मेहता
मैं तो अनाम था प्रिया! तुमने ही मुझे अपने नेत्रों के रुद्राक्ष की यह माला पहना दी। और एक दीक्षा-नाम दे दिया; वृक्�
आज मुझसे बोल, बादल!
हरिवंश राय बच्चन
आज मुझसे बोल, बादल! तम-भरा तू, तम-भरा मैं, ग़म-भरा तू, ग़म-भरा मैं, आज तू अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल! आज मुझसे बोल
गुरु ही पूर्ण वंदना
राघवेंद्र सिंह
प्रशस्त पुण्य पंथ पर, अखण्ड दीप जल रहा। है ज्ञान ज्योति बन गुरु, वह विश्व को बदल रहा। है शांति का प्रतीक भी, वह शिष�
गुरु पूर्णिमा त्यौहार
गणपत लाल उदय
सनातन धर्म में इसे एक महत्वपूर्ण पर्व माना जाता, जो आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को आता। इस दिन गुरुदेव महर्षि
मैं कलम हूँ न्याय की
राघवेंद्र सिंह
मैं कलम हूँ न्याय की, मैं न्याय लिखना जानती। मैं सत्यता को पूजती, निज सत्यता को मानती। न ज्ञात मुझको धर्म क्या, न ज
ज़माने में नहीं कुछ बस तुम्हारा साथ काफ़ी है
प्रशान्त 'अरहत'
ज़माने में नहीं कुछ बस तुम्हारा साथ काफ़ी है, बिताने को अवध की शाम, ये सौग़ात काफ़ी है। इरादा है अभी मेरा क्षितिज तक स
तुम मुझसे कह रही थी
पारो शैवलिनी
दो दिन की मुलाक़ात में दुनिया बदल गई थी। हम तुम में खो गए थे तुम मुझमें खो गई थी।। तन्हाईयों में पाकर किया प्यार म�
कितना मुश्किल है पिता होना
आशीष कुमार
बदलते सामाजिक परिवेश में बढ़ती ज़िम्मेदारियों तले बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए झुकती कमर की चिंता छोड़ जी तोड़ म
तुम दरिया के पार प्रिय
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
आशा मन साजन मिलन, सजूँ सनम शृंगार। नज़र टिकी आगम प्रियम, बस दरिया के पार॥ फिर सावन आया मधुर, सजी वृष्टि बारात। घन-घ
विश्वास
अवनीत कौर 'दीपाली'
विश्वास का बीज मुश्किल है बोना ज़िंदगी की धरा में पिरोना मिल जाए विश्वास एक बार फिर उस विश्वास को न खोना। टूटे विश�
अभिनन्दन है मेघराजा
गणपत लाल उदय
आपका अभिनन्दन है मेघराजा, बारिश की बौछारें लेकर आजा। आज बरसों तुम चारों और ऐसा, स्वागत में खड़े लेकर बैंड-बाजा॥ स�
मिट्टी थी मिट्टी बनी रही
राघवेंद्र सिंह
सौ दर्द सहे इस मिट्टी ने, सौ बार धूप में तपी यही। सौ बार उड़ी यह दूर-दूर, सौ बार क्रोध में नपी यही। किंतु यह फिर भी तन
हमीं से दूर जाना चाहता है
प्रशान्त 'अरहत'
हमीं से दूर जाना चाहता है, तभी वो पास आना चाहता है। नई दुनिया बनाई है वहाँ पर, वही मुझको दिखाना चाहता है। मुझे माल�
कवि हूँ कविता लिखता हूँ
सुधीर श्रीवास्तव
हाँ! मैं कवि हूँ कविता लिखता हूँ, सत्य से दो चार हो शब्दों से लड़ता झगड़ता हूँ, मन में जो भाव उठे उसे काग़ज़ पर उतार दे�
बात में भी जान हो
अविनाश ब्यौहार
बात में भी जान हो, रास्ता आसान हो। बाग़ ने अब ये कहा, कोकिला की तान हो। बुद्धि मानो है प्रखर, झोपड़ी में ज्ञान हो। �
रात भर चराग़ों की लौ से वो मचलते हैं
मनजीत भोला
रात भर चराग़ों की लौ से वो मचलते हैं, नींद क्यों नहीं आती करवटें बदलते हैं। भीड़ क्यों जमा की है चाँद ने सितारों की, �
बैरी सावन
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हाय रे आया बैरी सावन, आवन कह गए आए न साजन। रहती हूँ मैं खोई-खोई, रोग लगा है जैसे कोई। कब से न मैं तो चैन से सोई। सुनी �
महामहिम द्रोपदी मुर्मू
गणपत लाल उदय
अपनें अनुभवों और कार्यो से पाया आपने मुक़ाम, शिक्षक समाजसेवी राजनीति में किएँ बहुत काम। अभिनन्दन और अभिवादन है‌ आ�
पंच से पक्षकार
अंकुर सिंह
हरिप्रसाद और रामप्रसाद दोनों सगे भाई थे। उम्र के आख़िरी पड़ाव तक दोनों के रिश्ते ठीक-ठाक थे। दोनों ने आपसी सहमति से �
तेरी आँचल में
प्रवीन 'पथिक'
चले यूँ दोनो कदम साथ-साथ, मंजिल की तलाश में। जीवन से हँसते बतियाते, डूबे स्वप्नलोक में। प्रेम में मत्त। सांसारिक �
हर हर शंकर भोले दानी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
हर हर शंकर भोले दानी। देवासुर सब कीर्ति बखानी॥ द्वादश ज्योतिर्लिङ्गहि रूपा। त्रिलोकेश्वर रुप अनूपा॥ महादेव भ
मैं हारा हुआ एक भिक्षुक
राघवेंद्र सिंह
मैं हारा हुआ एक भिक्षुक, काया मेरी अधमरी हुई। मत पूछो मेरा हाल कोई, कितनी करुणा है भरी हुई। न ठौर ठिकाना है कोई, व्�
अब ना सखी मोहे सावन सुहाए
सुषमा दीक्षित शुक्ला
अब ना सखी मोहे सावन सुहाए, अब ना सखी मोरा मन मचलाए। अब तो सही मोहे पिया बिसराए, अब तो सखी मोहे रिमझिम जलाए। अब नहीं क�
हरि
रविंद्र दुबे 'बाबू'
कमल नयन पट, नमन सकल जर, खलल जगत जब, हरि उठ छल धर। तप जप वश कर, बम शिव धर वर, मटक कमर तब, भसम करत खर। क़हर परशुधर, बरसत डटकर
आओ शमा जलाएँ
संजय राजभर 'समित'
भटक रहा है क्यूँ दर-दर, स्वयं को अब जगाएँ। अंतःकरण में तमस है, आओ शमा जलाएँ। सुंदर-सुंदर बातें भी, अमल बिन सब व्यर्�
मेरा मन मंदिर भी शिवाला है
आशीष कुमार
बाबा बसे हो काशी नगरिया काशी नगरिया हो काशी नगरिया कभी तो आओ हमरी दुअरिया हमरी दुअरिया हो हमरी दुअरिया। मेरा मन �
ले चल रे! कहरवा पिया के नगरी
संजय राजभर 'समित'
कइसे चली डगरिया भर के गगरी। ले चल रे! कहरवा पिया के नगरी।। ओकरा से मोर शरधा बा लागल। दुनिया में लहँगा कई बार फाटल।।
भारत का वह अमर सितारा
राघवेंद्र सिंह
भारत के उस अमर व्योम पर, चमका एक सितारा था। अंग्रेजों के सम्मुख झुकना, जिसको नहीं गँवारा था। पराधीनता की रातों मे�
दी अगर सबने ढिलाई
अविनाश ब्यौहार
दी अगर सबने ढिलाई, क्यों नहीं करते भलाई। लोग केवल ढूँढ़ते हैं, अब भलाई में बुराई। जन्म दिन में दीजिएगा, ढेर सी उन�
दुआ
रमेश चंद्र बाजपेयी
जहाँ दवा काम करना बंद कर दे, वहाँ दुआ ही काम आती है। श्रम के निरंतर प्रयासो से, हिय की मृद कयासो से, दुआ सहज ही निकल
भ्रुण की ख़्वाहिश
रविंद्र दुबे 'बाबू'
मैं हूँ छोटी अधकली, कोख में माँ से लिपट रही, जन्म दात्री हिम्मत करती, दुनिया को डपट रही। मुझको भी इस धरा का, आनंद लेन
नाग पंचमी की धूम
रविंद्र दुबे 'बाबू'
सूरज झाँके भोर भए, गली-गली शोर हुआ। कीचड़ में हुए तर बतर, पहलवान भी मग्न हुआ।। नए नए पकवान बने, झांज मंजीरा भी बजे। न
मौत
रमेश चंद्र बाजपेयी
मौत तेरे कई बहाने, न जाने किस बहाने अपने पास बुलाए। न उम्र का बंधन, बाल हो या हो प्रोढ, जिसे तू न सुलाए। राजा हो या �
हरियाली तीज
गणपत लाल उदय
यें तीज का आया है प्यारा त्यौहार, बादलों से बरस रहीं हल्की फुहार। सात रंग में रंगा है प्यारा आसमान, चारों और छाया य�
काश! मेरा हृदय पाषाण खंड होता
प्रवीन 'पथिक'
काश! मेरा हृदय पाषाण खंड होता, तोड़ देता वो सारी बेड़ियाँ; जो मिथ्या प्रेम का दामन पकड़, झकझोड़ती हैं मासूम हृदयों �
दवा और दुआ
सुधीर श्रीवास्तव
दवा और दुआ सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं दवा तन पर असर करती है, दवाएँ अपरिहार्य हो सकती हैं लेकिन बिना धन के दवाएँ �
वो लड़की
प्रशान्त 'अरहत'
वो लड़की जिससे मेरे दिल का था कारोबार चला करता। वो लड़की जिससे मिलकर मन उपवन मेरा खिला करता। वो लड़की जब कुछ कहती तो ब
चैत्र महात्म
अनिल भूषण मिश्र
प्रथम माह चैत्र है आया, रंग गुलाल से यह सजा सजाया। नए साल की ख़ुशियाँ लाया, नवरात्रि की है धूम मचाया। खेतों को सोने स
महाकवि गोस्वामी तुलसीदास
गणपत लाल उदय
महाकवि और महान-संत थें आप तुलसीदास, श्रीराम कथा लिखकर बनें आप सबके ख़ास। जिनका जप करता है आज विश्व का नर नार, प्रेम-�
यादों की बारात सजाऊँ
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
यादों की बारात सजाऊँ, बचपन फिर लम्हें जी पाऊँ। माता की ममता छाया तल, पा सुकून फिर से सो जाऊँ। बाबूजी भय से सो जाऊँ, �
वैशाख महात्म
अनिल भूषण मिश्र
दूजा माह वैशाख है आया, कृषकों को अति व्यस्त बनाया। शुरू हुई फ़सलों की कटाई, सबके चेहरे पर मुस्कान है छाई। सूरज ने भी
रिश्तों को नमन
सुधीर श्रीवास्तव
अजूबा सा लगता है पर सच है और अप्रत्याशित भी, न भेंट न मुलाक़ात न ही जान, न पहचान न कोई रिश्ता, न कोई संबंध। फिर भी अपना�
हिन्दी के गौरव निशा इंदु : प्रेमचंद
राघवेंद्र सिंह
हे! हिन्द धरा के अमर सूर्य, हिन्दी के गौरव निशा इंदु। है नमन तुम्हें, हे! कलमकार, हिन्दी प्राँगण के केंद्र बिंदु। त�
तम जहाँ में पल रहा है
अविनाश ब्यौहार
तम जहाँ में पल रहा है, रौशनी को छल रहा है। मैं करूँ तो क्या करूँ अब, आग है कुछ जल रहा है। सूर्य भी दिन भर चला औ, शाम हो
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
मिर्ज़ा ग़ालिब
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे। हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में, गुल
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
मिर्ज़ा ग़ालिब
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे।
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मिर्ज़ा ग़ालिब
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही, मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही। क़त्अ कीजे न तअल्लुक़ हम से, कुछ नहीं है तो अदावत ही सही�
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मिर्ज़ा ग़ालिब
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही, मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही।
कब वो सुनता है कहानी मेरी
मिर्ज़ा ग़ालिब
कब वो सुनता है कहानी मेरी, और फिर वो भी ज़बानी मेरी। ख़लिश-ए-ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ न पूछ, देख ख़ूँनाबा-फ़िशानी मेरी।
कब वो सुनता है कहानी मेरी
मिर्ज़ा ग़ालिब
कब वो सुनता है कहानी मेरी, और फिर वो भी ज़बानी मेरी।
घर का रास्ता
मंगलेश डबराल
कई बार मैंने कोशिश की इस बाढ़ में से अपना एक हाथ निकालने की कई बार भरोसा हुआ कई बार दिखा यह है अंत मैं कहना चाहता �
बाक़ी कविता
कुँवर नारायण
पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है। जीवन को पूरी तरह पाने और पूरी तरह दे जाने के
तब किसी की याद आती
गोपालदास 'नीरज'
तब किसी की याद आती! पेट का धंधा ख़त्म कर लौटता हूँ साँझ को घर बंद घर पर, बंद ताले पर थकी जब आँख जाती। तब किसी की याद �
यह दर्द
धर्मवीर भारती
ईश्वर न करे तुम कभी ये दर्द सहो! दर्द, हाँ अगर चाहो तो इसे दर्द कहो; मगर ये और भी बेदर्द सज़ा है ऐ दोस्त! कि हाड़-हाड़ च�
माँ याद तेरी जब आती है
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
माँ क्या लिखूँ मैं तुम पर रब, तुम में ही ख़ुद को पाता हूँ। व्यक्तित्व तुम्हीं अस्तित्व सकल, माँ ममतांचल सुख देता है
गोस्वामी तुलसीदास
रविंद्र दुबे 'बाबू'
श्रवन दिवस भव, भगत सफल जग। मंगल भवन कह, जनकवि नरहरि।। पवन लहर चल, पुलकित तन मन। हरि कवि प्रेम वस, विषधर चढ धरि।। प्र
बहना का प्यार
रविंद्र दुबे 'बाबू'
झगड़े मुझको बहना ताड़े, दुश्मन सी इतराती है, ख़ुद बिखरे, गले लगाती, फिर पुचकार मनाती है। छेड़े मुझको करे शृंगार, मान क�
आह जो दिल से निकाली जाएगी
अकबर इलाहाबादी
आह जो दिल से निकाली जाएगी, क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी। इस नज़ाकत पर ये शमशीर-ए-जफ़ा, आप से क्यूँकर सँभाली जाएगी।
मेहरबानी है अयादत को जो आते हैं मगर
अकबर इलाहाबादी
मेहरबानी है अयादत को जो आते हैं मगर, किस तरह उन से हमारा हाल देखा जाएगा। दफ़्तर-ए-दुनिया उलट जाएगा बातिल यक-क़लम, ज�
तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है
अकबर इलाहाबादी
तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है, बला के पेच में आया हुआ है। न क्यूँकर बू-ए-ख़ूँ नामे से आए, उसी जल्लाद का लिक्खा ह
आह जो दिल से निकाली जाएगी
अकबर इलाहाबादी
आह जो दिल से निकाली जाएगी, क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी।
मेहरबानी है अयादत को जो आते हैं मगर
अकबर इलाहाबादी
मेहरबानी है अयादत को जो आते हैं मगर, किस तरह उन से हमारा हाल देखा जाएगा।
हर एक से सुना नया फ़साना हम ने
अकबर इलाहाबादी
हर एक से सुना नया फ़साना हम ने देखा दुनिया में एक ज़माना हम ने अव्वल ये था कि वाक़फ़ियत पे था नाज़ आख़िर ये खुला कि
भाए जो निगाह को वही रंग अच्छा
अकबर इलाहाबादी
भाए जो निगाह को वही रंग अच्छा लाए जो राह पर वही ढंग अच्छा क़ुरआन-ओ-नमाज़ से अगर दिल न हो गर्म हंगाम-ए-रक़्स-ओ-मुतरिब
समझाया हमने कि हम भी जले हैं
गोकुल कोठारी
सज धज पतंगे कहाँ को चले हैं, समझाया हमने कि हम भी जले हैं। निकला है घर से फिर इक दीवाना, कहता है मुझको मोहब्बत निभाना
गीता सार
गोकुल कोठारी
धर्म विरुद्ध है नीति जाकी कोई टार सका नहीं विपदा वाकी भूल गया तू एक ही क्षण में किस कारण तू खड़ा है रण में समझ यहाँ �
गाँव का बचपन
अखिलेश श्रीवास्तव
गाँव में बीते बचपन का मुझे दृश्य दिखाई देता है, अपने गाँव का वो प्यारा मुझे स्वप्न दिखाई देता है। काँव-काँव कौओं �
रक्षा बंधन
अखिलेश श्रीवास्तव
भैया रेशम के धागे का बंधन भूल न जाना, रक्षाबंधन के दिन भैया बहिन को नहीं भुलाना। घर में रहकर बचपन में हम कितनी धूम
आज़ादी के पचहत्तर साल
अखिलेश श्रीवास्तव
हुई पचहत्तर की आज़ादी अब नई अलख जगानी होगी, देश के सभी युवाओं को अब इसकी शान बढ़ानी होगी। शहीदों की क़ुर्बानी की हम�
ये आज़ादी का अमृत महोत्सव
गणपत लाल उदय
ये आज़ादी का अमृत महोत्सव सबको मनाना है, जान से प्यारा यह तिरंगा हम सबको फहराना है। उनके पदचिन्हों पर आज हम सभी को च
लिख दे कलम ओ प्यारी
राघवेंद्र सिंह
जिस राह वो चली थी, भारत की नौजवानी। लिख दे कलम ओ प्यारी, मेरे देश की कहानी। जिस राह वो चले थे, आज़ाद चंद्रशेखर। उस र
धरा से शिखर तक तिरंगा
अभिषेक अजनबी
यह धरा है स्वाभिमान की, यह धरा है हनुमान की। इस धरा की बात निराली, यहाँ की हर लड़की है काली। इस धरती से टकराने की हर म
तिरंगा ऊँचा रहे हमारा
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
भारत मातृभूमि तुझे नमन, नमन तिरंगा शान तुम्हारा। कल आज और कल का भारत, चहुँ कीर्ति पताका जय न्यारा। सबसे प्यारा ह
शहीद-ए-आज़म
गोकुल कोठारी
वतन के लिए ओढ़े जो कफ़न, कहलाए वो शहीद-ए-आज़म। न रास आया ज़ुल्मों सितम, यूँ कहलाए वो शहीद-ए-आज़म। जिनकी हुकूमत का न डूबा उ
स्वतन्त्रता आव्हान
रविंद्र दुबे 'बाबू'
मातृभूमि की पावन माटी, का अब तिलक लगाना है, खोई गौरव जग जननी का, फिर से अलख जगाना है l सोन चिरैया की ख़ातिर, मरदानी बन र�
मैं भारत हूँ भरत वंश का
राघवेंद्र सिंह
मैं भारत हूँ भरत वंश का, मेरा गौरव गान सुनो। अलंकार से सदा सुशोभित, मेरा तुम अभिमान सुनो। स्वाभिमान के चिन्हों पर
आज़ादी का अमृत महोत्सव
डॉ॰ सत्यनारायण चौधरी 'सत्या'
आओ सब मिल कर मनाएँ उत्सव, आज़ादी का अमृत महोत्सव। साल पचहत्तर बीते हैं अभी तक, नाम भारत का गूँज रहा जल थल नभ तक। उड़�
शत्रु
अज्ञेय
ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, “ज्ञान, मैंने तुम्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर संसार में
भरोसा ख़ुद पर
रविंद्र दुबे 'बाबू'
विश्वास का पौधा बोना चाहा, मिट्टी जो वफ़ादार नहीं, उग न पाया पारदर्शिता पानी से, सिखलाती निर्मल रहे पर, कुछ छद्म विभ�
बोरिया-बिस्तर
अविनाश ब्यौहार
वह शहर में नया-नया आया था। मैंने यह समझकर घर में शरण दे दी कि वह मित्र का लड़का है। जॉब तलाशने पर उसे इस शहर में जॉब मि�
सुभद्रा कुमारी चौहान
राघवेंद्र सिंह
हे कोकिल! हिन्दी की विदुषी, और राष्ट्र चेतना की सरिता। है नमन तुम्हें करता भारत, हे! काव्य साधिका हे! नमिता। तुम स्
आदमी ज़िंदा है
संजय राजभर 'समित'
मौन रहना– आमंत्रण है शोषण का द्योतक है कायरता का। कभी-कभी एक ग़ुस्सा है एक गंभीर ज्वालामुखी का फटने पर विनाश। क�
ज्येष्ठ महात्म
अनिल भूषण मिश्र
तीसरा माह ज्येष्ठ का आया, सूरज ने रौद्र रूप दिखलाया। धरती के कण-कण को गरमाया, सबका हाल बेहाल कराया। छाया भी अब माँग
शब्द
संजय राजभर 'समित'
मैं शब्द हूँ, दर्शन, ज्ञान, विज्ञान, योग का संचयन और व्यक्त करने का माध्यम हूँ। जहाँ-जहाँ जिस समूह ने जिस-जिस रूप �
हे! कृष्ण तुम्हें आना होगा
अखिलेश श्रीवास्तव
अब हाथ जोड़कर विनती है, हे! कृष्ण तुम्हें आना होगा। अपनी नीति और गीता का, उपदेश तुम्हें दुहराना होगा। कंस जैसे राक
श्याम बनवारी रास रचैया
रविंद्र दुबे 'बाबू'
मुरली सुनाएँ धुन, मन बसिया, श्याम बनवारी, रास रचैया। जिसके नेह में, रम जाएँ सारे मुरली वाले, ओ नंद कन्हैया। राधा का
मेरे देश की मिट्टी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
मेरे देश की मिट्टी नाज़ हमें, जन्नत धरती की शान सजें। परमवीर जाँबाज़ों शहीद, आज़ाद वतन मदमाते हैं। यह कर्मपथिक ह�
अमर हुए जाँबाज़
डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
सुकुमा की धरती हुई, आज रक्त से लाल। परिजन सारे रो रहे, होकर के बेहाल॥ होकर के बेहाल, तड़पते घायल सैनिक। ज़ालिम चलते �
बोलती दीवार
डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
यह रहा मेरा १० बाई १० का कमरा। कमरे के सीलन भरी दीवारों पर उभरी है छोटी-छोटी आकृतियाँ, मैं नित देखती हूँ आकृतियों क�
ठेस
फणीश्वरनाथ रेणु
खेती-बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते। लोग उसको बेकार ही नहीं, 'बेगार' समझते हैं। इसलिए, खेत-खलिहान
एक संभाव्य भूमिका
फणीश्वरनाथ रेणु
आपने दस वर्ष हमें और दिए बड़ी अनुकंपा की! हम नतशिर हैं! हममे तो आस्था है : कृतज्ञ होते हमें डर नहीं लगता कि उखड़ न ज
मुझे तुम मिले!
फणीश्वरनाथ रेणु
मुझे तुम मिले! मृतक-प्राण में शक्ति-संचार कर; निरंतर रहे पूज्य, चैतन्य भर! पराधीनता—पाप-पंकिल धुले! मुझे तुम मिल�
बहुरूपिया
फणीश्वरनाथ रेणु
दुनिया दूषती है हँसती है उँगलियाँ उठा कहती है... कहकहे कसती है— ‘राम रे राम! क्या पहरावा है क्या चाल-ढाल सबड़-भब
साहित्यकार का कर्तव्य
फणीश्वरनाथ रेणु
सूक्ष्मता से देखना और पहचानना साहित्यकार का कर्तव्य है—परिवेश से ऐसे ही सूक्ष्म लगाव का संबंध साहित्य से अपेक्षि
आराधन श्रीकृष्ण का
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
हे! अर्जुन के सारथी, हे गिरिधर गोपाल। नंदलाल यशुमति लला, राधा प्रीत निहाल॥ कृष्ण लाल प्रिय राधिका, प्रथम प्रीत मन�
आषाढ़ महात्म
अनिल भूषण मिश्र
चौथा माह आषाढ़ है आया, आग उगलते सूरज पर विराम लगाया। नहीं चलेगी किसी की गुंडागर्दी, गर्मी की तुमने तो हद कर दी। सूरज
नटखट रचावे लीला न्यारी हो
आशीष कुमार
नटखट रचावे लीला न्यारी हो मोरा बाँके बिहारी नटखट रचावे लीला न्यारी हो मोरा बाँके बिहारी बाँके बिहारी मोरा बाँके
जन्माष्टमी पर्व है आया
आशीष कुमार
जन्माष्टमी पर्व है आया, सुख समृद्धि उल्लास है छाया। मंगल पावन अनुपम बेला, विराज रहे लड्डू गोपाला। मोर पंख का मुक�
श्याम की बाँसुरी मुझे पुकारे
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
राधा बोली चलो सखी मधुवन, श्याम की बाँसुरी मुझे पुकारे। सुन रोम रोम सखि पुलकित तन मन, कान्हा नटवर मुख नैन निहारे।
कान्हा आयो रे
गोकुल कोठारी
ठुमक-ठुमक पैजनिया, मनमोहनी मुस्कान लियो अधरा में, छनक-छनक कंकणी बाजत ताहि कमलजात करा में। छप्पन भोग सुहावै नहिं ते
सावन महात्म
अनिल भूषण मिश्र
पाँचवाँ माह आया है सावन, लागे यह सबको मनभावन। बरस रही है नित वर्षा रानी, खिली-खिली है कृषि किसानी। धरती हो गई अब हरी
एक मीरा एक राधा
रविंद्र दुबे 'बाबू'
पागल हुआ है मन, श्यामल की माया में, भूख प्यास सुध नहीं अब तो, भक्ति सुहाई रे। एक मीरा एक राधा दोनों, प्रेम दीवानी हैं,
जैसा चलता है चलने दे
अविनाश ब्यौहार
जैसा चलता है चलने दे, सूरज ढलता है ढलने दे। तम को है दूर भगाने को, दीपक जलता है जलने दे। शम्मा महफ़िल में जलती है, औ
युद्ध दस्यु बना देता हैं
विनय विश्वा
युद्ध दस्यु बना देता हैं खुले विचारों को ध्वस्त कर देता हैं अपनी ख़ामोशी की ऐंठन में महाभारत हो जाती हैं भीष्म छलन
भादौं महात्म
अनिल भूषण मिश्र
छठा माह भादौं का आया, वर्षा चहुँओर घनघोर कराया। उफनाए हैं सब ताल-तलैया, उफनाई हैं गंगा यमुना मईया। कहीं बाढ़ आई है प�
सीख लिया है तुमसे कान्हा
सुषमा दीक्षित शुक्ला
सीख लिया है तुमसे कान्हा, मैंने भी मुस्काना। स्वयं कठिन जीवन जीकर के, गीता ज्ञान सिखाना। राधा जी से सीख लिया है, क�
ख़ुद से ख़ुद का प्रश्न
विनय विश्वा
मैं कौन हूँ, कैसा हूँ, क्यों हूँ? ये कौन पूछ रही है! किसका, किससे प्रश्न है? मन से, अंतर्तम से या फिर स्व शरीर से! किसका
उठो विवेकानंद बनो
विनय विश्वा
हे भारत के वीर सपूतों उठो विवेकानंद बनो। अपने भारत नीज को पहचानों तुम उठो तब तक न रुको लक्ष्य न जब तक पा लो तुम। हे
जीवन-राग
विनय विश्वा
जीवन के कुछ सच जो ना अपना है सब एक सपना है। आना और जाना जीवन के सुख-दुःख खेल-खिलौना सब फूल यहाँ खिले मुरझाए और धम से
आँख ने आँसू बहाए
अविनाश ब्यौहार
आँख ने आँसू बहाए, तुम बहुत ही याद आए। एक झूठी कल्पना में, ख़्वाब रातों भर सजाए। यह सरासर ज़ुल्म होगा, प्यार में सब कु
वक़्त बहुत ही झूठा निकला
अविनाश ब्यौहार
वक़्त बहुत ही झूठा निकला, ख़ाक मनाएँ रूठा निकला। अर्जुन की जब बात चली तो, देखो द्रोण अँगूठा निकला। कविताओं में बा�
मटके का पानी
संजय राजभर 'समित'
कुँआ खोदता कौन है? हल जोतता कौन है? घर बनाता कौन है? मवेशियाँ चराता कौन है? पसीने से सिंचित इन सब से सुख उठाता कौन ह
पुस्तक
डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
पोथी पुस्तक मोल कर, पढ़े नहीं अब कोय। कैसे इस संसार का, कहो सुमंगल होय॥ लोग करें अब आप को, ई-बुक से सन्तुष्ट। इस कारण �
अटूट विश्वास
रविंद्र दुबे 'बाबू'
भगवान बसते कण-कण में, कहाँ-कहाँ खोज मैं आया, मूर्ति गड़ ली, शिला तराशी, देव का वास विश्वास में पाया। कुरुक्षेत्र मे�
बड़ा मज़ा आता था
अखिलेश श्रीवास्तव
बचपन के दिनों में दोस्तों के साथ मिलकर शरारतों को करने में बड़ा मज़ा आता था। बचपन के खेल-खेल में अपने दोस्त की ढी�
कान्हा कृष्ण मुरारी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
अभिनंदन कान्हा जनम, विष्णु रूप अवतार। बालरूप लीला मधुर, शान्ति प्रेम रसधार॥ नंदलाल श्री कृष्ण भज, वासुदेव घनश्य�
मैं मान रहा हूँ हार प्रिये
संजय राजभर 'समित'
मान जाओ हे! महारानी, हम ग़लती से क्यूँ रार किए? अच्छा तुम ही जीतीं मुझसे, मैं मान रहा हूँ हार प्रिये। भोली-भाली छैल �
जीवनोत्सव
विनय विश्वा
जीवन का होना उत्सव होना है मतलब नया राग बोना है। बोना है धरती में पीड़ा को जो वीणा की धुन सुनाती इड़ा को खुल जाता ज्�
सदा सुहागन
रविंद्र दुबे 'बाबू'
जन्म-जन्म का साथ रहे, मेरे साजन का, हर राह में हो हरदम साथ, पिया मनभावन का। हे भोले बाबा शिव, माँ सती दो वरदान, आरती क�
गणपति विनायक
रविंद्र दुबे 'बाबू'
स्वामी मंगलकरता, गजकाय विनायक। ऋद्धि सिद्धि हरषित, मोह दिखावत है॥ तिरलोकी शिवसुत, भव कलुष नाशक। गौरी तनय गणेशा,�
प्रथम पूजनीय आराध्य गजानंद
गणपत लाल उदय
प्रथम पूजनीय प्यारे आराध्य गजानन्द, मनोकामना पूरी करतें हमारे ‌गजानन्द। कष्ट विनायक रिद्धि-सिद्धि फलदायक, झुका�
एक कण
अखिलेश श्रीवास्तव
एक वायरस ने दुनिया में कितना भय फैलाया है, कोविड-19 नाम से अपना परचम फैलाया है। फ्रांस चीन इटली को भी आग़ोश में अपने
गर्मियों की छुट्टियों में
निहाल सिंह
गर्मियों की छुट्टियों में नानी के पुरवा जाते थे, भरी कटोरी दही के साथ मक्के की रोटी खाते थे। यामा को सोने के अवसर �
बादल मगन हो गए
अविनाश ब्यौहार
बरसता पानी ख़ूब, बादल मगन हो गए। हैं कर रहीं लहरें उत्पात। पावस की हुई बहुत बिसात॥ उजड़ जाए है ऊब, बादल मगन हो गए।
मज़लूम यहाँ हैं प्यार करें
अविनाश ब्यौहार
मज़लूम यहाँ हैं प्यार करें, कुछ थोड़ा सा उपकार करें। गर इश्क़ हुआ है धोखा तो, फिर कैसे आँखें चार करें। गजरा तो बा�
इक तरफ़ है प्यास दूजी ओर पानी का घड़ा
मनजीत भोला
इक तरफ़ है प्यास दूजी ओर पानी का घड़ा, प्यास जूती पाँव की सिरमौर पानी का घड़ा। चाक से उतरा तो पागल जातियों में बंट ग�
महामारी
अखिलेश श्रीवास्तव
ये कैसी महामारी की आँधी चल रही है, असमय आई मौतों से ज़िंदगी डर रही है। अस्पतालों में मरीज़ों के लिए जगह भी नहीं है,
कृष्ण मुरारी
विपिन दिलवरिया
वसुदेव सुत देवकी लाला। सिर पर झाँपी उसमें डाला॥ चले देवकी से वह कहकर। पहुँचे गोकुल नगरी चलकर॥ गोकुल नगरी में ग
डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन
राघवेंद्र सिंह
धन्य-धन्य वह तिरुत्तनी और, धन्य हुआ वह तिरुपति। जन्मीं जहाँ विलक्षण प्रतिभा, जिसे पवन सी मिली गति। वेदों और उपनि�
गुरु ऋण मुझ पर है
रविंद्र दुबे 'बाबू'
मात पिता है, मेरे जन्मदाता, बाल जीवन आपने सँवारा। प्रकाश पुंज ज्ञानो संग पाऊँ, कर्त्तव्य सशक्त, सुदृढ़ किनारा। दी
गुरु
गोकुल कोठारी
सोचो, उसके बिना कैसी होती धरा, अज्ञान की एक गहन कंदरा। मैं भटकता इस तिमिर में कहाँ, जो बनकर उजाला वो आता नहीं, मैं खो
शिक्षक
विपिन दिलवरिया
शिक्षक क्या है? शिक्षक निराकार है, शिक्षक का नाम संस्कार है। शिक्षक फ़ज़ल है, शिक्षक कोरे काग़ज़ को ज्ञान रूपी शब्
बिन बुलाया मेहमान
आशीष कुमार
वह आता है। रोज़ आता है। बिन बुलाए आता है। वह जो मेरा कुछ भी नहीं लगता पर मेरा बहुत कुछ है। उसे देखे बिना मैं नहीं रह सक�
हिंदी सचमुच महान है
आशीष कुमार
हिंदी महज़ भाषा नहीं, हम सब की पहचान है। जोड़े रखती मातृभूमि से, यह भारत की शान है। हिंदी में है मिठास भरी, सहज सरल आ�
हिन्द की पहचान हिन्दी
राघवेंद्र सिंह
मेरे हिन्द के धरा की, पहचान है ये हिन्दी। वागेश्वरी की वीणा, और तान है ये हिन्दी। हिन्दी ही स्वर है व्यंजन, हिन्�
हिन्दी बोल इंडिया
गणपत लाल उदय
हिन्दी बोल इंडिया कहकर क़लम आज चलानी है, सरल शब्दों में कहा जाएँ तो यह बहुत वंदनीय है। वैश्विक स्तर पे जानते है अब र
मातृभूमि और मातृभाषा
गोकुल कोठारी
सुदूर कहीं किसी देश में, जब कोई मिलता, निज भाषा, निज वेश में, मन में वात्सल्य भाव से, उदगम एक सोता होगा, आँखें भर आएँगी
आम आदमी की व्यथा
अनिल भूषण मिश्र
ये कविता नहीं सच्ची कथा है, आम आदमी की व्यथा है। आमदनी जब आवश्यकता से कम होती है, मन में चिन्ता बेचैनी स्वाभाविक ह�
हिंदी भाषा
रविंद्र दुबे 'बाबू'
हिन्दी भाषा जानो! हिन्द जो है मेरा अभिमान, मातृभू की वंदनीय, भाषा सुखदायी है। सरल सहज तान, स्वर लय माला गीत, पहचान �
मन
अखिलेश श्रीवास्तव
मन चंचल है तुम ये जानो, मन की शक्ति को पहचानो। मन की गति का अंत नहीं है, ये तुम अपने मन से जानो॥ मन की भाषा समझ सको त�
पितरों का आशीष
अखिलेश श्रीवास्तव
पितृ पक्ष में पितर हमारे, पृथ्वी लोक पर आते हैं। प्यार हमारा पाकर वो, आशीष हमें दे जाते हैं॥ कल तक थे जो साथ हमारे, �
हे सकल सृष्टि के शिल्पकार!
राघवेंद्र सिंह
हे सकल सृष्टि के शिल्पकार! हे सृजन कला के अधिष्ठात्र! है नमन तुम्हें हे वास्तु पुत्र! हो कला अधिपति एक मात्र। तुम �
सर्वप्रथम वास्तुकार है विश्वकर्मा
गणपत लाल उदय
दुनिया के सर्व प्रथम, वास्तुकार विश्वकर्मा, १७ सितम्बर को जन्में भगवान विश्वकर्मा। हर वर्ष कन्या संक्रांति को मन
शीश महल
संजय राजभर 'समित'
पारदर्शी हो जो कुछ न छुपाता हो अंदर बाहर एक समान एक खुली किताब की तरह। जैसे– आत्मा जिसमें न घात न प्रतिशोध हो क�
मैं वृक्ष वृद्ध हो चला
राम प्रसाद आर्य
फूलना-फलना था जो, दिन व दिन कम हो चला। वृद्धपन बढ़ता चला, यौवन का जोश अब ढँला। मैं वृक्ष वृद्ध हो चला॥ हर पात पीत ह�
प्रेम में आस
विनय विश्वा
यादों की कसक लिए खोजती है ये निगाहें प्रेम में ये खोज यूँ ही जारी रहे 'तबस्सुम' खिलता रहे नजारत बढ़ती रहें, क्योंकि प
वाणी से ब्रह्म की ओर
विनय विश्वा
मानुष की पहली माकूल 'मुक्तक' स्वर की सुरीली ध्वनियों से ध्वनित शैशव की है ये स्वर वाणी ऊँ, आ आ, ...हून, सृजन की समर्थत�
लफ़्ज़ों के फूलें
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
लफ़्ज़ों के फूलें मनभावन, आनंद सकल सुख देता है। नव प्रभात अरुणिम मुस्कानें, मधुरिम मिठास दे जाता है। लफ़्ज़ों का �
गुरु
अर्चना मिश्रा
गुरु वो हैं जो ग़ुरूर से दूर हैं, हो मुश्किल कितना भी रास्ता देते हल ज़रूर हैं। जो भी मेरी लेखनी की चाल हैं, सब गुरु
ओ नभ के मंडराते बादल
आशीष कुमार
ओ नभ के मंडराते बादल! तनिक ठहर तनिक ठहर। अभी-अभी तो आया है तू, विशाल गगन पर छाया है तू। लौट ना जाना तुम अपने घर, नई नव�
हे गणेश!
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हे गणेश गिरिजा सुवन! जय गणपति महाराज। मंगल मूर्ति शिव तनय, पूर्ण करो सब काज। हर माता की गोद को, रखो सदा आबाद। सार�
आदेश की अवहेलना
अविनाश ब्यौहार
आदेश की अवहेलना, औ है दिलों से खेलना। यदि मुश्किलों में ज़िंदगी, तब तो दुखों का झेलना। गर काम से तुम बच रहे, पापड�
पितृ पक्ष में तर्पण
आशीष कुमार
पुरखों से चली आ रही परंपरा, पितृ भक्ति में होकर अर्पण, पार कराने उनको वैतरणी, पहुँचते गयाजी में करने तर्पण। अश्वि�
हे हास्य व्यंग के महारथी!
राघवेंद्र सिंह
हे हास्य व्यंग के महारथी! हे कला जगत के पुष्परत्न! है नमन तुम्हें करता भारत, मुखमण्डल तुम ही हर्ष यत्न। तुम स्वयं �
हास्य सम्राट राजू श्रीवास्तव को श्रद्धांजलि
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
हास्य गगन विहग उन्मुक्त उड़न, मुख अरुण किरण मुस्काया है। अवसाद ग्रस्त करता गुलशन, बस शाम ढले मुरझाया है। भरता उ�
जवानी का झंडा
रामधारी सिंह 'दिनकर'
घटा फाड़कर जगमगाता हुआ आ गया देख, ज्वाला का बान; खड़ा हो, जवानी का झंडा उड़ा, ओ मेरे देश के नौजवान! सहम करके चुप हो �
आग की भीख
रामधारी सिंह 'दिनकर'
धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है; मुँह को छ�
अरुणोदय
रामधारी सिंह 'दिनकर'
नई ज्योति से भीग रहा उदयाचल का आकाश, जय हो, आँखों के आगे यह सिमट रहा खग्रास। है फूट रही लालिमा, तिमिर की टूट रही घन क�
तिरंगा
सुनीता भट्ट पैन्यूली
हवाओं में आज देश-भक्ति की प्रगाढ भावना इस तरह फैल गई है कि फ़िज़ाएँ ख़ुशबूदार हो गई हैं मेरा भारत महान की प्राकट्य लहर
कृष्ण होना आसान नहीं किंतु नामुमकिन भी नहीं
सुनीता भट्ट पैन्यूली
ऐसा क्यों है कि बहुत सारे लोग मुझे जान नहीं पाते हैं?श्रीमद्भगवद्‌गीता में श्री कृष्ण ने कहा है। ऐसा इसलिए है शाय�
बालहठ
सुनीता भट्ट पैन्यूली
साँझ की वेला में पहाड़ी के नीचे घास की बिछावन में लेटकर वह देखती निर्निमेंष सूरज की भावभंगिमा को कौतुहलता वश... स�
हिंदी राजभाषा का उन्नयन और प्रसार
सुनीता भट्ट पैन्यूली
“जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता।” – डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद 14 सितंबर �
सोच का अस्तित्व
सुनीता भट्ट पैन्यूली
सोच का कोई तो अस्तित्व होगा न? डूबते सूरज की वृहद लालिमा में कुछ रेखाएँ खींची ज्यामितीय कुछ ख़ास समझ नहीं आया सोच क�
नदी व घाट
सुनीता भट्ट पैन्यूली
जीवन नदी है और गुरू घाट या पड़ाव, जो प्रतिबद्ध हैं सदियों से बिगड़ैल नदियों का रूख मोड़ने में... गुरु नदी में बहती अन�
आओ सब एक हो चले
दीपक राही
मैं कहूँगा, आओ सब एक हो चले। अपने लक्ष्य की और आगे बढ़ चले, फिर कोई आएगा, आपके इरादों को, कुचल कर चला जाएगा, मैं फिर भ�
आँखों की महिमा
अखिलेश श्रीवास्तव
आँखों का है खेल निराला, सुन लो भैया सुन लो लाला। आँखों का काजल लुट जाए, तुमको पता नहीं चल पाए॥ जब हम कभी दुखी हो जाए�
नव आश किरण मुस्काती है
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
नभ भोर अरुण चहुँ ओर शोर, पशु विहग प्रकृति चितचोर मोर, हलधर किसान उठ लखि विहान, नव आश किरण मुस्काती है। चहुँ प्रगत�
हे जनमानस के राष्ट्रकवि!
राघवेंद्र सिंह
साहित्य धरा के नलिन पुष्प, वसुधा पर भूषित प्रवर अंश। है नमन तुम्हें दिनकर उजास, हो दीप्तिमान तुम काव्य वंश। सौंद�
ग़म छुपाते रहे मुस्कुराते रहे
एल॰ सी॰ जैदिया 'जैदि'
ग़म छुपाते रहे मुस्कुराते रहे, दिल फिर भी हम लगाते रहे। हमारी ये दिवानगी भी देखो, तुम को पाके हम इतराते रहे। दिल-ओ-�
सुखद गृहस्थी की बुनियाद
रवि भूषण सिन्हा
सुखी गृहस्थ जीवन जीने की, होती सबकी अभिलाषा। बात गर हो इसकी बुनियाद की, उत्कृष्ट व्यक्तित्व से होती आशा। गृहस्थ�
दहेज
संजय राजभर 'समित'
गुड्डे-गुड्डी की शादी में, बच्चे सब शरारती हैं। कुछ बने हैं बाराती यहाँ, तो कुछ बने घराती हैं। कुछ नाच रहे हैं उछ�
शुभे कूष्माण्डा जय हो
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
करें सुमंगल जग जन गण मन कूष्माण्डा माँ, कोरोना दावानल रिपु जग तारिणि जय हो। छल प्रपंच लिप्सा मिथ्या बन्धन अभिशाप�
ऐसे थे गाँधी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
ऐसे थे गाँधी, कैसे थे गाँधी? जीवन के जिस रूप में देखो, वैसे थे गाँधी। जनता के साथ में, जनता के पास में, उनके सुख दुःख �
स्कन्दमातु जग मंगलमय हो
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
जय जननी जगतारिणी अम्बे! ममता करुणा सागर जय हो। स्कन्दमातु जय चतुर्भुजे, शुभदे वरमुद्रा माँ जय हो। मातु भवानी ग�
गांधी जी और स्वतंत्र भारत की स्त्री
सुनीता भट्ट पैन्यूली
गांधी जी का जीवन-दर्शन आश्रय स्थल है उन जीवन मूल्यों और विचारों का जहाँ श्रम है, सादगी है सदाचार है, आत्मसम्मान है, स�
जय गाँधी शास्त्री नमन
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सत्य त्याग शालीनता, कर्म धर्म समुदार। गाँधी शास्त्री युगल वे, स्वच्छ न्याय आधार॥ मार्ग अहिंसा विजय का, जीवन उच्च
हमारे राष्ट्रपिता
गणपत लाल उदय
महात्मा गाँधी कहलाएँ राष्ट्रपिता हमारे, आत्मशुद्धि शाकाहारी प्रेरणा देने वाले। सादा जीवन व उच्च विचार रखने वाल�
रावण वध
संजय राजभर 'समित'
मैं स्वयं रावण हूँ प्रति क्षण स्वयं से अंदर ही अंदर लड़ता हूँ, बाहर माया मोह का एक घना जंजाल है। बुद्ध महावीर
रामराज्य
अखिलेश श्रीवास्तव
नौजवान इस देश के अब एक नया इतिहास रचाएँगे, भ्रष्ट ग़ुंडे अपराधी लोगों को अब नेता नहीं बनाएँगे। एक अखंड भारत की घर-
नव प्रगति शान्ति नव विजय कहूँ
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
रावण दहन के इतिहास में, मैं दानवता का अंत कहूँ। या पाखंड मुदित खल मानस, कोटि रावण अब आभास करूँ। परमारथ सुख शान्त�
वो धूप अच्छी थी
अमृत 'शिवोहम्'
वो धूप अच्छी थी, जिसमें किसान के पसीने से, फ़सल लहलहा उठी। वो धूप अच्छी थी, जिसके ढलने पर प्रेम करता पक्षियों का जोड
कन्या भ्रूण हत्या
सुषमा दीक्षित शुक्ला
ऐ जग वालों! ये दर्द हमारा, रो रोकर तुम्हें सुनाती हूँ। गर्भस्थ शिशू कन्या निरीह, संसार त्याग मैं जाती हूँ। ऐ मानव! �
चिट्ठी
अखिलेश श्रीवास्तव
दूर बसे अपने लोगों की, ख़ैर-ख़बर लाती थी चिट्ठी। पोस्टमैन घर-घर में जाकर, पहुँचाते थे सबकी चिट्ठी॥ अपने लोगों की याद
मनभावन पूर्णिमा
रविंद्र दुबे 'बाबू'
चटक चाँदनी चंद्र किरणें, शुक्ल आश्विन की पूर्णिमा, सिंगार राधिका कृष्ण को अर्पित, प्रेम का महारास है पूर्णिमा। श
शरद पूर्णिमा
सुषमा दीक्षित शुक्ला
तपस्विनी के ओजस मुख सा, अद्भुत शीतल शरद चन्द्र है। पावस की घनघोर घटा संग, शशि सँग आया आज इन्द्र है। बरखा रानी नाच-
शरद पूर्णिमा
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
यह शरद पूर्णिमा का शशांक, खिल गया तीव्र लेकर उजास। पावन बृजभूमि अधीर हुई, यमुना की लहरों में हलचल। हो गया दृश्य रम
कुछ तो है
प्रवीन 'पथिक'
कुछ तो है! जो ज़िंदगी के थपेड़ो के बीच, बहाती कई ज़िंदगियाँ। भर देती एक तड़प ,निराशा और अंतर्द्वंद्व का, महासागर। जी�
नवरात्रि की धूम
रविंद्र दुबे 'बाबू'
देखो-देखो रे नाचे मोर मैं भी नाचूँगी... देखो देखो रे नाचे मोर मैं भी नाचूँगी... नवरात्रि की धूम मची हैं करते नमन हम स
विपदा हरो माँ
रविंद्र दुबे 'बाबू'
शेर पे सवार, मेरी माँ शेरावाली, पापियों का करे संहार, माँ शेरावाली। पर्वत पर है राज करे माँ, झोली सभी की तू भर दे माँ�
आसमाँ क्यों जल रहा है भाइयो
अविनाश ब्यौहार
आसमाँ क्यों जल रहा है भाइयो, झूठ सच को छल रहा है भाइयो। जो समय बेकार सा लगता रहा, वो समय अब ढल रहा है भाइयो। चाँद भी �
करवा चौथ का चाँद
अर्चना मिश्रा
यूँ तो तुम रोज़ मेरी मुँडेर पर आकर दस्तक देते हो, रोज़ तुमसे ढेरों बातें भी होती हैं। पर आज की बात कुछ ख़ास है, आज मे
मैं सुहागन तेरे कारण
आशीष कुमार
मैं सुहागन तेरे कारण तेरे कारण ओ सजना जो तू नहीं तो फिर क्या ये बिंदी क्या कंगना मैं सुहागन तेरे कारण तेरे कारण ओ स
फूल मत फूलन बनो तुम
प्रशान्त 'अरहत'
मैं नहीं कहता कभी ये कामिनी, कमनीय हो तुम! या सुमुखि मानो गुलाबों की तरह रमणीय हो तुम! तुम वही हो जो कि चढ़कर के हिमा�
भारत का गौरव: डॉ॰ ए॰ पी॰ जे॰ अब्दुल कलाम
राघवेंद्र सिंह
एक राष्ट्र ऋषि, कर्तव्य निष्ठ, था दिनकर सा वह दीप्तिमान। धन्य हुई वह भारत धरणी, अद्भुत प्रतिभा थे कान्तिवान। था श�
बेटी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
भारत की बेटी दुर्गा है, भारत की बेटी सीता है। रण चंडी बन वह युद्ध करे, गीता सी परम पुनीता है। लक्ष्मीबाई रजिया बन �
मैं क्यों लिखता हूँ?
गोकुल कोठारी
या छंद हैं? या द्वन्द्व हैं? या भीतर का दावानल? या मिटाने तीव्र तपन को शब्द बने हैं गंगाजल? या साकार हूँ? या निर्विक�
पुण्य का परिणाम है बेटी
अखिलेश श्रीवास्तव
पिता की आत्मा माँ का अभिमान होती है बेटी, पूर्व जन्मों में किए पुण्य का परिणाम होती है बेटी। मेरे जीवन का वो सुनह�
मृत्यु शैया
सुनीता भट्ट पैन्यूली
मृत्यु शैया पर जब देह पुरज़ोर संघर्ष करती है विभीषिका से... पसलियाँ एकजूट हो जाती हैं श्वास की लय से लय मिलाने को वि�
आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं
मीर तक़ी 'मीर'
आरज़ूएँ हज़ार रखते हैं, तो भी हम दिल को मार रखते हैं। बर्क़ कम-हौसला है हम भी तो, दिलक-ए-बे-क़रार रखते हैं। ग़ैर ह�
क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़
मीर तक़ी 'मीर'
क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़, हक़-शनासों के हाँ ख़ुदा है इश्क़। दिल लगा हो तो जी जहाँ से उठा, मौत का नाम प्या�
अश्क आँखों में कब नहीं आता
मीर तक़ी 'मीर'
अश्क आँखों में कब नहीं आता, लोहू आता है जब नहीं आता। होश जाता नहीं रहा लेकिन, जब वो आता है तब नहीं आता। सब्र था एक �
इस वक़्त अपने तेवर पूरे शबाब पर हैं
कुँअर बेचैन
इस वक़्त अपने तेवर पूरे शबाब पर हैं, सारे जहाँ से कह दो हम इंक़लाब पर हैं। हम को हमारी नींदें अब छू नहीं सकेंगी, जि
आँखों से जब ये ख़्वाब सुनहरे उतर गए
कुँअर बेचैन
आँखों से जब ये ख़्वाब सुनहरे उतर गए, हम दिल में अपने और भी गहरे उतर गए। साँपों ने मन की बीन को काटा है इस तरह, थे उस क
इस तरह मिल कि मुलाक़ात अधूरी न रहे
कुँअर बेचैन
इस तरह मिल कि मुलाक़ात अधूरी न रहे, ज़िंदगी देख कोई बात अधूरी न रहे। बादलों की तरह आए हो तो खुल कर बरसो, देखो इस बार
प्रीति में संदेह कैसा?
कुँअर बेचैन
प्रीति में संदेह कैसा? यदि रहे संदेह, तो फिर— प्रीति कैसी, नेह कैसा? प्रीति में संदेह कैसा! ज्योति पर जलते शलभ ने
आग की कहानी
कुँअर बेचैन
धुएँ से सुनी है हमने आग की कहानी! आग की कहानी जो है सदियों पुरानी! पत्थर के घर में जन्मी जंगल ने पाली जल ने जलन अप�
मन
श्याम सुन्दर अग्रवाल
तेरा मेरा उसका मन, अजब पहेली सबका मन, मन का जाने मन न कोई, मन ही जाने मन का मन। चाहे ये हो जाए मन, चाहे वो हो जाए मन, भल�
मेहनतकशों की पुकार
श्याम सुन्दर अग्रवाल
भैया रेऽऽऽऽऽऽ भैया रे हल ना रुके, रुके ना हँसिया रेऽऽऽ, भैया रे। रूठ जाए मेघा तो रुठ जाने देना डूब जाएँ तारे तो डूब �
बीच ही सफ़र पाँव रोक ना मुसाफ़िर
श्याम सुन्दर अग्रवाल
बीच ही सफ़र पाँव रोक ना मुसाफ़िर, आगे है सुहानी तेरी राह रेI कहने को जड़ है, ना चले रे ह�
धनतेरस शुभकामना
श्याम सुन्दर अग्रवाल
धान्य-धन से देवी लक्ष्मी, देश का आँगन सजा दे, दीप का आलोक अपने गेह को स्वर्णिम बना दे, तम, निराशा, द्वेष, कटुता की ढहें
बिन साजन, सावन की रातें
सुशील कुमार
सावन की बरसातें आईं कागा फिर से घूम, साजन मेरे कब आएँगे पूछे दिल मासूम। वैसे तो विश्वास मुझे वो भी होंगे बेचैन, न क�
सखी रे चल पनघट की ओर
सुशील कुमार
सखी रे चल पनघट की ओर, वाट निहारत आज वहाँ पर यशुदा नन्दकिशोर। पानी भरन बहाने आई लेकर मटकी हाँथ, राह अकेले में डर लाग�
तन-मन देख प्रतीक्षा हारे
सुशील कुमार
नैन थके हैं थकी दिशाएँ, तन मन देख प्रतीक्षा हारे, सतिए थके थकी रंगोली, कब आओगे द्वार हमारे। नींद बेचकर रात ख़रीदी, �
क्या माँग भरने का मुझे अधिकार दोगी?
सुशील कुमार
उम्र भर ख़िदमत करूँगा सिर्फ़ यह विश्वास दो तुम, क्या अमर शौभाग्य बनने का मुझे अधिकार दोगी? कह रही हो तुझपे मेरा पूर्ण
नवरात्रि
सुशील कुमार
माता दुर्गा का लगे, तीजा रूप महान। अर्धचंद्र है भाल पर, चंद्रघंटा सुजान॥ चंद्रघंटा सुजान, भुजा दस सोहे माँ के। मि�
रावण दहन
आशीष कुमार
लगा हुआ है दशहरे का मेला, खचाखच भरा पड़ा मैदान है। चल रही है अद्भुत रामलीला, जुटा पड़ा सकल जहान है। धनुष बाण लिए श्�
रावण ज़िंदा है
गोकुल कोठारी
सत्य आग्रही राम ने मारा, पर दुराग्रही रावण नहीं हारा। सदियों से हम फूँक रहे हैं, सारी ताक़त झोंक रहे हैं। लेकिन वह म�
बँधुआ मज़दूर
संजय राजभर 'समित'
मर गया रामू जीवन भर क़र्ज़ा चुकाते-चुकाते पर चुका नहीं पाया। कभी आधा सेर मज़दूरी कभी डाँट पेट की आग में फिर उसका ब�
गुज़रते मेरे पड़ाव
रवि भूषण सिन्हा
धीरे-धीरे मैं भी तो, जीवन की पैड़ी पर चढ़ता चला गया। समय की उँगली पकड़, आश्रमों की दहलीज़ तक पहुँचता चला गया। धीरे-ध
तुम्हें लिखना चाहा
प्रवीन 'पथिक'
मैंने जितनी बार, तुम्हें लिखना चाहा। मेरी लेखनी के पाँव, धँस गए शब्दों के दलदल में। अन्यमनस्क; भ्रमित पथिक की भाँ�
आग़ाज़
प्रवल राणा 'प्रवल'
आग़ाज़ हुआ दिल की आवाज की झंकार का, मन के तारों के कंपन इक छूटे हुए संसार का। कहीं मन की घुटन कहीं तन की तपन, कहीं तन का
एहसास
आशीष कुमार
मल्होत्रा परिवार की लाडली पद्मिनी उर्फ़ पम्मी ख़ुश-मिज़ाज लड़की थी। सुंदरता ऐसी की चाँद भी शरमा जाए। गोल मटोल मासूम स
नारी उत्पीड़न
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
नारी की नियति अस्मिता पर, जब प्रश्न उठा तुम मौन हुए। जीवन भर बंदिश में रहना, तुम कहने वाले कौन हुए। सदा प्रताड़ित हो�
छठ पूजन दें अर्घ्य हम
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
आदिदेव आदित्य अर्घ्य दूँ, धन मन जन कल्याण जगत हो। पूजन दें छठ अर्घ्य साँझ हम, हरें पाप जग मनुज त्राण हो। राग द्वेष
छठ पर्व
सुनीता भट्ट पैन्यूली
जल-लहरियों में आस्था और विश्वास के रंगों में सजी, शृंगार-विन्यास में व्रतधारी स्त्रियाँ दूर पहाड़ों पर नीम-कुहासे
एक अर्घ्य शौर्य को
गोकुल कोठारी
असंख्य सूर्य रश्मियों से प्रदीप्त ये धरा, तेजवान के लिए क्या तिमिर क्या जरा। सैकड़ों हों घटा या सैकड़ों हों ग्रह�
छठ पूजा की महिमा
दीपक झा 'राज'
यह त्योहार है बिहार का गर्व, लो आ गया छठ का महापर्व। स्वच्छता और संस्कृति का सरगम, आस्था और विश्वास का संगम। एक बार
मैं हूँ
केदारनाथ अग्रवाल
मैं हूँ आग और बर्फ़ की वसीयत मौत जिसे पाएगी जीवन से लिखी।
हे मेरी तुम!
केदारनाथ अग्रवाल
हे मेरी तुम! आज धूप जैसे ही आई और दुपट्टा उसने मेरी छत पर रक्खा मैंने समझा तुम आई हो दौड़ा मैं तुमसे मिलने को लेक�
इसी जन्म में इस जीवन में
केदारनाथ अग्रवाल
इसी जन्म में, इस जीवन में, हमको तुमको मान मिलेगा। गीतों की खेती करने को, पूरा हिंदुस्तान मिलेगा॥ क्लेश जहाँ है,
बसंती हवा
केदारनाथ अग्रवाल
हवा हूँ, हवा, मैं बसंती हवा हूँ! वही हाँ, वही जो युगों से गगन को बिना कष्ट-श्रम के सम्हाले हुए हूँ; हवा हूँ, हवा, मैं बस
दूर कटा कवि मैं जनता का
केदारनाथ अग्रवाल
दूर कटा कवि मैं जनता का, कच-कच करता कचर रहा हूँ अपनी माटी; मिट-मिट कर मैं सीख रहा हूँ गतिपल जीने की परिपाटी कानून�
आज नदी बिल्कुल उदास थी
केदारनाथ अग्रवाल
आज नदी बिल्कुल उदास थी, सोई थी अपने पानी में, उसके दर्पण पर बादल का वस्त्र पड़ा था। मैंने उसको नहीं जगाया, दबे पाँ
कृषक
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
कृषक का जीवन काँटों से भरा है, शीत ग्रीष्म बरखा से कब वे डरा है। विपत्तियों के पहाड़ सर पे उठाएँ, वह हँसता चेहरा खेत�
गुलकी बन्नो
धर्मवीर भारती
‘‘ऐ मर कलमुँहे!’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाज़ा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा,
कह रहीं हवाएँ
अविनाश ब्यौहार
शहर की व्यथाएँ कह रहीं हवाएँ। लग रहा ऐसे पत्थर के लोग हैं। कर्मों के भोग भोग रहे भोग हैं।। गले में अटक गईं जैसे स
जल ओक में भरने लगी
अविनाश ब्यौहार
जल ओक में भरने लगी, वह आचमन करने लगी। जब भी हवा आँधी बनी, ये सृष्टि भी डरने लगी। होता अगर है कोसना, मुझमें दुआ झरने �
उम्मीद
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
सफलता यदि छत है तो असफलताएँ उसकी सीढ़ियाँ खोकर तुमने जो पाया है देख उसे, आगे बढ़ेंगी आने वाली पीढ़ियाँ आसमाँ बड़�
दिल तुम्हारे दिल में अपना इक ठिकाना ढूँढ़ता है
सुशील कुमार
दिल तुम्हारे दिल में अपना इक ठिकाना ढूँढ़ता है, हो मिलन धरती का अंबर से बहाना ढूँढ़ता है। खो दिया अनमोल जीवन तुमको प�
इगास पर्व उत्तराखंड
सुनीता भट्ट पैन्यूली
"भैलो रे भैलो काखड़ी को रैलू, उज्यालू आलो अंधेरो भगलू" इगास पर्व पर उपरोक्त गढ़वाली लोकगीत गाते हुए,भैलों खेलते, गो�
बुद्ध बनने की इच्छा
प्रशान्त 'अरहत'
सिद्धार्थ के पिता की तरह; मेरे पिता के पास कोई राजपाट नहीं था, न मुझमें बुद्ध बनने की कोई इच्छा। मैंने सिर्फ़ एक घर छ�
नज़रिया
संजय राजभर 'समित'
जीवन सरल कैसे हो एक पैमाना लिए सारी उम्र मुद्राएँ बटोरता रहा। हर एक क़दम के बाद वही समस्याएँ पर तन-मन में ताक़त थी
अंतहीन आकृतियाँ
प्रवीन 'पथिक'
अंधेरी रात में, घने जंगल से गुज़रता हुआ; एक शराबी को, गीदड़ों के गुर्राने की आवाज़; भयानक हिलती हुई आकृति; औ झिंगुरों �
वक़्त ठहरा कब है
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
वक़्त ठहरा कब है बता मानव, जीवन मूक खड़ा रह जाता है। अबाधित दुरूह विघ्न से ऊपर, वायुगति कालचक्र बढ़ जाता है। शाश्व
पण्डित जवाहरलाल नेहरू
राघवेंद्र सिंह
हे रत्न! भूमि भारत, हे हिन्द की धरोहर! हे हिन्द स्वप्नदृष्टा! हे हिन्द के जवाहर! सच्चे सपूत तुम थे, इस हिन्द वाटिका �
दशरथ माँझी
गोकुल कोठारी
फड़कती भुजाओं का ज़ोर देखा, क्या ख़ूब बरसे घनघोर देखा। कर्मों की बहती दरिया देखी, उससे निकलती नई राह देखी। इतिहास रच
गुलाबी चूड़ियाँ
नागार्जुन
प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ, सात साल की बच्ची का पिता तो है! सामने गियर से ऊपर हुक से लटका रक्खी हैं काँच
सुबह-सुबह
नागार्जुन
सुबह-सुबह तालाब के दो फेरे लगाए सुबह-सुबह रात्रि शेष की भीगी दूबों पर नंगे पाँव चहलक़दमी की सुबह-सुबह हाथ-पैर ठ
गांधी
नागार्जुन
कल मैंने तुमको फिर देखा हे खर्वकाय, हे कृश शरीर, हे महापुरुष, हे महावीर! हाँ, लगभग ग्यारह साल बाद कल मैंने तुमको फि�
उनको प्रणाम!
नागार्जुन
जो नहीं हो सके पूर्ण-काम मैं उनका करता हूँ प्रणाम। कुछ कुंठित औ’ कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट जिनके अभिमंत्रित तीर हुए; रण
बादल को घिरते देखा
नागार्जुन
अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है। छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को मानसरोवर के उन स्वर�
ज़िंदगी की माया
अखिलेश श्रीवास्तव
ये ज़िंदगी की माया, कोई समझ न पाया। ये ज़िंदगी हमारी, है अनबुझी पहेली॥ कभी ख़ुशी का समंदर, कभी ग़मों का है मंज़र। किसी �
मानसिक तनाव
सुनील माहेश्वरी
अधिकतर तनाव का मुख्य कारण काम का समय से पूरा नहीं करना होता है, जिससे हमें मानसिक तनाव होता है, हमें अवचेतन मन में पत�
चमक
संजय राजभर 'समित'
न ठनक न खनक न सनक बस चुपचाप धैर्य से शांति से अनवरत सही दिशा में होश और जोश के साथ अपने लक्ष्य की ओर आत्मविश्व�
यह दुनिया एक भ्रम है
प्रशान्त 'अरहत'
हम जिस दुनिया में रहते हैं, वो हक़ीक़त नहीं है, एक भ्रम है। हम एक पूरे भ्रम और अधूरे सच के बीच जी रहे हैं, जो भ्रम किसी भ�
वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई
राघवेंद्र सिंह
स्वाभिमान के रक्त से रंजित, हुई धरा यह प्रिय पावन। हिला हुकूमत का सिंहासन, और हिला सन् सत्तावन। राजवंश की शान थी ज
लक्ष्मीबाई
गोकुल कोठारी
विषय नहीं आज यह, वह नर थी या नारी थी, लेकिन थी हाहाकारी, आदिशक्ति अवतारी थी। मातृभूमि की आन पर जब भी बन आई है, नर ही क्�
प्रेम
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
तेरी अनुपस्थिति ही प्रेम का एहसास कराती है पल भर का मिलन फिर बिझड़न उस पल में मेरी तड़पन तेरी यादों ने फिर जोड़ा �
सावन
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
सावन की बरखा में तन-मन झूम रहा है, धरा को मानो आकाश बूँदों से चूम रहा है। चिंताओं की चादर ओढ़े कृषक बैठा था, बरखा क�
रक्षा बंधन
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
कुछ रिश्तों की डोर कभी टूट न पाए, भाई-बहन के रिश्ते में खटास कभी न आए। छोटी-छोटी ग़लतियाँ जब भाई करता, माँ-बाप के ग़ुस
खोजे कृष्णा को मन
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
लागी जबसे लगन, खोजे कृष्णा को मन। चैन मिलता नहीं, तुझे ढूँढ़ूँ वन-वन। जीवन की यही आस, तुझसे मिलन की बुझे न प्यास। तू �
गजानन तेरी महिमा प्यारी
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
हे प्रभु! तेरी मूषक सवारी, गजानन तेरी महिमा प्यारी। भक्तों पर जब कष्ट पड़े तो, पल भर में कष्ट हरे तू सारी। प्रथम प�
मुझे पुकार लो
हरिवंश राय बच्चन
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो! 1. ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता,  जहान देखकर मुझे  नहीं ज़बान खोलता,  नहीं ज
मैं जीवन में कुछ कर न सका
हरिवंश राय बच्चन
मैं जीवन में कुछ कर न सका! जग में अँधियारा छाया था, मैं ज्वाला लेकर आया था, मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न
कहते हैं, तारे गाते हैं
हरिवंश राय बच्चन
कहते हैं, तारे गाते हैं! सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमने कान लगाया, फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते
कवि की वासना
हरिवंश राय बच्चन
कह रहा जग वासनामय  हो रहा उद्गार मेरा! 1. सृष्टि के प्रारंभ में  मैंने उषा के गाल चूमे,  बाल रवि के भाग्यवाले  दीप्�
तुम्हारे नील झील-से नैन
हरिवंश राय बच्चन
तुम्हारे नील झील-से नैन, नीर निर्झर-से लहरे केश। तुम्हारे तन का रेखाकार वही कमनीय, कलामय हाथ कि जिसने रुचिर तुम्
गुरु
राघवेंद्र सिंह
गुरु केवल राह दिखाते हैं, चलना तो ख़ुद को पड़ता है। गुरु तो दीपक बन आते हैं, जलना तो ख़ुद को पड़ता है। गुरु की वाणी मे�
वह युद्ध था
राघवेंद्र सिंह
वह युद्ध था सत्यार्थ का, जीवन के उस यथार्थ का। वह युद्ध कुंठित बोध का, बिन शोध के प्रतिशोध का। वह युद्ध था दो नेत्र
ज़िंदगी मौत से हारती नहीं
गोकुल कोठारी
जो हमारे ख़्यालों का रुख़ मोड़कर, याद करते उन्हें जो गए छोड़कर। बेजान है मौत तो मारती ही नहीं, ज़िंदगी मौत से हारती ही �
गुरु सृष्टि का वरदान
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
गुरु सृष्टि का सबसे सुंदर वरदान है, बिना गुरु के कहाँ किसी की पहचान है। जान कर, जो न जान पाए, 'सृजन' की नज़रों में वे
हिंद के माथे पर हिंदी
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
हिंद के माथे पर हिंदी बिंदी सा चमके है, आज विश्व के हर कोने में तू मोतियों सा दमके है। बग़ैर तेरे क्या करूँ कल्पना,
परोपकार की देवी मदर टेरेसा
आशीष कुमार
26 अगस्त, 1910 का दिन था वो, मासूम सी खिली थी एक कली। नाम पड़ा आन्येज़े गोंजा बोयाजियू, जो थी अल्बेनियाई परिवार की लाडली�
सूरज
आशीष कुमार
1. सूरज हूँ मैं प्रकाश बिखेरता तम मिटाता 2. सौर मंडल गतिशील रहता परिक्रमा में 3. ऊर्जा स्रोत हूँ संचरण करता जोश भ�
प्रेम का अस्तित्व
आशीष कुमार
1. शिव पार्वती कैलाश सुशोभित अमर प्रेम 2. सिया राम हैं वन-वन भटके प्रेम अटल 3. राधा कृष्ण सा दुनिया देखी नहीं प्रे�
तुम्हारी तारीफ़
प्रशान्त 'अरहत'
तुम्हारी तारीफ़ों के पुल नहीं बाँधूँगा। ज़ुल्फ़ों को घटाएँ, आँखों को झीलें, होटों को कलियाँ, नदियों सी चाल, नहीं कहूँ
विवेकानंद का सपना
प्रशान्त 'अरहत'
नज़र मंज़िल पे है जिनकी, वो क़दम खुद ही बढ़ाते हैं। फिर चढ़कर आसमानों पर, सितारे गढ़ के आते हैं। चाहे दीवार बनकर मुश्किल�
बेचारे कृषक
प्रशान्त 'अरहत'
वे नहीं जानते लड़ना अपने हक़ के लिए। वे वंचित रहते हैं तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद। उन्हें मयस्सर नहीं होती मूल�
माँ की ममता
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
आँचल में छुपाकर के अपने, ममता के स्नेह से नहलाती है, पाल पोस अपना जीवन दे, प्रिय सन्तति मनुज बनाती है। करुणामय माँ �
इक सुब्ह है जो हुई नहीं है
अली सरदार जाफ़री
इक सुब्ह है जो हुई नहीं है, इक रात है जो कटी नहीं है। मक़्तूलों का क़हत पड़ न जाए, क़ातिल की कहीं कमी नहीं है। वीर�
हम तिरी चाह में ऐ यार वहाँ तक पहुँचे
गोपालदास 'नीरज'
हम तिरी चाह में ऐ यार वहाँ तक पहुँचे, होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे। इतना मालूम है ख़ामोश है सारी महफ़िल, पर �
गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारो
गोपालदास 'नीरज'
गगन बजाने लगा जल-तरंग फिर यारो, कि भीगे हम भी ज़रा संग संग फिर यारो। किसे पता है कि कब तक रहेगा ये मौसम, रखा है बाँध क�
अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई
गोपालदास 'नीरज'
अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई, मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई। आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुज़री, �
ख़ुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की
गोपालदास 'नीरज'
ख़ुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की, खिड़की खुली है फिर कोई उन के मकान की। हारे हुए परिंद ज़रा उड़ के देख तू, आ जाएगी �
बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा
गोपालदास 'नीरज'
बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा, वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा। ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया, किसी कबीर
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
गोपालदास 'नीरज'
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए। जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर, फूल इस
सारा जग मधुबन लगता है
गोपालदास 'नीरज'
दो गुलाब के फूल छू गए जब से होंठ अपावन मेरे ऐसी गंध बसी है मन में सारा जग मधुबन लगता है। रोम-रोम में खिले चमेली साँ�
कानपुर के नाम पाती
गोपालदास 'नीरज'
कानपुर! आह! आज याद तेरी आई फिर स्याह कुछ और मेरी रात हुई जाती है, आँख पहले भी यह रोई थी बहुत तेरे लिए अब तो लगता है कि �
रोने वाला ही गाता है
गोपालदास 'नीरज'
रोने वाला ही गाता है! मधु-विष हैं दोनों जीवन में दोनों मिलते जीवन-क्रम में पर विष पाने पर पहले मधु-मूल्य अरे, कुछ ब�
भूल जाना
गोपालदास 'नीरज'
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! साथ देखा था कभी जो एक तारा आज भी अपनी डगर का वो सहारा आज भी हैं देखते हम तुम उसे पर है �
तुम हो, तुम्हारी याद है
प्रवीन 'पथिक'
तुम हो, तुम्हारी याद है और क्या चाहिए! दिल में एक जज़्बात है, और क्या चाहिए! हृदय में उमड़ता सागर है, बहते ख़्वाबों क�
प्रेम की भाषा
संजय राजभर 'समित'
अंतः से बोलो, मधु रस घोलो, प्रेम सरल हो,धाम करें। ममता की भाषा, सबकी आशा, पशु भी समझे, काम करें॥ परखते हैं खरा, समझो न ज़
ठंड की मिठास
रविंद्र दुबे 'बाबू'
ठंडी सिहरन शाम शहर से, तन मन ठिठुरे घर आँगन भी। तेज़ किरण लालिमा भाती, सूरज जागे देर, जल्द शयन भी॥ ओस की बूँदें हल्की
मारा ग़म ने
गोकुल कोठारी
नहीं तुमने, नहीं हमने, मारा अगर तो, मारा ग़म ने। नैनों से कहो, ज़्यादा न बहो, समझे हैं हम, कहो न कहो। गिनते थे दुनिया के �
पहेली जीवन की
प्रवीन 'पथिक'
अनबुझ पहेली जीवन की, जो बचा रहा वह नहीं रहा। जो टीश कभी उठी नहीं, वह शूल न हमसे सहा गया। कितनी नदियों का पता नहीं, जो �
प्रीति
संजय राजभर 'समित'
हाज़िर हूँ मैं पलक बिछाए, तेरी ही अभिनंदन में। शुभगे! बाँध लिया है तुमने, मुझे प्रीति के बंधन में॥ नीरस जीवन था तब म�
नई जेनरेशन
अखिलेश श्रीवास्तव
रंग ढंग नई जेनरेशन के हमको समझ न आए, सदी बीस को छोड़ के ये इक्कीसवीं सदी में आए। देर रात तक जगने की आदत इनके मन भाए,
तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
शाद अज़ीमाबादी
तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ, खिलौने दे के बहलाया गया हूँ। हूँ इस कूचे के हर ज़र्रे से आगाह, इधर से मुद्दतों आया गय
तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा
शाद अज़ीमाबादी
तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा, आँख वालों से न देखा जाएगा। सब तरह की सख़्तियाँ सह जाएगा, क्यूँ दिला तू भी कभी क�
अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया
शाद अज़ीमाबादी
अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया, कि मुँह से नाम लिया दिल में तू उतर आया। बहुत दिनों पे मिरी चश्म में नज़र आया,
उससे पूछा कुछ दिन पहले
ममता शर्मा 'अंचल'
उससे पूछा कुछ दिन पहले, बनकर मीत साथ में रह ले। रिश्ते को मज़बूती देकर, फिर जो जी में आए कहले। ग़म या ख़ुशी मिले जो भी �
नहीं बात करनी मत कीजै
सुशील कुमार
निशा चली है स्वप्न ब्याहने जलता दीपक मिले चाह में झूठे मन से झूठे सपनों को मेरे आकार न दीजै नहीं बात करनी मत कीजै।
लोक-लाज का डर
संजय राजभर 'समित'
सदाचार की संस्कृति मेरी, भेद मालूम है तुझको। प्रेम प्रदर्शित कैसे कर दूँ? लोक-लाज का डर मुझको। प्रेम पथिक तो सब �
हार का महत्व
डॉ॰ रोहित श्रीवास्तव 'सृजन'
समय रेत सा फिसल न जाए वक्त रहते तुम करो उपाय जीतने की आदत तो अच्छी पर हार से तू क्यों घबराए? हार तो वह अनमोल हार है ज�
कण्वाश्रम
सुनीता भट्ट पैन्यूली
हिमालय के दक्षिण में, समुद्र के उत्तर में, भारत वर्ष है जहाँ भारत के वंशज रहते हैं। संभवतः मैं उसी जगह पर खड़ी हूँ जहा
मूल चुका ना पाओगे
रमेश चंद्र बाजपेयी
तुम कितने भी बड़े हो जाओगे, पर मूल ना चुका पाओगे। तुम करो ग़लतियाँ हज़ार पर माँ की बद-दुआ, कभी ना पाओगे। माँ ने कितने
हे निशा निमंत्रण के द्योतक
राघवेंद्र सिंह
हे अरुणोदय के प्रथम अंशु! हे निशा निमंत्रण के द्योतक! हे मृदुभावों के कन्त हार! हे दिग दिगंत के विद्योतक! तुम प्रे�
आन-बान और शान की प्रतीक हैं टोपियाँ
सुनीता भट्ट पैन्यूली
सर्द मौसम है कभी बादल सूर्य को आग़ोश में ले लेते हैं कभी सूरज देवता बादलों को पछाड़कर धूप फेंकते यहाँ वहाँ नज़र आ जात
वह तुम्हीं थी
प्रवीन 'पथिक'
तुम्हारा यूॅं मिलना; जैसे मुरझाते पौधों की, धमनियों में प्रेम जल का प्रवाह होना; जिसका पल्लवन ये सुंदर पुष्प है। �
भाग्य
रमेश चंद्र बाजपेयी
हे मानुष! भाग्य को कोस कर, विकास को अवरोध मत कर। श्रम बिंदु से लिख दे ललाट को, क्योंकि तू देव नहीं है नर। इंसान के स
कर्मवीर बनता विजेता कर्मपथ
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
रावण ब्राह्मण ही नहीं वेदज्ञ था, महाकर्मवीर, पर अहंकारत्व था। वैज्ञानिक दार्शनिक बलवन्त था, विश्वविजेता, पर खल श
काश कि बचपना होता
विनय विश्वा
एक वह गोली थी जो बचपन का हिस्सा हुआ करती थी एक यह गोली है जो शासन की बंदूक से निहत्थे को छलनी कर देती है कितना फ़र्क़
समय धारा प्रवाह बहती नदी है
सुनीता भट्ट पैन्यूली
समय धारा प्रवाह बहती हुई अविरल नदी है जिसकी नियति बहना है जो किसी के लिए नहीं ठहरती है। हाँ! विभिन्न कालखंडों में वि
प्यास
सुरेन्द्र प्रजापति
ज़िंदगी के रास्ते पर चलते हुए अचानक एक दिन प्रतिरोध आता है विपतियों का पहाड़ टूट पड़ता है ऐसे समय में यह निश्चय कर पान
हे क़लम! तुम्हें है नमन सदा
राघवेंद्र सिंह
हे क़लम! तुम्हें है नमन सदा, कुछ आज परिश्रम कर जाओ। एक नई प्रेरणा लिखकर तुम, उद्गार हृदय में भर जाओ। हर पंक्ति में नव
दिसम्बर के महीने में
कर्मवीर 'बुडाना'
याद रहेगी सर्द मौसम की ये सरगोशियाँ जो कानों पर छोड़ रही हैं दस्तकें, फिर भी क्यूँ इक सूरज चाँद से मिलकर पिघल जाता है�
स्वागत है तुम्हारा हे नववर्ष!
आशीष कुमार
पलकें बिछाए खड़े हम सभी, दिलों में है हमारे अपार हर्ष। शुभ मंगल की कामना संग, स्वागत है तुम्हारा हे नववर्ष! रसधार �
नववर्ष तुम्हे मंगलमय हो
प्रवल राणा 'प्रवल'
नववर्ष तुम्हे मंगलमय हो, जीवन भी शुभ मंगलमय हो। ऊर्जा से प्रकाशित नववर्ष रहे, आगामी जीवन में उत्कर्ष रहे। जो संत
एक जीवन बीत गया
जयप्रकाश 'जय बाबू'
यह वक़्त जो बीत गया सिर्फ़ वक़्त नहीं था सिर्फ़ एक साल बारह मास या दिन नहीं था एक जीवन था जो बीत गया। आपसी रिश्तों के त�
नववर्ष की पावन बेला
अजय कुमार 'अजेय'
नववर्ष की पावन बेला, शुभ संदेश सुनाती है। भगा तम अंतर्मन से, नव प्रभाती गाती है। उदित शिशिर लालिमा, धुँध परत हटाती
संधि की शर्तों पे कायम हो गई है दोस्ती
प्रशान्त 'अरहत'
संधि की शर्तों पे कायम हो गई है दोस्ती, अब नए आयाम गढ़ती जा रही है दोस्ती। कॉल तुमने काट दी ये बोलकर मैं व्यस्त हूँ,
कृष्णा के पार्थ
कर्मवीर 'बुडाना'
मेरा आशियाँ मुन्तज़िर हैं कि अब तो तिरी आँखें टिमटिमाए, ज़रा आओ, लोग उम्मीद से हैं कब यहॉं बिजली जगमगाए। काग़ज़ को बना�
देना है इनकम टैक्स
गणपत लाल उदय
रह जाएगा सब कुछ एक दिन यही पर मेरे यारों, इस‌ धन और दौलत को कोई इतना नहीं सवारों। देना है इनकम टैक्स प्रत्येक साल नि�
ओ बहना
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मेरे दुःखते इस जीवन का, तुम मरहम थी बहना। कौन तकेगा राहें मेरी? चली गई क्यूँ बहना? मुझे अकेली देख जगत में, हिम्मत त�
मैंने तो कभी लिखा ही नहीं
मयंक द्विवेदी
मैंने तो कभी लिखा ही नहीं, यह मन के उद्गार है। कुछ टीस रही होगी दिल में, ये इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। मैंने शब्दों क
तुम्हें पाकर
प्रवीन 'पथिक'
तुम्हें पाकर, लगता है ऐसे; जैसे जीवन की परिभाषा बदल गई है। अंतःकरण की रिक्तता, पूर्णता में परिवर्तित हो गई है। एक अ
बादलों में प्रिय चाँद छिपा है
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
बादलों में प्रिय चाँद छिपा है, मस्ती उसमें आन पड़ा है। देख प्रिया रजनी अति भोली, नवप्रीता अब चन्द्रकला है। ख़ुशी�
काश मैं मोबाइल होती
अंकुर सिंह
"आज काम बहुत था यार, बुरी तरह से थक गया हूँ।" सोफ़ा पर अपना बैग रखते हुए अजीत ने कहा। "अजीत, जल्दी से फ्रेश हो जाओ तुम, तब
नीला आसमान
संजय राजभर 'समित'
नम्र होकर ऊँचा उठें, करें सबका सम्मान। दूर क्षितिज से कहता है, यह नीला आसमान॥ सबल भावना परहित की, ह्रदय में रखना सा
एक ख़्वाब
प्रवीन 'पथिक'
जीवन की गोधूली में, अतृप्त आकांक्षाओं का स्वप्न; आशान्वित हो तैरता है। किसी संघर्ष की छाती पर, उठता ऑंखों में अंधड
हमारा भारत
रवि भूषण सिन्हा
अरुणाचल है शीश हमारा, कश्मीर से कन्याकुमारी, मेरी बाँहें। राजस्थान, गुजरात है पग हमारा, और दिल्ली आत्मा, और दिल्ली
वो ग़ज़ल तुम्हारी है लेकिन वो मेरे मन की भाषा है
ममता शर्मा 'अंचल'
वो ग़ज़ल तुम्हारी है लेकिन वो मेरे मन की भाषा है, जब भी पढ़ती हूँ लगता है यह जन्मों की अभिलाषा है। हर शब्द शब्द कहता �
सुभाष चंद्र बोस
प्रवल राणा 'प्रवल'
23 जनवरी को कटक में जन्मे, सुनो सुभाष की जीवन गाथा। जानकी नाथ बोस थे पिताश्री, प्रभावती थीं सुभाष की माता। कटक से प्
राम खिवैया मेरी नैया
मयंक द्विवेदी
राम खिवैया मेरी नैया माली जीवन उपवन का, राम है माँझी भवसागर का भवसागर तर जाएगा। पत्थर शीला नारी बन गई तेरे चरण के वं
ओ मेरे साँवरे रे
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
रूप सलोने यशुमति कान्हा, ओ मेरे लला साँवरे रे। मनमोहन गिरिधर नागर तू, लावण्य रूप निहारे रे। लीलाधर बहुरुपिया क�
वक़्त का परिंदा
जयप्रकाश 'जय बाबू'
वक़्त का परिंदा आया, ना जाने किस देश से हो, यह सिखलाए सत्य ईमानदारी प्रेम का वेश हो। एक ही देश है, एक ही राग, एक ही गान ह
प्रभा
संजय राजभर 'समित'
थका हुआ क्यूँ सोया है तू, जन्म मिला अलबेला है। कट गई घनेरी रात प्रिये! जाग प्रभा की बेला है॥ न कर आलस अंतस में, कर्म �
पहचान
विजय कुमार सिन्हा
माँ ने जन्म दिया बाबूजी ने मज़बूत हाथों का सहारा तब बनी मेरी पहली पहचान। गाँव से निकलकर शहर में आया चकाचौंध भरी रौ�
उम्मीद
विजय कुमार सिन्हा
एक सुंदर भविष्य की आश में मात-पिता बड़े शहर में छोड़ने जाते हैं अपने बच्चों को। लगता है अपनी साँसे हीं छोड़े जा रह�
जीवन की मुस्कान है बेटी
विजय कुमार सिन्हा
जीवन की मुस्कान पापा की पहचान ईश्वर द्वारा प्रदत्त वरदान कौन है वह? निश्चित तौर पर वह बेटी ही माँ के सो जाने पर ज�
कुल की शान
विजय कुमार सिन्हा
जिन उँगलियों को पकड़कर पिता ने चलना सिखाया, उसी वक़्त वह अनकहे ही कह देता है– “जीवन के हर क्षण में तुम्हें प्यार करे�
जीवन पल दो पल
विजय कुमार सिन्हा
ज़िंदगी में हर पल लिखा जाता है एक नया तराना, कभी सूरज की तपती धूप कभी चाँदनी की शीतलता। बीत रहा ज़िंदगी का हर पल आश म�
रिश्तों की डोर
विजय कुमार सिन्हा
जन्म से मृत्यु तक, इंसान बँधा है रिश्तों की डोर में। रिश्तों की डोर बहुआयामी होती है। मात-पिता, भाई-बहन, दादा दादी �
माँ
विजय कुमार सिन्हा
शरीर के रोम-रोम में बह रहा है माँ का दूध लहू बनकर। यह एक ऐसा क़र्ज़ है जो कभी उतर नहीं सकता। बड़ी ही मीठी बोल है माँ।
साला का महत्व
विजय कुमार सिन्हा
जिस घर में मेरा विवाह तय हुआ उस घर में पहले से था एक जमाई रिश्ते में था वह मेरा भाई। एक दिन मैंने उससे कहा– तुम तो अ�
मेरा मान
महेश कुमार हरियाणवी
कोई सर पर उड़ता यान है, कोई कारीगर करवान है। कोई मिट्टी की पहचान है, कोई चौखट का अभिमान है। कोई शिक्षा में गुणवान है,
दर्पण
महेश कुमार हरियाणवी
देख ले जहान आज, कल कैसा होएगा। संचारित दुनिया में, अकेलापन रोएगा।। बच्चा कहीं और पले, माता कहीं और हो। कौन देगा ज्
माँ का आँचल
महेश कुमार हरियाणवी
थाम के दुःख का दामन, जो दुनिया दिखलाती हैं। सच, माँ तो केवल माँ है, हर दुखड़े हर जाती हैं॥ जिस आँचल के दूध तले, इस जीव�
वसन्त का कैलेण्डर
डॉ॰ नेत्रपाल मलिक
दो तारीख़ों के बीच बीतते हैं जो युग उनका फ़ासला भी दीवार पर टँगा कैलेण्डर दिनों में बताता है फिसल जाती हैं जो तारीख़
संकल्प
संजय राजभर 'समित'
मत बन अँधा गूँगा बहरा, क्या तेरी मजबूरी है? प्रकृति को बचाना ही होगा, ये संकल्प ज़रूरी है। वन गिरि पंछी ताल तलैया, अ�
तुम्हारी नहीं पर जवानी लिखी है
प्रशान्त 'अरहत'
तुम्हारी नहीं पर जवानी लिखी है, इबारत किसी की पुरानी लिखी है। मेरी डायरी में नहीं शायरी तो, तुम्हारी ही कोई निशान�
अहसास
अवनीत कौर 'दीपाली'
जब से तू आया है मेरी ज़िंदगी में, ज़िंदगी में अहसासों को आगे बढ़ाया तुमने। अहसास हुआ ज़िम्मेदारी का, बिन डोर उड़ रही थ�
प्रेम पिपासा
अभिनव मिश्र 'अदम्य'
चंचल चितवन रूप देखकर, मैं अपना दिल हारा हूँ। प्रेम पिपासा में भटके जो, वो आशिक़ आवारा हूँ। मेरे मन के तार छेड़ता है ग�
उत्तरदायित्व
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
माहिष्मती गाँव में ललिता देवी नामक एक सुसभ्य सुसंस्कृत महिला रहती थी। उनके पति गौरी शंकर एक पढ़े लिखे और निहायत भद्
दुःख और दर्द
पारो शैवलिनी
भूल की धूल को छाँटना ही होगा। दुःख और दर्द को बाँटना ही होगा। मोम से पिघलते ये रिश्ते औ नाते, झूठी-झूठी कसमें, झूठे-�
साथ-साथ हैं
सुषमा दीक्षित शुक्ला
दीपू एक ऐसा बालक था जो सेठ मानिकचन्द अग्रवाल को वर्षो पूर्व सड़क पर लावारिस और विकल अवस्था रोता बिलखता मिला था। तब उ�
अन्तर्ग्रंथियाँ
प्रवीन 'पथिक'
अजीब मन: स्तिथि में हूँ आजकल! धैर्य टूटता जा रहा आत्मविश्वास का; लक्ष्य, विषम परिस्थितियों से हो रहा धूमिल; अंतःकरण
कल्पने! धीरे-धीरे बोल
सुरेन्द्र प्रजापति
कल्पने! धीरे-धीरे बोल। बोल रही जो स्वप्न उबलकर विह्वल दर्दीले स्वर में, कुछ वैसी ही आग सोई है मेरे, लघु अंतर में। �
आप दिल की किताब हो जाओ
ममता शर्मा 'अंचल'
आप दिल की किताब हो जाओ, ज़िंदगी का हिसाब हो जाओ। आपको पढ़ सकूँ सलीक़े से, दो घड़ी माहताब हो जाओ। मीत मैं प्यार का सवाल
साजन विरह नैन मैं भी बरसूँ
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
इन बारिस की बूँदों में भिगूँ, तन मन प्रीति हृदय गुलज़ार बनूँ। पलकों में छिपा मृगनैन नशा प्रिय, मुस्कान चपल अधर इज�
बुनकर
डॉ॰ अबू होरैरा
कपड़े का कारीगर कौन? मैं। कपड़े पर की गई कारीगरी किसकी? मेरी। कपड़े का सौदागर कौन? तुम। कपड़े की कमाई खाने वाले तुम, कप�
मैं बुनकर मज़दूर
डॉ॰ अबू होरैरा
मैं बुनकर मज़दूर हुनर मेरा लूम चलाना। मेरी कोई उम्र नहीं है... मैं एक नन्हा बच्चा भी हो सकता हूँ जहाँ मेरे नन्हे हाथो
मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं
डॉ॰ अबू होरैरा
मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं। मैं भी मुस्कुराते हुए... लखनऊ की ऊँची इमारतों को, शॉपिंग मॉल्स को, तारीख़ी इमारतों को
आवश्यकता है लड़ने की
डॉ॰ अबू होरैरा
आवश्यकता है लड़ने की– चीथड़ा पहनाने वालों से, पेट और पीठ को एक करने वाली तोन्दों से, एक ही कमरे में गृहस्थी बसवाने वा�
चले चलो, बढ़े चलो
डॉ॰ अबू होरैरा
चले चलो, बढ़े चलो लड़ो कि बिना लड़े हक़ नहीं मिलता। उठो कि बिना चले मंज़िल नहीं मिलती। माँगों कि बिना माँगे कुछ नहीं मिल�
है मित्र ही सुवृंद भी
राघवेंद्र सिंह
है मित्र ही सुवृंद भी, है इत्र की सुगन्ध भी। चरित्र में प्रबन्ध भी। अनंतकोटि बन्ध भी, है राम वो है, कृष्ण भी, सुदाम�
आओ! शहरों में गाँव ढूँढ़ते हैं
डॉ॰ नेत्रपाल मलिक
आरूढ़ वांछा के रथ पर कंक्रीट के भीड़ भरे पथ पर हो विह्वल आतप से, छाँव ढूँढ़ते हैं आओ! शहरों में गाँव ढूँढ़ते हैं। अय्या�
नहीं रोया कभी पशु
डॉ॰ नेत्रपाल मलिक
नहीं रोया कभी पशु उसने नहीं किसी का विश्वास तोड़ा नहीं कभी वो झूठ बोला नहीं किसी को धोखा दिया नहीं कभी विद्रोह किय�
मेरा देवता मौन है कई दिनों से
डॉ॰ नेत्रपाल मलिक
हे मन्दिर के पुजारी! नाराज़ तो हुए होंगे मुझसे कि नैवेद्य के समय चित में अर्पण नहीं था। हे सरसों, गुलाब, नर्गिस और ड�
हर पल के अन्तराल में तुम हो
डॉ॰ नेत्रपाल मलिक
अलार्म की आवाज़ दे जाती है हर दिन मुट्ठीभर पल ख़र्चने को घड़ी की सुइयाँ उठा लेती हैं बही-खाता हर पल का हिसाब रखने को �
आवाज़ फ़ासले भी कहती है
डॉ॰ नेत्रपाल मलिक
क्षमा कर देना दे जाता है एक अधिकार शक्ति का अहसास और माँगना खड़ा कर देता है पायदान के छोर पर क्षमा उस वृक्ष की कोपल�
पति-पत्नी
विजय कुमार सिन्हा
दो अनजाने परिवारों के बच्चे बंधते हैं एक साथ परिणय सूत्र में परिणय सूत्र में बंधते ही हो जाते हैं जीवन भर के लिए एक
दामाद की ससुराल कथा
विजय कुमार सिन्हा
ससुराल में सासू माँ का प्यारा होता है दामाद। दामाद जो पहुँच जाए ससुराल घर के सारे लग जाते ख़ातिरदारी में। दामाद था
नया आँचल नई मुस्कान
विजय कुमार सिन्हा
कलाइयों में भरी हुई चूड़ियाँ पाँवों में पाज़ेब ललाट पर बड़ी सी बिंदिया माँग में सिंदूर बदन पे भरे हुए आभूषण माँ-�
ख़्वाब
विजय कुमार सिन्हा
अब ख़्वाबों की क्या कहें ये अपने तो होते नहीं पर नज़रों में सदा बने रहते हैं। बेगानी और बेदर्द ज़माने में सदा रंगीन �
पंच परमेश्वर
प्रेमचंद
१ जुम्मन शेख़ और अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी साझा था। एक को दूसरे पर अ�
थोड़ा सा प्यार लुटाओ तो
सुषमा दीक्षित शुक्ला
जीने का मज़ा तो आता है, औरों के ख़ातिर जीने में। कितना सुकूँ मिल जाता है, औरों के आँसू पीने में। ओ हो हो हो ओ हो हो हो... �
हे सूर्य देव!
सुषमा दीक्षित शुक्ला
हे सूर्य देव! हे ज्योतिपुंज! तमतोम मिटा दो जीवन का। ज्योतिर्मय राहें दिखला दो, दुःख क्लेश मिटा दो जीवन का। तुमसे
ऐ सावन!
सुषमा दीक्षित शुक्ला
ऐ सावन! तेरे रूप हैं कितने? कोई कहे तुझे बेदर्दी रे, कोई सजाए मीठे सपने, ऐ सावन! तेरे रूप हैं कितने? ख़्वाबों की ताबीर
मस्ताने मौसम ने
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मस्ताने मौसम ने पागल मुझे कर दिया, दीवाने मौसम ने घायल मुझे कर दिया। भीगा सावन बहकने लगा, गीला बदन क्यूँ दहकने लगा�
मेरी माटी देश मेरा ये
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मेरी माटी देश मेरा ये, हमे जान से प्यारा है। भारत माँ का बच्चा-बच्चा, इस पर जाँ दिल हारा है। सदियों से ये सोंधी माटी
इतराता बलखाता यौवन
ममता शर्मा 'अंचल'
इतराता बलखाता यौवन, सबको केवल भाता यौवन। उम्मीदों से भरी रूह को, जब तक है बहलाता यौवन। मर्यादा की बात न सुनता, तन�
बंदिश में जीना मरना है
ममता शर्मा 'अंचल'
बंदिश में जीना मरना है, फिर क्यों बंदिश से डरना है। सोच लिया है इसीलिए अब, जो मन कहता वह करना है। दुख की गहरी झील हु
दर्द पलकों में छुपा लेते हैं
ममता शर्मा 'अंचल'
दर्द पलकों में छुपा लेते हैं, आग सीने में दबा लेते हैं। जिस्म ढकने को भले हों चिथड़े, आबरू अपनी बचा लेते हैं। भूख म�
ग़ुस्सा है या प्यार आपका
ममता शर्मा 'अंचल'
ग़ुस्सा है या प्यार आपका, चुप क्यों है इज़हार आपका। बहुत दिनों से उलझाए है, अनजाना व्यवहार आपका। रहता है दिल की आँख�
वो दिन जाने कब आएगा
ममता शर्मा 'अंचल'
वो दिन जाने कब आएगा, दुख में आकर समझाएगा। सुख का यक़ीं न कर पगले मन, सुख चंचल है बहकाएगा। सुख ने कितने दुश्मन पाले, �
फ़ासला नज़दीकियों का मूल है
ममता शर्मा 'अंचल'
फ़ासला नज़दीकियों का मूल है, ज्यों गुलाबों का सहारा शूल है। इक ज़रा सी बात पर नाराज़गी, मान लो यह नासमझ सी भूल है। मेल �
कब मिलोगे बोलिए जी
ममता शर्मा 'अंचल'
कब मिलोगे बोलिए जी, चुप ज़ुबाँ को खोलिए जी। याद में छुप कर बहुत दिन, अब बहुत दिन रो लिए जी। क्यों बसे आकर ज़हन में, क�
आज कुछ लिखने का मन है
ममता शर्मा 'अंचल'
आज कुछ लिखने का मन है, प्रीत का जागा बचपन है। मिलन दिल को छूने आ रहा, विरह कर रहा पलायन है। लगा है बिना कहे ही आज, म
बस वही एक है जो अपना सा लगता है
ममता शर्मा 'अंचल'
बस वही एक है जो अपना सा लगता है, बाक़ी रिश्तों का रस सपना सा लगता है। एकाग्र न होता और कहीं मन दुनिया में, बस बेमन से म�
संबल
सुशील कुमार
नव ज्ञान रश्मि बिखराऊँ, निर्बल को सबल बनाऊँ। जो हार चुके हैं जग में, पथ भूल चुके हैं मग में। उत्साह जगा चिंगारी, अं
राम
सुशील कुमार
राम के नाम सा नाम नहीं जग संत कहें श्रुति चारि बखानी, राम कथानक राम स्वयं बिन राम नहीं कहीं राम कहानी। राम बिना नहि�
बिदा
सुभद्रा कुमारी चौहान
'गिरफ़्तार होने वाले हैं, आता है वारंट अभी।' धक्-सा हुआ हृदय, मैं सहमी हुए विकल आशंक सभी॥ किंतु सामने दीख पड़े मु�
स्वागत-गीत
सुभद्रा कुमारी चौहान
कर्म के योगी, शक्ति-प्रयोगी, देश-भविष्य सुधारिएगा। हाँ, वीर-देश के दीन देश के, जीवन-प्राण पधारिएगा। तुम्हारा कर्
वीरों का कैसा हो वसंत?
सुभद्रा कुमारी चौहान
वीरों का कैसा हो वसंत? आ रही हिमाचल से पुकार, है उदधि गरजता बार-बार, प्राची, पश्चिम, भू, नभ अपार, सब पूछ रहे हैं दिग्-�
जलियाँवाले बाग़ में वसंत
सुभद्रा कुमारी चौहान
यहाँ कोकिला नहीं, काक हैं शोर मचाते। काले-काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते॥ कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से। �
खेल
जैनेंद्र कुमार
मौन-मुग्ध संध्या स्मित प्रकाश से हँस रही थी। उस समय गंगा के निर्जन बालुका-तीर पर एक बालक और एक बालिका अपने को और सार�
पत्नी
जैनेंद्र कुमार
शहर के एक ओर एक तिरस्कृत मकान। दूसरा तल्ला। वहाँ चौके में एक स्त्री अँगीठी सामने लिए बैठी है। अँगीठी की आग राख हुई ज
पाज़ेब
जैनेंद्र कुमार
बाज़ार में एक नई तरह की पाज़ेब चली है। पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियाँ आपस में लचक के साथ जु�
इतस्तत:
जैनेंद्र कुमार
पाप का सवाल एक बहुत बड़ा सवाल है। पाप समाप्त हो तो धर्म अनावश्यक हो जाता हैं। परम आस्तिक और परम नास्तिक दर्शन यही कह
ग़ुस्सा
गुलज़ार
बूँद बराबर बौना-सा भन्नाकर लपका पैर के अँगूठे से उछला टख़नों से घुटनों पर आया पेट पे कूदा नाक पकड़ कर फन फैला कर �
इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता
गुलज़ार
इश्क़ में ‘रेफ़री’ नहीं होता ‘फ़ाउल’ होते हैं बेशुमार मगर ‘पेनल्टी कॉर्नर’ नहीं मिलता! दोनों टीमें जुनूँ में द
इतवार
गुलज़ार
हर इतवार यही लगता है देरे से आँख खुली है मेरी, या सूरज जल्दी निकला है जागते ही मैं थोड़ी देर को हैराँ-सा रह जाता हूँ
महामारी लगी थी
गुलज़ार
घरों को भाग लिए थे सभी मज़दूर, कारीगर मशीनें बंद होने लग गई थीं शहर की सारी उन्हीं से हाथ पाओं चलते रहते थे वरना ज़�
शराब पीने से...
गुलज़ार
शराब पीने से कुछ तो फ़र्क़ पड़ता है, ये लगता है! ज़रा-सी वक़्त की रफ़्तार धीमी होने लगती है गटागट पल निगलने की कोई ज
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
गुलज़ार
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा, क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा। अपने साए से चौंक जाते हैं, उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा।
बीते रिश्ते तलाश करती है
गुलज़ार
बीते रिश्ते तलाश करती है, ख़ुशबू ग़ुंचे तलाश करती है। जब गुज़रती है उस गली से सबा, ख़त के पुर्ज़े तलाश करती है। �
सहमा सहमा डरा सा रहता है
गुलज़ार
सहमा सहमा डरा सा रहता है, जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है। काई सी जम गई है आँखों पर, सारा मंज़र हरा सा रहता है। एक पल द
मुझे अँधेरे में बे-शक बिठा दिया होता
गुलज़ार
मुझे अँधेरे में बे-शक बिठा दिया होता, मगर चराग़ की सूरत जला दिया होता। न रौशनी कोई आती मिरे तआ'क़ुब में, जो अपने-आप
जब भी आँखों में अश्क भर आए
गुलज़ार
जब भी आँखों में अश्क भर आए, लोग कुछ डूबते नज़र आए। अपना मेहवर बदल चुकी थी ज़मीं, हम ख़ला से जो लौट कर आए। चाँद जित�
फूलों की तरह लब खोल कभी
गुलज़ार
फूलों की तरह लब खोल कभी, ख़ुशबू की ज़बाँ में बोल कभी। अल्फ़ाज़ परखता रहता है, आवाज़ हमारी तोल कभी। अनमोल नहीं ले
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
गुलज़ार
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है, ज़िंदगी एक नज़्म लगती है। बज़्म-ए-याराँ में रहता हूँ तन्हा, और तंहाई बज़्म लगती है। अ
शाम से आज साँस भारी है
गुलज़ार
शाम से आज साँस भारी है, बे-क़रारी सी बे-क़रारी है। आप के बा'द हर घड़ी हम ने, आप के साथ ही गुज़ारी है। रात को दे दो चा�
बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद
गुलज़ार
बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद, कोई साज़िश छुपा रहा है चाँद। जाने किस की गली से निकला है, झेंपा झेंपा सा आ रहा है चाँद�
कोई अटका हुआ है पल शायद
गुलज़ार
कोई अटका हुआ है पल शायद, वक़्त में पड़ गया है बल शायद। लब पे आई मिरी ग़ज़ल शायद, वो अकेले हैं आज-कल शायद। दिल अगर ह�
डाइरी
गुलज़ार
न जाने किस की ये डाइरी है न नाम है, न पता है कोई: ''हर एक करवट मैं याद करता हूँ तुम को लेकिन ये करवटें लेते रात दिन यूँ �
ख़ुदा
गुलज़ार
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने! काले घर में सूरज रख के तुम ने शायद सोचा था मेरे सब मोहरे पिट जाएँगे मै�
एक ख़्वाब
गुलज़ार
एक ही ख़्वाब कई बार यूँही देखा मैंने तू ने साड़ी में उड़स ली हैं मिरी चाबियाँ घर की और चली आई है बस यूँही मिरा हाथ पक�
लकड़ी की काठी काठी पे घोड़ा
गुलज़ार
लकड़ी की काठी काठी पे घोड़ा घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा दौड़ा दौड़ा दौड़ा घोड़ा दुम उठा के दौड़ा घोड़ा पहुँचा
रात
गुलज़ार
मिरी दहलीज़ पर बैठी हुई ज़ानू पे सर रक्खे ये शब अफ़्सोस करने आई है कि मेरे घर पे आज ही जो मर गया है दिन वो दिन हम-ज़ा�
पेंटिंग
गुलज़ार
रात कल गहरी नींद में थी जब एक ताज़ा सफ़ेद कैनवस पर आतिशीं, लाल सुर्ख़ रंगों से मैं ने रौशन किया था इक सूरज... सुब्ह
घुटन
गुलज़ार
जी में आता है कि इस कान से सूराख़ करूँ खींच कर दूसरी जानिब से निकालूँ उस को सारी की सारी निचोड़ूँ ये रगें, साफ़ करूँ
एक और रात
गुलज़ार
रात चुप-चाप दबे पाँव चले जाती है रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं काँच का नीला सा गुम्बद है उड़ा जाता है ख़ाल�
ग़ालिब
गुलज़ार
बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे गुड़गुड़ाती हुई
फ़ज़ा
गुलज़ार
फ़ज़ा ये बूढ़ी लगती है पुराना लगता है मकाँ समुंदरों के पानियों से नील अब उतर चुका हवा के झोंके छूते हैं तो खुरदु�
किताबें
गुलज़ार
किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतीं जो शामें उन की स�
आदत
गुलज़ार
साँस लेना भी कैसी आदत है जिए जाना भी क्या रिवायत है कोई आहट नहीं बदन में कहीं कोई साया नहीं है आँखों में पाँव बेहि
अख़बार
गुलज़ार
सारा दिन मैं ख़ून में लत-पत रहता हूँ सारे दिन में सूख सूख के काला पड़ जाता है ख़ून पपड़ी सी जम जाती है खुरच खुरच के �
जब भी ये दिल उदास होता है
गुलज़ार
जब भी ये दिल उदास होता है, जाने कौन आस-पास होता है। आँखें पहचानती हैं आँखों को, दर्द चेहरा-शनास होता है। गो बरसती
बढ़ती भूख
महेश कुमार हरियाणवी
अन्न के ही अन्नदानों भारती के खलिहानों, धरती पुकारती है बैठ मत जाइए। बोल रही सर पर महँगाई घर पर, लुट रही लाज आज फि�
छोड़ भतैरा जाएगी
महेश कुमार हरियाणवी
तोते की देख के चोंच, उठने लगा संकोच। कितना ही खा पाएगी? छोड़ भतैरा जाएगी॥ सौंप बाग़ की डोर उसे, कोस रहा था और किसे। म�
रामत्व
महेश कुमार हरियाणवी
कर्म: पावन नाम को पावन गाएँ, मिल-मिल कर सब ही दोहराएँ। कर्मों की जग करता पूजा, राम नाम हैं जीवन दूजा॥ प्रण: साथ के स�
तीज का त्यौहार
महेश कुमार हरियाणवी
शिव गौरा का मिलन पुनः, पावन प्रेम का द्वार है। छम-छम-छम मेघ पुकारे, ये तीज का त्यौहार है। ऊँचे-ऊँचे झूलों पर, झूली
रसमादन
शिव प्रसाद सिंह
गरमी की छुट्टी हो, या किसी पर्व-त्योहार का समय, जहाँ भी नियमित ढंग से चलते हुए कार्यों से बचने का मौक़ा हाथ लगे, मेरे म�
नन्हों
शिव प्रसाद सिंह
चिट्ठी-डाकिए ने दरवाज़े पर दस्‍तक दी तो नन्हों सहुआइन ने दाल की बटुली पर यों कलछी मारी जैसे सारा क़सूर बटुली का ही है।
साथ मुश्किल में भला कौन दिया करता है
सुशील कुमार
साथ मुश्किल में भला कौन दिया करता है, ज़ख़्म भर जाए यहाँ कौन दुआ करता है। प्यार करते हैं सभी लोग यहाँ मतलब से, बाद मत�
कुछ कहना नहीं चाहता
प्रवीन 'पथिक'
अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता! सुनना चाहता हूँ; उस निस्तब्ध निशा को। जिसके गहन अँधेरे में, एक अजीब मासूमियत छिपी होती �
बस तुझको ही पाया है
प्रवीन 'पथिक'
खो दिया सब कुछ मैंने यूँ बस, तुझको ही पाया है। आँखों में था प्रणय-प्यास, पलकों में हया की लाली थी। होठों पे कुछ मीठे
आज मैं अकेला हूँ
त्रिलोचन
१ आज मैं अकेला हूँ अकेले रहा नहीं जाता। २ जीवन मिला है यह  रतन मिला है यह धूल में  कि  फूल में मिला है तो मिला है य�
विजय के गान
त्रिलोचन
तुम महाप्राण संगठन शक्ति तुम जग जीवन की अभिव्यक्ति तुम कर्म-निष्ठ तुम ध्येय-निष्ठ तुम धैर्य-निष्ठ तुम प्रति प�
तुलसी बाबा
त्रिलोचन
तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुम से सीखी मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो। कह सकते थे तुम सब कड़वी, मीठी, तीखी। प्रखर काल
भाषा की लहरें
त्रिलोचन
भाषाओं के अगम समुद्रों का अवगाहन मैंने किया। मुझे मानव जीवन की माया सदा मुग्ध करती है, आहोरात्र आवाहन सुन सुनकर �
वही त्रिलोचन है
त्रिलोचन
वही त्रिलोचन है, वह—जिस के तन पर गंदे कपड़े हैं। कपड़े भी कैसे—फटे लटे हैं यह भी फ़ैशन है, फ़ैशन से कटे कटे हैं। कौ�
आत्मालोचना
त्रिलोचन
शब्द, मालूम है, व्यर्थ नहीं जाते हैं पहले मैं सोचता था उत्तर यदि नहीं मिले तो फिर क्या लिखा जाए किंतु मेरे अंतरन
अस्वस्थ होने पर
त्रिलोचन
मित्रों से बात करना अच्छा है और यदि मुँह से बात ही न निकले तो उतनी देर साथ रहना अच्छा है जितनी देर मित्रों को यह च�
उनका हो जाता हूँ
त्रिलोचन
चोट जभी लगती है तभी हँस देता हूँ देखने वालों की आँखें उस हालत में देखा ही करती हैं आँसू नहीं लाती हैं और जब पीड�
सोच समझकर चलना होगा
त्रिलोचन
सोच-समझकर चलना होगा, अगति नहीं लक्षण जीवन का। परिवर्तन होते रहते हैं, उन्हें न रोक सका है कोई। परिवर्तन की शक्ति
शब्दों से कभी-कभी काम नहीं चलता
त्रिलोचन
शब्दों से कभी-कभी काम नहीं चलता जीवन को देखा है यहाँ कुछ और वहाँ कुछ और इसी तरह यहाँ-वहाँ हरदम कुछ और काई एक ढंग �
धूप सुंदर
त्रिलोचन
धूप सुंदर धूप में जग-रूप सुंदर सहज सुंदर व्योम निर्मल दृश्य जितना स्पृश्य जितना भूमि का वैभव तरंगित रूप सुं�
पथ पर चलते रहो निरंतर
त्रिलोचन
पथ पर चलते रहो निरंतर सूनापन हो या निर्जन हो पथ पुकारता है गत-स्वप्न हो पथिक, चरण-ध्वनि से दो उत्तर पथ पर चल
आज का दिन बादलों में खो गया था
त्रिलोचन
आज का दिन बादलों में खो गया था दृष्टि में आकर शशक जैसे चपल से चपल होकर सघन पत्रश्याम वन में खो गया था वायु भू पर औ�
तुम्हें सौंपता हूँ
त्रिलोचन
फूल मेरे जीवन में आ रहे हैं सौरभ से दसों दिशाएँ भरी हुई हैं मेरी जी विह्वल है मैं किस से क्या कहूँ आओ, अच्छे आए �
उस जनपद का कवि हूँ
त्रिलोचन
उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है, नंगा है, अनजान है, कला—नहीं जानता कैसी होती है क्या है, वह नहीं मानता कविता कुछ भ�
हंस के समान दिन उड़ कर चला गया
त्रिलोचन
हंस के समान दिन उड़ कर चला गया अभी उड़ कर चला गया पृथ्वी आकाश डूबे स्वर्ण की तरंगों में गूँजे स्वर ध्यान-हरण मन �
उठ किसान ओ
त्रिलोचन
उठ किसान ओ, उठ किसान ओ, बादल घिर आए हैं तेरे हरे-भरे सावन के साथी ये आए हैं आसमान भर गया देख तो इधर देख तो, उधर देख त�
कुरुक्षेत्र भी फूट-फूट रोया है
मयंक द्विवेदी
समय रेत के साँचों पर शर शैय्या के बाणों पर चुभते तीरों की नोकों पर एक युगपुरुष सोया है देख-देख उसको भी करूक्षेत्र �
दुर्योधन क्या बाँध पाएगा?
मयंक द्विवेदी
न बाँध सका जिसे कारागृह, न बाँध सके जिसे नंद अयन, न बाँध सके यशोदा सूत बंधन, न साध सके जिसे कंस भुजबल, दुर्योधन क्या �
सावन को आने दो
मयंक द्विवेदी
पतझड़ की अग्नि में जल जाने दो, विरह वेदना के स्वर गाने दो, हर शाख़-शाख़ हिसाब लेगी, समय सावन का आने दो। पर्ण-पर्ण छिन्न ह
अंतःपीड़ा
प्रवीन 'पथिक'
मैं जानता हूँ; तेरी असहमति कहीं न कहीं, आँधी के पश्चात होने वाली रिमझिम बारिश से है। तेरी पलकों का झुकना, दोपहर के �
तू क्या जानती है
प्रवीन 'पथिक'
तू क्या जानती है, तुझसे डर जाऊँगा मैं! तेरे बिन, हाँ! तेरे बिन न रह पाऊँगा मैं? ऐसा तेरा सोचना व्यर्थ है। ना ह�
छोड़ चले हैं बाबूजी
प्रवीन 'पथिक'
जीवन के सूने आँगन में, यादों की पतझड़ है छाई। एक दिवस ऐसा न गुज़रा, जिस रोज़ उनकी याद न आई। कर अनाथ हम माँ बेटे को, मुख म
हे तिथि अमावस दीपरात्रि!
राघवेंद्र सिंह
हे तिथि अमावस दीपरात्रि! हे माह कार्तिक कृष्ण रात्रि! हो रहा आगमन दिव्य रूप, हो रहा कान्तिमय नव स्वरूप। कट रही दिश
हे मधुमास! ऋतुपति बसंत
राघवेंद्र सिंह
हे मधुमास! ऋतुपति बसंत, आओ राजा हे अधिराज! हे मधुऋतु! हे कुसुमाकर प्रिय! आओ बासंतिक पहन ताज। आ गया माघ का शुक्ल पक्ष
लक्ष्यभेद अब करना होगा
राघवेंद्र सिंह
जीवन के इस महासमर में, तुझको न अब डरना होगा। अर्जुन की ही भाँति तुझे भी, लक्ष्यभेद अब करना होगा। इस शूलित पथ पर तुझ�
ऋतुओं की रानी वर्षा ऋतु
राघवेंद्र सिंह
मेघ चले हैं बनकर वाहक, वसुधा प्यास बुझाने को। मृदुल स्वप्न ने दिया निमंत्रण, वर्षा ऋतु के आने को। हरी भरी वह संध्य
चौथी का जोड़ा
इस्मत चुग़ताई
सहदरी के चौके पर आज फिर साफ़-सुथरी जाज़िम बिछी थी। टूटी-फूटी खपरैल की झिर्रियों में से धूप के आड़े तिरछे क़त्ले पूरे दाल
जड़ें
इस्मत चुग़ताई
सब के चेहरे फ़क़ थे घर में खाना भी न पका था। आज छटा रोज़ था। बच्चे स्कूल छोड़े घरों में बैठे अपनी और सारे घर वालों की ज़िंद�
लिहाफ़
इस्मत चुग़ताई
जब मैं जाड़ों में लिहाफ़ ओढ़ती हूँ, तो पास की दीवारों पर उसकी परछाईं हाथी की तरह झूमती हुई मालूम होती है और एक दम से मेरा
दो हाथ
इस्मत चुग़ताई
राम अवतार लाम पर से वापस आ रहा था। बूढ़ी मेहतरानी अब्बा मियाँ से चिट्ठी पढ़वाने आई थी। राम अवतार को छुट्टी मिल गई। जं
दोपहरी
शकुन्त माथुर
गर्मी की दोपहरी में तपे हुए नभ के नीचे काली सड़कें तारकोल की अंगारे-सी जली पड़ी थीं छाँह जली थी पेड़ों की भी पत्�
ताज़ा पानी
शकुन्त माथुर
धरा पर गंध फैली है हवा में साँस भारी है, रमक उस गंध की है जो सड़ाती मानवों को बंद जेलों में। सुबह में साँझ में है
ये हरे वृक्ष
शकुन्त माथुर
ये हरे वृक्ष यह नई लता खुलती कोंपल यह बंद फलों की कलियाँ सब खुलने को, खिलने को, झुकने को होतीं स्वयं धरा पर। धूल �
बुद्ध
गिरिजा कुमार माथुर
आज लौटती जाती है पदचाप युगों की, सदियों पहले का शिव-सुंदर मूर्तिमान हो चलता जाता है बोझीले इतिहासों पर श्वेत हिम�
भीगा दिन
गिरिजा कुमार माथुर
भीगा दिन पश्चिमी तटों में उतर चुका है, बादल ढँकी रात आती है धूल-भरी दीपक की लौ पर मंद पग धर। गीली राहें धीरे-धीरे
आज हैं केसर रंग रँगे वन
गिरिजा कुमार माथुर
आज हैं केसर रंग रँगे वन रंजित शाम भी फागुन की खिली-खिली पीली कली-सी केसर के वसनों में छिपा तन सोने की छाँह-सा बोलत�
क्वाँर की दुपहरी
गिरिजा कुमार माथुर
क्वाँर की सूनी दुपहरी, श्वेत गरमीले, रुएँ-से बादलों में, तेज़ सूरज निकलता, फिर डूब जाता। घरों में सूनसान आलस ऊँघता �
देह की दूरियाँ
गिरिजा कुमार माथुर
निर्जन दूरियों के ठोस दर्पणों में चलते हुए सहसा मेरी एक देह तीन देह हो गई उगकर एक बिंदु पर तीन अजनबी साथ चलने लग�
असिद्ध की व्यथा
गिरिजा कुमार माथुर
नदियाँ, दो-दो अपार बहतीं विपरीत छोर कब तक मैं दोनों धाराओं में साथ बहूँ ओ मेरे सूत्रधार! नौकाएँ दो भारी अलग दिशा
रुक कर जाती हुई रात
गिरिजा कुमार माथुर
रुक कर जाती हुई रात का अंतिम छाँहों भरा प्रहर है श्वेत धुएँ से पतले नभ में दूर झाँवरे पड़े हुए सोने-से तारे जगी हुई
छाया मत छूना
गिरिजा कुमार माथुर
छाया मत छूना मन, होगा दु:ख दूना। जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी : तन-सुगंध शे
जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूँ मैं?
हरिशंकर परसाई
किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको, नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको। ले निराला मार्ग उस पर सींच जल क
पानी भरे हुए बादल
गिरिजा कुमार माथुर
पानी भरे हुए भारी बादल से डूबा आसमान है ऊँचे गुंबद, मीनारों, शिखरों के ऊपर। निर्जन धूल-भरी राहों में विवश उदासी फै
नया कवि
गिरिजा कुमार माथुर
जो अँधेरी रात में भभके अचानक चमक से चकचौंध भर दे मैं निरंतर पास आता अग्निध्वज हूँ कड़कड़ाएँ रीढ़ बूढ़ी रूढ़ियो
आँगन में बैंगन
हरिशंकर परसाई
मेरे दोस्‍त के आँगन में इस साल बैंगन फल आए हैं। पिछले कई सालों से सपाट पड़े आँगन में जब बैंगन का फल उठा तो ऐसी ख़ुशी ह
भोलाराम का जीव
हरिशंकर परसाई
ऐसा कभी नहीं हुआ था... धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफ़ारिश के आधार पर स्वर्ग या नर्क में निव�
चूहा और मैं
हरिशंकर परसाई
चाहता तो लेख का शीर्षक मैं और चूहा रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता, वह मेरे घर
क्या किया आज तक क्या पाया?
हरिशंकर परसाई
मैं सोच रहा, सिर पर अपार, दिन, मास, वर्ष का धरे भार। पल, प्रतिपल का अंबार लगा, आखिर पाया तो क्या पाया? जब तान छिड़ी, मै
कल तलक
श्याम सुन्दर अग्रवाल
1 कल तलक तो हम भी होते थे सुघड़, क्या हुआ जो आज हैं ऊबड़-खाबड़। जो ख़ामियाँ हममें नज़र आतीं हैं तुम्हें, ये, वक्त ने की ह�
छप रहे हैं इतने क़िस्से रोज़ भ्रष्टाचार के
श्याम सुन्दर अग्रवाल
छप रहे हैं इतने क़िस्से रोज़ भ्रष्टाचार के, हाशिये तक पर नहीं हैं गीत अब सिंगार के। ख़ून की होली की ख़बरें सुर्ख़ हैं इत�
सीमा के पहरुओं
श्याम सुन्दर अग्रवाल
1 ओ नेफ़ा के रक्षक जवान, ओ हिमगिरि पर भारत की शान, ओ सीमाओं के पहरेदारो, कर रहा देश तुमको प्रणाम। 2 तुम लिए शस्त्र, पर �
सावन के आँगन में मेघा घिर आए रे
श्याम सुन्दर अग्रवाल
सावन के आँगन में मेघा घिर आए रे, धरती की माँग भर जल किसान गीत गाए रे, सावन के आँगन में मेघा घिर आए रे। खेतों में बीज प�
माधवी
सुमन राजे
तुम रच सकते हो नीली झील में अपनी परछाइयाँ हमें अपनी अंजुरी भर पानी में भरना लुढ़काना है प्यास का वर्त्तन झलकान
किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं
अज्ञात
किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश
उम्मीद
पंकज चतुर्वेदी
जिसकी आँख में आँसू है उससे मुझे हमेशा उम्मीद है
एक ही चेहरा
पंकज चतुर्वेदी
कुशीनगर में एक प्रसिद्ध प्रतिमा है बुद्ध की एक कोण से देखें तो लगता है मुस्करा रहे हैं बुद्ध दूसरे कोण से वे दिख
कला का समय
पंकज चतुर्वेदी
रामलीला में धनुष-यज्ञ के दिन राम का अभिनय राजकुमार का अभिनय है मुकुट और राजसी वस्त्र पहने गाँव का नवयुवक नरेश �
कोरोना काल में
पंकज चतुर्वेदी
कोरोना से उपजे संकट से निपटने के लिए राजस्व विभाग के अफ़सरों ने रपट तैयार की : ज़्यादा अमीर लोगों पर टैक्स लगाया ज�
एक संपूर्णता के लिए
पंकज चतुर्वेदी
तुम्हारे देखने और न देख पाने के समझने और न समझ पाने के आने और आकर चले जाने के बीच में ही रहना है हमें अपने अनुभवों �
कुछ चीज़ें अब भी अच्छी हैं
पंकज चतुर्वेदी
कुछ चीज़ें अब भी अच्छी हैं न यात्रा अच्छी है न ट्रेन के भीतर की परिस्थिति लेकिन गाड़ी नंबर गाड़ी के आने और जाने
अगर यही प्रेम है
पंकज चतुर्वेदी
अगर यह अधैर्य है कि तुम रहो मेरी आँखों के बियाबान में मेरे शब्दों की पीड़ा में रहो मेरे हाथ इतने कोमल हों कि डिटर�
जाति के लिए
पंकज चतुर्वेदी
ईश्वर सिंह के उपन्यास पर राजधानी में गोष्ठी हुई कहते हैं कि बोलने वालों में उपन्यास के समर्थक सब सिंह थे और विरो
प्रेम
पंकज चतुर्वेदी
तुम्हारे रक्त की लालिमा से त्वचा में ऐसी आभा है पानी में जैसे केसर घुल जाता हो आँखें ऐसे खींचती हैं कि उनकी सम्�
एक ऐसे समय में
पंकज चतुर्वेदी
एक ऐसे समय में जब लोगों का विचार है कि आत्मा रह ही नहीं गई है ज़िम्मेदार लोगों के पास यह कहते-कहते मैं थका नहीं हूँ
मेरे दरवाज़े सुबह
पंकज चतुर्वेदी
मेरे दरवाज़े यदि सुबह आई तो मैं अपने दरवाज़े बंद कर लूँगा और कहूँगा कि अब बहुत देर हो चुकी है देर से मिले न्याय की
आते हैं
पंकज चतुर्वेदी
जाते हुए उसने कहा कि आते हैं तभी मुझे दिखा सुबह के आसमान में हँसिए के आकार का चंद्रमा जैसे वह जाते हुए कह रहा हो
मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा
अज्ञात
मैं अपने साथ रहता हूँ हमेशा अकेला हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ
साँसें
प्रयाग नारायण त्रिपाठी
उत्तप्त धरती की गरमीली, हल्की साँस ऊपर उठी; प्रोज्वल गगन की सर्दीली, भारी साँस नीचे झुकी; यह हुआ फिर-फिर जब तक न आ�
लक्ष्य
प्रयाग नारायण त्रिपाठी
सौदा सौदा है तभी, अगर सेवा है, सेवा सेवा है तभी, अगर अर्पण है। अर्पण अर्पण है तभी, अगर पीड़ा है, पीड़ा पीड़ा है तभी, अ�
अधूरा गीत
प्रयाग नारायण त्रिपाठी
पहले तो सुनने वालों की पलकें झपकीं जैसे कमोदनी के वन को प्रातः समीर ने छेड़ा हो; फिर कई-कई कोरों में झलकी तरल चमक ज�
प्रश्न
प्रयाग नारायण त्रिपाठी
वृक्ष! पूछूँ किसलिए निःशब्द तुम इतने सटे-से निर्वसन, निश्चेष्ट, गुरु भू-वक्ष से— जैसे कि बर्फ़? बर्फ़! पूछूँ क
नई बरसात
प्रयाग नारायण त्रिपाठी
सुप्त जल— जो कुनमुनाता था, झकोरों के सहारे सर उठाता था, देखता था अचानक सम्मुख अड़े गिरि को; क्षुब्ध होता था, थपेड�
नदी-तट, साँझ और मेरा प्रश्न
प्रयाग नारायण त्रिपाठी
“आह देखो, नदी का तट बहुत सुंदर है बहुत सुंदर...'' (किंतु यह तो नहीं है उत्तर उस प्रश्न का जो मैंने किया था जो कुरेदे ज
लक्ष्य-वेध
प्रयाग नारायण त्रिपाठी
आँखें लीं मींच और खींच ली कमान और छोड़ दिया शब्द-वेधी बाण लक्ष्य बिंध गया। ओ रे ओ अहेरी! दृष्टि आभ्यंतर तेरी कैस
देह की चादर
गोबिन्द प्रसाद
कभी-कभी शब्दों तक हाथ नहीं पहुँचता, वेदना में नहाई रोशनी का शब्द पड़े रहते हैं किसी अँधेरे कोने में दुनिया के अन�
नदी भी ख़ूब है
गोबिन्द प्रसाद
नदी भी ख़ूब है यह दो किनारों के बीच ही क्यों बहती है हमेशा क्या यह तट के बिना नहीं रह सकती और फिर दो ही तट क्यों?... एक
मैं लौट नहीं सका
गोबिन्द प्रसाद
मैं लौट नहीं सका होकर संपूर्ण स्वर में भर रूपाकार —यह और बात है लेकिन उड़ने से पहले दृष्टि ने ध्यान के अगम शिखरो�
सुंदरता के बारे में
गोबिन्द प्रसाद
सुंदरता के बारे में मैं जो भी कहूँगा वह भूख में एक टुकड़ा होगा सुंदरता के बारे में मैं जो भी कहूँगा वह प्यास में ए
अतीत का वर्तमान
गोबिन्द प्रसाद
जिन्हें हम एक मुद्दत से जानते हैं और मिलते ही रहते हैं अक्सर ऐसे और इतने अपनों पर बुढ़ापा कब आया जवानी कहाँ चली ग�
विस्मृति का फूल
गोबिन्द प्रसाद
...मैं हूँ मैं हूँ किसी का ...हूँ किसी का सपना देखा हुआ अनदेखा अपना स्मृति में जैसे बसा-किसी की विस्मृति का फूल ब�
दीवानगी
गोबिन्द प्रसाद
मैं हँसता ज़रूर हूँ मगर दु:ख के सुरूर में... हँसना अब दीवानगी में ढलता जा रहा है
राजा बोला
गोबिन्द प्रसाद
राजा बोला— ‘रात है’ मंत्री बोला—‘रात है’ एक-एक कर फिर सभासदों की बारी आई उबासी किसी ने, किसी ने ली अँगड़ाई इसने, �
ज़िंदगी का स्वाद
गोबिन्द प्रसाद
तुम्हारे होंठों को देखने से पहले मैं नहीं जान पाया था कि गुलाब इतना सुंदर क्यों होता है तुम्हारे होंठों को छूने
पुराना घर
गोबिन्द प्रसाद
पुराना घर इतना पुराना कि कभी पुराना नहीं होता कविता की उस किताब की तरह पंक्तियों के बीच ठहरे हुए किसी अनबीते क�
स्मृति-वन
मनीषा कुलश्रेष्ठ
स्मृतियों के वन होते तो सबसे घने मेरे होते हर छोटी बात हर महीन जुंबिश किसी डाल की लहर लहर ताल की कोई संकर शब्द क�
अभंग
मनीषा कुलश्रेष्ठ
मूर्ति नहीं मानवी धातु नहीं लचीली देह पत्थर नहीं ज़बान कौड़ियाँ नहीं आँखें मौन की पूजा नहीं संवाद का आह्वान ट�
भाषा
मनीषा कुलश्रेष्ठ
भाषा त्वचा बन गई है स्पर्श चाहती है भाषा त्वचा है... शब्द उँगलियाँ हैं आजकल! तुम्हारी और मेरी अलग-अलग कोई एलियन भा
सीली कविता
मनीषा कुलश्रेष्ठ
सारी नैतिकताओं गरिमाओं का भारी दुशाला ओढ़े बैठ गई है उम्र वो सारी उच्छृंखलता कहाँ जाकर सो गई है जब लगता था, हुआ ज�
मैं एक आहट आगत की
मनीषा कुलश्रेष्ठ
मैं एक मिथक हूँ सखि मुझे जानना उपनिषदों में गहरे उतरना है आसान होता है किसी धर्म को उसकी स्थूलता में पकड़ना अपनी �
रज़ा
मनीषा कुलश्रेष्ठ
रज़ा आज भी पेंट करते हैं, एक प्रार्थना की तरह रंगीन-रंगहीन रचते हैं वृत्त और वर्ग अँधेरे उजालों के क्षितिज रँगत�
एकांतिका
मनीषा कुलश्रेष्ठ
जाने ऐसा है कि मेरे वहम के वहम को ऐसा लगता है तुम शब्दों में छिपाते हो प्रेम जैसे कोई जंगल में छिपा आए बालों में आ
योगमाया
मनीषा कुलश्रेष्ठ
कृष्ण की नियति से तुम्हारा ऋणात्मक योग था योगमाया! तुम्हें विनिष्ट होना था लीला-पुरुष की लीलाओं में योग-माया त�
चाय
मनीषा कुलश्रेष्ठ
वह कई मगों वाली चाय का दिन था ज़ाहिर है बुरी तरह भीग गया था किले से उतर कर आया बरसात का पानी भी चाय के रंग का था मान
क्लियोपैट्रा
मनीषा कुलश्रेष्ठ
इतनी सुर्ख़ कि वे लाल की जगह काली दिखने लगें ऐसी अंजीरों की टोकरी में किसने छिपाया था अंजीरों-सा ही चमकीला मिश्र�
शुतुरमुर्ग़
मनीषा कुलश्रेष्ठ
अपनी बेचैनियों को उठाकर कहाँ रख दूँ किसी ताख पर या लपेट कर सिरहाने मेरे कान सोते क्यों नहीं आँखें सूँघती रहती ह�
छिन्नमस्ता
मनीषा कुलश्रेष्ठ
छिन्नमस्ता जन्मों के निर्वासन में पीती हुई अपना ही लहू कोई मानवी तो नहीं ही हो सकती थी अपने संपूर्ण में अपूर्ण �
प्रक्रिया
गोबिन्द प्रसाद
एकाएक कैसा खिल उठा दर्द पत्ती-पत्ती में बनकर फूल सहकर एक उम्र भर की अनदेखी किसी अपने से भी अपने की ख़ामोशी में क�
भविष्य का चेहरा
गोबिन्द प्रसाद
जिस दिन माओ मुस्कराता था सुनते हैं नींद अच्छी आती थी दुश्मन को, उस रात सपनों की चादर में लिपटकर विश्व विजेता क़�
जब मैं बोलता हूँ
गोबिन्द प्रसाद
जब मैं बोलता हूँ तो दरअसल बोलता कहाँ हूँ अंदर ही अंदर ख़ौलता हूँ रह-रहकर कहीं अपने को टटोलता हूँ भीतर ही भीतर उस �
रात
गोबिन्द प्रसाद
रात कितनी बीती कहाँ इसका अनुमान एकाएक स्वप्न में मेरे जागे, जागे-से स्वर तुम्हारे भर गए प्राणों में प्राण स्व�
क्रोध
चतुरसेन शास्त्री
सिर्फ़ हज़ार रुपये ही की तो बात थी। वह भी नहीं दे सका। देना एक ओर रहा, पत्र का उत्तर तक नहीं दिया। एक-दो-तीन-चार, सब पत्
दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी
चतुरसेन शास्त्री
गर्मी के दिन थे। बादशाह ने उसी फाल्गुन में सलीमा से नई शादी की थी। सल्तनत के सब झंझटों से दूर रहकर नई दुलहिन के साथ प�
मेरे नाज़ुक सवाल में उतरो
ज़फ़र हमीदी
मेरे नाज़ुक सवाल में उतरो एक हर्फ़-ए-जमाल में उतरो नक़्श-बंदी मुझे भी आती है कोई सूरत ख़याल में उतरो फेंक दो दूर
जब भी वो मुझ से मिला रोने लगा
ज़फ़र हमीदी
जब भी वो मुझ से मिला रोने लगा और जब तन्हा हुआ रोने लगा दोस्तों ने हँस के जब भी बात की वो हँसा फिर चुप रहा रोने लगा �
मैं ज़िंदगी का नक़्शा तरतीब दे रहा हूँ
ज़फ़र हमीदी
मैं ज़िंदगी का नक़्शा तरतीब दे रहा हूँ फिर इक जदीद ख़ाका तरतीब दे रहा हूँ हर साज़ का तरन्नुम यकसानियत-नुमा है इक �
अपने दिल-ए-मुज़्तर को बेताब ही रहने दो
ज़फ़र हमीदी
अपने दिल-ए-मुज़्तर को बेताब ही रहने दो चलते रहो मंज़िल को नायाब ही रहने दो तोहफ़े में अनोखा ज़ख़्म हालात ने बख़्श�
क्यूँ मैं हाइल हो जाता हूँ अपनी ही तन्हाई में
ज़फ़र हमीदी
क्यूँ मैं हाइल हो जाता हूँ अपनी ही तन्हाई में वर्ना इक पुर-लुत्फ़ समाँ है ख़ुद अपनी गहराई में फ़ितरत ने अता की है �
आँगन-आँगन जारी धूप
ज़फ़र ताबिश
आँगन-आँगन जारी धूप मेरे घर भी आरी धूप क्या जाने क्यूँ जलती है सदियों से बिचारी धूप किस के घर तू ठहरेगी तू तो है �
कितने हाथ सवाली हैं
ज़फ़र ताबिश
कितने हाथ सवाली हैं कितनी जेबें ख़ाली हैं सब कुछ देख रहा हूँ मैं रातें कितनी काली हैं मंज़र से ला-मंज़र तक आँख�
न कहो तुम भी कुछ न हम बोलें
ज़फ़र ताबिश
न कहो तुम भी कुछ न हम बोलें आओ ख़ामोशियों के लब खोलें बस्तियाँ हम ख़ुद ही जला आए किसी बरगद के साए में सो लें कुछ न
गिर गए जब सब्ज़ मंज़र टूट कर
ज़फ़र ताबिश
गिर गए जब सब्ज़ मंज़र टूट कर रह गया मैं अपने अंदर टूट कर सो रहे थे शहर भी जंगल भी जब रो रहा था नीला अम्बर टूट कर मै�
बस्ती बस्ती जंगल जंगल घूमा मैं
ज़फ़र ताबिश
बस्ती बस्ती जंगल जंगल घूमा मैं लेकिन अपने घर में आ कर सोया मैं जब भी थकन महसूस हुई है रस्ते की बूढ़े-बरगद के साए म�
ब-ज़ाहिर यूँ तो मैं सिमटा हुआ हूँ
ज़फ़र ताबिश
ब-ज़ाहिर यूँ तो मैं सिमटा हुआ हूँ अगर सोचो तो फिर बिखरा हुआ हूँ मुझे देखो तसव्वुर की नज़र से तुम्हारी ज़ात में उत�
ज़िंदगी दर्द की कहानी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ज़िंदगी दर्द की कहानी है चश्म-ए-अंजुम में भी तो पानी है बे-नियाज़ाना सुन लिया ग़म-ए-दिल मेहरबानी है मेहरबानी है
आँखों में जो बात हो गई है
फ़िराक़ गोरखपुरी
आँखों में जो बात हो गई है इक शरह-ए-हयात हो गई है जब दिल की वफ़ात हो गई है हर चीज़ की रात हो गई है ग़म से छुट कर ये ग़म
निगाह-ए-नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या क्या
फ़िराक़ गोरखपुरी
निगाह-ए-नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या क्या हिजाब अहल-ए-मोहब्बत को आए हैं क्या क्या जहाँ में थी बस इक अफ़्वाह तेरे जल�
ये नर्म नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चराग़
फ़िराक़ गोरखपुरी
ये नर्म नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चराग़ तिरे ख़याल की ख़ुशबू से बस रहे हैं दिमाग़ दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँ
है अभी महताब बाक़ी और बाक़ी है शराब
फ़िराक़ गोरखपुरी
है अभी महताब बाक़ी और बाक़ी है शराब और बाक़ी मेरे तेरे दरमियाँ सदहा हिसाब दिल में यूँ बेदार होते हैं ख़यालात-ए-ग़�
इक रोज़ हुए थे कुछ इशारात ख़फ़ी से
फ़िराक़ गोरखपुरी
इक रोज़ हुए थे कुछ इशारात ख़फ़ी से आशिक़ हैं हम उस नर्गिस-ए-राना के जभी से करने को हैं दूर आज तो तौ ये रोग ही जी से अ�
जुनून-ए-कारगर है और मैं हूँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
जुनून-ए-कारगर है और मैं हूँ हयात-ए-बे-ख़बर है और मैं हूँ मिटा कर दिल निगाह-ए-अव्वलीं से तक़ाज़ा-ए-दिगर है और मैं हूँ
हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का पर्दा उठा दिया
फ़िराक़ गोरखपुरी
हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का पर्दा उठा दिया ख़ुद बढ़ के इश्क़ ने मुझे मेरा पता दिया गर्द-ओ-ग़ुबार-ए-हस्ती-ए-फ़ानी उड़ा दि�
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ उफ़ ले गई है मुझ को मोहब्बत कहाँ कहाँ बेताबी-ओ-सुकूँ की हुईं मंज़िलें तमाम बहलाए�
समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है
फ़िराक़ गोरखपुरी
समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है शब-ए-फ़ुर्क़त मुझे क्या हो गया है तिरा ग़म क्या है बस ये जानता हूँ कि मेरी ज़िंदगी म�
रात भी नींद भी कहानी भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
रात भी नींद भी कहानी भी हाए क्या चीज़ है जवानी भी एक पैग़ाम-ए-ज़िंदगानी भी आशिक़ी मर्ग-ए-ना-गहानी भी इस अदा का ति�
वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें
फ़िराक़ गोरखपुरी
वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें वो इक शख़्स के याद आने की रातें शब-ए-मह की वो ठंडी आँचें वो शबनम तिरे हुस्न के रस्मस�
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं मिरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का �
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
फ़िराक़ गोरखपुरी
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम उस निगाह-ए-आश्ना को क्या समझ बैठे थे हम रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र
अपने ग़म का मुझे कहाँ ग़म है
फ़िराक़ गोरखपुरी
अपने ग़म का मुझे कहाँ ग़म है ऐ कि तेरी ख़ुशी मुक़द्दम है आग में जो पड़ा वो आग हुआ हुस्न-ए-सोज़-ए-निहाँ मुजस्सम है
जिस शहर गए
अनिरुद्ध उमट
जिस शहर गए स्टेशन पर मिला पुराना शहर हमें मिलने को आतुर हमारे धोखे स्वप्न रातें घातें उसकी जेबों में खनखना र�
हमें क्या
अनिरुद्ध उमट
इतवार के दिन न मैं उठूँ जल्दी न तुम सूर्य उठे केवल काम पर अपने लगना होगा उसे दहके कहीं हमें क्या आते खिड़की तक
सज़ा
अनिरुद्ध उमट
ईश्वर की अदालत में एक नदी गिड़गिड़ा रही थी कोई तालाब हाथ बाँधे बैठा था उकड़ूँ समंदर उम्मीद हारे खड़े थे पर्वत �
भीतर के अँधेरे में
अनिरुद्ध उमट
दीवार थी मेरे देखने पर दीवार न रही देखना दीवार हो गया हाथ लगाया फफक पड़ी कोई चेहरा था जाने कैसा किसका अँगुलिया
जा चुके चेहरे
अनिरुद्ध उमट
शाम किसी आवाज़-सी बलखाती तस्वीरों से जा चुके चेहरे उदास हो उतरने लगते जिस आँगन वहाँ टूटी साँस का तार फफक म
किससे पूछें
अनिरुद्ध उमट
जिन बस्तियों को हमने दिए पक्षियों के नाम पक्षी वे लुप्त हो गए —सूखे जिस्मों-सी बस्तियाँ— लोग जाने कहाँ गए किस�
अपना आप
अनिरुद्ध उमट
लगा जब भूल रहा हूँ सब न भूलने ने तब बहुत मारा दो दीवारों बीच जैसे ढह गई हो रात अपना आप उठाया और चीलों के हवाल�
चीज़ें
अनिरुद्ध उमट
चीज़ें जानती हैं कुछ नहीं है होना उन्हें रहना है ताकि लोग न रह जाएँ अकेले
मौत की घड़ी
अनिरुद्ध उमट
जिस क्षण तुम्हें मृत्यु लेने आएगी उसकी आँखों में मत देखना सिर्फ़ कहना देखो तुम्हारे हाथ कितने गंदे हैं देखो त�
खोज
अनिरुद्ध उमट
किसी भी चीज़ की खोज असंभव है कविता में सत्य की सुख की करुणा की ख़ुद कविता की भी
संदूक़
अनिरुद्ध उमट
प्रेम खोजते मैंने संदूक़ खोला। उसमें बाँसुरी मिली। स्लेट मिली। काग़ज़ की नाव मिली। नमक की पोटली भी। नक़ली दाँत भ�
अंत में
अनिरुद्ध उमट
होने से होगी जिसके भी कविता होगा नहीं वह कहीं
आँच
अनिरुद्ध उमट
तुम जाओ करनी है ठंडी राख मुझे रखनी है पलकों पर तुम जाओगे नहीं तो लौटोगे कैसे तुम्हें लिखी जाती इबारत पढ़ोग
ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
फ़िराक़ गोरखपुरी
ये माना ज़िंदगी है चार दिन की बहुत होते हैं यारो चार दिन भी
प्रायश्चित
भगवती चरण वर्मा
अगर कबरी बिल्ली घर-भर में किसी से प्रेम करती थी तो रामू की बहू से, और अगर रामू की बहू घर-भर में किसी से घृणा करती थी तो �
दो बाँके
भगवती चरण वर्मा
शायद ही कोई ऐसा अभागा हो, जिसने लखनऊ का नाम न सुना हो, और युक्त प्रांत में ही नहीं, बल्कि सारे हिंदुस्तान न में, और मैं
देखो-सोचो-समझो
भगवती चरण वर्मा
देखो, सोचो, समझो, सुनो, गुनो औ' जानो, इसको, उसको, सम्भव हो निज को पहचानो। लेकिन अपना चेहरा जैसा है रहने दो, जीवन की धार�
आज शाम है बहुत उदास
भगवती चरण वर्मा
आज शाम है बहुत उदास, केवल मैं हूँ अपने पास। दूर कहीं पर हास-विलास, दूर कहीं उत्सव-उल्लास। दूर छिटक कर कहीं खो गया,
तुम मृगनयनी
भगवती चरण वर्मा
तुम मृगनयनी, तुम पिकबयनी, तुम छवि की परिणीता-सी। अपनी बेसुध मादकता में, भूली-सी, भयभीता सी। तुम उल्लास भरी आई हो,
लड़ने के लिए चाहिए
विहाग वैभव
लड़ने के लिए चाहिए थोड़ी-सी सनक, थोड़ा-सा पागलपन और एक आवाज़ को बुलंद करते हुए मुफ़्त में मर जाने का हुनर बहुत समझदार
बेलगाम घोड़े
शैलेन्द्र
आज से नहीं बचपन से देखता हूँ इन बेलगाम घोड़ों को उन्मत्त हिनहिनाते उछलते-कूदते रौंदते बाग़ों को, बग़ीचों को कलि�
कल हमारा है
शैलेन्द्र
ग़म की बदली में चमकता एक सितारा है आज अपना हो न हो पर कल हमारा है धमकी ग़ैरों का नहीं अपना सहारा है आज अपना हो न हो प�
तुम रहे आकाश को ही देखते
शैलेन्द्र
ज़िंदगी अरमान बनके गुनगुनाई एक नई पहचान बनके मुस्कुराई तुम रहे आकाश को ही देखते। जब समझ पाए न तुम उसका इशारा ना�
हड़ताल के गीत
शैलेन्द्र
जब तक मालिक की नस-नस को हिला न दे भूचाल जारी है हड़ताल हमारी जारी है हड़ताल न टूटे हड़ताल हमारी न टूटे हड़ताल हम इ�
पंद्रह अगस्त
शैलेन्द्र
जय-जय भारतवर्ष प्रणाम! युग-युग के आदर्श प्रणाम! शत्-शत् बंधन टूटे आज बैरी के प्रभु रूठे आज अंधकार है भाग रहा जाग र
अंदर भी आग जला
शैलेन्द्र
झूठे सपनों के छल से निकल चलती सड़कों पर आ! अपनों से न रह यों दूर-दूर आ क़दम से क़दम मिला! हम सबकी मुश्किलें एक सी है
कवि तुम किनके? कविता किसकी?
शैलेन्द्र
जिनके सीने में सुइयों-सा गड़ता है दर्द विवशता का, जिनके घर में घुस बैठा है अंधा राक्षस परवशता का, जो दुनिया भर का बो
हम आज़ादी के दीवाने
शैलेन्द्र
विजयी वीर सिपाही हम आज़ाद हिंद फ़ौज के विद्रोही मल्लाही आज़ादी का दुश्मन जो हो यूँ ही छोड़ न देंगे दम न लेंगे जब
तू ज़िंदा है तो...
शैलेन्द्र
तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर। ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को �
जिन लड़कियों के प्रेमी मर जाते हैं
विहाग वैभव
पहले तो उन्हें इस ख़बर पर विश्वास नहीं होता कि धरती को किसी अजगर ने निगल लिया है सूरज आज काम पर नहीं लौटेगा आज की र�
चाय पर शत्रु-सैनिक
विहाग वैभव
उस शाम हमारे बीच किसी युद्ध का रिश्ता नहीं था मैनें उसे पुकार दिया— आओ भीतर चले आओ बेधड़क अपनी बंदूक़ और असलहे वही�
पिता होना बचा रहेगा
विहाग वैभव
आसमान से एक फूल गिरा उसकी प्रार्थना में उठी दोनों बाँहों में गिरते हुए झरने-सा उजला-सा फूल ख़ुशबुओं से भर दिया आ�
कुम्हार के हाथ से
विहाग वैभव
यही सही समय है जगत की पुनर्रचना का मुनादी पिटवाकर इसी दम सृष्टि की सभी कार्यवाहियाँ स्थगित की जाएँ ग्रहों को ठह�
सपने
विहाग वैभव
विशाल तोप की पीठ पर चित्त लेटकर दंगों के के बीच तलवार ओढ़कर सोते हुए मणिकर्णिका पर जलाते हुए अपने जवान भाई की लाश उ
बेहया के फूल
विहाग वैभव
हम गलीच में पैदा हुए गलीच में ही बढ़े और खिले भी यानी सबसे पुराने और सड़ चुके पानी को पिया हमने उसी में जिया हमने ह�
आत्मा की मिट्टी
विहाग वैभव
मेरी आत्मा कुछ अलग क़िस्म की मिट्टी से बनाई गई एक बेचैन और शांत दहकता हुआ चूल्हा जिसने चारों पहर और सातों मास अप�
छद्म संवेदनाओं को भुना लो साथी
विहाग वैभव
छद्म संवेदनाओं को भुना लो साथी कहीं दुर्घटनाओं का यह सुअवसर निकल न जाए भीतर से ज़रा और दम साधो आँखों में तनिक और न�
जीवन के अंत में
असद ज़ैदी
जीवन के अंत में अचानक दिखाई देंगी हमें अपनी कुछ कारगुज़ारियाँ अरे हमें ख़ुद कभी पता नहीं चल पाया कि हम एक बेहतर �
जल के लिए
नन्द किशोर आचार्य
जितना भी जला दे सूरज सुखा दे पवन सूखी-फटी पपड़ियों में झलक आता है धरती का प्यार जल के लिए— गहरे कहीं जज़्ब है जो
हे ईश्वर
असद ज़ैदी
ईर्ष्या करना भी एक काम है काश, मैं यही ठीक से कर पाता मैंने कुछ लोगों से ईर्ष्या की और कुछ लोगों का भला चाहा जिनका �
सुबह की दुआ
असद ज़ैदी
जीवित रहे मेरी रज़ाई जिसने मुझे पाला जीवित रहे सुबह जो मेरी ख़ुशी है और रहें फिर संसार में वे जिन्हें रहना है।
कविता-पाठ
असद ज़ैदी
मैं एक ऐसी जगह गया जो अपने लठैतों मोहभंग से ग्रस्त फ़रिश्तों और बेरोज़गार अर्द्धकवियों के लिए मशहूर थी शाम का
ख़ामोशी और हँसी
असद ज़ैदी
किस क़िस्म का जीवन तुमने जिया बड़ी आपा ने पूछा बड़ी आपा बहुत अच्छा-सा जीवन ख़ुशबूदार बुरादा खाया चटपटा ज्ञान लिय
निद्राविहीन रात्रि
असद ज़ैदी
भौंकता है रात्रि का पशु मेरी खुली आँख से भौंकता है, न कि काटता है भौंकता है क्योंकि शरीर में चीख़ता है शरीर क्यों
इन शब्दों में
असद ज़ैदी
इन शब्दों में कोई छाया नहीं है कभी थी—रही होगी अब तो महज़ ठंडे काले अक्षर हैं जो कोई मर्ज़ी भी नहीं बताते इन शब्द�
एक ग़रीब का अकेलापन
असद ज़ैदी
एक ग़रीब का अकेलापन उसके ख़ाली पेट के सिवा कुछ नहीं अपनी दार्शनिक चिंता में दुहराता हूँ मैं यही एक बात।
पानी
असद ज़ैदी
जब तक मैं इसे जल न कहूँ मुझे इसकी कल-कल सुनाई नहीं देती मेरी चुटिया इससे भीगती नहीं मेरे लोटे में भरा रहता है अंधक�
मेरे दुश्मन
असद ज़ैदी
जब मैं देखूँगा कि वे बहुत क़रीब आ चुके हैं और उन्होंने मुझे अभी देखा नहीं है इससे पहले कि उनकी नज़र मुझ पर पड़े
दूसरी तरफ़
असद ज़ैदी
कहीं भी दाख़िल होते ही मैं बाहर जाने का रास्ता ढूँढ़ने लगता हूँ मेरी यही उपलब्धि है कि मुझे ऐसी बहुत जगहों से बा
संस्कार
असद ज़ैदी
बीच के किसी स्टेशन पर दोने में पूड़ी-साग खाते हुए आप छिपाते हैं अपना रोना जो अचानक शुरू होने लगता है पेट की मरोड़
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अकबर इलाहाबादी
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
आज वीरान अपना घर देखा
दुष्यंत कुमार
आज वीरान अपना घर देखा, तो कई बार झाँक कर देखा। पाँव टूटे हुए नज़र आए, एक ठहरा हुआ सफ़र देखा। रास्ता काट कर गई बिल्
होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए
दुष्यंत कुमार
होने लगी है जिस्म में जुम्बिश तो देखिए, इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिए। गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में,
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
दुष्यंत कुमार
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं, कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं। इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक �
अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए
दुष्यंत कुमार
अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए, तिरी सहर हो मिरा आफ़्ताब हो जाए। हुज़ूर आरिज़-ओ-रुख़्सार क्या तमाम बदन, मिरी �
तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा
दुष्यंत कुमार
तुमको निहारता हूँ सुबह से ऋतम्बरा, अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा। ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब, फिरता �
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है
दुष्यंत कुमार
मत कहो, आकाश में कुहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से, क्या करोगे, सूर्य क�
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए
दुष्यंत कुमार
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए, कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए। यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है, च�
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
दुष्यंत कुमार
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है, माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है। वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू, मैं क�
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
दुष्यंत कुमार
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त ल�
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
दुष्यंत कुमार
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा, मैं सज्दे में नहीं था आप को धोका हुआ होगा। यहाँ तक आते आते सूख जाती है क�
ये सच है कि पाँवों ने बहुत कष्ट उठाए
दुष्यंत कुमार
ये सच है कि पाँवों ने बहुत कष्ट उठाए, पर पाँव किसी तरह से राहों पे तो आए। हाथों में अँगारों को लिए सोच रहा था, कोई म�
तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं
दुष्यंत कुमार
तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं, कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं। मैं बे-पनाह अँधेरों को सुब्ह कैस�
जाने किस किस का ख़याल आया है
दुष्यंत कुमार
जाने किस किस का ख़याल आया है, इस समुंदर में उबाल आया है। एक बच्चा था हवा का झोंका, साफ़ पानी को खँगाल आया है। एक ढ�
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
दुष्यंत कुमार
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ। एक जंगल है तेरी आँखों में, मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ। तू कि�
बूँद में ब्रह्मांड
उद्‌भ्रान्त
जब प्राणवायु ने अपनी से दोगुनी जलवायु से मिलकर सिरजी एक बूँद जल की तब उसी बूँद के आईने में देखा मैंने ख़ुशी से
दर्द
उद्‌भ्रान्त
कोई ऐसा भी होता है दर्द? जिसका कोई चेहरा न हो आँख, नाक, कान, मुख से विहीन! आत्मा के अँधेरों में गहरे उतरता और टप�
बीज की यात्रा
उद्‌भ्रान्त
विराट पृथ्वी को अपनी उँगली पर नचाता काल कर रहा है नृत्य महाशून्य में सृजन का शिशु अभी-अभी जन्मा बीज ने की यात�
नींद में जीवन
उद्‌भ्रान्त
जन्म के समय आँखें थीं बंद मगर जाग रहा था मैं आँखें खुलते ही आने लगी नींद नींद में ही जीवन अंततः जगे विस्फारि
उलटबाँसी
उद्‌भ्रान्त
मैंने दृष्टि से लिया सुनने का काम चुनांचे मेरी श्रवणेंद्रिय ने मुझे दिखाए स्तब्धकारी दृश्य स्पर्श ने सुनाया
मृत्यु
उद्‌भ्रान्त
मृत्यु जैसे कि एक गुलदस्ता टूटकर बदलता सृष्टि के बग़ीचे में मृत्यु जैसे कि एक झरना एक क्षण ठहर उद्याम वेग से आ
शुभागमन
सियारामशरण गुप्त
चक्रपाणिता तज, धोने को पाप-पंक के परनाले, आहा! आ पहुँचा मोहन तू विप्लव की झाड़ू वाले! आवर्जन के ढेर हमारे इस आँगन
पतंग
उद्‌भ्रान्त
आधे से अधिक जीवन कानपुर में बिताते हुए पतंगबाज़ी ख़ूब मैंने देखी थी नवाबों के शहर लखनऊ में भी बचपन में स्वयं
ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे
राहत इन्दौरी
ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे, नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो।
जल
उद्‌भ्रान्त
जीवन का सबसे ज़रूरी तत्त्व। यही है सत्व। ईश्वर की तरह धरे रूप अनेक। भावना-सा तरल। चुप-चुप छुपता आँख की ओट।
इत्ता-सा ब्राह्मांड
उद्‌भ्रान्त
इत्ता-सा! बित्ता-सा मृद्भांड! कित्ता-सा? इत्ता-सा ब्रह्मांड!
पोस्टकार्ड
उद्‌भ्रान्त
मोबाइल और इंटरनेट के इस युग में भी अपनी धीमी रफ़्तार के बावजूद एक आम आदमी की तरह अभी बचा है उसका अस्तित्व और जब �
हम सैनिक हैं
सियारामशरण गुप्त
हम सैनिक हैं, हमें जगत में किसका डर है? रणक्षेत्र ही सदा हमारा प्यारा घर है। हृदय हमारा विपुल वीरता का आकर है, आँगन-
एक हमारा देश
सियारामशरण गुप्त
एक हमारा ऊँचा झंडा, एक हमारा देश, इस झंडे के नीचे निश्चित एक अमिट उद्देश। देखा जागृति के प्रभात में एक स्वतंत्र प्
जय-जय भारतवर्ष हमारे
सियारामशरण गुप्त
जय-जय भारतवर्ष हमारे, जय जय हिंद, हमारे हिंद, विश्व-सरोवर के सौरभमय प्रिय अरविंद, हमारे हिंद! तेरे स्रोतों में अक�
जग में अब भी गूँज रहे हैं
सियारामशरण गुप्त
जग में अब भी गूँज रहे हैं गीत हमारे; शौर्य, वीर्य्य, गुण हुए न अब भी हमसे न्यारे। रोम, मिस्र, चीनादि काँपते रहते सारे,
शंखनाद
सियारामशरण गुप्त
मृत्युंजय, इस घट में अपना कालकूट भर दे तू आज; ओ मंगलमय, पूर्ण, सदाशिव, रुद्र-रूप धर ले तू आज! चिर-निद्रित भी जाग उठे�
असहाय
शुभा
कभी फेफड़े भर जाते हैं गूँगे दुख से दिल का कहीं पता नहीं मिलता भ्रम की पीठ दिखाई देती है चेहरा नहीं।
एक लंबी दूरी
शुभा
एक लंबी दूरी एक अधूरा काम एक भ्रूण ये सभी जगाते हैं कल्पना कल्पना से दूरी कम नहीं होती काम पूरा नहीं होता फिर भ�
दुख का विरह
शुभा
कहाँ है वह दुख चट्टानों से टक्कर मारता भरी-पूरी नदी जैसा और यह क्या है बूँद-बूँद टपकता मरे हुए साँप के विष जैसा�
पिताओं के बारे में
शुभा
मैंने बहुत समय तक कविता नहीं लिखी समझिए बस लिखते-लिखते नहीं लिखी इसकी एक वजह तो आलस ही है लेकिन यह वजह तो लगभग झ�
एक पत्ता
शुभा
यह पत्ता जिसे बथुआ कहते हैं उगता है कहीं भी उत्तर भारत के खेतों और मैदानों में यह वही पत्ता है जिसके साथ वह दो ब�
एक और मुश्किल
शुभा
अत्याचार कहने पर प्रतिक्रिया होती है दुःख कहने पर कोई दिल पसीजता है दोनों के बीच हिलता एक धागा छूटता रहता है भा�
एक ख़याल
शुभा
वह टीला वहीं होगा झड़बेरियाँ उस पर चढ़ जमने की कोशिश में होंगी चींटियाँ अपने अंडे लिए बिलों की ओर जा रही होंगी हरा
पेड़ों की उदासी
शुभा
पेड़ों के पास ऐसी कोई भाषा नहीं थी जिसके ज़रिए वे अपनी बात इंसानों तक पहुँचा सकें शायद पेड़ बुरा मान गए किसी बात �
सौभाग्य
शुभा
एकमुश्त शरीर का दर्द महसूस करना जैसे घर लौटना हुआ आत्मा की उदासी देखना जैसे प्रियजन से मिलना हुआ।
आजकल
शुभा
लोग पॉलीथिन के थैले पैकेट और डिब्बे लिए शॅपिंग के बाद लदे-फँदे जा रहे थे मैं ख़ाली हाथ गुज़रती थी उस सड़क से मेर�
हवा आधी है
शुभा
हवा आधी है आग आधी है पानी आधा है दुनिया आधी है आधा-आधा नहीं बीच से टूटा है यह संसार बीच से टूटा है।
स्वाभाविक जीवन
शुभा
एक व्यक्ति विफलता से बना है और इसमें कोई ख़ास बात नहीं है ख़ास बात इसमें है कि वह सफलता से कैसे बचा सफलता जब प्यार औ
ये रोटियाँ हैं ये सिक्के हैं और दाएरे हैं
गुलज़ार
ये रोटियाँ हैं ये सिक्के हैं और दाएरे हैं, ये एक दूजे को दिन भर पकड़ते रहते हैं।
ये माना उस तरफ़ रस्ता न जाए
मदन मोहन दानिश
ये माना उस तरफ़ रस्ता न जाए, मगर फिर भी मुझे रोका न जाए। बदल सकती है रुख़ तस्वीर अपना, कुछ इतने ग़ौर से देखा न जाए।
हम अपने दुख को गाने लग गए हैं
मदन मोहन दानिश
हम अपने दुख को गाने लग गए हैं, मगर इस में ज़माने लग गए हैं। किसी की तर्बियत का है करिश्मा, ये आँसू मुस्कुराने लग गए
दे सको तो ज़िंदगानी दो मुझे
मदन मोहन दानिश
दे सको तो ज़िंदगानी दो मुझे, लफ़्ज़ तो मैं हूँ मआ'नी दो मुझे। खो न जाए मुझ में इक बच्चा है जो, यूँ करो कोई कहानी दो म�
नफ़रतों से लड़ो प्यार करते रहो
मदन मोहन दानिश
नफ़रतों से लड़ो प्यार करते रहो, अपने होने का इज़हार करते रहो। इतने अच्छे बनोगे तो मर जाओगे, थोड़े दुश्मन भी तय्य�
रंग-ए-दुनिया कितना गहरा हो गया
मदन मोहन दानिश
रंग-ए-दुनिया कितना गहरा हो गया, आदमी का रंग फीका हो गया। रात क्या होती है हम से पूछिए, आप तो सोए सवेरा हो गया। डूब�
कोई ये लाख कहे मेरे बनाने से मिला
मदन मोहन दानिश
कोई ये लाख कहे मेरे बनाने से मिला, हर नया रंग ज़माने को पुराने से मिला। फ़िक्र हर बार ख़मोशी से मिली है मुझ को, और ज
है इंतिज़ार मुक़द्दर तो इंतिज़ार करो
मदन मोहन दानिश
है इंतिज़ार मुक़द्दर तो इंतिज़ार करो, पर अपने दिल की फ़ज़ा को भी ख़ुश-गवार करो। तुम्हारे पीछे लगी हैं उदासियाँ क�
हर एक लम्हा मिरी आग में गुज़ारे कोई
मदन मोहन दानिश
हर एक लम्हा मिरी आग में गुज़ारे कोई, फिर उस के बा'द मुझे इश्क़ में उतारे कोई। मैं अपनी गूँज को महसूस करना चाहता हूँ,
आधी आग और आधा पानी हम दोनों
मदन मोहन दानिश
आधी आग और आधा पानी हम दोनों, जलती-बुझती एक कहानी हम दोनों। मंदिर मस्जिद गिरिजा-घर और गुरुद्वारा, लफ़्ज़ कई हैं एक
तुम्हारे साथ जो बरता हुआ है
मदन मोहन दानिश
तुम्हारे साथ जो बरता हुआ है, वो लम्हा जस का तस रक्खा हुआ है। अभी ये रंग जो पहना है तुम ने, यही मौसम ने भी पहना हुआ है�
मेरा नहीं है और न किसी और ही का है
अतुल अजनबी
मेरा नहीं है और न किसी और ही का है, परतव जहाँ कहीं है तिरी रौशनी का है। पंछी दरख़्त फूल तो मुँह ढक के सो गए, जंगल में
भली हो या कि बुरी हर नज़र समझता है
अतुल अजनबी
भली हो या कि बुरी हर नज़र समझता है, हर एक शख़्स की आहट को घर समझता है। हर एक दर को वो अपना ही दर समझता है, मगर ज़माना �
जब उस के सामने सूरज हवा नदी क्या है
अतुल अजनबी
जब उस के सामने सूरज हवा नदी क्या है, हम आदमी हैं हमारी बिसात ही क्या है। बिछड़ के घर से यही सोचता हूँ मैं दिन-रात, श�
सफ़र में यूँ तो बलाएँ भी काम करती हैं
अतुल अजनबी
सफ़र में यूँ तो बलाएँ भी काम करती हैं, मगर किसी की दुआएँ भी काम करती हैं। मुशायरों में फ़क़त शाइरी नहीं चलती, मुशा
निगाह कोई तो तूफ़ाँ में मेहरबान सी है
अतुल अजनबी
निगाह कोई तो तूफ़ाँ में मेहरबान सी है, हर एक मौज समुंदर की पाएदान सी है। हर एक शख़्स को गाहक समझ के ख़ुश रखना, ये ज़
अजब ख़ुलूस अजब सादगी से करता है
अतुल अजनबी
अजब ख़ुलूस अजब सादगी से करता है, दरख़्त नेकी बड़ी ख़ामोशी से करता है। मैं उस का दोस्त हूँ अच्छा यही नहीं काफ़ी, उम
सर पर हमारे साया-ए-दीवार भी नहीं
अतुल अजनबी
सर पर हमारे साया-ए-दीवार भी नहीं, सूरज सा हम फ़क़ीरों का घर-बार भी नहीं। मुझ से तअ'ल्लुक़ात का इक़रार भी नहीं, और को
उमंग
केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'
सागर-सा उमड़ पड़ूँ मैं, लहरें असंख्य फैलाकर। विचरूँ झंझा के रथ पर, मैं ध्वंसक रूप बनाकर। मैं शिव-सा ताण्डव दिखलाऊ�
करुणा की छाया न करो
केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'
जलने दो जीवन को इस पर करुणा की छाया न करो! इन असंख्य-घावों पर नाहक अमृत बरसाया न करो! फिर-फिर उस स्वप्निल-अतीत की गाथ
ऐ अतीत की घड़ियाँ!
केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'
अधर न आओ, तड़प रहा हूँ ऐ अतीत की घड़ियाँ! इधर न आओ, छिन्न पड़ी हैं, प्राणों की पंखुड़ियाँ! मलिन-विषाद-तन-में पीड़ित जी�
मेरे मन का भार
केदारनाथ मिश्र 'प्रभात'
मेरे मन का भार प्यार से कैसे तोल सकोगे? आज मौन का पट प्यारे! तुम कैसे खोल सकोगे? हिय-हारक मृदुहीर-हार पर लुटते लाख-ह�
रागिनी
कन्हैयालाल सेठिया
भले ही फूँकते रहो बाँसुरी बिना धरे छिद्रों पर उँगलियाँ नहीं निकलेगी प्रणय की रागिनी!
स्वभाव
कन्हैयालाल सेठिया
नहीं कर पाता सागर को मीठा सरिताओं का समर्पण, कर सकता प्रचंड सूर्य उसे विवश रचने के लिए पीयूषवर्षी मेघ!
मंज़ूर नहीं
रमेश रंजक
बहुत अच्छी लगती हैं मेड़ें खेतों की सिंचाई के लिए कितनी प्यारी लगती हैं कुर्सियाँ भलाई के लिए। बहुत मौजूँ लगती ह
भला लगता है
रमेश रंजक
डाकिये का दीख जाना मुस्कुराते हुए आना भला लगता है। सोचता हूँ कुछ देर बैठाल कर बातें करूँ सामने सिगरेट, बीड़ी, �
किसी के एक इशारे में किस को क्या न मिला
फ़ानी बदायुनी
किसी के एक इशारे में किस को क्या न मिला, बशर को ज़ीस्त मिली मौत को बहाना मिला। मज़ाक़-ए-तल्ख़-पसंदी न पूछ इस दिल का,
हम मौत भी आए तो मसरूर नहीं होते
फ़ानी बदायुनी
हम मौत भी आए तो मसरूर नहीं होते, मजबूर-ए-ग़म इतने भी मजबूर नहीं होते। दिल ही में नहीं रहते आँखों में भी रहते हो, तुम
मर के टूटा है कहीं सिलसिला-ए-क़ैद-ए-हयात
फ़ानी बदायुनी
मर के टूटा है कहीं सिलसिला-ए-क़ैद-ए-हयात, मगर इतना है कि ज़ंजीर बदल जाती है। असर-ए-इश्क़ तग़ाफ़ुल भी है बेदाद भी है,
संग-ए-दर देख के सर याद आया
फ़ानी बदायुनी
संग-ए-दर देख के सर याद आया, कोई दीवाना मगर याद आया। फिर वो अंदाज़-ए-नज़र याद आया, चाक-ए-दिल ता-ब जिगर याद आया। ज़ौक़
क्या छुपाते किसी से हाल अपना
फ़ानी बदायुनी
क्या छुपाते किसी से हाल अपना, जी ही जब हो गया निढाल अपना। हम हैं उस के ख़याल की तस्वीर, जिस की तस्वीर है ख़याल अपना�
हर घड़ी इंक़लाब में गुज़री
फ़ानी बदायुनी
हर घड़ी इंक़लाब में गुज़री, ज़िंदगी किस अज़ाब में गुज़री। शौक़ था माना-ए-तजल्ली-ए-दोस्त, उन की शोख़ी हिजाब में गु�
आँख उठाई ही थी कि खाई चोट
फ़ानी बदायुनी
आँख उठाई ही थी कि खाई चोट, बच गई आँख दिल पे आई चोट। दर्द-ए-दिल की उन्हें ख़बर क्या हो, जानता कौन है पराई चोट। आई तन्
मेरे लब पर कोई दुआ ही नहीं
फ़ानी बदायुनी
मेरे लब पर कोई दुआ ही नहीं, इस करम की कुछ इंतिहा ही नहीं। कश्ती-ए-ए'तिबार तोड़ के देख, कि ख़ुदा भी है ना-ख़ुदा ही नही�
हर साँस के साथ जा रहा हूँ
फ़ानी बदायुनी
हर साँस के साथ जा रहा हूँ, मैं तेरे क़रीब आ रहा हूँ। ये दिल में कराहने लगा कौन, रो रो के किसे रुला रहा हूँ। अब इश्क�
इक फ़साना सुन गए इक कह गए
फ़ानी बदायुनी
इक फ़साना सुन गए इक कह गए, मैं जो रोया मुस्कुरा कर रह गए। या तिरे मोहताज हैं ऐ ख़ून-ए-दिल, या इन्हीं आँखों से दरिया �
वो हमें जिस क़दर आज़माते रहे
ख़ुमार बाराबंकवी
वो हमें जिस क़दर आज़माते रहे, अपनी ही मुश्किलों को बढ़ाते रहे। वो अकेले में भी जो लजाते रहे, हो न हो उन को हम याद आत
न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
ख़ुमार बाराबंकवी
न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है, दिया जल रहा है हवा चल रही है। सुकूँ ही सुकूँ है ख़ुशी ही ख़ुशी है, तिरा ग़म सलाम�
न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
ख़ुमार बाराबंकवी
न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है, दिया जल रहा है हवा चल रही है।
रंग इस मौसम में भरना चाहिए
अंजुम रहबर
रंग इस मौसम में भरना चाहिए, सोचती हूँ प्यार करना चाहिए। ज़िंदगी को ज़िंदगी के वास्ते, रोज़ जीना रोज़ मरना चाहिए।
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
अंजुम रहबर
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था, वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था। मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई, जिस शख़�
बुझ गया दिल हयात बाक़ी है
ख़ुमार बाराबंकवी
बुझ गया दिल हयात बाक़ी है, छुप गया चाँद रात बाक़ी है। हाल-ए-दिल उन से कह चुके सौ बार, अब भी कहने की बात बाक़ी है। ऐ �
तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए
अंजुम रहबर
तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए, मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद आ गए। कल मेरी एक प्यारी सहेली किताब में, इक ख़त छुपा
कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
अंजुम रहबर
कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं, यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं। वो बे-वफ़ा जो राह में टकरा गया कहीं, कह द�
आग बहते हुए पानी में लगाने आई
अंजुम रहबर
आग बहते हुए पानी में लगाने आई, तेरे ख़त आज मैं दरिया में बहाने आई। फिर तिरी याद नए ख़्वाब दिखाने आई, चाँदनी झील के �
अँगूठा छाप नेता
काका हाथरसी
चपरासी या कलर्क जब करना पड़े तलाश। पूछा जाता—क्या पढ़े, कौन क्लास हो पास? कौन क्लास हो पास, विवाहित हो या क्वारे। �
घाटे पर घाटा
काका हाथरसी
भोंदूमल बेकार थे, हुआ पिलपिला हाल। फ़ाक़े होने लगे तब, पहुँच गए ससुराल॥ पहुँच गए ससुराल, बीस दिन करो चराई। पाँच कि
गुड़ और चीनी
काका हाथरसी
चीनी हमले से हुई, मिस ‘चीनी’ बदनाम। गुड़ की इज़्ज़त बढ़ गई और बढ़ गए दाम॥ और बढ़ गए दाम, ‘गुलगुले’ तब बन पाए। सवा रु
तथाकथित पत्रकार
काका हाथरसी
पत्रकार दादा बने, देखो उनके ठाठ। काग़ज़ का कोटा झपट, करें एक के आठ॥ करे एक के आठ, चल रही आपाधापी। दस हज़ार बतलाए, छप�
चोटी के कवि
काका हाथरसी
बोले माइक पकड़ कर, पापड़चंद ‘पराग’। चोटी के कवि ले रहे, सम्मेलन में भाग॥ सम्मेलन में भाग, महाकवि गामा आए। काका, चाच�
चुनाव की चोट
काका हाथरसी
हार गए वे, लग गई इलेक्शन में चोट। अपना अपना भाग्य है, वोटर का क्या खोट? वोटर का क्या खोट, ज़मानत ज़ब्त हो गई। उस दिन स
खल-वंदना
काका हाथरसी
प्रथम करूँ खल-वंदना, श्रद्धा से सिर नाय। मेरी कविता यों जमे, ज्यो कुल्फ़ी जम जाय॥ ज्यो कुल्फ़ी जम जाय, आप जब कविता न
इतना कुछ था
कुँवर नारायण
इतना कुछ था दुनिया में लड़ने-झगड़ने को पर ऐसा मन मिला कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा और जीवन बीत गया...
अबकी बार लौटा तो
कुँवर नारायण
अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूँगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछे नहीं जगह दूँगा स�
पहले भी आया हूँ
कुँवर नारायण
जैसे इन जगहों में पहले भी आया हूँ बीता हूँ। जैसे इन महलों में कोई आने को था मन अपनी मनमानी ख़ुशियाँ पाने को था। लग
तुमने देखा
कुँवर नारायण
तुमने देखा कि हँसती बहारों ने? तुमने देखा, कि लाखों सितारों ने? कि जैसे सुबह धूप का एक सुनहरा बादल छा जाए, और अना�
चक्रव्यूह
कुँवर नारायण
युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर जो हज़ारों बार दुहराई गई, रक्त की विरुदावली कुछ और रँगकर लोरियों के संग जो गाई गई— उसी
माध्यम
कुँवर नारायण
वस्तु और वस्तु के बीच भाषा है जो हमें अलग करती है, मेरे और तुम्हारे बीच एक मौन है जो किसी अखंडता में हमको मिलाता है
अपने बजाय
कुँवर नारायण
रफ़्तार से जीते दृश्यों की लीलाप्रद दूरी को लाँघते हुए : या एक ही कमरे में उड़ते-टूटते लथपथ दीवारों के बीच अपने क�
संभावनाएँ
कुँवर नारायण
लगभग मान ही चुका था मैं मृत्यु के अंतिम तर्क को कि तुम आए और कुछ इस तरह रखा फैलाकर जीवन के जादू का भोला-सा इंद्रज�
सीढ़ियाँ
जयप्रकाश मानस
सीढ़ियाँ हैं किताबें छत की ओर जाती हुईं ग़ायब हो जाती हैं छत पहुँचने से ठीक पहले जैसे कहती हों सीढ़ियाँ— कोई का�
पाठ
जयप्रकाश मानस
जूतों के नीचे भी आ सकती है दुर्लंघ्य पर्वत की मदांध चोटी परंतु इसके लिए ज़रूरी है- पहाड़ों के भूगोल से कहीं ज़्याद�
उल्टे सीधे गिरे पड़े हैं पेड़
सूर्यभानु गुप्त
उल्टे सीधे गिरे पड़े हैं पेड़, रात तूफ़ान से लड़े हैं पेड़। कौन आया था किस से बात हुई, आँसुओं की तरह झड़े हैं पेड़�
दिल लगाने की भूल थे पहले
सूर्यभानु गुप्त
दिल लगाने की भूल थे पहले, अब जो पत्थर हैं फूल थे पहले। मुद्दतों ब'अद वो हुआ क़ाएल, हम उसे कब क़ुबूल थे पहले। उस से �
अपने घर में ही अजनबी की तरह
सूर्यभानु गुप्त
अपने घर में ही अजनबी की तरह, मैं सुराही में इक नदी की तरह। किस से हारा मैं ये मिरे अंदर, कौन रहता है ब्रूसली की तरह।
जिन के अंदर चराग़ जलते हैं
सूर्यभानु गुप्त
जिन के अंदर चराग़ जलते हैं, घर से बाहर वही निकलते हैं। बर्फ़ गिरती है जिन इलाक़ों में, धूप के कारोबार चलते हैं। �
रंज इस का नहीं कि हम टूटे
सूर्यभानु गुप्त
रंज इस का नहीं कि हम टूटे, ये तो अच्छा हुआ भरम टूटे। एक हल्की सी ठेस लगते ही, जैसे कोई गिलास हम टूटे। आई थी जिस हिस�
हो कर बूँद
हेमन्त कुमार शर्मा
हो कर बूँद, प्यास धरा की जान सका। क्यों कोयल गाती फिरती है, क्यों रंग उसका काला है। पिय की पुकार रहे सदा, रंग विरह क�
बरसे बादल
हेमन्त कुमार शर्मा
बरसे बादल क्रोध भरे, नश्वरता का बोध भरे। इतना पानी आँखों में, जाने कैसे रोध करे। कुछ तो सावन का असर, उस पे नयन मो�
यह जो स्वतंत्रता दिवस है
हेमन्त कुमार शर्मा
यह जो स्वतंत्रता दिवस है। कितने जीवन भूनने पर, और कितने घर फूँकने पर, दृशित यह वरदान हुआ। सुभाष की आशा का, बिस्मिल �
एक सपना था
हेमन्त कुमार शर्मा
एक सपना था, जो जाग रहा। दूब पे बिखरी ओस का, स्पर्श जो था पाँओं को। विपन्नता से जीवनयापन का, कुल ज्ञान था गाँवों को।
एक फ़ितरत सी हो गई है
हेमन्त कुमार शर्मा
एक फ़ितरत सी हो गई है, चुप्प रहना। कितने मकानों की कथा, चिल्लाती ऑंखों की व्यथा। बस फँस गई है, भूल गया कहना। खारी ब�
कृष्णमय जीवन
हेमन्त कुमार शर्मा
कृष्णमय जीवन की बोली, कूक रही कलाई की मोली। मीरा का प्याला, विरह की हाला। राधा की प्रतीक्षा, उद्धो की शिक्षा, गो
हिन्दी
हेमन्त कुमार शर्मा
कभी छाया में कभी प्रयोग की धूप में बैठ गई। रीति के कोमल भावों से, बिहारी की गहराई में, घनानंद की भावुकता का, कम्बल �
दीनदयाल दया करिए
प्रतापनारायण मिश्र
निज हाथन सर्वसु खोय चुके कहँ लौ दुख पै दुख ही भरिए। हम आरत भारतवासिन पै अब दीनदयाल दया करिए॥ लरि भाइन-भाइन आपस में �
फाग
प्रतापनारायण मिश्र
अब तो चेत करो रे भाई। जब सर्बसु कढ़ि गयो हाथ ते तब न उचित हुरिहाई॥ उपज घटे धरती को दिन दिन नाज नितहि महँगाई। कहा ख�
होलिकापंचक
प्रतापनारायण मिश्र
भारत सुत खेलत होरी॥ प्रथम अविद्या अगिनि बारिकै, सर्वसु फूँकि दियो री। आलस बस पुरिखन के जस की, चूरि उड़ाइ बहोरी। र�
एक
प्रतापनारायण मिश्र
इस अनेकवस्‍त्‍वात्‍मक विश्‍व का कर्ता, धरता, भर्ता, हर्ता परमेश्‍वर एक है। उसके मिलने का मार्ग प्रेम ही केवल एक है�
धोखा
प्रतापनारायण मिश्र
इन दो अक्षरों में भी न जाने कितनी शक्ति है कि इनकी लपेट से बचना यदि निरा असंभव न हो तो भी महाकठिन तो अवश्य है। जब कि भ�
दीवार पर धूप
तरुण भटनागर
दीवार पर धूप शाम तक, मेरे कमरे की दीवार पर, टिकी रहती हे, रोज़ की, एक सी धूप। न दीवार को भेदती, न दीवार में समाती, �
शिखरों पर
तरुण भटनागर
पुकार थी, सो चुना शिखर। पता चला— राख पुकार, बढ़े क़दम थे-झूठ। पर शिखर, सबसे करता न्याय, न्याय— लोगों का उचित। ल�
उस शाम
तरुण भटनागर
पहाड़ों का सलेटी धुँआ, उतरा भीतर, घुला, ऑफ़िस की चीकट थकान में। उस शाम— सुस्त मैं, कॉफ़ी सुड़कता, ठूँसता रहा, खोल
उसका समय
तरुण भटनागर
कितना स्पष्ट कहा था, उसने— कि, तुम मेरे, मेरा सब कुछ तुम्हारा। सिवाय— घड़ी के साथ वाली मेरी धड़कन, नाख़ूनों में म�
सीखो
गणेश भारद्वाज
हालात बदलते रहते हैं, हिम्मत करके लड़ना सीखो। समय बड़ा बलवान रहा है, साथ समय के चलना सीखो। झूठ कभी दौड़ नहीं सकता,
मैं बोझ नहीं हूँ
गणेश भारद्वाज
मैं बोझ नहीं हूँ भाग्य लेकर आई हूँ, ममता की मूर्त मैं कुदरत की जाई हूँ। मेरे आने से आँगन तेरा महकेगा, मन उपवन का हर ए�
नशे की मार
उमेश यादव
समाज रो रहा है, परिवार रो रहा है। नशे के भार को ये, संसार ढो रहा है॥ ये क्या हो रहा है देखो, क्या हो रहा है। नशे की मार
अपना सुधार सर्वोत्तम सेवा
उमेश यादव
अपना सुधार सर्वोत्तम सेवा, सुखमय घर संसार है। स्वयं बदलना मानवता पर, बहुत बड़ा उपकार है॥ समझें मन के भावों को हम, स�
मेरा कवि
अनिल कुमार सिंह
धूप, हवा और पानी से दूर खिड़कीविहीन दफ़्न हूँ मैं अपनी इस कोठरी में मकड़ियों ने जाले बुन दिए हैं मेरी पलकों पर स
अकेलापन
अनिल कुमार सिंह
अकेलापन एक खाई है खुदी हुई मेरे घर के चारों ओर जिसे बनाया है मेरे दोस्तों ने मेरी इच्छा से पहले उस पर एक पुल था ज�
सन्नाटा
अनिल कुमार सिंह
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अंत में कहीं ख़त्म होगा यह खेल तब आएगा सन्नाटा राख की तरह ढाँपता हमारी आत्मा और शर�
पहाड़ पर जाना
अनिल कुमार सिंह
अपनी बस्ती से गुज़रते हुए मुझे याद आया कि पहले मैं पहाड़ों पर जाना चाहता था ‘पहाड़ पर जाना' महज़ एक वाक्य नहीं ए�
नफ़रत
अनिल कुमार सिंह
नफ़रत को पहचानना आसान है क्योंकि वह अब एक प्रवृत्ति है अक्सर हमारे सबसे आत्मीय क्षणों में भी वह विद्यमान होती ह�
इंतज़ार
अनिल कुमार सिंह
इंतज़ार कोई मामूली क्रिया नहीं है हम अक्सर किसी न किसी चीज़ का इंतज़ार करते ही रहते हैं बहुत बार तो वह दुःस्वप्�
पुरानी शर्म
अनिल कुमार सिंह
मैं चाहता हूँ कि भूल जाएँ लोग मुझे सुखद आकांक्षा की तरह नहीं आऊँ उनकी स्मृति में और मिटा डालें वे अपनी चेतना की �
आदमी क्या चाहता है
अनिल कुमार सिंह
एक आदमी क्या चाहता है सिवाय इसके कि उसे भी प्यार किया जाए उसे प्यार किया जाए इस आशा से वह देखता है इस आदमज़ाद को
हिक़ारत भरा समय
अनिल कुमार सिंह
हिक़ारत भरा समय है यह स्थितियाँ चूँकि गड्डमड्ड हैं इसलिए निरीहता कब हथियार बन जाएगी ठीक-ठीक समझा नहीं जा सकता �
हम कुछ ज़्यादा नहीं चाहते
अनिल कुमार सिंह
हम कुछ ज़्यादा नहीं चाहते सिवा इसके कि हमें भी मनुष्य समझें आप सड़ी हुई लाशों पर जश्न कुत्ते और गिद्ध मनाते हैं
जनादेश
संजय चतुर्वेदी
चालीस प्रतिशत लोगों ने वोट नहीं डाला इनमें अधिकांश चाहते तो वोट डालते उन्हें लगा इससे क्या होगा या उन्होंने इसक�
हम क़बीलों से निकल के बेहया होते गए
संजय चतुर्वेदी
हम क़बीलों से निकल के बेहया होते गए, क़ातिलों के हाथ दस्त-ए-मोजज़ा होते गए। इंक़लाब आया जहाँ आया वहीं चौपट हुआ, लोग झ�
एक कोई काम अच्छे से नहीं होता गुरू
संजय चतुर्वेदी
एक कोई काम अच्छे से नहीं होता गुरू, ढेर भर बड़का गुरू मँझला गुरू छोटा गुरू। हर किसू का पार्लर लेकिन हुसुन हईयै नहीं
काए मारे है फिर जफ़ा करके
संजय चतुर्वेदी
काए मारे है फिर जफ़ा करके, हम मरे थे ख़ुदा ख़ुदा करके। दिल ने हर चीज़ मुफ़्त में चाही, हक़ हुआ है तो हक़ अदा करके। जो मिला
पुस्तक मेले
संजय चतुर्वेदी
हुईं ज्ञान से बड़ी किताबें अर्थतंत्र के पुल के नीचे रखवाली में खड़ी किताबें जंगल कटे किताब बनाई लेकिन चाल ख़राब बन�
अगली भाषाओं की तलाश में
संजय चतुर्वेदी
क्या पता लोहे में जीवन हो पत्थर हों वनस्पति क्या पता कल हम समझ सकें जल और वायु का व्यवहार निश्चय और निष्कर्ष के बी
पानी में नबूवत
संजय चतुर्वेदी
सावन झरता है जैसे पेड़ों पर उतरती हो रहमत मीलों तक फैली है जलवायु सृष्टिकर्ता का दूरदर्शन बूँदों में उतरता है घास
बदली नहीं उदासी
संजय चतुर्वेदी
कविता कहाँ दशक की दासी, अस्सी-नब्बे क्या देखै जनगण की देख उदासी वोट हमारा राज किसी का ठगे देश के वासी परिवारों के �
जनगणित
संजय चतुर्वेदी
ईसाईयत और रोम के बीच क्या संबंध है यह पता लगाने में मेरे तीन घंटे बरबाद हो गए लेकिन इस बात पर आप हँसते हुए न जाएँ क्
प्रतिनिधि स्वर
संजय चतुर्वेदी
जैसे समय में एक स्यूडो समय बनाया जाता है जनता में एक स्यूडो जनता बनाई जाती है और इसी अर्हता के दम पर मै अपने समय का
साहित्य में
संजय चतुर्वेदी
साहित्य में होता है साबुन का पानी साहित्य में होते हैं बुलबुले साहित्य में होती हैं बहुत-सी सहेलियाँ साहित्य मे�
रोए क़ाबिल हाथ
संजय चतुर्वेदी
साधो न्याय जबर का खेल सभी सफल हैं सभी विजेता बाक़ी सारे फ़ेल उसने उनको फ़ोन कर दिया उसने उनको चिट्ठी लिख दी भैया बंद
ख़ुशी सिर्फ़ उनको मिले
संजय चतुर्वेदी
प्रकृति तेरे गर्भ में हिरण्य है तेरे पास सभी के लिए है सभी कुछ सभापतियों को सभापतित्व दे वक्ताओं को वाणी आलोचको�
ध्वज हर घर में फहराता है
उमेश यादव
तीन रंग में रंगा तिरंगा, ध्वज हर घर फहराता है। शौर्य शांति और प्रगति से, सबका मान बढ़ाता है॥ हरा स्वेत केसरिया रंग �
गणपति मंगलकारी
उमेश यादव
प्रथम पूज्य गणनायक देवा,विघ्नेश्वर हितकारी। शंकरसुवन पार्वतीनंदन, गणपति मंगलकारी॥ हे शिवनंदन, प्रातःवंदन, रि�
शिव स्वरूप श्री नीलकंठ
उमेश यादव
दिव्य मनोहर सुन्दर नभचर, शिव दर्शन मनभावन है। शिवस्वरुप श्री नीलकंठ का, शुभदर्शन अति पावन है॥ रावण वध से पूर्व र�
पुष्टिकारक बाजरा
उमेश यादव
सर्वश्रेष्ठ पोषक शरीर का, नियमित इसको खाएँ। पुष्टिकारक बाजरे को हम, भोजन में अपनाएँ॥ सर्वगुण संपन्न अन्न यह, बल �
स्नेह प्यार का बंधन राखी
उमेश यादव
भाई बहन का पर्व मनोहर, भैया मान बढ़ाना। स्नेह प्यार का बंधन राखी, बहना से बंधवाना॥ ये रक्षाबंधन, विमल प्रेम का बंधन�
कृष्ण
उमेश यादव
प्रेम मगन मनमोहना, छवि प्रभु की प्यारी। दूर करो कष्ट सोहना, केशव गिरधारी॥ पग ठुमक ठुमक प्रभु चलिहें। पद नूपुर छू
सृजन देवता श्री विश्वकर्मा
उमेश यादव
शिल्प के ज्ञाता, विश्व निर्माता, रूपकर्ता महान हैं। सृजन देवता श्री विश्वकर्मा, साक्षात भगवान हैं॥ ब्रह्मापुत्
मैं नारी हूँ
उमेश यादव
मैं नारी हूँ, मैं शक्ति हूँ , मैं देवी हूँ, अवतारी हूँ। अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ, चिंगारी हूँ॥ कल्याणी, भवान�
खोटा कवि हूँ मैं
गणेश भारद्वाज
मैं कोई फ़नकार नहीं हूँ, औरों की सरकार नहीं हूँ। लिख देता हूँ मन की पीड़ा, बेदर्द कलमकार नहीं हूँ। पन्ने और सजात�
शव जीवित हैं
गणेश भारद्वाज
दाएँ-बाएँ, पीछे-आगे, स्वार्थ हित सब भागे-भागे। इस दुनियाँ में चलते-फिरते, आते-जाते हमसे मिलते। अपने हित में पाले �
सफ़ेद हाथी
मलखान सिंह
गाँव के दक्खिन में पोखर की पार से सटा यह डोम पाड़ा है— जो दूर से देखने में ठेठ मेंढ़क लगता है और अंदर घुसते ही सू�
मुझे ग़ुस्सा आता है
मलखान सिंह
मेरा माँ मैला कमाती थी बाप बेगार करता था और मैं मेहनताने में मिली जूठन को इकट्ठा करता था, खाता था। आज बदलाव इतना �
छत की तलाश
मलखान सिंह
इस अपरिचित बस्ती में घूमते हुए मेरे पाँव थक गए हैं अफ़सोस! एक भी छत सर ढँकने को तैयार नहीं। हिंदू दरवाज़ा खुलते �
एक पूरी उम्र
मलखान सिंह
यक़ीन मानिए इस आदमख़ोर गाँव में मुझे डर लगता है बहुत डर लगता है लगता है कि अभी बस अभी ठकुराइसी मेड़ चीख़ेगी मैं
आख़िरी जंग
मलखान सिंह
ओ परमेश्वर! कितनी पशुता से रौंदा है हमें तेरे इतिहास ने। देख, हमारे चेहरों को देख भूख की मार के निशान साफ़ दिखाई �
आशा और उद्योग
रामचंद्र शुक्ल
(1) हा! हा! मुझसे कहो न क्यों तुम, आशा कभी न होगी पूर्ण प्रतिफल इसकी नहीं मिलेगा, बैरी मान न होगा चूर्ण॥ (2) वृथा मुझे भ�
हमारी हिंदी
रामचंद्र शुक्ल
(1) मन के धन वे भाव हमारे हैं खरे। जोड़ जोड़ कर जिन्हें पूर्वजों ने भरे॥ उस भाषा में जो है इस स्थान की। उस हिंदी में �
बसंत
रामचंद्र शुक्ल
(1) कुसुमित लतिका ललित तरुन बसि क्यों छबि छावत? हे रसालग्न! बैरि व्यर्थ क्यों सोग बढ़ावत? हे कोकिल! तजि भूमि नाहिं क्
वंदना
रामचंद्र शुक्ल
(1) प्रथम कारण जो सब कार्य का, विपूल विश्व विधायक भाव जो। सतत देख रहे जिसकी छटा, मनुज कल्पित कर्मकलाप में॥ (2) हम उस�
उठाए जा उन के सितम और जिए जा
मजरूह सुल्तानपुरी
उठाए जा उन के सितम और जिए जा, यूँ ही मुस्कुराए जा आँसू पिए जा। यही है मोहब्बत का दस्तूर ऐ दिल, वो ग़म दे तुझे तू दुआ�
निगाह-ए-साक़ी-ए-ना-मेहरबाँ ये क्या जाने
मजरूह सुल्तानपुरी
निगाह-ए-साक़ी-ए-ना-मेहरबाँ ये क्या जाने, कि टूट जाते हैं ख़ुद दिल के साथ पैमाने। मिली जब उन से नज़र बस रहा था एक जहा�
यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं
मजरूह सुल्तानपुरी
यूँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं, मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं। हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब�
ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें
मजरूह सुल्तानपुरी
ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें, यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें। कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है �
वो तो गया ये दीदा-ए-ख़ूँ-बार देखिए
मजरूह सुल्तानपुरी
वो तो गया ये दीदा-ए-ख़ूँ-बार देखिए, दामन पे रंग-ए-पैरहन-ए-यार देखिए। दिखला के वो तो ले भी गया शोख़ी-ए-ख़िराम, अब तक है
किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे
मजरूह सुल्तानपुरी
किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे, गया फिर आज का दिन भी उदास कर के मुझे। सबा भी लाई न कोई पयाम अपनों का, सुना रही �
नकारने की भाषा
ज्योति चावला
उसने धीरे से मेरे कान में कहा चलो मेरे संग तुम्हें चाँद की सैर करवाता हूँ मैं बिना कुछ सोचे उछल कर उसकी साइकिल के
माँ का जवान चेहरा
ज्योति चावला
मेरे बचपन की ढेरों स्मृतियों में हैं ढेर सारी बातें, पुराने दोस्त नन्ही शैतानियाँ, टीचर की डाँट और न जाने क्या-क्�
अठारह दिन
बद्री नारायण
न अक्षौहिणी सेनाएँ न सहस्र कोटि हाथी मुझे लड़नी पड़ती है अपने से ही लड़ाई। कभी भी कभी तक कोई समय निश्चित नहीं
घर
बद्री नारायण
जहाँ बिल्ली को खदेड़ता दिख जाएगा ख़रगोश वहीं अपना घर बनाऊँगा वहीं शीत वसंत लाऊँगा वहीं लगाऊँगा सेब, नारंगी, संतर
शब्दपदीयम्
बद्री नारायण
मैं शब्द हूँ शंकर के डमरू से निकला और इधर-उधर बिखरा न जाने कब कोई इंद्र आए और रात के तीसरे पहर मुझी से अहिल्या का
माँ का गीत
बद्री नारायण
अगर तू सूर्य होता तो दिन भर आसमान में जलता रहता अगर तू चाँद होता तो पूर्णिमा से एकम तक तुझे रोज़-रोज़ क़साई के कत्त
छोटी-छोटी इच्छाएँ
बद्री नारायण
मैं रात-दिन स्मरण करता हूँ अपनी उन छोटी इच्छाओं का जो पूरी हो गईं धीरे-धीरे जिन छोटी-छोटी इच्छाओं के चक्कर में �
प्रेमपत्र
बद्री नारायण
प्रेत आएगा किताब से निकाल ले जाएगा प्रेमपत्र गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खाएगा चोर आएगा तो प्रेमपत्र चुराएगा जु
दुख-पुराण
बद्री नारायण
नीले आकाश में उड़ती चिड़ियों के हार से जो चिड़ियाँ पीछे छूट जाती हैं चरते हुई गायों के झुंड से कोई बछड़ा पीछे रह
समकालीन
बद्री नारायण
समकालीन हूँ मैं आपका अगर मैं गोष्ठी में बुलाऊँ तो कभी आइएगा कभी मत आइएगा आ-आके आने से रह जाइएगा कभी आते-आते रह जा�
माँ
बद्री नारायण
थकी-हरी माँ माँ, तुम्हारी हँसुली जिसे रख आए थे पिता बनिए की दुकान उग रही है दूर आसमान पर इंद्रधनुष की तरह! माँ, �
मेरा डर
बद्री नारायण
पहाड़ों के पीछे से आई बाघ की हुंकारऽऽऽ मैं काँप गया डर मत कहा रामदाना बेचने वाले बूढ़े ने पहाड़ी के पीछे बाघ-बाघ
कविता का छंद
बद्री नारायण
हालाँकि यहाँ के नागरिक तो सभ्य थे चौक पर टँगी दीवाल घड़ी भी सभ्य ढंग से चल रही थी समय से दफ़्तर खुलते थे और बंद होते
समर्पण
बद्री नारायण
मैं जानता हूँ कि कलापक्ष पर बात करना परम धर्म है साहित्य का पर मैं भूख के कलापक्ष से अभिभूत होने से बचते हुए उसके र�
विश्वास
बद्री नारायण
मैं नश्वर हूँ पर मुझसे भी नश्वर है मेरी किताब जिसे मैं इतनी लगन से लिखता हूँ मैं नश्वर हूँ पर मुझसे कम नश्वर नही�
उन जगहों की याद
स्वप्निल श्रीवास्तव
हमें उन जगहों की याद आती है जहाँ से होकर हम यहाँ तक पहुँचे उन लोगों से मिलने की इच्छा उमगती है जिन्होंने हमारे जीव
बहरूपिया आ रहा है
ज्योति चावला
इन दिनों घूम रहा है बहरूपिया अलग-अलग रंगों में उसके झोले में हैं न जाने कितने भेस न जाने कितने चेहरे, न जाने कितने र
बड़ी हो रही बेटी के लिए
ज्योति चावला
ज्यों-ज्यों बड़ी हो रही है मेरी बेटी माँ मुझे और अधिक समझ में आने लगी हे कि क्यों अक्सर वह मुझे लगा देती थी माथे पर क�
दुविधा
ज्योति चावला
सुनो, मैं एक दुविधा में हूँ तुम ही बताओ कि जब मेरे हृदय में उमड़ रहा हो प्रेम मेरी बेटी के लिए, तब मैं उसके लिए कौन-सी
झूठ बोलती लड़कियाँ
ज्योति चावला
न जाने क्यों झूठ बोलती लड़कियाँ मुझे अच्छी लगती हैं झूठ बोलती लड़कियों का झूठ बोलना न जाने क्यों मुझे अच्छा लगता ह�
उदासी
ज्योति चावला
अठमाहे गर्भ को अपनी देह में छिपाए वह लेटी है आँखें मूँद कर ऐसे जैसे सो रही हो गहरी नींद और सो रहा हो उसके पेट में उस
बेटी की गुल्लक
ज्योति चावला
मेरी बेटी रोज़ सुबह उठती है और नियम से अपनी गुल्लक में डालती है सिक्के इन सिक्कों की खनक से खिल जाती है उसके चेहरे प�
क्यों नहीं कान्हा हमारे पास आते हो
सुशील कुमार
क्यों नहीं कान्हा हमारे पास आते हो। प्रेम की वंशी अधर से ना बजाते हो॥ राह मे जो तुम कभी माखन चुराते थे, साँझ के ढल�
गजानन! तुम्हारी गूँजे जै-जैकार
सुशील कुमार
जय शिव नंदन, कृपा निकंदन, गौरी सुत सरकार तुम्हारी गूँजे जै-जैकार। वाहन तेरा मूसक राजे, मातु पिता के चरण विराजे अन�
जो न समझते पाक मुहब्बत
ममता शर्मा 'अंचल'
जो न समझते पाक मुहब्बत, उन ख़ातिर है ख़ाक मुहब्बत। जिन्हे तजुर्बा नहीं इश्क़ का, उनको रहती ताक मुहब्बत। नफ़ा खोजते �
हर सृजन कल्पना बन पलता
राघवेंद्र सिंह
निरवधि, उद्भवन धरातल पर, हर सृजन कल्पना बन पलता। हर काव्य स्वयं शृंगारित हो, हृदयारित-पथ पर है चलता। सिंचित हो क�
छाया त्रासन है
अविनाश ब्यौहार
नहीं फटकता अँधकार पहरुए हैं उजाले के। अँधकार का नाश करेंगे दिए दिवाली के। हथकड़ियाँ हाँथों में होंगी किसी मवाल�
गाँव का दर्द
संजय राजभर 'समित'
बचपन गाँव में जवानी शहर में एक बैल की तरह फिर बुढ़ापे ने कहा चल गाँव में, गाँव से पूछा– "तू पहले ही जैसा है कुछ भी न�
इसी तरह उम्र भर
विजयदेव नारायण साही
पृष्ठभूमि के नाम पर यों समझिए कि बाक़ी दुनिया अँधेरे में है बीच में एक मेज़ है जिसके गिर्द लोग बैठे हैं कुछ खड़े �
बीच का बसंत
विजयदेव नारायण साही
बीते हुए कुंचित कुतूहल औ’ आने वाले तप्त आलिंगन के बीच हम तुम जैसे प्यास सहलाती मीठी ममता में बहते हैं वैसे ही कु
मुझे याद है
विजयदेव नारायण साही
और वहाँ मैं खड़ा था तुम्हारे खिलखिलाकर आने के समय मैंने पेड़ से एक बचा आम तोड़ा और तुम्हें दे दिया पीछे फेंकी हु�
अकेले पेड़ों का तूफ़ान
विजयदेव नारायण साही
फिर तेज़ी से तूफ़ान का झोंका आया और सड़क के किनारे खड़े सिर्फ़ एक पेड़ को हिला गया शेष पेड़ गुमसुम देखते रहे उनम�
प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए
विजयदेव नारायण साही
परम गुरु दो तो ऐसी विनम्रता दो कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ और यह अंतहीन सहानुभूति पाखंड न लगे। दो तो ऐ�
साक्षात्कार
विजयदेव नारायण साही
उसने दोनों हाथों से मेरे कंधे पकड़ लिए और मुझे पेड़ की डाल की तरह हिलाया मुझे याद है मैं बेहोश नहीं था, मैंने कोई �
कहाँ तक जाओगे?
विजयदेव नारायण साही
कहाँ तक जाओगे? जाने को क्या है, आगे जो पहाड़ देखते हो वहाँ तक भी जा सकते हो फिर उसके आगे भी पहाड़ लगता है चाहो तो वह�
एक और बसंत
विजयदेव नारायण साही
बंधु, तुम आ गए? सद्यस्नात, रंगारंग, खिले हुए सब कुछ समझती हुई आँखों में वही प्रश्न! ओ परिचित क्या कहूँ? मैंने यदि त�
अँधेरे मुसाफ़िरख़ाने में
विजयदेव नारायण साही
मैं नहीं जानता था कि अँधेरे मुसाफ़िरख़ाने में जहाँ टार्च की रोशनी में सिर्फ़ एक तमतमाया हुआ चेहरा दिखता है इतन�
इस नगरी में रात हुई
विजयदेव नारायण साही
मन में पैठा चोर अँधेरी तारों की बारात हुई बिना घुटन के बोल न निकले यह भी कोई बात हुई धीरे-धीरे तल्ख़ अँधेरा फैल गया,
पराजित मन
शंकरानंद
वसंत के बाद तो पेड़ हरे रहते हैं उसकी छाया में मन नए पत्तों से भर जाता है हर साल यह कौन-सा वसंत है आया जिसका कोई असर
भरोसा
शंकरानंद
कोई अगर आँख बंद किए चल रहा है हाथ पकड़ कर तो उसके रास्ते के पत्थर देखना सँभालना गिरने से पहले जब भी वह कुछ कहे तो �
विरोध
शंकरानंद
चुप रहने पर आवाज़ चुप हो जाती है एक दिन भाषा चुप हो जाती है व्याकरण बिगड़ जाता है चुप रहने से चुप रहने से स्मृति क�
पुश्तैनी घर
शंकरानंद
काग़ज़ पर जिस घर की चर्चा है वह बहुत पुराना है मैं जिस घर में रहता हूँ वह बहुत नया है नए और पुराने के बीच कोई सीढ़ी �
स्वाद की तलाश
शंकरानंद
जिसके जीवन में सबसे ज़्यादा उदासी है वह रोज़ सींचती है फूल के गाछ सुबह जगती है फूल की आशा लिए कोई तो खिला होगा टह�
जगह की कमी
शंकरानंद
इतनी बड़ी पृथ्वी पर मुश्किल है एक बच्चे का आज़ादी से खेलना इतनी पाबंदियाँ हैं कि लोग हौसला नहीं हिदायतें दिया कर�
पता पूछना
शंकरानंद
जब भी मैं जाता हूँ अनजान जगहों पर भूल जाना चाहता हूँ वे तमाम कहानियाँ जो भय पैदा करती हैं वे कहानियाँ जो पता नहीं
नींद का हासिल
शंकरानंद
यह एक बेचैन करने वाली रात है जब तारे अबरख की तरह चमक रहे हैं जब फड़फड़ाते हैं पक्षी सारी-सारी रात इस टहनी से उस पे�
परिणति
रामविलास शर्मा
दु:ख की प्रत्येक अनुभूति में, बोध करता हूँ कहीं आत्मा है मूल से सिहरती प्रगाढ़ अनुभूति में। आत्मा की ज्योति में, �
प्रत्यूष के पूर्व
रामविलास शर्मा
दूर छिपा है भोर अभी आकाश में, पश्चिम में धीरे-धीरे पर डूबता ठिठुरन से छोटा हो पीला चंद्रमा, धुँधली है तुषार से भीग�
समुद्र के किनारे
रामविलास शर्मा
सागर लंबी साँसें भरता है, सिर धुनती है लहर-लहर; बूँदी-बादर में एक वही स्वर गूँज रहा है हहर-हहर। सागर की छाती से उठ क
कवि
रामविलास शर्मा
1 वह सहज विलंबित मंथर गति जिसको निहार गजराज लाज से राह छोड़ दे एक बार; काले लहराते बाल देव-सा तन विशाल, आर्यों का ग�
दिवा-स्वप्न
रामविलास शर्मा
वर्षा से धुल कर निखर उठा नीला-नीला फिर हरे-हरे खेतों पर छाया आसमान, उजली कुँआर की धूप अकेली पड़ी हार में, लौटे इस बे
चाँदनी
रामविलास शर्मा
चाँदी की झीनी चादर-सी फैली है वन पर चाँदनी। चाँदी का झूठा पानी है यह माह-पूस की चाँदनी। खेतों पर ओस-भरा कुहरा, कुह
किसान कवि और उसका पुत्र
रामविलास शर्मा
नीले रँग में डूब गया सारा नभ-मंडल, पूर्व दिशा में उठे घने दल के दल बादल लहराती पुरवाई के झोंकों पर आए, धूल-भरे लू से �
सामना
विनोद दास
हवा ख़िलाफ़ थी और मैं जा रहा था एक चौराहा ही गुज़रा था मुझे लगा साइकिल में कम हो रही है हवा दूसरे चौराहे तक पहुँ
सुबह
विनोद दास
यह एक सुबह है दूसरी सुबहों की तरह आँख खुलती है नज़र आती हैं कूड़े पर भिनभिनाती मक्खियाँ रसोई में बिखरे झूठे बरत�
घर
विनोद दास
मेरे पास किराए का एक कमरा है या एक घर है इन दोनों में कोई फ़र्क़ नहीं है हर रात इस एक कमरे वाले घर में जब मेरे दोन�
दोपहर
विनोद दास
जून की दोपहर बैलगाड़ी पर चढ़कर आ रही है चीज़ों को तपाती हुई ख़ून को ललकारती हई एक औरत उठती है और गेहूँ के स्वच्छ
सहपाठी
विनोद दास
वह मेरे साथ पढ़ता था खाने की छुट्टी में अपने डब्बे खोलकर टूट पड़ते थे जब भूखे पशु की तरह हम सब खाने पर हमारी आँख�
नए अन्न की आहट
विनोद दास
वे खड़े हैं जो जानते हैं पौधों की प्यास नींद और जड़ों की बेचैनी ज़मीन के भीतर का जो अँधेरा जानते हैं वे खड़े ह�
बावजूद
विनोद दास
मैं अकेला बर्फ़ तोड़ता रहा ठोस ठंडी और सफ़ेद बर्फ़ बर्फ़ के भीतर हैं अनंत दुख भरे वृत्तांत तापमान के ख़ौफ़ से �
तवा
विनोद दास
वह लौटने का वक़्त है एक औरत इंतज़ार करती है चूल्हे के पास रखे तवे के साथ तवा ठंडा है मैं जब कोई ठंडा तवा देखता ह�
जलते हुए घर से
अष्टभुजा शुक्‍ल
चारो कोनों में आग लगी है भहर-भहर जल रहा है घर जलते हुए घर से चमड़े की चिहिन आ रही है साइकिल के टायर जलने की भभक जल
आज की रात
अष्टभुजा शुक्‍ल
कल जो जो कहोगे वो वो खाना बना दूँगी प्याज, लहसुन, नमक और मिर्चा मिलाकर वो मोटी रोटी सेंक दूँगी खरी खरी उस दिन मजूर�
कोई नदी है यह
अष्टभुजा शुक्‍ल
कोई नदी है यह जिसका नाम मैं नहीं जानता जेठ में आधी सूखी और आधी बह रही है नदी नदी ने अपने आँचल को दो भागों में �
जीवन-वृत्तांत
अष्टभुजा शुक्‍ल
उठाया ही था पहला कौर कि पगहा तुड़ा कर भैंस भागी कहीं और पहुँचा ही था खेत में पानी कि छप्पर में आग लगी बिटिया चिल्ल
ज़ख़्मों के नए फूल खिलाने के लिए आ
कलीम आजिज़
ज़ख़्मों के नए फूल खिलाने के लिए आ, फिर मौसम-ए-गुल याद दिलाने के लिए आ। मस्ती लिए आँखों में बिखेरे हुए ज़ुल्फ़ें, �
ये आँसू बे-सबब जारी नहीं है
कलीम आजिज़
ये आँसू बे-सबब जारी नहीं है, मुझे रोने की बीमारी नहीं है। न पूछो ज़ख़्म-हा-ए-दिल का आलम, चमन में ऐसी गुल-कारी नहीं ह�
बस
कलीम आजिज़
गए लेटने रात ढलते हुए, उठे सुब्ह को आँख मलते हुए। नहा धो के कपड़े बदलते हुए, उठाई किताब और चलते हुए। सवेरे का जब तक
इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो
कलीम आजिज़
इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो, रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो। रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव, चलन
ये दीवाने कभी पाबंदियों का ग़म नहीं लेंगे
कलीम आजिज़
ये दीवाने कभी पाबंदियों का ग़म नहीं लेंगे, गरेबाँ चाक जब तक कर न लेंगे दम नहीं लेंगे। लहू देंगे तो लेंगे प्यार मोत
बेकसी है और दिल नाशाद है
कलीम आजिज़
बेकसी है और दिल नाशाद है, अब इन्हीं दोनों से घर आबाद है। अब उन्हीं की फ़िक्र में सय्याद है, जिन के नग़्मों से चमन आ�
शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे
कलीम आजिज़
शाने का बहुत ख़ून-ए-जिगर जाए है प्यारे, तब ज़ुल्फ़ कहीं ता-ब-कमर जाए है प्यारे। जिस दिन कोई ग़म मुझ पे गुज़र जाए है �
मिरी मस्ती के अफ़्साने रहेंगे
कलीम आजिज़
मिरी मस्ती के अफ़्साने रहेंगे, जहाँ गर्दिश में पैमाने रहेंगे। निकाले जाएँगे अहल-ए-मोहब्बत, अब इस महफ़िल में बेग�
दर्द कब दिल में मेहरबाँ न रहा
कलीम आजिज़
दर्द कब दिल में मेहरबाँ न रहा, हाँ मगर क़ाबिल-ए-बयाँ न रहा। हम जो गुलशन में थे बहार न थी, जब बहार आई आशियाँ न रहा। ग
हर चोट पे पूछे है बता याद रहेगी
कलीम आजिज़
हर चोट पे पूछे है बता याद रहेगी, हम को ये ज़माने की अदा याद रहेगी। दिन रात के आँसू सहर ओ शाम की आहें, इस बाग़ की ये आब
बड़ी तलब थी बड़ा इंतिज़ार देखो तो
कलीम आजिज़
बड़ी तलब थी बड़ा इंतिज़ार देखो तो, बहार लाई है कैसी बहार देखो तो। ये क्या हुआ कि सलामत नहीं कोई दामन, चमन में फूल ख�
चाँद उन आँखों ने देखा और है
जयंत परमार
चाँद उन आँखों ने देखा और है, शहर-ए-दिल पे जगमगाता और है। लम्स की वो रौशनी भी बुझ गई, जिस्म के अंदर अंधेरा और है। ऐ स
उस ने मज़ाक़ समझा मिरा दिल दुखा गया
जयंत परमार
उस ने मज़ाक़ समझा मिरा दिल दुखा गया, फिर मोम-बत्तियों को हमेशा बुझा गया। निकला था ख़ुद को ढूँडने उस रेगज़ार में, म
जुगनू था तारा था क्या था
जयंत परमार
जुगनू था तारा था क्या था, दरवाज़े पर कौन खड़ा था। सदियाँ बीतीं दरवाज़े पर, काम फ़क़त तो पल भर का था। फँसी हुई थी ड
कोशिश
जयंत परमार
कई दिनों से मेरे सर में सुब्ह शाम और रात रात भर ना-उम्मीद परिंदे उड़ते रहते हैं उन्हें रोकना मुश्किल है लेकिन अप�
एक सितारा टूट गिरा था
जयंत परमार
ख़्वाबों की सरहद पे नीला नीला एक समुंदर तेरी आँखों जैसा लहरों के नेज़ों पे बहती जगमग जगमग चाँद सी रौशन अपने प्य�
घर की याद
जयंत परमार
लौट रहा था फूलों की घाटी से जब सवार था मैं जिस घोड़े पर वो लुढका मैं ने सोचा उसे भी शायद घर की याद ने घेर लिया है!
पतंग
जयंत परमार
कभी कभी मन करता है पतंग बन कर आसमान में उड़ने का घर की टूटी छत पे चढ़ कर देखता हूँ रंग-बिरंगी कई पतंगें लेकिन नीले �
ग़ालिब
जयंत परमार
जब भी तुझको पढ़ता हूँ लफ़्ज़-लफ़्ज़ से गोया आसमाँ खिला देखूँ एक-एक मिसरे में कायनात का साया फैलता हुआ देखूँ!
अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
निदा फ़ाज़ली
अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला, हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला। एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा, जिस त�
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा
निदा फ़ाज़ली
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा, मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा। किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई ब�
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
निदा फ़ाज़ली
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो, ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो। सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया नहीं देखी ज
नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर
निदा फ़ाज़ली
नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर, जो हाथ में नहीं है वो पत्थर तलाश कर। सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा, दरिय
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
निदा फ़ाज़ली
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो, सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो। किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं,
ये कैसी कश्मकश है ज़िंदगी में
निदा फ़ाज़ली
ये कैसी कश्मकश है ज़िंदगी में, किसी को ढूँडते हैं हम किसी में। जो खो जाता है मिल कर ज़िंदगी में, ग़ज़ल है नाम उस का
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
निदा फ़ाज़ली
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है, सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है। इतनी ख़ूँ-ख़ार न थीं पहले इबादत-गाहें, ये अक�
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए
निदा फ़ाज़ली
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए, घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए। जिन चराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं, उन
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
निदा फ़ाज़ली
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता। तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो, जहाँ उम�
हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी
निदा फ़ाज़ली
हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी। सुब्ह से शाम तक बोझ ढोता हुआ, अपनी ही लाश का ख़ुद मज़�
दो चार गाम राह को हमवार देखना
निदा फ़ाज़ली
दो चार गाम राह को हमवार देखना, फिर हर क़दम पे इक नई दीवार देखना। आँखों की रौशनी से है हर संग आईना, हर आइने में ख़ुद �
दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए
निदा फ़ाज़ली
दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए, जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए। यूँ तो क़दम क़दम पे है दीवार सामने, कोई न हो तो
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
निदा फ़ाज़ली
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है, इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है। उन से नज़रें क्या मिलीं र
इंतिज़ार
निदा फ़ाज़ली
मुद्दतें बीत गईं तुम नहीं आईं अब तक रोज़ सूरज के बयाबाँ में भटकती है हयात चाँद के ग़ार में थक-हार के सो जाती है रा
खेलता बच्चा
निदा फ़ाज़ली
घास पर खेलता है इक बच्चा पास माँ बैठी मुस्कुराती है मुझ को हैरत है जाने क्यूँ दुनिया काबा ओ सोमनात जाती है
एक चिड़िया
निदा फ़ाज़ली
जामुन की इक शाख़ पे बैठी इक चिड़िया हरे हरे पत्तों में छप कर गाती है नन्हे नन्हे तीर चलाए जाती है और फिर अपने आप ही
नया दिन
निदा फ़ाज़ली
सूरज! इक नट-खट बालक-सा दिन भर शोर मचाए इधर उधर चिड़ियों को बिखेरे किरनों को छितराए क़लम दरांती ब्रश हथौड़ा जगह जग
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
निदा फ़ाज़ली
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा, वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा। इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझ�
जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे
निदा फ़ाज़ली
जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे, उसे उम्र सारी हमारी लगे। उजाला सा है उस के चारों तरफ़, वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे। व�
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
निदा फ़ाज़ली
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है। अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम,
गेंदा
अर्पिता राठौर
तुमने कभी गेंदे का फूल देखा है? देखा है कि कैसे खिलता है थोड़ा-थोड़ा… एक दिन में नहीं लाकर रख देता है अपने हफ़्तों के
कविता
अर्पिता राठौर
मुझे कविता नहीं आती वह तो बस कई दफ़े रोटी सेंकते नज़र अटक जाती है दहकते तवे की ओर और हाथ छू जाता है उससे तब उफन पड़�
बेईमानी
अर्पिता राठौर
मैंने अपने जीवन के सबसे उदास क्षणों पर कविता तब लिखी जब उस उदासी को लेकर मैं सबसे ज़्यादा तटस्थ थी।
तात्कालिकता
अर्पिता राठौर
तात्कालिकता मुझे जीना सिखाती है साथ ही सिखाती है मुझे कि कालजयी होना कितना ख़तरनाक है।
ऊहापोह
अर्पिता राठौर
रेत ने सोचा, कि समय उससे पहले फिसल जाएगा। और समय था कि रेत के फिसलने का इन्तज़ार कर रहा था। और इसी ऊहापोह में   य�
पिता
अर्पिता राठौर
पिता का 49वाँ जन्मदिन उम्र के साथ उनके चेहरे पर लटकी मुस्कान को मैंने उनकी उम्र से आधी होते हुए देखा। माथे की शिकन
मुझ पे इल्ज़ाम लगाते क्यों हो
रेखा राजवंशी
मुझ पे इल्ज़ाम लगाते क्यों हो, बात पे बात बनाते क्यों हो। ज़ख़्म पिछले न भरे अब तक फिर, इक नई चोट लगाते क्यों हो।
आज मैं फिर से माहताब बनूँ
रेखा राजवंशी
आज मैं फिर से माहताब बनूँ, तू मुझे पढ़ तिरी किताब बनूँ। शबनमी रात की ख़ुमारी में, तू मुझे पी तिरी शराब बनूँ। पूछ�
अश्कों की बरसातें ले कर लोग मिले
रेखा राजवंशी
अश्कों की बरसातें ले कर लोग मिले, ग़म में भीगी रातें ले कर लोग मिले। पूरी एक कहानी कैसे बन पाती, क़तरा क़तरा बातें
रात फिर बोलती रहीं आँखें
रेखा राजवंशी
रात फिर बोलती रहीं आँखें, राज़ सब खोलती रहीं आँखें। किस तरह ए'तिबार कर पाते, हर तरफ़ डोलती रहीं आँखें। मेरे कपड़
कितने अरमाँ पिघल के आते हैं
रेखा राजवंशी
कितने अरमाँ पिघल के आते हैं, लोग चेहरे बदल के आते हैं। अब मिरे दोस्त भी रक़ीबों से, जब भी आते सँभल के आते हैं। जब �
बंद लिफ़ाफ़ों में
अमृत 'शिवोहम्'
मौत से पहले कोई ज़मीन ख़रीदेगा, आने वाली पीढ़ियों के लिए, दे जाएगा अपनी औलादों को, ख़ुद से महँगा सोना चाँदी, ज़मीन जाय�
मुस्कुराहट
अमृत 'शिवोहम्'
मंद हवा में लहराते तुम्हारे बाल जब तुम्हारे होठों पर आते हैं... और तुम्हारे दोनों डिंपल होठों से सटकर 180 डिग्री का स�
क्या नेह लगाना जीवन में
श्याम सुन्दर अग्रवाल
क्या नेह लगाना जीवन में, चौराहे पर मिले पथिक से, सबको अपनी बस्ती अपने गाँव चले जाना है। यह अभिनेताओं का गाँव, यहाँ स
हम बंजारे हैं
श्याम सुन्दर अग्रवाल
नहीं इजाज़त रुकने की, अब सफ़र करें हम बंजारे हैं, ना अपना कोई गली गाँव, ना कोई देहरी द्वारे हैं। संग साथ संगी साथी, य
हर कलम यहाँ शमशीर है
श्याम सुन्दर अग्रवाल
अपना हर आँगन नेफ़ा है, हर बगिया कश्मीर है, स्याही की हर बूँद लहू है, हर कलम यहाँ शमशीर है। हम आँगन के रखवारे हैं, औ' बग�
शब्द चरित
गणेश भारद्वाज
शब्द कलेवर बन जाते हैं, सब मुखरित होते भावों के। अंतर्मन की लहरों में फिर, बनते हैं वाहक ख़्वाबों के। मनभावन, सुख�
मान करो या अपमान करो
गणेश भारद्वाज
मैं नर की पूरक नारी हूँ, नर से मेरी होड़ नहीं है। भाव सरल सब सीधे मेरे, पथ में कोई मोड़ नहीं है। मैं मालिन बाग़ बगीच�
एक मित्र से
हरिनारायण व्यास
वस्तुतः हम मित्र हैं और कुछ होना असंभव क्योंकि हम इस सृष्टि की उद्भावना के नित अधूरे ज्वाल में लिपटे मिलन की माँ
एक भावना
हरिनारायण व्यास
इस पुरानी ज़िंदगी की जेल में जन्म लेता है या मन। मुक्त नीलाकाश की लंबी भुजाएँ। हैं समेटे कोटि युग से सूर्य, शशि, न�
शिशिरांत
हरिनारायण व्यास
हो चुका हेमंत अब शिशिरांत भी नज़दीक है। पात पीले गिर चुके तरु के तले आज ये संक्रांति के दिन भी चले। नाश का घनघोर न
उठे बादल, झुके बादल
हरिनारायण व्यास
उधर उस नीम की कलगी पकड़ने को झुके बादल। नई रंगत सुहानी चढ़ रही है सब के माथे पर। उड़े बगुले, चले सारस, हरस छाया कि�
ग्रंथि
हरिनारायण व्यास
लिख दिया तुम्हारा भाग्य समय ने उसी पुरानी क़लम पुराने शब्द-अर्थ से। उसी पुराने हास-रुदन, जीवन-बंधन में, उन्हीं पु�
वर्षा के बाद
हरिनारायण व्यास
पहली असाढ़ की संध्या में नीलांजन बादल बरस गए। फट गया गगन में नील मेघ पय की गगरी ज्यों फूट गई बौछार ज्योति की बरस ग
शरणार्थी
हरिनारायण व्यास
रात-दिन, बारिश, नमी, गर्मी सबेरा-साँझ सूरज-चाँद-तारे अजनबी-सब हम पड़े हैं आँख मूँदे, कान खोले। मृत्यु-पंखों की विक
नशीला चाँद
हरिनारायण व्यास
नशीला चाँद आता है। नयापन रूप पाता है। सवेरे को छिपाती रात अंचल में, झलकती ज्योति निशि के नैन के जल में मगर फिर भी �
नया इतिहास
शैलेश मटियानी
अभय होकर बहे गंगा, हमें विश्वास देना है हिमालय को शहादत से धुला आकाश देना है। हमारी शांतिप्रियता का नहीं है �
जैसे मैं
लीलाधर मंडलोई
क़ब्र पर जो यहाँ लिखा है उसमें दु:ख की कोई इबारत नहीं नाम, जाति, जन्मतिथि एक अनाम इतिहास है इसके बीच से उगा पौधा प
रोना नहीं रोते
लीलाधर मंडलोई
वे अपार दुखों और संकटों के बीच एक ऐसे सफ़र पर हैं जो ख़त्म नहीं होता दिल्ली में सीरिया का एक युवक मिला उसके वीरान
ये रात
लीलाधर मंडलोई
न गोलियाँ चल रही हैं न बम गिर रहे हैं इलाक़े में न तोपों की आवाज़ बुलंद है न अजनबी छायाएँ हैं आस-पास हमारा घर आज ख�
वे लौट नहीं रहे
लीलाधर मंडलोई
वे लौट नहीं रहे हाँ वे लौटते थे अपने तीज-त्यौहार पर वे कमा कर लौटते थे वे ख़ुश-ख़ुश लौटते थे उनके बच्चे के हाथों में
मैं उनमें से नहीं हूँ
लीलाधर मंडलोई
जो उनकी दलाली में देश को भूल बैठे हैं मैं उनमें से नहीं हूँ मोर्चे पर शहीद हो जाने वालों की सूची में मैं अपना नाम �
मेरा प्रेम
लीलाधर मंडलोई
मैं जो बोलता हूँ वह मेरा बोला नहीं उसमें उनकी आवाज़ शामिल है जो मेरी तरह बोलते हैं उनके बोलने में प्रेम के अलावा
उजड़े दयार में
लीलाधर मंडलोई
बचे हुओं के पास कुछ न था एक तोता रह सकता था कहीं और गाय भी जा सकती थी कहीं जंगल में बिल्ली और कुत्ता तो कम से कम रह ह�
सुनो
लीलाधर मंडलोई
जहाँ ख़त्म होता है कोई जीवन, एक नया शुरू होता है वहीं से एक बूढ़े की अंतिम साँसों को सुन रहा होता है उसका पोता या ना
अंतिम संस्कार
लीलाधर मंडलोई
तितली के पंखों पर, फूलों पर, पत्तियों पर, बारूद के धब्बे हैं बम गिराए गए थे कल रात ही यहाँ जंगल की तरफ़ भागते लोगों
सपने से बाहर
लीलाधर मंडलोई
गा रहा है उनका रुधिर घृणा के गीत अपनी भुजाओं में मलबे के ढेर पर वे बैठे हैं और यहीं बजाएँगे अपने ढोल तारों से अनुप�
सुब्हान अल्लाह
लीलाधर मंडलोई
भयानक तूफ़ान के ऐन बीच कश्ती है मल्लाह है बेरहम लहरों से घिरा कश्ती में लोग हैं जिन्हें उस पार लगाना है एक कुएँ क�
ख़तरनाक
लीलाधर मंडलोई
मैं जिनके साथ पचास सालों से हूँ यह क्या हुआ एकाएक कि उनका प्यार घृणा में बदल गया और उनका धर्म-युद्ध में उनकी थाल�
देहगंध
लीलाधर मंडलोई
भागते-भागते मेरी आँखें ग़र्दों-ग़ुबार में लाल हो गई हैं मेरा चश्मा भागने के फेर में घर छूट गया और कई बेहद ज़रूरी स
अंतिम सिपाही की तरह
लीलाधर मंडलोई
मैं उनके लिए पागल हूँ जिन्हें बचा नहीं सका मैं उनके लिए रोता हूँ जो लड़ते हुए क़ब्र में अब भी ज़िंदा हैं मैं रस्मी
नदियाँ मेरे काम आईं
सुदीप बनर्जी
जहाँ भी गया मैं नदियाँ मेरे काम आईं भटका इतने देस-परदेस देर-सबेर परास्त हुआ पड़ोस से इसी बीच चमकी कोई आबेहयात म�
कितनों ने उपकृत किया
सुदीप बनर्जी
कितनों ने उपकृत किया कितनों ने अनदेखा फिर भी जीवन रहा वैसा ही अकारथ ख़ुद के भीतर से आए कोई गीत मन ही मन सूझे कोई म
हम पेड़ को कुछ भी कह सकते हैं
सुदीप बनर्जी
यह पेड़ मेरी कोशिश नहीं है इसके भीतर से उभरती कुर्सी तहज़ीब की आँखें हैं और मेरा कुर्सी से उठकर इस पेड़ के बारे मे
अगर तुम यहाँ पर होते
सुदीप बनर्जी
अगर तुम यहाँ पर होते मेरे बेटे, तो मैं तुम्हें ज़रूर दिखाता ये ख़ूबसूरत चिड़िया काले शरीर और सफ़ेद पंखों वाली ज�
इतना औसत समय
सुदीप बनर्जी
इतना औसत समय इतनी गहरी व्यथा इतना विचलित मन ग़ाफ़िल अपने ही शोर में कोई रह-रहकर पुकार उठता जगाता ख़ौफ़नाक हसरत
लौट आने का सुकून
सुदीप बनर्जी
किसी के लौट आने का सुकून मकान नहीं दरख़्त है पीले फूलों का तुम लौट आई हो तुम्हारी ख़ुशी बनकर हनी इमारती इच्छाएँ फ�
उतना कवि तो कोई भी नहीं
सुदीप बनर्जी
उतना कवि तो कोई भी नहीं जितनी व्यापक दुनिया जितने अंतर्मन के प्रसंग आहत करती शब्दावलियाँ फिर भी उँगलियों को दु
अगर ठीक से तय कर सकता
सुदीप बनर्जी
अगर ठीक से तय कर सकता कि कहाँ खड़ा रहूँगा ऐसी बिन बुलाए रात में तो बता सकता मैं किसी भी तारे की ठीक जगह चाहे कितन�
तुम्हारी हँसी होती
सुदीप बनर्जी
तुम्हारी हँसी होती तो चुप हो, छिप जाते हवा की ओट में हँसी होती अगर हवा पर रक़्साँ खिल जाते तारामंडलों के चुपचा�
मकान मना करते हैं
सुदीप बनर्जी
मकान मना करते हैं पेड़ नहीं नदी नहीं आसमान नहीं मकान मना करते हैं क्योंकि मकान में अंदर है पेड़ में, नदी में, आस
आसमान तुम्हारे कितने तारे
सुदीप बनर्जी
आसमान, तुम्हारे कितने तारे तुम्हें परेशान करते हैं, जंगल, तुम कितने पेड़ों से उदास होते हो नदी, तुम्हारा कितना पा�
अश्व-गंध
सुदीप बनर्जी
हवाओं में एक उन्मत्त अश्व-गंध जिसका पीछा करते पूरी तहज़ीब आदिम हुए जाती है : गुफाओं में कौन ईजाद कर रहा है हर चेह�
कभी हरीफ़ कभी हम-नवा हमीं ठहरे
फ़राग़ रोहवी
कभी हरीफ़ कभी हम-नवा हमीं ठहरे, कि दुश्मनों के भी मुश्किल-कुशा हमीं ठहरे। किसी ने राह का पत्थर हमीं को ठहराया, ये �
देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा
फ़राग़ रोहवी
देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा, ख़ुद से न मिल सका तो मुझे सोचना पड़ा। उस का जो ख़त मिला तो मुझे सोचना पड़ा, अपना सा
चिड़िया-ख़ाना
फ़राग़ रोहवी
नजमी फ़हमी उज़मा राना आओ देखें चिड़िया-ख़ाना जिन के नाम सुना करते हो आज उन्हें नज़दीक से देखो एक से एक परिंदे दे�
वसंत की हत्या
दूधनाथ सिंह
सब बेपहचान हवा भी अंधी। जल पगडंडी! तुमसे भी धँसना ही धँसना, बेथाह! पियानो की धुन में लिपटे आकार! तुम्हारे भी इ�
जन्म
दूधनाथ सिंह
मुझमें एक युग है जो परेशान है। मुझमें एक खंडित भूगोल है अखंड जो रेगिस्तान है। मुझमें सदियाँ हैं बेपर्द तन पर पै�
वसंत
दूधनाथ सिंह
यों ही हवा में झुके हुए, हवा को ख़त्म कर देना है... सड़कों को कुहरे के गहरे तहख़ाने में खो देना है। कभी-कभी एकाएक बारि
कहीं एक जगह
दूधनाथ सिंह
कहीं एक जगह है, जिसे कोई नहीं जानता। वहीं एक तालाब है, जिसमें एक अपरिचित फूल खिलता है, तालाब के किनारे साँप के जोड़े
युग और मैं
दूधनाथ सिंह
तुम मेरी अंतिम पराजय हो इस छोटी-सी दुनिया के गंदे शराबख़ाने में। वह, जो भटकी उजाले की पंख थाम, मेरी छाया थी। धूप औ
आँखों में आँखें नहीं हैं
दूधनाथ सिंह
सभी आवाज़ें मिलकर—गड्डमगड्ड सुबक रही हैं... मेरे सिरहाने, टप-टप अकेली एक बूँद टपक रही है। आँखों में आँखें नहीं हैं
किस अज्ञात इशारे पर
दूधनाथ सिंह
यह एक नया दिन है— ख़ून में नहाई सदियों के बाद—यह मौन अट्टहास। न्याय की आशा में बाँधे हुए तुम्हें—मैं ताक रहा हूँ
एक संभावना गीत
दूधनाथ सिंह
जैसे मैं अस्तिहीन चुप्पी में झरता-झरता खिल जाऊँगा जैसे मैं फिर किसी गहरे संगीत में लिपट कर रो जाऊँगा जैसे मैं फिर
ईमानख़ोर
दूधनाथ सिंह
नींद नहीं आती लोग आते हैं। हरे जवासों के तन वर्षा के प्रथम जल में जलते हैं। कच्चे काँटों की छुरग्र-धार-कथा आँखो�
नई संस्कृति
दूधनाथ सिंह
आसमान में बसा हुआ नगर निर्वसन हवा को नींव में चुनवा कर, आपस में टकराते, जूझते मकान। बँधे हुए कुत्तों का मुँह नोच�
कहीं कुछ खो गया है
दूधनाथ सिंह
कहीं कुछ खो गया है ऐसा जो कभी नहीं था, कहीं नहीं था हर चीज़ एक खोखले अट्टहास में गूँजती हुई... अनिद्रित, आशंकाग्रस्�
कवि-धर्म
दूधनाथ सिंह
मैं जगाऊँ उसे केवल जागरण मानूँ नहीं। सहज मति से थाम कर यह अर्द्धनग्न प्रकाश— गति में बँधा मेधावी भविष्य अकाश स�
मृत्यु
दूधनाथ सिंह
एक बहुत बड़े दर्पण में अँधेरा डोल रहा है। तूफ़ान पी रहा है आसमान। बाहर बहुत तेज़ धूप है— गहरी और सुर्ख़ धूप। त�
ऐसी तड़प अता हो के दुनिया मिसाल दे
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ऐसी तड़प अता हो के दुनिया मिसाल दे, इक मौज-ए-तह-नशीं हूँ मुझे भी उछाल दे। बे-चेहरगी की भीड़ में गुम है मिरा वजूद, मै�
चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है, जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है। उलझन घुटन हिरास तपिश कर्ब इंतिशार, वो भी
पहाड़ी औरतें
रुचि बहुगुणा उनियाल
पहाड़ की औरतें सूरज को जगाती हैं मुँह अँधेरे बनाकर गुड़ की चाय और उतारती हैं सूर्य-रश्मियों को जब जाती हैं धार�
पीड़ा का वैभव
रुचि बहुगुणा उनियाल
इतनी निष्ठुर सर्दियाँ कि शरीर की सारी कोशिकाएँ सुप्तावस्था में चली जाएँ मैं जीवित हूँ तुम्हारी याद को लपेटे हु
नदी की भाषा
रुचि बहुगुणा उनियाल
नदी के पास देने के लिए बहुत कुछ था सन्नाटे और एकांत को नदी ने शब्दों से सींचा लगी ख़ामोशी बतियाने! पानी को आवाज़
विस्मृति
रुचि बहुगुणा उनियाल
स्त्री का समर्पण शुक्राणु का भविष्य बदल देता है भले ही वह शुक्राणु हो एक अहंकारी पुरुष के वीर्य का अंश परंतु स्�
बिंब की पूर्णता
रुचि बहुगुणा उनियाल
ऊपर की पंक्ति से नीचे वाली पंक्तियों की असहमति ने कविता को ज़िद्दी बना दिया कविता का अर्थ कटघरे में खड़ा और उसका �
दुःख को गले लगा लो
रुचि बहुगुणा उनियाल
ईश्वर का पैरहन उधड़ रहा था... दुःख की सुई से चींदी-चींदी टाँका सुख टाँके के रेशे जितना ही रहा उघड़े हुए दुःख को ढाँ�
मैं लौटूँगी
रुचि बहुगुणा उनियाल
जैसे लौट आती हैं ऋतुएँ जैसे लौटती हैं हर शाम चिड़ियाँ घोंसले में जैसे लौटती है गाय अपने बछड़े के पास गोधूलि म
बची रहे
रुचि बहुगुणा उनियाल
बचा रहे प्यास बुझाने जितना पानी बादलों की कोख में दुनिया भर के दुःखों की कठोरता के उत्तर में धरती के आँचल में नर
घर
रुचि बहुगुणा उनियाल
चौकन्ना हो जाता है तब जब भी पुरुष ज़ोर से खंखार लेते हैं गला अपना लेता है गहरी साँसें जब स्त्रियाँ करती हैं आराम
पेड़
शरद बिलाैरे
आज जब मैं अपने टूटने के क्षणों में पेड़ की टूटती डालियों को महसूस करता हूँ तो बातें ज़्यादा साफ़ और तर्कसंगत लगन
तय तो यही हुआ था
शरद बिलाैरे
सबसे पहले बायाँ हाथ कटा फिर दोनों पैर लहूलुहान होते हुए टुकड़ों में कटते चले गए ख़ून दर्द के धक्के खा-खा कर नशों �
मेरी कहानी
शरद बिलाैरे
मेरी कहानी उस संगमरमरी पत्थर की कहानी है लोग ख़ूबसूरत कहने के बावजूद जिसे पत्थर कहते हैं। उस काली चट्टान की कह�
धरती
शरद बिलाैरे
दो बरस की नीलू आसमान तकती है पापा से कहती है पापा मुझे आसमान चाहिए। पापा ने कभी आसमान जैसी चीज़ अपने बाप से नहीं
रात
शरद बिलाैरे
कंधे पर टँगे थैले से लेकर बिस्तर तक कितना कुछ हो गया होता है रात देर गए जब हम अपने घरों में लौटते हैं कितना भारी-भ
पत्थर
शरद बिलाैरे
छेनी और हथौड़े के संघर्ष सारे वातावरण में डायनामाइट के धमाकों के बीच बहुत भीतर तक टूट-टूट कर पत्थर कितने ज़्या�
छोटे की ज़िम्मेदारी
शरद बिलाैरे
छोटे ने पर्याप्त मात्रा में घास-फूस इकट्ठा कर लिया है और ललचाई नज़रों से मेरी ओर देख रहा है एक अंगार के लिए। छोट
तुम मुझे उगने तो दो
शरद बिलाैरे
आख़िर कब तक तलाशता रहूँगा संभावनाएँ अँकुराने की और आख़िर कब तक मेरी पृथ्वी तुम अपना गीलापन दफ़नाती रहोगी, कब त�
मैं गाँव गया था
शरद बिलाैरे
मैं अभी गाँव गया था केवल यह देखने कि घर वाले बदल गए हैं या अभी तक यह सोचते हैं कि मैं बड़ा आदमी बन कर लौटूँगा। रा�
गेहूँ
शरद बिलाैरे
गेहूँ चाँस लगे आँख के कितने पास कि नत्थू घर में बैठे-बैठे गिन लेता है पीक बालियाँ दाने क़ीमत क़र्ज़ा बचत। औ�
तीन दिनों से
शरद बिलाैरे
तीन दिनों से लगातार बरसे हैं बादल ननकू तीन दिनों से आग ताप रहा है रधिया के चूल्हे के पीछे तीन दिनों से हँडिया औंधी
ग़ालिब को सुनते हुए
शरद बिलाैरे
आपने मेरे सलाम का जवाब नहीं दिया चचा ग़ालिब आप इतने उदास क्यूँ हैं एक बात बताइए आपको मौत से डर नहीं लगता देखिए �
भाषा
शरद बिलाैरे
पृथ्वी के अंदर के सार में से फूट कर निकलती हुई एक भाषा है बीज के अँकुराने की। तिनके बटोर-बटोर कर टहनियों के बीच �
मेरे बच्चे
शरद बिलाैरे
कल मैं उन्हें विदा दूँगा उनकी स्कूल की वर्दी में उन्हे सड़क पार करा कर लौट आऊँगा। कल वे गुज़रेंगे मेरे घर के ऊपर स
बरसात
शरद बिलाैरे
एक झल्ला पानी क्या गिरा कीचड़ से कतराती गली आँगन में आ गई देहरी पर पाँव रखते सहमी और मुस्कुरा कर पानी-पानी होती �
मनु का आसमान
शरद बिलाैरे
कितना निर्मल है मनु का दो बरस का आसमान और कितने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है मेरा नाम मनु के दो बरस के आसमान में
ज़ेहन में चराग़ाँ है रूह जगमगाई है
मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद
ज़ेहन में चराग़ाँ है रूह जगमगाई है, शाम के धुँदलकों में याद तेरी आई है। कल ख़िज़ाँ में दीवाने बे-नियाज़-ए-दामन थे,
सारा आलम गोश-बर-आवाज़ है
असरार-उल-हक़ मजाज़
सारा आलम गोश-बर-आवाज़ है, आज किन हाथों में दिल का साज़ है। तू जहाँ है ज़मज़मा-पर्दाज़ है, दिल जहाँ है गोश-बर-आवाज़ ह
ज़िंदगी दुश्वार है उफ़ ये गरानी देखिए
अदम गोंडवी
ज़िंदगी दुश्वार है उफ़ ये गरानी देखिए, और फिर नेताओं की शोला बयानी देखिए। भीख का लेकर कटोरा चाँद पर जाने की ज़िद, ये �
ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी
अदम गोंडवी
ये अमीरों से हमारी फ़ैसलाकुन जंग थी, फिर कहाँ से बीच में मस्जिद व मंदिर आ गए। जिनके चेहरे पर लिखी है जेल की ऊँची फ़सी�
वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं
अदम गोंडवी
वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं, वे अभागे आस्था-विश्वास लेकर क्या करें। लोकरंजन हो जहाँ शंबूक वध की आड़ में, उ
तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
अदम गोंडवी
तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है, मगर ये आँकड़ें झूठे हैं ये दावा किताबी है। उधर जम्हूरियत ढोल पीटे जा र�
जितने हरामख़ाेर थे क़ुर्ब-ओ-जवार में
अदम गोंडवी
जितने हरामख़ाेर थे क़ुर्ब-ओ-जवार में, परधान बनके आ गए अगली क़तार में। दीवार फाँदने में यूँ जिनका रिकॉर्ड था, वे चौधर�
पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो
अदम गोंडवी
पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो, फिर कर का बोझ की गर्दन पर डाल दो। रिश्वत को हक़ समझ के जहाँ ले रहे हों लोग, है और कोई मु�
वल्लाह किस जुनूँ के सताए हुए हैं लोग
अदम गोंडवी
वल्लाह किस जुनूँ के सताए हुए हैं लोग, हमसाये के लहू में नहाए हुए हैं लोग। ये तिश्नगी गवाह है घायल है इनकी रूह, चेह�
ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना है
अदम गोंडवी
ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना है, पर अपने ख़ून से गुलशन में रंग भरना है। उससे मिलने को कई मोड़ से गुज़रना है, अभी
घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है
अदम गोंडवी
घर पे ठंडे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है, बताओं कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है। भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भि�
अंत्यज कोरी पासी हैं हम
अदम गोंडवी
अंत्यज कोरी पासी हैं हम, क्यूँ कर भारतवासी हैं हम। अपने को क्यों वेद में खोजें, क्या दर्पण विश्वासी हैं हम। छाय�
समारंभ
वेणु गोपाल
घर नींव में है। बीच में पेड़ होता है ज्यों। घर भूमिका है। रिश्तों का पूर्व-कथन। एक निश्चय है सुगबुगाता हुआ हाथों
ख़तरे
वेणु गोपाल
ख़तरे पारदर्शी होते हैं। ख़ूबसूरत। अपने पार भविष्य दिखाते हुए। जैसे छोटे से गुदाज़ बदन वाली बच्ची किसी जंगली ज�
काले भेड़िए के ख़िलाफ़
वेणु गोपाल
देखो कि जंगल आज भी उतना ही ख़ूबसूरत है। अपने आशावान हरेपन के साथ बरसात में झूमता हुआ। उस काले भेड़िए के बावजूद ज�
कौन बचता है
वेणु गोपाल
जहाँ इस वक़्त कवि है कविता है वहाँ जंगल है और अँधेरा है और हैं धोखेबाज़ दिशाएँ। दुश्मन सेनाओं से बचने की कोशि�
उड़ते हुए
वेणु गोपाल
कभी अपने नवजात पंखों को देखता हूँ कभी आकाश को उड़ते हुए। लेकिन ऋणी मैं फिर भी ज़मीन का हूँ जहाँ तब भी था—जब प�
भविष्य
वेणु गोपाल
मज़बूत घोड़ों की तरह दौड़ रही हैं जड़ें और सबेरा है हर तरफ़ गोया घने जंगलों का बिंब उभर आया हो आकाश में।
साथ
वेणु गोपाल
अँधेरे में हो इसीलिए अकेले हो रोशनी में आओगे तो कम से कम अपने साथ एक परछाईं तो जुड़ी पाओगे।
रोज़ यही होता है
वेणु गोपाल
‘समझौते हमेशा-हमेशा ग़लत होते हैं’ यह कहने से पहले ज़रा तो सोच लेते कि इन फ़तवे में फिर से वे ही शब्द आ गए हैं जो अक
जिस सिम्त नज़र जाए, वो मुझको नज़र आए
शतदल
जिस सिम्त नज़र जाए, वो मुझको नज़र आए, हसरत है कि अब यूँ ही, ये उम्र गुज़र जाए। आसार हैं बारिश के, तूफ़ाँ का अंदेशा है,
वो जो थोड़ी मुश्किलों से हो के आजिज़ मर गए
शतदल
वो जो थोड़ी मुश्किलों से हो के आजिज़ मर गए, उनसे क्या उम्मीद थी और देखिए क्या कर गए? उस इमारत को भला पुख़्ता इमारत क
मौसम के फूल
शतदल
गंध के धनुष खींचे आ गए मौसम के फूल। फूल जो लुभाते हैं, प्राण तक चुराते हैं। कानों में मंत्र गीत गा गए मौसम के फू�
एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं
शतदल
एक ख़त जो किसी ने लिखा भी नहीं उम्र भर आँसुओं ने उसे ही पढ़ा। गंध डूबा हुआ एक मीठा सपन कर गया प्रार्थना के समय आचम�
एक सपना दिए का जिएँ
शतदल
एक सपना दिए का जिएँ हम अँधेरा समय का पिएँ दीप बालो, हृदय में धरो! हर दिशा में, उजाला करो! दीप की बात इतनी सुनो; रोशन
कल अचानक
शतदल
कल अचानक गुनगुनाते चीड़-वन जलने लगे और उनके पाँव से लिपटी नदी बहती रही। है नदी के पास भी अपनी सुलगती पीर है, दोपहर
एक सपना उगा
शतदल
एक सपना उगा जो नयन में कभी आँसुओं से धुला और बादल हुआ! धूप में छाँव बनकर अचानक मिला, था अकेला मगर बन गया क़ाफ़िला। �
तेरी प्यास अमोल
शतदल
बटोही, तेरी प्यास अमोल, तेरी प्यास अमोल! नदियों के तट पर तू अपने प्यासे अधर न खोल, बटोही, तेरी प्यास अमोल! जो कुछ त�
नैन मिले अनमोल
शतदल
जोगन, नैन मिले अनमोल, ओस कनों से कोमल सपने पलकों-पलकों तौल! जोगन, नैन मिले अनमोल! इन सपनों की बात निराली, दिन-दिन ह�
एक दिन
शलभ श्रीराम सिंह
पृथ्वी पर जन्मे असंख्य लोगों की तरह मिट जाऊँगा मैं। मिट जाएँगी मेरी स्मृतियाँ मेरे नाम के शब्द भी हो जाएँगे एक
व्यर्थता
शलभ श्रीराम सिंह
कंधे पर रखा हाथ मन को न छू रहा हो अगर व्यर्थ है। चेहरे पर टिकी निगाह आत्मा को न देख रही हो अगर व्यर्थ है। आलिंगन
उतना ही है जीवन
शलभ श्रीराम सिंह
प्यार के पास अपनी आँख होती है अपनी भाषा होती है प्यार के पास होती है अपनी राह देखता, बोलता, चलता हुआ प्यार जहाँ हो�
बच गया मैं
शलभ श्रीराम सिंह
किसी ने दावानल कह कर ख़ुद से अलग कर दिया। अचल मानकर किसी ने कर ली किनाराकशी किसी ने निरंतर चल जानकर बचा लिया �
अनैतिक कहा गया
शलभ श्रीराम सिंह
अनैतिक कहा गया मुझको अनैतिकों के बीच, सबसे ज़्यादह नैतिक रहा मैं ही सबसे ज़्यादह ख़तरनाक मोर्चों पर लड़ता हुआ उ�
यह रास्ता
शलभ श्रीराम सिंह
यह रास्ता परेशानी का है इसी पर चला जाए पहले। यह रास्ता सुख का है बच्चों से कहो इस पर आगे बढ़े। यह रास्ता कुनकुनी
बहुत दिनों तक
शलभ श्रीराम सिंह
पृथ्वी हिलेगी नहीं इस बार धधकेगा भी नहीं डूब जाएगी अपने ही पानी में अकस्मात। अपने विस्तार के साथ अपने ही पानी म�
दैनिक उत्सर्ग
शलभ श्रीराम सिंह
हँसते-हँसते होंठों की हँसी छीन लेते हैं लोग देखते-देखते आँखों की रोशनी बोलते-बोलते छीन लेते हैं शब्द बाक़ी रह जा
डर
शलभ श्रीराम सिंह
ज्ञानियों से लगता है डर डर गुणी जनों से लगता है अनुभवी जनों से लगता है डर। ज्ञान, गुण, अनुभव के बिना जिया गया जीवन
अपने लिए
शलभ श्रीराम सिंह
पहले एक लकीर बनी फिर रोलर घूमने लगा याददाश्त के ऊपर। यंत्रणा का ऐसा स्वरूप इससे पहले कहाँ था दुनिया में? सभ्यत
सार्थकता
शलभ श्रीराम सिंह
बिना कहे कहा है जो कुछ तुमने उसका एक भी हिस्सा अगर बचा रहा मेरे पास मेरे शब्दों के अर्थ नित नए होते रहेंगे। शब्दो�
प्रतिप्रेम
शलभ श्रीराम सिंह
वह कि जिसकी मौत कभी नहीं होती निर्दोष और निर्विकार है जो किसी भी शरीर में रहे किसी भी रूप में किसी के पास चिंता क�
सौंदर्यवान है सब कुछ
शलभ श्रीराम सिंह
घृणित कुछ रहा नहीं मेरे लिए न रहा कुत्सित-कुरुप-गर्हित अपने-अपने स्व में सौंदर्यवान रहा सब कुछ। पापियों के गले �
उजाले के पक्ष में
शलभ श्रीराम सिंह
अँधेरा मन के भीतर था उजाले की राह रोक कर खड़ा। अँधेरे के ख़िलाफ़ क्या कर सकता था मैं ख़ुद को जला देने के अलावा? उ�
तुम्हारा अकेलापन
शलभ श्रीराम सिंह
ज़िंदगी ले जा रही है कि मौत मेरा समय कि तुम्हारा अकेलापन कोई न कोई तो ले जा रहा है मुझे ज़रूर ज़िंदगी भटकाएगी पहल�
एक फूल का खिलना
शलभ श्रीराम सिंह
एक फूल का खिलना हज़ार-हज़ार बच्चों के पैदा होने का संकेत है एक फूल का टूटना हज़ार-हज़ार बच्चों की मौत का पैग़ाम।
मनहूस श्रोता
ओम् प्रकाश 'आदित्य'
हास्य रस सुनके भी टस से न मस हुआ सरस न लगी हो तो व्यंग्य ही तू कस दे धन नहीं माँगता सुमन नहीं माँगता मैं, नहीं चाहता �
जून में जनवरी
ओम् प्रकाश 'आदित्य'
हसीना के मुख पे पसीना यों झलकता है, तारे निकले हों जैसे पूनम के मून में। सेंट की सुगंध से जो शीत की लहर चली, मन मसूर�
लापता गधा
ओम् प्रकाश 'आदित्य'
आगरे का धोबी एक दिन राजधानी दिल्ली आया, दिल्ली वालों से यों बोला दुखी होके मन में— गाँव-गाँव भटका मैं नगर-नगर गया, �
दिल्ली और दलदल
ओम् प्रकाश 'आदित्य'
जल में भी रहके न जल लगता था कभी, कीचड़ लगी है अब ऊपर कमल में, बल रहता था बाहुओं में या कि आत्मा में, बल बसता है अब नेत�
चीख़ रस
ओम् प्रकाश 'आदित्य'
छंद को बिगाड़ो मत, गंध को उजाड़ो मत कविता लता के ये सुमन मर जाएँगे शब्द को उघाड़ो मत, अर्थ को पछाड़ो मत भाषण-सा झाड़ो
सोने की ईंट
ओम् प्रकाश 'आदित्य'
कंचन-सी गोरी घूमने को मार्किट गई उसे देख ख़ुद मार्किट घूम रही है। कवियों ने कहा स्वर्णिम उषा सुंदरी है किरणों का �
भ्रष्टाचार पेट पर
ओम् प्रकाश 'आदित्य'
कवि जिमि मंच पर, भूखा जिमि लंच पर, जिमि सरपंच पर न्याय का ख़ुमार है। कामदेव मन पर मन गोरे तन पर, जिमि मूलधन पर ब्याज �
पुराने अँधेरे को
चन्द्रकान्त देवताले
पुराने अँधेरे को गा रही हैं सफ़ेद चिड़ियाएँ जिस पेड़ पर गा रही हैं असमय झर रही हैं उसकी पत्तियाँ मैं चाहता हूँ ऊ�
विचार आते हैं
गजानन माधव मुक्तिबोध
विचार आते हैं— लिखते समय नहीं, बोझ ढोते वक़्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करत समय चाँद उगता है व पानी मे�
डूबता चाँद कब डूबेगा
गजानन माधव मुक्तिबोध
अँधियारे मैदान के इन सुनसानों में बिल्ली की, बाघों की आँखों-सी चमक रहीं ये राग-द्वेष, ईर्ष्या, भय, मत्सर की आँखें, ह
मैं तुम लोगों से दूर हूँ
गजानन माधव मुक्तिबोध
मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए
बेचैन चील
गजानन माधव मुक्तिबोध
बेचैन चील!! उस-जैसा मैं पर्यटनशील प्यासा-प्यासा, देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील या पानी का कोरा झाँसा जिसकी सफ़ेद
ब्रह्मराक्षस
गजानन माधव मुक्तिबोध
शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ी के भीतरी ठंडे अँधेरे में बसी गहराइयाँ जल की... सीढ़ियाँ डूबीं अ�
चाँद का मुँह टेढ़ा है
गजानन माधव मुक्तिबोध
नगर के बीचो-बीच आधी रात—अँधेरे की काली स्याह शिलाओं से बनी हुई भीतों और अहातों के, काँच-टुकड़े जमे हुए ऊँचे-ऊँचे �
एक अंत:कथा
गजानन माधव मुक्तिबोध
अग्नि के काष्ठ खोजती माँ बीनती नित्य सूखे डंठल सूखी टहनी, रूखी डालें घूमती सभ्यता के जंगल वह मेरी माँ खोजती अग�
एक वजह काफ़ी होती है
सैयद इंतज़ार अहमद
किसी को याद करने की किसी को याद आने की, किसी के दिल की धड़कन को महसूस करके, किसी के ख़्वाब के हिस्से में धीमे से पहुँच �
लू के मौसम में बहारों की हवा माँगते हैं
अली सरदार जाफ़री
लू के मौसम में बहारों की हवा माँगते हैं, हम कफ़-ए-दस्त-ए-ख़िज़ाँ पर भी हिना माँगते हैं। हम-नशीं सादा-दिली-हा-ए-तमन्ना �
तुम्हारा शहर
अली सरदार जाफ़री
तुम्हारा शहर तुम्हारे बदन की ख़ुश्बू से महक रहा था, हर इक बाम तुम से रौशन था हवा तुम्हारी तरह हर रविश पे चलती थी तु�
दिवा स्वप्न
प्रवीन 'पथिक'
एक; किसी पिंजरे में कैद पक्षी की तरह, फड़फड़ाता है। उसके निकलने के अपेक्षा, मौत का आलिंगन प्यारा लगता है। रात के सन�
एक बार जो टूट गया तो
प्रवीन 'पथिक'
एक बार जो टूट गया तो, शायद ही जुड़ पाएगा! प्रेम या जीवन के सपनें, हुए पराए जो थे अपने। ऑंखें खोई हो आकाश में, न उर पीड़
आर्तनाद
प्रवीन 'पथिक'
जब भी अतीत को देखता हूँ! एक भयानक यथार्थ; खड़ा हो जाता मेरे समक्ष। बड़ी भुजाऍं, बड़ी-बड़ी ऑंखें, और लपलपाती रक्तिम �
एक अज्ञात चिंता
प्रवीन 'पथिक'
जब भी तुम्हे ढूॅंढ़ने की कोशिश करता हूॅं! भूल जाता हूॅं, ख़ुद में ही। एक अज्ञात चिंता, मन पर हावी होने लगती। इस संसा�
तुम्हारा प्रेम
प्रवीन 'पथिक'
भावनाओं की उधेड़बुन में, मेरे दुर्बल मन को; विचारों की आँधी में तुम्हारा प्रेम; अपनी आग़ोश में ले तृप्त कर देता उफन�
ख़ामोश ज़िन्दगी
प्रवीन 'पथिक'
हर सुबह! एक ख़ामोश ज़िन्दगी लेकर आती है। जिसे न जीने की चाह होती है; न खोने का अफ़सोस। चेहरे पर, एक झूठी मुस्कुराह�
अनोखा स्वप्न
प्रवीन 'पथिक'
हर उदासी की, एक कहानी होती है। जिसे पढ़ना, सब पसंद करते हैं। भोगना नहीं। हर कहानी में एक दर्द होता है! जो भले हृदय �
मर्म-स्मृतियाँ
प्रवीन 'पथिक'
आँखों मे डर का ख़ौफ़, दिल मे भयानक मंज़र, मन मे अप्रत्याशित आशंका, और जीवन से मोह भंग– निविड़ता से उत्पन्न दुःख की ऐ
हमारा अस्तित्व हमारे कर्म से है...
अज्ञात
हमारा अस्तित्व हमारे कर्म से है, किसी के नज़रिए से नहीं।
दुनिया में नाम कमाने के लिए
गजानन माधव मुक्तिबोध
दुनिया में नाम कमाने के लिए कभी कोई फूल नहीं खिलता है।
वक़्त यूँ ज़ाया न कर
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
मसर्रतों की तलाश में अपनों से ख़ुद को यूँ पराया न कर, बेशक़ गर्दिश भरा है सफ़र, तू चल वक़्त यूँ ज़ाया न कर। हाँ, मिल ही जाए�
मंज़िल पर हूँ
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
मंज़िल पर हूँ, पैरो को अब और चलने की ज़रूरत ना रही, दिल में इस तरह से बसे हो कि मन्दिर में तेरी मूरत ना रही। फ़लक़, पंछी, ये �
चाहता हूँ
गणेश भारद्वाज
जाने दो मुझे, चाँद के घर थोड़ी शीतलता उधार लाना चाहता हूँ। उतरने दो मुझे, थोड़ा और गहरा मोती सागर तल से लाना चाहता
संतोष से बड़ा सुख नहीं
गणेश भारद्वाज
संतोषी जन बहुत सुखी हैं, स्वार्थ की दुनियाँदारी में। झूम उठा जो एक ही गुल पर, क्या करना उसको क्यारी में? सीख लिया
जो जाता है उसे जाने दो
गणेश भारद्वाज
जो बीत गया सो बीत गया, अब बीता वक्त भुलाने दो। जीवन है आशा का दीपक, जो छोड़ गया उसे जाने दो। बीते से जो सीखा मैंने, न�
जय बोलें श्रीराम की
उमेश यादव
आओ सब मिल महिमा गाएँ, जननायक श्रीराम की। राम तत्त्व मन में विकसाएँ, जय बोलें श्रीराम की॥ राज पाट को छोड़ा प्रभु ने, क
मकर संक्रांति
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
आज हुआ किसान फिर धरा मुदित, नवान्न फ़सल कटाई होती है। फिर जले अलाव लोहड़ी उत्सव, बाली गेहूँ आग दी जाती है। ख़ुशियाँ �
खिचड़ी
सुषमा दीक्षित शुक्ला
खिचड़ी का अर्थ है एकता ये है अनेकता में एकता खिचड़ी का अर्थ है प्यार ये सादगी का अद्भुत त्यौहार सामंजस्य भी है इसका �
मकर संक्रांति
उमेश यादव
संक्रांति का पर्व है पावन, सबके मन को भाता है। पोंगल, लोहड़ी, खिचड़ी, बीहू, मकर संक्रांति कहलाता है॥ मकर राशि में जाक�
जीवन उतना गंभीर नहीं है...
अज्ञात
जीवन उतना गंभीर नहीं है, जितना मन इसे बना देता है।
धरे रहे सब ख़्वाब
हेमन्त कुमार शर्मा
धरे रहे सब ख़्वाब, आँखें बोझिल थी। आसूँ की सौग़ात, सावन को भी मात, हाथों में नहीं हाथ, छूटा स्नेह का साथ, पर मधुर रहा ब�
हे राम!
प्रवीन 'पथिक'
हे राम! तुम्हारे जीवन की झाँकियाॅं, मेरे अंतर्मन को रुदन जल से अभिसिंचित कर, कृतार्थ करती है, जो मुझे पुण्य मार्ग क
नमन
महेश कुमार हरियाणवी
खगोलीय जहान हो, या गूँजता विमान हो, अपने तिरंगे का तो, अलग मक़ाम है। तकनीक का है जोर, चमके हैं चारों ओर, पैर धरती पे म्�
मुझे देखकर अब उसका शर्माना चला गया
ममता शर्मा 'अंचल'
मुझे देखकर अब उसका शर्माना चला गया, राह देखने वाला आज जमाना चला गया। जैसे बच्चे जीते बेफ़िक्री में जीवन को, आज बुज़�
हे! मृदु मलयानिल अनुभूति
राघवेंद्र सिंह
हे! अंतस की चिर विभूति, हे! मृदु मलयानिल अनुभूति। तुमसे ही होते मुखर भाव, कम्पित पुलकित दृग के विभाव। तुम लेकर आती �
मेरा गाँव
सुषमा दीक्षित शुक्ला
मेरे गाँव की सोधीं मिट्टी, अम्मा की भेजी चिट्ठी। स्कूल से हो जब छुट्टी, वो बात-बात पर खुट्टी। हर बात याद क्यूँ आती? �
अपनापन
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
खोता जीवन सुख अपनापन, वह स्वार्थ तिमिर खो जाता है। कहँ वासन्तिक मधुमास मिलन, पतझड़ अहसास दिलाता है। भौतिक सुख साधन
राष्ट्र की उपासना ही, अश्वमेधिक लक्ष्य हैं
उमेश यादव
राष्ट्र की उपासना ही, आश्वमेधिक लक्ष्य है। पराक्रम से राष्ट्र रक्षा, यज्ञ संस्कृति रक्ष्य है॥ अश्व है प्रतीक साह
बिंदु-बिंदु शिल्पकार है
मयंक द्विवेदी
सीमित ना हो दायरा उर के द्वार का, प्रकृति भी देती परिचय दाता उदार का। यूँ ही नहीं होता सृजन उपलब्धि के आधार का, छूपी
आशंका
प्रवीन 'पथिक'
एक घना अँधेरा! मेरी तरफ़ आता है मुँह बाए, और ढक देता सम्पूर्ण जीवन को; अपनी कालिमा से। किसी सुरंगमय कंदराओं में से, स�
सब एक जैसी नहीं होती
संजय राजभर 'समित'
एक तरफ़ समर्पण था निष्कलंक, निष्छल असीम प्रेम था पर मेरे दिमाग़ में एक वहम थी एक बस छूटेगी तो दूसरी मिलेगी फिर कली-क�
प्यार में कोई दवा क्या है दुआ क्या है
रोहित सैनी
प्यार में कोई दवा क्या है दुआ क्या है, जो हुआ उसमें बुरा क्या है भला क्या है। वो हमें मिल जाए तो हसरत नहीं है कुछ, न�
वह तुम हो
रोहित सैनी
"अर्धनारीश्वर" की "अवधारणा" तुम्हीं से पूर्ण होगी "पायल" "डमरू" की डम-डम में जो छन-छन है उधार! वह तुम हो, वह तुम हो। इस स
कोई ख़ुशबू, कोई साया, याद आया रात भर
रोहित सैनी
कोई ख़ुशबू, कोई साया, याद आया रात भर, जाने किसकी, याद ने हमको जगाया रात भर। रात गुज़री बात करते तारिकाओं से जो ये, सोच�
जो बचाना चाहते हो बच भी जाएगा मगर
रोहित सैनी
जो बचाना चाहते हो बच भी जाएगा मगर, एक दिन मौसम सुहाना दिल जलाएगा मगर। मान लो के ज़ख़्म दिल के भर भी जाएँगे सभी, एक दिन �
तेल की कमी में बाती
रोहित सैनी
जैसे मौत आती है; और... "है" का "था" हो जाता है! दीप आँधियों में एकदम से बुझ जाते हैं! तेल की कमी में बाती... टिमटिमाती है कु
प्रेम
रोहित सैनी
प्रेम! धूप है हमारे चेहरे की... सितारों की जग-मगाहट, जिसमें... सब कुछ सुंदर दिखता है शीतल, शांत, मद्धम रौशनी है चाँद की।
इक ख़ुमारी है बे-क़रारी है
रोहित सैनी
इक ख़ुमारी है, बे-क़रारी है, रूह प्यासी है, मन भी भारी है। इक सदी है कि जो गुज़र गई है, एक लम्हा है जो कि तारी है। आग है दि
ग़लती करना उतना ग़लत नहीं...
प्रेमचंद
ग़लती करना उतना ग़लत नहीं, जितना उन्हें दोहराना है।
मेरी कविताएँ
जयप्रकाश 'जय बाबू'
मेरी कविताएँ मेरा सहारा है मैंने जब जब उनको पुकारा है वह साथ देती है मेरा हर वक्त फैलाती दिल में उजियारा है मेरी क�
शिव का सार
हेमन्त कुमार शर्मा
गहन क्लेश में सुख का आगार योग से प्राप्य शिव का सार। बृहद क्षेत्र में व्यापक आकाश सर, कल्प दिए सरलता से संवत्सर। न
सम्मान
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सदाचार शिक्षण मिले, शिक्षा नैतिक ज्ञान। मानवीय मूल्यक सदा, मिले कीर्ति सम्मान॥ सबकी चाहत लोक में, मिले समादर मान�
क्षितिज के पार जाना है
उमेश यादव
उठो जागो बढ़ो आगे, क्षितिज के पार जाना है। सुनो नारियों, आगे बढ़कर, अपना मार्ग बनाना है॥ जकड़ी थी ज़ंजीरों से पर, तूने �
ऋतुराज बसंत
गणेश भारद्वाज
पहन बसंती चोला देखो, अब शील धरा सकुचाई है। कू-कू करती कोयल रानी, लो सबके मन को भाई है। हरयाली है वन-उपवन में, कण-कण म�
जो सहज सुलभ हो
मयंक द्विवेदी
जो सहज सुलभ हो अमृत तो तुच्छ अमृत का क्यूँ पान करूँ इससे अच्छा तो विष पीकर विष का ही गुणगान करूँ कूल सिंधु के बैठे-�
बचपन के दिन
सुषमा दीक्षित शुक्ला
कितने सुंदर, बेमिसाल थे, छुटपन के दिन बचपन के दिन, रह ना पाते सखियों के बिन। रह ना पाते सखियों के बिन। खेलकूद थे मस्
हम जिएँ न जिएँ दोस्त
केदारनाथ अग्रवाल
हम जिएँ न जिएँ दोस्त तुम जियो एक नौजवान की तरह, खेत में झूम रहे धान की तरह, मौत को मार रहे बान की तरह। हम जिएँ न जिए�
बाँध ना पाया
हेमन्त कुमार शर्मा
व्यर्थ हुए सावन ने कहा― क्या कोई सम्भाल ना पाया, बहते-बहते पानी को, मुट्ठी में पकड़ ना पाया। यहाँ पुल तिनके से टूट �
नहीं चाहता आसाँ हो जीवन
मयंक द्विवेदी
चाहे सौभाग्य स्वयं हो द्वार खडे, चाहे कर्ता भी हो भूल पड़े, नहीं चाहता आसाँ हो जीवन, चाहे मग में हो शूल गढ़े। जो पत्थ
तो समझो की ये होली है
उमेश यादव
नयनों में ख़ुमारी छाए, साँसों में भी उष्णता आए। मन मिलने को अपनों से, होकर अधीर अकुलाए॥ लहरों सा हिलोरे ले मन, तो समझ�
एक दो-दिन का है ख़ुमार, बस, और
रोहित सैनी
एक दो-दिन का है ख़ुमार, बस, और, सोचा थोड़ा-सा इंतिज़ार, बस, और। भूल जाने में कौन मुश्किल है, चार-छै उम्र का क़रार, बस, और। म�
बचपन
प्रवीन 'पथिक'
है याद आती, वह बातें पुरानी, वही प्यारा क़िस्सा, वह बीती कहानी। याद आता वह तेरा मुस्काता चेहरा, थी होती लड़ाई, पर था प�
श्रद्धा भक्ति प्रेममय होली है
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
ब्रज होली है रंगों का त्यौहार राधा संग खेलें होली रे। गोरी राधा हृदय गोपाल मन माधव प्रिय हमजोली रे। मोहे रंग दे गु
होली आई रे
अजय कुमार 'अजेय'
होली आई रे होली आई रे। मस्ती छाई रे मस्ती छाई रे। रंगों से भरी पिचकारी, छोरा-छोरी चोरी मारी। गुब्बारे में भर-भर रंग
अनुसरण कृष्ण का
हेमन्त कुमार शर्मा
शिथिल पाँव भोग के, विस्मरण भाव शोक के। कर्म से गति का अवसर, सम्यक ध्यान अहरहर। अनुसरण कृष्ण का। होली, अग्नि दहन ईर�
होली
गणेश भारद्वाज
सद्भावों की माला होली, ख़ुशियों की है खाला होली। रंग बसे हैं रग-रग इसकी, रंगों की है बाला होली॥ मन के शिकवे दूर करे य
स्वयं जलो
संजय राजभर 'समित'
जलो मत न जलाओ किसी को यदि जलाना है तो अंदर के विकारों को जलाओ अप्प दीपो भव: बनो कुंदन बनोगे आत्म चेतना जिस दिन जल ग�
दुख बदली
हेमन्त कुमार शर्मा
कभी शाम के सिरहाने खड़े सूरज को देखा है, ढलते माथे पर दुख बदली की रेखा है। स्मरण किया उन व्यर्थ हुए मूल्यों का, नदी
अभिशप्त इच्छाएँ
प्रवीन 'पथिक'
सब कुछ बिखर जाने के बाद; पथ-परिवर्तन के बाद; और स्मृतियों का गला घोंटने के बाद भी लगता है, कोई ऐसी बिंदु, कोई अवशेष, क�
तोहरो रूप गढूँ मैं राधिका प्यारी
रोहित सैनी
सुनो वृषभानु कुमारी, राधिका प्यारी तोहरो पंथ निहारी, अँखियाँ दुखारी म्हाने मत भी सताओ, नैनन समाओ करो न देर अब आओ, र�
आगंतुक
अज्ञेय
आँखों ने देखा पर वाणी ने बखाना नहीं। भावना ने छुआ पर मन ने पहचाना नहीं। राह मैंने बहुत दिन देखी, तुम उस पर से आए भी, ग
ख़ामोशियाँ
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
ख़ामोशियाँ बहुत कुछ कहती हैं धीरे-से, हौले-से, चुपके-से ख़ामोशियाँ बहुत कुछ कहती हैं। मन की बाट जोहती हैं बेसुध-बे
बिन तेल की बाती
मयंक द्विवेदी
देख बिन तेल की बाती को रजनी के अंधेरे भाग रहे देख धधकती ज्वाला में अपने सूत के अंग-अंग को आनंद की इस अनुभूति में प्�
जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
केदारनाथ अग्रवाल
जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है जो रवि के रथ �
धरती का शृंगार मिटा है
राघवेंद्र सिंह
धधक उठी है ज्वालित धरती, जल थल अम्बर धधक उठा है। अंगारों की विष बूँदों से, प्रणय काल भी भभक उठा है। सूख गए हैं तृण-त�
ऋतुओं का महत्त्व
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
सुष्मित कुसुमित प्रकृति यह, सुरभित जीवन लोक। सूरज चंदा अहर्निश, हरे तिमिर जग शोक॥ षड् ऋतुओं में प्रकृति सज, विवि�
दुःख उठाने वाला प्रायः टूट जाया करता है
नरेश मेहता
दुःख उठाने वाला प्रायः टूट जाया करता है, परंतु दूःख का साक्षात् करने वाला निश्चय ही आत्मजयी होता है।
ख़ास
विनय विश्वा
मनुष्य गुणों से ही तो ख़ास होता है इसीलिए तो वह दिल के पास होता है। ईश्वर के अवतारी युग– त्रेता हो या द्वापर राम के �
सिर्फ़ मरते हैं यहाँ हिन्दू, मुसलमाँ या दलित
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
सिर्फ़ मरते हैं यहाँ हिन्दू, मुसलमाँ या दलित अब किसी भी जगह पर मरता नहीं है आदमी बँट गए अब तो स्वयं भगवान कितनी जात�
फिर भी मुस्कुरा दिया
हेमन्त कुमार शर्मा
ग़म थे ज़माने भर के, फिर भी मुस्कुरा दिया। फूल होने का, फ़र्ज़ अदा किया। काग़ज़ और पैन का, समझोता टूटा। लिखता वो, काग़ज़ की �
अंगारों को यूँ जिनके सीने में धड़कते देखा है
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
अंगारों को यूँ जिनके सीने में धड़कते देखा है, मेहनत कशी से वक्त फिर उनको बदलते देखा है। ये राह आसाँ तो नहीं पर लेना �
ऐ कविता!
सुषमा दीक्षित शुक्ला
ऐ कविता! शायद तू मेरी सहेली है, तू प्यारी सी कोई पहेली है। नीरसता में रस भर देती, तू अलबेली है सच तू अलबेली है। ऐ कवि�
मैं चिर निर्वासित दीपक हूँ
राघवेंद्र सिंह
दिनकर-सी चाह नहीं मेरी, उद्घोषित राह नहीं मेरी। निर्भीक, निडर, निश्चल-सा मैं, प्रतिदिन, प्रतिक्षण, प्रतिपल-सा मैं।
ऊहापोह
प्रवीन 'पथिक'
रात ढली ही नहीं! करवट बदलता रहा बिछौने पर। ऑंखों में रौद्र की लालिमा; मस्तिक में प्रश्नों का तूफ़ान; जीवन की आद्योप�
बिखरे ना परिवार हमारा
अंकुर सिंह
भैया न्याय की बातें कर लो, सार्थक पहल इक रख लो। एक माँ की हम दो औलादें, निज अनुज पे रहम कर दो॥ हो रहा परिवार की किरकि�
हे तथागत ये बताओं
मयंक द्विवेदी
हे तथागत ये बताओ जीवन का क्या मर्म है? कैसे हो जीवन का उद्धार क्या संन्यास ही है मुक्ति का द्वार कैसे सम्भव है जन्म
स्नेह भरे आँचल में माते
उमेश यादव
कष्टों से व्याकुल मेरा मन, पीड़ा से जब भरता है। स्नेह भरे आँचल में माते, छुपने को मन करता है॥ जब भी विपदा आई मुझपर, तू�
पर्यावरण
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
चलो बचाएँ प्रकृति धरा को, वृक्षारोपण मिल साथ करें। बाढ़, भूकम्प तूफ़ाँ कहर ताप, पर्यावरण प्रदूषण मुक्त करें। हव�
किसी पुस्तक के किसी पन्ने पर
हेमन्त कुमार शर्मा
किसी पुस्तक के किसी पन्ने पर, दिखाई दिया, एक कतरन नुमा काग़ज़। लिखा था कल क्या क्या, सामान लाना है, घर चलाने को। शायद
चलो पथिक
मयंक द्विवेदी
सुगम पथ की राहों पर चलना भी क्या चलना है राह सीधी तो सबने देखी जाँची परखी अपनी मानी कहो दुर्गम अनजानी राहों के मंज
संकटों के साधकों
मयंक द्विवेदी
हे संकटों के साधकों अब इन कंटकों को चाह लो समय दे रहा चुनौती जब कुंद को नयी धार दो वार पर अब वार हो और प्रयत्नों की ब
ज्ञान दीन
महेश कुमार हरियाणवी
उसे घर से निकाला घर जिसने संभाला। पढ़े-लिखे बगुलों का काला किरदार है। माया जिन पे चढ़ादी देह अपनी लुटादी। बोलियाँ
मँझधार फँसी नैया
उमेश यादव
मँझधार फँसी नैया, उद्धार करा देना। जीवन की कश्ती को, प्रभु पार लगा देना॥ सुख-दुःख ही जीवन है, मन को समझाना है। संघ�
मानवता बेहाल
ममता शर्मा 'अंचल'
घर के पीछे आम हो, और द्वार पर नीम, एक वैद्य बन जाएगा, दूजा बने हकीम। पीपल की ममता मिले, औ बरगद की छाँव, सपने आएँ सगुन क�
पेड़ की व्यथा
हेमन्त कुमार शर्मा
पेड़ की व्यथा, आँसुओं की कथा। यह कुछ पीली मशीनें, यह कुछ आरी सी कीलें। रस्सी के फंदे, जमघट मज़दूरों का, पेड़ अकेला थ�
कठपुतली
अजय कुमार 'अजेय'
अंग-अंग पर बाँधे धागे, तभी हिले जब हिलते तागे। कठपुतली है नाम कहाई, मन को सबके भाती ताई। कभी प्रसन्न कभी यह रूठी, ल
अनकही बातें
प्रवीन 'पथिक'
कभी कभी जीवन में भी कुछ ऐसा क्षण आता है, दर्द सिसकता है भीतर, मुस्कान दिखाया जाता है। मन की मायूसी का जब, चीत्कार उठत
पुण्य भाग्य आगम अतिथि
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
अतिथि देवता तुल्य है, चिर पूजित संसार। मान दान सेवा नमन, ईश्वर का अवतार॥ अतिथि गेह आगम सुखद, पावन मिलन सुयोग। कुश�
जंगली मन
सुनीता प्रशांत
इन हरे भरे जंगली पेड़ों जैसे मैं भी हरी भरी हो जाऊँ मनचाहा आकार ले लूँ कितनी भी बढ़ जाऊँ फैल जाऊँ दूर-दूर तक या आका�
उड़ो तुम लड़कियों
सुनीता प्रशांत
उड़ो तुम लड़कियों छू लो आसमान कर लो मुठ्ठी में सारा जहान तोड़ दो दीवारे जो रोकती हैं तुम्हे छोड़ दो वो बंदिशे जो ब
अहसास
सुनीता प्रशांत
छोड़ आई जो माँ की गली वो गली गुम गई है वो राह तकती दो आँखें हमेशा के लिए बंद हो गई हैं वो मोहल्ला भी नहीं रहा वो लोग भ
ग्रीष्म ऋतु
सुनीता प्रशांत
आकाश हो गया चुप धरा ने धरा मौन मन हुआ कुछ उदास ये मौसम आया कौन हवा हो रही ऊष्ण भास्कर भी तमतमाया घने वृक्षों की डाल�
प्रिय तुम कुछ बोलो
सुनीता प्रशांत
प्रिय तुम कुछ बोलो झोली शब्दों की खोलो थाम लूँगी उन शब्दों को सजा लूँगी माथे पर सहेजूँगी जीवन भर समेट लूँगी उन्हे
सावन
सुनीता प्रशांत
ये कौन उत्सव आया सखी री मन क्यों कर मुसकाया सखी री मेघ गरज कर मृदंग बजाते मधुकर मधुर तान सुनाते फूल ये क्यूँ सकुच�
कृष्ण
सुनीता प्रशांत
कृष्ण तो बस कृष्ण थे सुंदर चितवन नंद नंदन थे बालक थे तो जैसे चंचल मन युवा वस्था जैसे वसुंधरा वसन स्मित हास्य हो जै�
मैं हिंदी हूँ
सुनीता प्रशांत
सबकी जानी पहचानी सबकी प्यारी अपनी अपनी भावना मैं मन की भाषा मैं जन जन की व्यक्त मैं, अभिव्यक्त मैं सार मैं, अभिसार
आव्हान
सुनीता प्रशांत
“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” क्या आशय समझूँ मैं इसका मज़�
तस्वीर
लाल्टू
यह तस्वीर कभी पूरी नहीं होगी इसमें एक औरत है वह पहाड़ों की ओर जा रही है पहाड़ इतने दूर हैं कि तस्वीर पूरी नहीं हो सकती
कविता
लाल्टू
बहुत बड़ा शहर बहुत बड़ा अँधेरा छोटा बच्चा खोया हुआ बड़ी अँधेरी भीड़ में मुझे यह सपना बार बार आता है अँधरे से एक पत
जैसे यही सच है
लाल्टू
जैसे समंदरों पार वह इंतज़ार में रहती है कि मैं फ़ोन करूँ कई बार मन करता है कि फूट पड़ूँ कि तुम्हें कभी नहीं फ़ोन करना �
लोग ही चुनेंगे रंग
लाल्टू
चुप्पी के ख़िलाफ़ किसी विशेष रंग का झंडा नहीं चाहिए खड़े या बैठे भीड़ में कोई हाथ लहराता है लाल या सफ़ेद आँखें ढू�
एक और रात
लाल्टू
दर्द जो जिस्म की तहों में बिखरा है उसे रातें गुज़ारने की आदत हो गई है रात की मक्खियाँ रात की धूल नाक कान में से घुस ज�
विस्मृति
शैलप्रिया
ख़ुशनुमा दिन हथेलियों पर बो देता है काग़ज़ी फूलों का जंगल, भ्रांतियों के आकाश में कौंधती है जब बिजली, मेरे भीतर च�
शहर क्या होता है
शैलप्रिया
जब बनने लगा था यह नगर, चकित हुई थीं झील के गर्भ में पलती मछलियाँ। सड़कों पर उतर आया था नए वाहनों का शोर और सबके सपनो�
पालने की हँसी
शैलप्रिया
चाँदनी के उजले फ़व्वारों-सी ख़ुशियाँ भर देती है मुझमें पालने की हँसी। यही हँसी एक दिन बन जाती है कला, और कल ढल जाए�
शब्द
शैलप्रिया
नहीं याद आता है वह शब्द जिसे बड़ी मासूमियत से दफ़नाया था मैंने, बस, उसकी क़ब्र की जगह नहीं भूल पाई मैं। शब्द जड़ नह
परेशानी
शैलप्रिया
जब टपकता है बूँद-बूँद मोती-सा पानी, कजरारे बादलों के संग उड़ता है सहेली का मन। मन की पाती लिख नहीं पाती कि अक्सर ह�
कविता से एक अंतरंग संवाद
शैलप्रिया
मेरी अंतरंग सखी! मैं तुम्हारे साथ सैर को जाती हूँ जब भी, ख़ाली तन्हाइयों में तुम मुखर हो जाती हो। तुम्हारे संग-साथ �
कभी सोचा है तुमने
शैलप्रिया
बिन किए, बिन कहे बँट गई है कथा तुम्हारी और हमारी। नमी के शोषांत तक बच जाती है एक नन्हीं बूँद। कहाँ तक जाएँगे हम दल�
सहभागिता
शैलप्रिया
यादों के ढेर, गहराती शाम, सूखी पंखड़ियों का अहसास, पियराई आँखों-सा ध्रुव तारा... इस यात्रा में बिछड़ते लोग हैं जो भट
तुम और तुम्हारी याद
शैलप्रिया
इंद्रधनुष के रंगों में रँगता है जब दिन, स्मृतियों में घुलती है गुलाब की गंध और खिल जाता है एक फूल तुम्हारे नाम का�
चक्रव्यूह
शैलप्रिया
रोज़ उगते सूर्य के संग-साथ दिनचर्याओं में उलझ जाते हैं हम सब और एक ही लीक पर चलते होते हैं अहर्निश। गतिशील समय ठहर
बुरा वक़्त
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
दुखों की थी जो काली रात, हँसी के जो सूखे थे हर इक पात, मुसीबत थे घने बादल, जो कोहरा ग़म का था छाया, फिर सुबह हुई सबकी उम�
महज़ कविता नहीं हूँ मैं
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
तीर सा चुभता शब्द हूँ मैं। शब्दों में पिरोई, मोतियों का गुच्छा हूँ मैं, शब्द नहीं शब्द का सार हूँ मैं॥ कटते पेड़ों क
परम्परागत और वैज्ञानिक कृषि जल संकट और जीवनशैली
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
भारत ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में बढ़ती हुई जनसंख्या और और कृषि योग्य भूमि की कमी से खाद्य संकट संभावना बढ़ रही है और
भौतिकवाद, प्रकृतिवाद और हमारी महत्वाकांक्षाएँ
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
सुदूर गाँव और जंगलों मे बैठा कोई बुज़ुर्ग व्यक्ति और उसका परिवार जो खेती बाड़ी करता है, गाय, भैंस और बकरियाँ चराता है, �
स्थायित्व
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
ब्रह्मांड का हर कण दूसरे कण को आकर्षित अथवा प्रतिकर्षित करता रहता है सतत… ताप, दाब और सम्बेदनाओं से प्रभावित टूट
सफलता निजी नहीं होती
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दें, उनका चरित्र निर्माण करें ईमानदारी और मेहनत करना सिखाएँ। रिश्ते और रिश्
ऐ ज़िंदगी! तू सहज या दुर्गम
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
सही कहती थी अम्मा (मेरी माँ)– यूँ बात-बात पर ग़ुस्सा ठीक नहीं। इक दिन तो बढ़नी से पीटा गया। अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी नहीं च
जीवन क्या है?
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
कुछ शब्दों, चीज़ों या विषयों को परिभाषित करना मुश्किल है जैसे प्रेम, मित्रता और जीवन। इन शब्दों का कोई सार्वभौम पर
सुना है सपने सच होते हैं
श्याम नंदन पाण्डेय 'श्यामजी'
मन की तरंगे बढ़ने दो मन पतंग सा उड़ने दो पंख तेरे अब खुलने दो भ्रम की दीवारें गिरने दो नैनो में सपने पलने दो सिंचित-प�
ज़िंदाँ-नसीब हूँ मिरे क़ाबू में सर नहीं
इक़बाल सुहैल
ज़िंदाँ-नसीब हूँ मिरे क़ाबू में सर नहीं मेरा सुजूद उन के लिए मो'तबर नहीं क्या है फ़रेब नर्गिस-ए-ग़म्माज़ अगर नहीं �
सदा फ़रियाद की आए कहीं से
इक़बाल सुहैल
सदा फ़रियाद की आए कहीं से वो ज़ालिम बद-गुमाँ होगा हमीं से ख़ुदा समझे बुत-ए-सेहर-आफ़रीं से गरेबाँ को लड़ाया आस्तीं �
असीरों में भी हो जाएँ जो कुछ आशुफ़्ता-सर पैदा
इक़बाल सुहैल
असीरों में भी हो जाएँ जो कुछ आशुफ़्ता-सर पैदा अभी दीवार-ए-ज़िंदाँ में हुआ जाता है दर पैदा किए हैं चाक-ए-दिल से बू-ए-ग�
पैग़ाम-ए-रिहाई दिया हर चंद क़ज़ा ने
इक़बाल सुहैल
पैग़ाम-ए-रिहाई दिया हर चंद क़ज़ा ने देखा भी न उस सम्त असीरान-ए-वफ़ा ने कह दूँगा जो की पुर्सिश-ए-आमाल ख़ुदा ने फ़ुर्�
उफ़ क्या मज़ा मिला सितम-ए-रोज़गार में
इक़बाल सुहैल
उफ़ क्या मज़ा मिला सितम-ए-रोज़गार में क्या तुम छुपे थे पर्दा-ए-लैल-ओ-नहार में सौ सज्दे एक लग़्ज़िश-ए-मस्ताना-वार मे�
अब दिल को हम ने बंदा-ए-जानाँ बना दिया
इक़बाल सुहैल
अब दिल को हम ने बंदा-ए-जानाँ बना दिया इक काफ़िर-ए-अज़ल को मुसलमाँ बना दिया दुश्वारियों को इश्क़ ने आसाँ बना दिया ग़
हुस्न-ए-फ़ितरत की आबरू मुझ से
इक़बाल सुहैल
हुस्न-ए-फ़ितरत की आबरू मुझ से आब ओ गिल में है रंग-ओ-बू मुझ से मेरे दम से बिना-ए-मय-ख़ाना हस्ती-ए-शीशा-ओ-सुबू मुझ से मु
ज़बानों पर नहीं अब तूर का फ़साना बरसों से
इक़बाल सुहैल
ज़बानों पर नहीं अब तूर का फ़साना बरसों से तजल्ली-गाह-ए-ऐमन है दिल-ए-दीवाना बरसों से कुछ ऐसा है फ़रेब-ए-नर्गिस-ए-मस्त
न रहा ज़ौक़-ए-रंग-ओ-बू मुझ को
इक़बाल सुहैल
न रहा ज़ौक़-ए-रंग-ओ-बू मुझ को अब न छेड़ ऐ बहार तू मुझ को अब अगर हैं कहीं तो दें आवाज़ क्यूँ फिराते हैं कू-ब-कू मुझ को �
जो तसव्वुर से मावरा न हुआ
इक़बाल सुहैल
जो तसव्वुर से मावरा न हुआ वो तो बंदा हुआ ख़ुदा न हुआ दिल अगर दर्द-आश्ना न हुआ नंग-ए-हस्ती हुआ हुआ न हुआ रूतबा-दाँ था
किसी से रिश्ता-ए-उम्मीद जोड़ता क्यों है
ज़ाहिद अबरोल
किसी से रिश्ता-ए-उम्मीद जोड़ता क्यों है लहू ख़ुद अपनी रगों का निचोड़ता क्यों है तिरे मिज़ाज की ग़फ़लत का जाएज़ा ल�
सोचता हूँ क्या था अब क्या हो गया
ज़ाहिद अबरोल
सोचता हूँ क्या था अब क्या हो गया इक समुंदर कैसे सहरा हो गया धज्जियाँ उड़ती रहीं तहज़ीब की पल में मेरा मुल्क नंगा ह�
छोड़ जा साथ मगर मेरी दुआ तू ले जा
ज़ाहिद अबरोल
छोड़ जा साथ मगर मेरी दुआ तू ले जा अपने रस्ते के लिए मेरा ख़ुदा तू ले जा मैं ने माना कि ख़ता कोई नहीं तुझ से हुई अपनी �
अपनों का दिल तोड़ के बाबा
ज़ाहिद अबरोल
अपनों का दिल तोड़ के बाबा क्यों आए घर छोड़ के बाबा पैसा पैसा माँग रहे हो पैसे से मुँह मोड़ के बाबा क्या ढूँडा था क�
इश्क़ का फूल तो सहरा में खिला करता है
ज़ाहिद अबरोल
इश्क़ का फूल तो सहरा में खिला करता है एक इक ज़र्रा जहाँ रश्क-ओ-दुआ करता है ये बुरा वक़्त ही नाज़िल हुआ सर पर वर्ना अ�
मोहब्बत तिश्नगी भी है नशा भी
ज़ाहिद अबरोल
मोहब्बत तिश्नगी भी है नशा भी सनम पत्थर भी है और है ख़ुदा भी फ़क़त इनआ'म ही देते रहे हो किसी ग़लती पे दो मुझ को सज़ा भ
दिल-रुबा दिलदार दिल-आरा न था
ज़ाहिद अबरोल
दिल-रुबा दिलदार दिल-आरा न था शहर में कोई तिरे जैसा न था ना-ख़ुदाई का वो रुत्बा ले गया उम्र भर पानी में जो उतरा न था �
लफ़्ज़ फिसला तिरे होंटों से हवा में उतरा
ज़ाहिद अबरोल
लफ़्ज़ फिसला तिरे होंटों से हवा में उतरा मेरा इल्हाम था जो तेरी सदा में उतरा नेक बंदों के लिए देर थी बस रोने में फि
बात ख़त्म किए बिना
प्रमोद कौंसवाल
मैं चुप क्यों हो गया बात के ख़त्म होते न होते या शायद मैं बात पूरी कर चुका कई लोग उठकर चले गए हैं कई को मेरी बात से ग
बहुत कम
प्रमोद कौंसवाल
बहुत कम कुछ दिख रहा है समझ आ रहा है कुछ बहुत ही कम आवाज़ें तो इसमें और भी धीमी हैं यही हुई कविता बहुत कम।
दूरियाँ
प्रमोद कौंसवाल
वहाँ मैं था मेरे साथ तुम एक बिनवा नदी भी बरसाती सबके सब कितने दूर बिनवा के लिए जैसे एक बरसात से दूसरी।
पहाड़ से मतलब
प्रमोद कौंसवाल
बहुत-सी चीज़ें मसलन ख़ामोशी कोई चीज़ है मैं कभी नहीं जान पाता अगर पैदा न हुआ होता पहाड़ में।
प्रेम
प्रमोद कौंसवाल
मैंने उसे छुआ उस तरह उतनी देर जैसे पत्ते को छूकर चुपचाप गिर जाए ओस की एक बूँद मुझे पता नहीं था ओस के गिरने के साथ इ
इच्छा
प्रमोद कौंसवाल
वहाँ जब मैं पहली बार पहुँचा तो पहली बार नहीं पहुँचा था कुछ चीज़ें स्पष्ट थीं एक आकर्षक छवि लेकिन थोड़ी-सी कालिमा �
यह सर्दी
प्रमोद कौंसवाल
यह सर्दी तुम्हारी बीतती होगी किसके साथ बताओ तो फूल पत्ती, पहाड़, मौसम किसी के साथ तो बताओ कहाँ किस घर में किस बच्चे
रूपिन और सूपिन
प्रमोद कौंसवाल
खिली हुई चाँदनी में बिखरा किसका बचपन किसको याद चाँदनी पेड़ों से छनकर आई या दीवार से मैं ही नहीं जानता अपने बचपन के
गेसू को तिरे रुख़ से बहम होने न देंगे
साग़र निज़ामी
गेसू को तिरे रुख़ से बहम होने न देंगे हम रात को ख़ुर्शीद में ज़म होने न देंगे ये दर्द तो आराम-ए-दो-आलम से सिवा है ऐ द�
दश्त में क़ैस नहीं कोह पे फ़रहाद नहीं
साग़र निज़ामी
दश्त में क़ैस नहीं कोह पे फ़रहाद नहीं है वही इश्क़ की दुनिया मगर आबाद नहीं ढूँढने को तुझे ओ मेरे न मिलने वाले वो चल
हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे
साग़र निज़ामी
हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे तुम ने बना दिया है मोहब्बत में क्या मुझे हर मंज़िल-ए-हयात से गुम कर गया मुझे मुड़
नदीम-ए-दर्द-ए-मोहब्बत बड़ा सहारा है
साग़र निज़ामी
नदीम-ए-दर्द-ए-मोहब्बत बड़ा सहारा है जभी तो ये ग़म-ए-दौराँ हमें गवारा है ज़माना कहता है हंगामा-ए-हयात जिसे मिरे हुजू
नग़्मे हवा ने छेड़े फ़ितरत की बाँसुरी में
साग़र निज़ामी
नग़्मे हवा ने छेड़े फ़ितरत की बाँसुरी में पैदा हुईं ज़बानें जंगल की ख़ामुशी में उस वक़्त की उदासी है देखने के क़ा�
न कश्ती है न फ़िक्र-ए-ना-ख़ुदा है
साग़र निज़ामी
न कश्ती है न फ़िक्र-ए-ना-ख़ुदा है दिल-ए-तूफ़ाँ-तलब का आसरा है इलाही ख़ैर नामूस-ए-वफ़ा की उन्हें भी फ़िक्र-ए-नामूस-ए-व
जो रहीन-ए-तग़य्युरात नहीं
साग़र निज़ामी
जो रहीन-ए-तग़य्युरात नहीं मौत है मौत वो हयात नहीं कुछ बहारों ही पे नहीं मौक़ूफ़ मेरी वहशत को भी सबात नहीं मसअले ह�
सदियों की शब-ए-ग़म को सहर हम ने बनाया
साग़र निज़ामी
सदियों की शब-ए-ग़म को सहर हम ने बनाया ज़र्रात को ख़ुर्शीद ओ क़मर हम ने बनाया तख़्लीक़ अंधेरों से किए हम ने उजाले हर
वह ज़िंदा होगा
आनन्द कुमार 'आनन्दम्'
भला कैसे कोई समझें मेरे किरदार को जब हो रही हो इम्तिहान प्यार की वह बेज़ुबान बेगुनाह था भरी महफ़िल में जिसे स्व�
नारी
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
ईश्वर की अनुपम, अद्भुत कृति, हे सावित्री! सीता, हे सती! हो रानी लक्ष्मी बाई तुम, काली बनकर के आई तुम॥ परहित करने वाल�
शिक्षक
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
बिना शिक्षकों के, कैसे होता इतिहास हमारा? क़दम-क़दम पर शिक्षक द्वारा लिखा अतीत ये सारा॥ शिष्य, शिक्षकों के निर्देशो�
हिन्दी
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
मिली एक महिला कल मुझको, सुस्त और रोई सी थी। किन्ही दुखों के कारण वो, अपने ग़म में खोई सी थी। माथे पर उसके मुकुट सजा, ज
सैनिकों को नमन
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
वे वहाँ पर देश की दीवार बनकर के खड़े हैं, दुश्मनों को क्या पता है, वीर पर्वत से अड़े हैं। जो कोई हथियार की धमकी दिया क
मानवीय प्रदूषण
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
आँखों को वह अब नोच रहा, मानव! अब भी क्या सोच रहा? तेरे ही हठ का कारण यह, है ख़तरनाक उच्चारण यह। वह कलयुग का खर दूषण है, �
स्वार्थी मनुष्य
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
मानव ने पूरी धरती पर, आधिपत्य है जमा लिया। पूरी पृथ्वी पर मानव ने, बस अपना घर बना लिया॥ यद्यपि ईश्वर ने मानव के– सा
फ़र्क़ है
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
फ़र्क़ है श्रीराम की जयकार करने में, और अपने तात की आज्ञा शिरोधार्य करने में, और सबके हित के कार्य करने में, फ़र्क़ है।
ओ तिरंगा
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
ओ तिरंगा! तेरी शान रहे, तेरी ख़ातिर, मेरी जान रहे। मेरे देश का अभिमान रहे, ओ तिरंगा! तेरी शान रहे। तेरी छाया के तले, प
आज़ादी का त्यौहार
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
तीन रंग से बना तिरंगा, आज इसे फहराएँगे। 'जन गण मन अधिनायक' सारे बच्चे मिलकर गाएँगे॥ भारत की है शान तिरंगा, हम सबकी �
प्रेम स्मृति
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
मेरी स्मृतियों में हो तुम, मैं तुम्हें भुला दूँगा कैसे? अपनी यादों की तिलांजलि, बोलो आख़िर दूँगा कैसे? जो साथ तुम्ह�
पिता
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
धरा पर जिसने हमको लाया, पकड़ के उँगली चलना सिखाया। पुरुष नहीं वह देव हैं, चरणों में जिनके संसार समाया। बिखरे ना कभ
प्रेम प्रसंग
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
मैं शीत संवर का प्रेमी हूँ तू आतप मुझे समझता है मैं सीधा साधा परवाना हूँ तू छलिया मुझको कहता है। मैं चलता हूँ जिन �
प्रेम सरोकार
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
मैं नंद गाँव का ग्वाला हूँ, तू बरसाने की राग प्रिये। मैं पुण्य भूमि का सरोवर हूँ, तू पुष्कर रूपी प्रेम प्रिये। मैं
मैं तेरे हृदय का कान्हा हूँ
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
तू मेरे सपनों की राधा जैसी, मैं तेरे हृदय का कान्हा हूँ। तू मेरे दर्द की औषधी जैसी, मैं तेरे अश्कों का दीवाना हूँ। �
विरह
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
विरह के इस घड़ी में, रो-रो कर मैं जीता हूँ, याद तेरी जब आती है, अश्रु विष पीता हूँ। याद तेरी जब आती हैं, हृदय में पीड़�
छात्र जीवन
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
ख़ुशियों की तलाश में ख़ुशियाँ छोड़ आए हम, कुछ करने की आस में हर स्वाँस छोड़ आए हम। दर्द कैसा है उर में यह मैं कैसे बता�
कर्मवीर
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
उठो मित्र कुछ कार्य करो, भाग्य पे ना विश्वास करो, उठो मित्र कुछ कार्य करो। कर्म तनिक भी किए नहीं, फल की इच्छा करते ह
माँ
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
हमारे हँसने से जो हँसती है, रोने से जो रोती है। है कौन भला इस दुनिया में, ऐसी एक माँ ही होती है। हर दुःख के साए को जिस
हाथ दिया इस ने मिरे हाथ में
क़तील शिफ़ाई
हाथ दिया इस ने मिरे हाथ में मैं तो वली बन गया इक रात में इश्क़ करोगे तो कमाओगे नाम तोहमतें बटती नहीं ख़ैरात में इश
अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ
क़तील शिफ़ाई
अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चा�
हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ
क़तील शिफ़ाई
हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ शीशे के महल बना रहा हूँ सीने में मिरे है मोम का दिल सूरज से बदन छुपा रहा हूँ महरूम-ए-नज़र
रास्ते याद नहीं राह-नुमा याद नहीं
क़तील शिफ़ाई
रास्ते याद नहीं राह-नुमा याद नहीं अब मुझे कुछ तिरी गलियों के सिवा याद नहीं फिर ख़यालों में वो बीते हुए सावन आए लेक�
यारो कहाँ तक और मोहब्बत निभाऊँ मैं
क़तील शिफ़ाई
यारो कहाँ तक और मोहब्बत निभाऊँ मैं दो मुझ को बद-दुआ' कि उसे भूल जाऊँ मैं दिल तो जला किया है वो शो'ला सा आदमी अब किस को
किया है प्यार जिसे हम ने ज़िंदगी की तरह
क़तील शिफ़ाई
किया है प्यार जिसे हम ने ज़िंदगी की तरह वो आश्ना भी मिला हम से अजनबी की तरह किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी छुपेग
हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता
क़तील शिफ़ाई
हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक़ से दरिय
चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल
क़तील शिफ़ाई
चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल इक तू ही धनवान है गोरी बाक़ी सब कंगाल हर आँगन में आए तेरे उजले रूप की धूप छैल-छ�
दिल जलता है शाम सवेरे
क़तील शिफ़ाई
दिल जलता है शाम सवेरे एक चराग़ और लाख अँधेरे भीगी पलकें नींद से ख़ाली चैन के दुश्मन रैन-बसेरे लोग समझते हैं सौदा�
प्यार की राह में ऐसे भी मक़ाम आते हैं
क़तील शिफ़ाई
प्यार की राह में ऐसे भी मक़ाम आते हैं सिर्फ़ आँसू जहाँ इंसान के काम आते हैं उन की आँखों से रखे क्या कोई उम्मीद-ए-करम
हो चुका इंतिज़ार सोने दे
क़तील शिफ़ाई
हो चुका इंतिज़ार सोने दे ऐ दिल-ए-बे-क़रार सोने दे मिट गईं रौनक़ें चराग़ों की लुट गए रहगुज़ार सोने दे आहटों के फ़र�
मिरी नज़र से न हो दूर एक पल के लिए
क़तील शिफ़ाई
मिरी नज़र से न हो दूर एक पल के लिए तिरा वजूद है लाज़िम मिरी ग़ज़ल के लिए कहाँ से ढूँढ के लाऊँ चराग़ सा वो बदन तरस गई �
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
क़तील शिफ़ाई
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं शम्अ' जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए हम उस�
तुम्हारे पाँव मेरी गोद में
धर्मवीर भारती
ये शरद के चाँद से उजले धुले-से पाँव, मेरी गोद में! ये लहर पर नाचते ताज़े कमल की छाँव, मेरी गोद में! दो बड़े मासूम बादल,
जाड़े की शाम
धर्मवीर भारती
जाड़े की हल्की बासंती दोपहरी ने ज़रतार धूप की चुनरी में मुँह छिपा लिया, हल्के नीले नभ की, उदास गहराई में तैरती हुई �
गुनाह का दूसरा गीत
धर्मवीर भारती
अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे महज़ इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कै�
कविता की मौत
धर्मवीर भारती
लाद कर ये आज किसका शव चले और उस छतनार बरगद के तले किस अभागिन का जनाज़ा है रुका बैठ इसके पाँयते गर्दन झुका कौन कहता ह
हरि वन्दना
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
जय हो तुम्हारी हे माधव मुरारी, जय हो सदा हे जग बलिहारी। सुमिरन तुम्हारी करता सदा हूँ, छाया में तुम्हारी रहता सदा हू
प्रेमिका
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
जन्मों का वादा था, राह में ही वो छोड़ गई। था नाज़ुक सा हृदय मेरा, जिसको वो तोड़ गई। प्राण‌ बसे‌ है तुझमें मेरे, ऐसी ब�
महावीर सूर्यपुत्र कर्ण
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
उठो पार्थ प्रहार करो, ये सूरज ढलने वाला है, क्षणिक तनिक तुम देर किए, तो रथ निकलने वाला है। यह गांडीव धरा रह जाएगा, ज�
महारथी कर्ण
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
श्रापों और छलों के मध्य, फँसा था वह वीर महान, सूर्यपुत्र कर्ण की गाथा, हर युग में अद्वितीय प्रमाण। धरती का पुत्र, रा
एक आवाज़ दो
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
प्रेम की बाँसुरी होठों से चूम लो, फूँक दो एक स्वर राग भर जाएँगे, बिन तुम्हारे रहे हम अधूरे सदा, एक आवाज़ दो पार कर जाए�
देर लगे पर आना तुम
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
बूँद-बूँद बरसात जब हो सावन की सौग़ात जब हो दिल के दरिया में डूबा कोई ख़्वाब नया सँवार जब हो मेघ घिरे जब धरा-सरोवर रं�
हौसलों की उड़ान
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
दर्द की आग में तपकर बनें हैं हम, हर मुश्किल से लड़कर बनें हैं हम। हौसले की उड़ान है अभी बाक़ी, मंज़िलें हासिल कर दिखाए�
वृष्टि
प्रभाकर माचवे
वर्षा, जिसने कर्षक को आकर्षा। स्वस्थ, मस्त बूँदों ने आकर, विपदग्रस्त धरती को स्पर्शा। सहसा जलमय हुए झील, रत्नाकर, �
राही से
प्रभाकर माचवे
इस मुसाफ़िरी का कुछ न ठिकाना, भइया! याँ हार बन गया अदना दाना, भइया। है पता न कितनी और दूर है मंज़िल हम ने तो जाना केवल
प्रेम : एक परिभाषा
प्रभाकर माचवे
प्रेम क्या किसी मृदूष्ण स्पर्श का भिखारी? प्रेम वो प्रपात गीत दिवारात गा रहा अशांत प्रेम आत्मा-विस्मृत पर लक्ष्य
कविता क्या है?
प्रभाकर माचवे
कविता क्या है? कहते हैं जीवन का दर्शन है—आलोचन, (वह कूड़ा जो ढँक देता है बचे-खुचे पत्रों में के स्थल)। कविता क्या है? �
छलना
प्रभाकर माचवे
हेमंती संध्या है, सूरज जल्दी ही डूबा जाता है— मन भी आज अकारज चिर-प्रवास से क्यों ऊबा जाता है? फ़सल कट गई, कहीं गड़रिया
वसंतागम
प्रभाकर माचवे
गा रे गा हरवाहे दिल चाहे वही तान खेतों में पका धान मंजरियों में फैला आमों का गंध-ध्यान आज बने हैं कल के ज्यों निशान
डरू संस्कृति
प्रभाकर माचवे
जो कुछ करना भाई वह सब करना, लेकिन डरते-डरते! जीना हो तो डरते-डरते, मरना लेकिन डरते-डरते! प्रेम करो तो चोरी-छुपके, देख-फ�
मेघ-मल्लार
प्रभाकर माचवे
मालव की संध्याएँ मेघल अवसाद-लदी! कोमल-मधु-याद बँधी— सजल, शीत, बह बयार। मन का सब व्यथा-भार बह चले निराधार निराकार... म
गेहूँ की सोच
प्रभाकर माचवे
काँप रहीं खेतों में गेहूँ की बालियाँ मेंड़ पर बैठा है भूमिजन चिलम पीता, खाँसता। सोचती हैं बालियाँ— ‘यहाँ से हमें �
देशोद्धारकों से
प्रभाकर माचवे
मृदुल नींद नीड़ की गोद में और परों की सेज नरम, बाहर झुलसी हवा बह रही रह-रह कर लू तेज़ गरम, बाहर अर्धनग्न पीड़ा, भीतर �
अज़-मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना
मिर्ज़ा ग़ालिब
अज़-मेहर ता-ब-ज़र्रा दिल-ओ-दिल है आइना तूती को शश-जिहत से मुक़ाबिल है आइना हैरत हुजूम-ए-लज़्ज़त-ए-ग़लतानी-ए-तपिश सी�
शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है
मिर्ज़ा ग़ालिब
शबनम ब-गुल-ए-लाला न ख़ाली ज़-अदा है दाग़-ए-दिल-ए-बेदर्द नज़र-गाह-ए-हया है दिल ख़ूँ-शुदा-ए-कशमकश-ए-हसरत-ए-दीदार आईना ब-द
आ कि मिरी जान को क़रार नहीं है
मिर्ज़ा ग़ालिब
आ कि मिरी जान को क़रार नहीं है ताक़त-ए-बेदाद-ए-इंतिज़ार नहीं है देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले नश्शा ब-अंदाज़ा-ए-�
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
मिर्ज़ा ग़ालिब
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए सर्फ़-ए-बहा-ए-मय हुए आलात-ए-मय-कशी थे ये ही दो हिसाब सो �
फिर कुछ इक दिल को बे-क़रारी है
मिर्ज़ा ग़ालिब
फिर कुछ इक दिल को बे-क़रारी है सीना जूया-ए-ज़ख़्म-ए-कारी है फिर जिगर खोदने लगा नाख़ुन आमद-ए-फ़स्ल-ए-लाला-कारी है क़�
जौर से बाज़ आए पर बाज़ आएँ क्या
मिर्ज़ा ग़ालिब
जौर से बाज़ आए पर बाज़ आएँ क्या कहते हैं हम तुझ को मुँह दिखलाएँ क्या रात दिन गर्दिश में हैं सात आसमाँ हो रहेगा कुछ �
कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
मिर्ज़ा ग़ालिब
कोई दिन गर ज़िंदगानी और है अपने जी में हम ने ठानी और है आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ सोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी और है
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं
मिर्ज़ा ग़ालिब
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं या'नी हमारे जेब में इक तार भी नहीं दिल को नियाज़-ए-हसरत-ए-दीदार कर चुके देखा तो ह�
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
मिर्ज़ा ग़ालिब
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ मे�
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मिर्ज़ा ग़ालिब
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही क़त्अ कीजे न तअल्लुक़ हम से कुछ नहीं है तो अदावत ही सही �
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले डरे क्यूँ मेरा क़ा�
मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें
मिर्ज़ा ग़ालिब
मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें चल निकलते जो मय पिए होते क़हर हो या बला हो जो कुछ हो काश के तुम मिरे लिए होते मेरी क
जहाँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं
मिर्ज़ा ग़ालिब
जहाँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं ख़याबाँ ख़याबाँ इरम देखते हैं दिल-आशुफ़्तगाँ ख़ाल-ए-कुंज-ए-दहन के सुवैदा में सैर
कोई उम्मीद बर नहीं आती
मिर्ज़ा ग़ालिब
कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअ'य्यन है नींद क्यूँ रात भर नहीं आती आगे आती थी हाल-ए-
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता हुआ जब ग़म से यूँ बे-हिस त�
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मिर्ज़ा ग़ालिब
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ जम्अ' करते हो क्यूँ रक़ीबों को इक तमाशा हुआ गिला न हुआ हम कहाँ
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मिर्ज़ा ग़ालिब
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ ज़ोफ़ में ताना-ए-अग़्यार का शिकव
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
मिर्ज़ा ग़ालिब
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता तिरे वा'दे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
मिर्ज़ा ग़ालिब
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार या इलाही ये माजरा क्या है म�
वृंदावन
हेमन्त शेष
किसी निर्धन बेवा की फटी हुई बिवाई की तरह मेरी आँख की एड़ी में रोज़ दरकता और दुखता है वृंदावन यह दृश्य : ज्यों भीख के लि
परछाईं
हेमन्त शेष
कल की परछाईं गिरती है आज की देह पर ज़रूरतें रोज़ झरती हैं पहने हुए कपड़ों पर काठ की नसैनी के नीचे एक पुराना पीला पत्ता
असहमति
हरीशचन्द्र पाण्डे
मैं अगर कहूँगा शून्य तो ढूँढ़ने लग जाएँगे बहुत से लोग बहुत कुछ इसलिए कहता हूँ ख़ालीपन जैसे बामियान में बुध्द प्र�
अधूरा मकान
हरीशचन्द्र पाण्डे
इसे दो कमरे का मकान बनना था फ़िलहाल एक कमरे के बाद काम बंद है जो कमरा अभी बनना है वह नक़्शे के हिसाब से बड़ा कमरा है ज�
खेल
हेमन्त शेष
अंतरिक्ष के मैदान में उड़ती पृथ्वी की फ़ुटबाल इसे ठोकर मारते हैं कुछ एटमी-पाँव स्टेडियम की तालियाँ हाहाकार में बद�
उम्मीदें
हेमन्त शेष
मेरे भीतर हाथ से छूट कर गिरता है एक कप मुझे भी बिखेरता मन के फ़र्श पर चला नहीं गया है सब कुछ सांत्वना में कहता अपने आ
यह एक दिन
हेमन्त शेष
यह एक दिन है बिल्कुल दिन कहा जा सके जिसे छतें सूनी पेड़ चुप हवा बंद और धूप शुरू करना है यहीं से नया जीवन बस थोड़ा-सा अ�
हवा नहीं हूँ, तब भी चला हूँ
हेमन्त शेष
खो चुके अक्षर पुराने, शब्द सारे गुम हूँ नहीं उस दृश्य में फिर भी नया हूँ कैसा ये संसार हमारे हृदयों को छीलता-सा मो�
अकेला होना
हेमन्त शेष
दृश्य में लौट कर पीछे छूटती सड़क पर फिर अचानक पेड़ घिरती आ रही है शाम पक्षी है कि कोई अधखुली-सी गाँठ? सोचता हूँ मै�
वही पत्थर
हेमन्त शेष
हाँ, वही पत्थर जो कभी टूटता था महाकवि के हृदय पर मैं भी शमशेर बहादुर सिंह के पत्थर को थोड़ा-बहुत जानता हूँ अगर एक कव�
इतना पास अपने
हेमन्त शेष
इतना पास अपने कि बस धुँध में हूँ गिर गए सारे पराजित-पत्र वृक्ष-साधु और चीलें, हतप्रभ! 'हो कहाँ अब लौट आओ'—सुन रहा अपन�
कविता-असंभव
हेमन्त शेष
किसी भी रंग को आप नहीं कह सकते लाल लाल होने के लिए ज़रूरी है उसका लाल होना कविता होने के लिए भी लाल वाली बात सच है।
पूर्णिमा
हेमन्त शेष
चाँद एक पुरानी पीली बड़ी-सी गेंद नहीं चंद्रमा है सौ प्रतिशत तारे आकाश की सिगड़ी में सुलगते अंगारे नहीं सिर्फ़ तारे �
ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम
आलोक श्रीवास्तव
ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम मिलते हैं रो�
रोज़ ख़्वाबों में आ के चल दूँगा
आलोक श्रीवास्तव
रोज़ ख़्वाबों में आ के चल दूँगा तेरी नींदों में यूँ ख़लल दूँगा मैं नई शाम की अलामत हूँ ख़ाक सूरज के मुँह पे मल दूँग
ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं
आलोक श्रीवास्तव
ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बे-ख़बर नहीं अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया मैं
अगर सफ़र में मिरे साथ मेरा यार चले
आलोक श्रीवास्तव
अगर सफ़र में मिरे साथ मेरा यार चले तवाफ़ करता हुआ मौसम-ए-बहार चले लगा के वक़्त को ठोकर जो ख़ाकसार चले यक़ीं के क़ाफ
वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है
आलोक श्रीवास्तव
वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है अकेला जब भी होता हूँ मुझे घर याद आता है मिरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बतात
मुझे सिरे से पकड़ कर उधेड़ देती है
आलोक श्रीवास्तव
मुझे सिरे से पकड़ कर उधेड़ देती है मैं एक झूट वो सच्चे सुबूत जैसी है मैं रोज़ रोज़ तबस्सुम में छुपता फिरता हूँ उदा�
मंज़िल पे ध्यान हम ने ज़रा भी अगर दिया
आलोक श्रीवास्तव
मंज़िल पे ध्यान हम ने ज़रा भी अगर दिया आकाश ने डगर को उजालों से भर दिया रुकने की भूल हार का कारन न बन सकी चलने की धुन
जिन बातों को कहना मुश्किल होता है
आलोक श्रीवास्तव
जिन बातों को कहना मुश्किल होता है उन बातों को सहना मुश्किल होता है इस दुनिया में रह कर हम ने ये जाना इस दुनिया में �
तू वफ़ा कर के भूल जा मुझ को
आलोक श्रीवास्तव
तू वफ़ा कर के भूल जा मुझ को अब ज़रा यूँ भी आज़मा मुझ को ये ज़माना बुरा नहीं है मगर अपनी नज़रों से देखना मुझ को बे-सद
जब भी तक़दीर का हल्का सा इशारा होगा
आलोक श्रीवास्तव
जब भी तक़दीर का हल्का सा इशारा होगा आसमाँ पर कहीं मेरा भी सितारा होगा दुश्मनी नींद से कर के हूँ पशेमानी में किस तर�
तुम्हारे पास आते हैं तो साँसें भीग जाती हैं
आलोक श्रीवास्तव
तुम्हारे पास आते हैं तो साँसें भीग जाती हैं मोहब्बत इतनी मिलती है कि आँखें भीग जाती हैं तबस्सुम इत्र जैसा है हँसी
झिलमिलाते हुए दिन-रात हमारे ले कर
आलोक श्रीवास्तव
झिलमिलाते हुए दिन-रात हमारे ले कर कौन आया है हथेली पे सितारे ले कर हम उसे आँखों की देहरी नहीं चढ़ने देते नींद आती न
फ़ज़ा में कैसी उदासी है क्या कहा जाए
मख़मूर सईदी
फ़ज़ा में कैसी उदासी है क्या कहा जाए 'अजीब शाम ये गुज़री है क्या कहा जाए कई गुमान हमें ज़िंदगी पे गुज़रे हैं ये अजन
ग़म ओ नशात की हर रहगुज़र में तन्हा हूँ
मख़मूर सईदी
ग़म ओ नशात की हर रहगुज़र में तन्हा हूँ मुझे ख़बर है मैं अपने सफ़र में तन्हा हूँ मुझी पे संग-ए-मलामत की बारिशें होंग�
लजा लजा के सितारों से माँग भरती है
मख़मूर सईदी
लजा लजा के सितारों से माँग भरती है उरूस-ए-शाम ये किस के लिए सँवरती है वो अपनी शोख़ी-ए-रफ़्तार-ए-नाज़ में गुम है उसे ख
न रस्ता न कोई डगर है यहाँ
मख़मूर सईदी
न रस्ता न कोई डगर है यहाँ मगर सब की क़िस्मत सफ़र है यहाँ सुनाई न देगी दिलों की सदा दिमाग़ों में वो शोर-ओ-शर है यहाँ
मुद्दतों बाद हम किसी से मिले
मख़मूर सईदी
मुद्दतों बाद हम किसी से मिले यूँ लगा जैसे ज़िंदगी से मिले इस तरह कोई क्यूँ किसी से मिले अजनबी जैसे अजनबी से मिले �
कसक पुराने ज़माने की साथ लाया है
मख़मूर सईदी
कसक पुराने ज़माने की साथ लाया है तिरा ख़याल कि बरसों के बाद आया है किसी ने क्यूँ मिरे क़दमों तले बिछाया है वो रास्�
सीने में कसक बन के उतरने के लिए है
मख़मूर सईदी
सीने में कसक बन के उतरने के लिए है हर लम्हा-ए-हासिल कि गुज़रने के लिए है सँवरेगा न इस शाम सर-ए-आईना कोई ये शाम तो तेर�
याद फिर भूली हुई एक कहानी आई
मख़मूर सईदी
याद फिर भूली हुई एक कहानी आई दिल हुआ ख़ून तबीअत में रवानी आई सुब्ह-ए-नौ नग़्मा-ब-लब है मगर ऐ डूबती रात मेरे हिस्से म�
ग़म से जब आगही नहीं होती
मख़मूर सईदी
ग़म से जब आगही नहीं होती ख़ुश भी रह कर ख़ुशी नहीं होती जब तवज्जोह तिरी नहीं होती ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं होती उफ़ व�
कितनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियाँ
मख़मूर सईदी
कितनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियाँ घर कहीं गुम हो गया दीवार-ओ-दर के दरमियाँ कौन अब इस शहर में किस की ख़बर-गीरी क�
क्यों हो गए हक़ीर ख़ुद अपनी निगाह में
मख़मूर सईदी
क्यों हो गए हक़ीर ख़ुद अपनी निगाह में क्या देख आए हम ये तिरी जल्वा-गाह में क्या क्या गुमाँ हैं हम पे हमारी निगाह को
मकीनों को तरसता हर मकाँ है
मख़मूर सईदी
मकीनों को तरसता हर मकाँ है मगर अब शहर में अम्न-ओ-अमाँ है लुटी क्यों दिन-दहाड़े घर की पूँजी जो इस घर का मुहाफ़िज़ था �
हनुमान
सुशील कुमार
सीय हरी जब रावण सिंधु को लांघि मिलाए दिए बजरंगी। रावण के अभिमान गुमान का लंक जलाए दिए बजरंगी॥ प्रश्न उठा जब राम की �
माँ नव दुर्गा पचासा
सुशील कुमार
दोहा:- मातु पिता गुरु नाय सिर, प्रथम मनाय गणेश। कारज आय सॅंवारिए, बह्मा, विष्णु, महेश॥ जय जय माँ जगदम्बिका, करो कंठ म
प्रेम
सुशील कुमार
प्रेम न होत जो भ्रात को भ्रात से तौ पद त्राण न राज चलाते। प्रेम न होत जो भक्त से ईश को तौ शबरी फल जूठ न खाते॥ प्रेम न ह�
बोलो जय श्री राम
सुशील कुमार
मर्यादा पुरुषोत्तम आए देखो अपने धाम सब जन मिलकर बोलो जय श्री राम दुल्हन जैसी सजी अयोध्या दर्शन को ललसाई राम मिलन
एक बार प्रिये
सुशील कुमार
तुझपे तन मन सब वारु मैं बस तुझको अपना मानू मैं जीवन की सारी ख़ुशियाँ कर दूँ तुझपे न्योछार प्रिये तू कह दे बस एक बार प
जय जय हो भारत माता
सुशील कुमार
हिमगिरि से बहता पानी नदियों की कल कल ध्वनियाँ मन देख देख हर्षाता बागों की कुसमित कलियाँ आनन्द भाव भर मन में गाथा �
सीता
सुशील कुमार
राम गए वनवास तो राम के साथ में साथ निभा गई सीता, प्रेम पुनीत चराचर में सचराचार को बतला गई सीता। सीय को सीय बनाया जो र�
अपूर्ण नव वर्ष
सुशील कुमार
किंचित मन में उत्कर्ष नहीं, ये हो सकता नव वर्ष नहीं है स्याह धुँध से भरी रात ख़ुशियों की कोई नहीं बात धरती अम्बर ये �
नववर्ष की शुभकामना
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
हे प्रभु! नव वर्ष में गिरते हुओं को थामना। है यही नव वर्ष की मंगलमयी शुभकामना॥ भूख से पीड़ित शिशु, जिनको नहीं मिलत�
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते
राहत इन्दौरी
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज
बुलाती है मगर जाने का नइं
राहत इन्दौरी
बुलाती है मगर जाने का नइं वो दुनिया है उधर जाने का नइं सितारे नोच कर ले जाऊँगा मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नइं मिरे ब�
दोस्ती जब किसी से की जाए
राहत इन्दौरी
दोस्ती जब किसी से की जाए दुश्मनों की भी राय ली जाए मौत का ज़हर है फ़ज़ाओं में अब कहाँ जा के साँस ली जाए बस इसी सोच म
दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं
राहत इन्दौरी
दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं सब अपने चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे हम अपने घ
सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए
राहत इन्दौरी
सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी �
कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो
राहत इन्दौरी
कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो ये सब तुम्हारे ही घर हैं किसी भी घर में रहो जला न लो कहीं हमदर्दियों में अपना वज
कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे
राहत इन्दौरी
कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उस का इर�
लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं
राहत इन्दौरी
लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं मय-कदा ज़र्फ़ के मेआ'र का पैम�
चराग़ों का घराना चल रहा है
राहत इन्दौरी
चराग़ों का घराना चल रहा है हवा से दोस्ताना चल रहा है जवानी की हवाएँ चल रही हैं बुज़ुर्गों का ख़ज़ाना चल रहा है मि�
सबब वो पूछ रहे हैं उदास होने का
राहत इन्दौरी
सबब वो पूछ रहे हैं उदास होने का मिरा मिज़ाज नहीं बे-लिबास होने का नया बहाना है हर पल उदास होने का ये फ़ाएदा है तिरे �
रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
राहत इन्दौरी
रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है एक दीवाना मुसाफ़िर है मिरी आँखों में
न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा
राहत इन्दौरी
न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर तिरा �
घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है
राहत इन्दौरी
घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो इस मु�
मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं
राहत इन्दौरी
मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझ को वहा
देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना
हसरत मोहानी
देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुस्वा करना इक नज़र भी तिरी काफ़ी थी प-ए-राहत-ए-जाँ क�
दर्द-ए-दिल की उन्हें ख़बर न हुई
हसरत मोहानी
दर्द-ए-दिल की उन्हें ख़बर न हुई कोई तदबीर कारगर न हुई कोशिशें हम ने कीं हज़ार मगर इश्क़ में एक मो'तबर न हुई कर चुके
यूँ तो आशिक़ तिरा ज़माना हुआ
हसरत मोहानी
यूँ तो आशिक़ तिरा ज़माना हुआ मुझ सा जाँ-बाज़ दूसरा न हुआ ख़ुद-ब-ख़ुद बू-ए-यार फैल गई कोई मिन्नत-कश-ए-सबा न हुआ मैं ग�
दिल को ख़याल-ए-यार ने मख़्मूर कर दिया
हसरत मोहानी
दिल को ख़याल-ए-यार ने मख़्मूर कर दिया साग़र को रंग-ए-बादा ने पुर-नूर कर दिया मानूस हो चला था तसल्ली से हाल-ए-दिल फिर �
और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है
हसरत मोहानी
और तो पास मिरे हिज्र में क्या रक्खा है इक तिरे दर्द को पहलू में छुपा रक्खा है दिल से अरबाब-ए-वफ़ा का है भुलाना मुश्क
वो चुप हो गए मुझ से क्या कहते कहते
हसरत मोहानी
वो चुप हो गए मुझ से क्या कहते कहते कि दिल रह गया मुद्दआ कहते कहते मिरा इश्क़ भी ख़ुद-ग़रज़ हो चला है तिरे हुस्न को ब�
क़िस्मत-ए-शौक़ आज़मा न सके
हसरत मोहानी
क़िस्मत-ए-शौक़ आज़मा न सके उन से हम आँख भी मिला न सके हम से याँ रंज-ए-हिज्र उठ न सका वाँ वो मजबूर थे वो आ न सके डर ये थ�
रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम
हसरत मोहानी
रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम दहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम हैरत ग़ुरूर-ए-हुस्न से शोख़ी से इज़्तिराब दिल �
चाहत मिरी चाहत ही नहीं आप के नज़दीक
हसरत मोहानी
चाहत मिरी चाहत ही नहीं आप के नज़दीक कुछ मेरी हक़ीक़त ही नहीं आप के नज़दीक कुछ क़द्र तो करते मिरे इज़हार वफ़ा की शा�
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
हसरत मोहानी
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं इलाही तर्क-ए-उल्फ़त पर वो क्यूँकर याद आते हैं न छेड़ ऐ हम-नशीं कैफ़िय्यत-ए-स�
न सही गर उन्हें ख़याल नहीं
हसरत मोहानी
न सही गर उन्हें ख़याल नहीं कि हमारा भी अब वो हाल नहीं याद उन्हें वादा-ए-विसाल नहीं कब किया था यही ख़याल नहीं ऐसे ब�
अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम
हसरत मोहानी
अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम घबरा गए हैं बे-दिली-ए-हमरहाँ से हम कुछ ऐसी दूर भी तो नहीं मंज़िल-ए-मुराद लेकिन
उन को रुस्वा मुझे ख़राब न कर
हसरत मोहानी
उन को रुस्वा मुझे ख़राब न कर ऐ दिल इतना भी इज़्तिराब न कर आमद-ए-यार की उमीद न छोड़ देख ऐ आँख मैल-ए-ख़्वाब न कर मिल ही
आप ने क़द्र कुछ न की दिल की
हसरत मोहानी
आप ने क़द्र कुछ न की दिल की उड़ गई मुफ़्त में हँसी दिल की ख़ू है अज़-बस कि आशिक़ी दिल की ग़म से वाबस्ता है ख़ुशी दिल �
रोग दिल को लगा गईं आँखें
हसरत मोहानी
रोग दिल को लगा गईं आँखें इक तमाशा दिखा गईं आँखें मिल के उन की निगाह-ए-जादू से दिल को हैराँ बना गईं आँखें मुझ को दिख�
तुझ से गिरवीदा यक ज़माना रहा
हसरत मोहानी
तुझ से गिरवीदा यक ज़माना रहा कुछ फ़क़त मैं ही मुब्तला न रहा आप को अब हुई है क़द्र-ए-वफ़ा जब कि मैं लाइक़-ए-जफ़ा न रहा
हर हाल में रहा जो तिरा आसरा मुझे
हसरत मोहानी
हर हाल में रहा जो तिरा आसरा मुझे मायूस कर सका न हुजूम-ए-बला मुझे हर नग़्मे ने उन्हीं की तलब का दिया पयाम हर साज़ ने उ
निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे
हसरत मोहानी
निगाह-ए-यार जिसे आश्ना-ए-राज़ करे वो अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत पे क्यूँ न नाज़ करे दिलों को फ़िक्र-ए-दो-आलम से कर दिया आज�
तिरे दर्द से जिस को निस्बत नहीं है
हसरत मोहानी
तिरे दर्द से जिस को निस्बत नहीं है वो राहत मुसीबत है राहत नहीं है जुनून-ए-मोहब्बत का दीवाना हूँ मैं मिरे सर में सौद
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हसरत मोहानी
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्�
तालिब-ए-दीद पे आँच आए ये मंज़ूर नहीं
सफ़ी लखनवी
तालिब-ए-दीद पे आँच आए ये मंज़ूर नहीं दिल में है वर्ना वो बिजली जो सर-ए-तूर नहीं दिल से नज़दीक हैं आँखों से भी कुछ दूर
तड़प के रात बसर की जो इक मुहिम सर की
सफ़ी लखनवी
तड़प के रात बसर की जो इक मुहिम सर की छुरी थी मेरे लिए जो शिकन थी बिस्तर की अरक़ अरक़ हैं जो गर्मी से रोज़-ए-महशर की प�
जाना जाना जल्दी क्या है इन बातों को जाने दो
सफ़ी लखनवी
जाना जाना जल्दी क्या है इन बातों को जाने दो ठहरो ठहरो दिल तो ठहरे मुझ को होश में आने दो पाँव निकालो ख़ल्वत से आए जो �
कोई आबाद मंज़िल हम जो वीराँ देख लेते हैं
सफ़ी लखनवी
कोई आबाद मंज़िल हम जो वीराँ देख लेते हैं ब-हसरत सू-ए-चर्ख़-ए-फ़ित्ना-सामाँ देख लेते हैं नज़र हुस्न आश्ना ठहरी वो ख़�
पैग़ाम ज़िंदगी ने दिया मौत का मुझे
सफ़ी लखनवी
पैग़ाम ज़िंदगी ने दिया मौत का मुझे मरने के इंतिज़ार में जीना पड़ा मुझे इस इंक़लाब की भी कोई हद है दोस्तो ना-आश्ना �
आज़ादी की गाथा
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
स्वतंत्रता के सूरज की, रश्मियाँ बिखरी हैं चहुँओर, वीरों के बलिदान से सजी, ये धरती गाती है गीत और। लहू से रंगी थी ये
बोझ, ज़िम्मेदारी और राखी का धागा
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
है बोझ बड़ा भारी सिर पर, ज़िम्मेदारियों का भार उठाए, हर साँस में है एक नई जंग, पर दिल है तुम्हारे नाम का साए। नाराज़ न �
माँ भाषा हिंदी
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
हिंदी है वो ममता की छाँव, जो हर दिल में बसती है, आँगन की वो मीठी बोली, जो होठों पर सजती है। गंगा सी निर्मल, सरल, हर पग �
वृक्ष
उदयन वाजपेयी
वृक्ष में यह किसका सिसकना है जिसे पक्षी दिन-रात दानों की तरह चुगते हैं, जिसे पत्ते अपनी सरसर से निरंतर ढाँके रखते है
हम तो रूठे थे आज़माने को
फ़हमी बदायूनी
हम तो रूठे थे आज़माने को कोई आया नहीं मनाने को जाने क्या बैर है ज़माने को फल समझता है आशियाने को पारसाओं ने ग़ौर स
नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं
फ़हमी बदायूनी
नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं हमारे ज़ख़्म वर्ज़िश कर रहे हैं सुनो लोगों को ये शक हो गया है कि हम जीने की साज़िश कर र�
बिटिया को देख कर
नरेन्द्र पुण्डरीक
शादी के बाद पहली बार घर आई बिटिया को देखकर मैं भाँप लेना चाहता था कि जिस घर में बिटिया गई है घर का आँगन इतना तो है न क
अब तो लगता है
नरेन्द्र पुण्डरीक
हम लड़कों का प्रिय खेल था छुपा-छुपौवल क्योंकि इसमें अक्सर ही छुपा लेते थे हम बड़ों की आँखों से अपनी आँखों के रंग ह�
बनारस
नरेन्द्र पुण्डरीक
(1) बनारस तो मैं कई बार गया इस बार भी गया बनारस बनारस से अच्छा लगा मुझे सारनाथ क्योंकि मुझे स्कूल की किताबों में बना�
आधा है चंद्रमा रात आधी
भरत व्यास
आधा है चंद्रमा रात आधी रह न जाए तेरी मेरी बात आधी, मुलाक़ात आधी आधा है चंद्रमा... आस कब तक रहेगी अधूरी प्यास होगी नह�
जीवन में पिया तेरा साथ रहे
भरत व्यास
जीवन में पिया तेरा साथ रहे हाथों में तेरे मेरा हाथ रहे जीवन में पिया तेरा साथ रहे जब तक सूरज चन्दा चमके गंगा जमुना
मैं गाऊँ तू चुप हो जा
भरत व्यास
मैं गाऊँ तू चुप हो जा मैं गाऊँ तू चुप हो जा मैं जागूँ रे तू सो जा धरती की काया सोई अंबर की माया सोई झिलमिल तारों के न
ज्योत से ज्योत जगाते चलो
भरत व्यास
ज्योत से ज्योत जगाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो राह में आए जो दीन दुखी, सबको गले से लगाते चलो जिसका न कोई संगी साथ�
ऐ मालिक तेरे बंदे हम
भरत व्यास
ऐ मालिक तेरे बंदे हम ऐसे हो हमारे करम नेकी पर चलें और बदी से टलें ताकि हँसते हुए निकले दम जब ज़ुलमों का हो सामना त�
यही मौक़ा है ज़माने से गुज़र जाने का
शाद अज़ीमाबादी
यही मौक़ा है ज़माने से गुज़र जाने का क्यूँ अजल क्या किया सामाँ मिरे मर जाने का क्या कहूँ नज़्अ' में मैं अपनी ख़मोश�
काबा भी है टूटा हुआ बुत-ख़ाना हमारा
शाद अज़ीमाबादी
काबा भी है टूटा हुआ बुत-ख़ाना हमारा यारब रहे आबाद ये वीराना हमारा बातिन की तरह पाक है ख़ुम-ख़ाना हमारा क्यूँ कर न अ
था अजल का मैं अजल का हो गया
शाद अज़ीमाबादी
था अजल का मैं अजल का हो गया बीच में चौंका तो था फिर सो गया लुत्फ़ तो ये है कि आप अपना नहीं जो हुआ तेरा वो तेरा हो गया
हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़
शाद अज़ीमाबादी
हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़ जब कुछ ग़रज़ नहीं तो ज़माने से क्या ग़रज़ फैला के हाथ मुफ़्त में होंगे ज़लील �
हज़ार हैफ़ छुटा साथ हम-नशीनों का
शाद अज़ीमाबादी
हज़ार हैफ़ छुटा साथ हम-नशीनों का मकाँ तो है पे ठिकाना नहीं मकीनों का खिला जो बाग़ में ग़ुंचा सितारा-दार खिला गुलो�
हो के ख़ुश नाज़ हम ऐसों के उठाने वाला
शाद अज़ीमाबादी
हो के ख़ुश नाज़ हम ऐसों के उठाने वाला कोई बाक़ी न रहा अगले ज़माने वाला ख़्वाब तक में भी नज़र आता नहीं ऐ चश्म मेरे र�
ऐ बुत जफ़ा से अपनी लिया कर वफ़ा का काम
शाद अज़ीमाबादी
ऐ बुत जफ़ा से अपनी लिया कर वफ़ा का काम बंदों के काम आ कि यही है ख़ुदा का काम किस जा था क़स्द शौक़ ने पहुँचा दिया किधर
अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया
शाद अज़ीमाबादी
अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया मुज़्दा ऐ रूह तुझे इश्क़ सा दम-साज़ आया
अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा
शाद अज़ीमाबादी
अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा तो मैं मरने से दर-गुज़रा मिरे किस काम आएगा उसे भी ठान रख साक़ी यक़ीं होगा न रिंदो�
न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना
शाद अज़ीमाबादी
न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना हम अपना जानते हर चीज़ को होता जो यार अपना जमे किस तरह इस हैरत-कदे में ए'तिब
जब किसी ने हाल पूछा रो दिया
शाद अज़ीमाबादी
जब किसी ने हाल पूछा रो दिया चश्म-ए-तर तू ने तो मुझ को खो दिया दाग़ हो या सोज़ हो या दर्द-ओ-ग़म ले लिया ख़ुश हो के जिस न�
कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था
शाद अज़ीमाबादी
कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था मरते मरते होश बाक़ी तेरे दीवाने में था हाए वो ख़ुद-रफ़्तगी उलझे हुए
ग़म-ए-फ़िराक़ मय ओ जाम का ख़याल आया
शाद अज़ीमाबादी
ग़म-ए-फ़िराक़ मय ओ जाम का ख़याल आया सफ़ेद बाल लिए सर पे इक वबाल आया मिलेगा ग़ैर भी उन के गले ब-शौक़ ऐ दिल हलाल करने म�
ता-उम्र आश्ना न हुआ दिल गुनाह का
शाद अज़ीमाबादी
ता-उम्र आश्ना न हुआ दिल गुनाह का ख़ालिक़ भला करे तिरी तिरछी निगाह का तन्हा मज़ा उठाता है दिल रस्म-ओ-राह का बीना तो �
किस बुरी साअत से ख़त ले कर गया
शाद अज़ीमाबादी
किस बुरी साअत से ख़त ले कर गया नामा-बर अब तक न आया मर गया जाते ही दिल उस गली में मर गया मरने वाला बेवफ़ाई कर गया दिल �
तन्हा है चराग़ दूर परवाने हैं
शाद अज़ीमाबादी
तन्हा है चराग़ दूर परवाने हैं अपने थे जो कल आज वो बेगाने हैं बे-रंगी-ए-दुनिया का न पूछो अहवाल क़िस्से हैं कहानियाँ �
बदले न सदाक़त का निशाँ एक रहे
शाद अज़ीमाबादी
बदले न सदाक़त का निशाँ एक रहे हर हाल में पिन्हाँ ओ निहाँ एक रहे इंसाँ है वही जो इस दौर-ए-दो-रंगी से बचे लाज़िम है कि द�
तारीफ़ बताऊँ शेर की क्या क्या है
शाद अज़ीमाबादी
तारीफ़ बताऊँ शेर की क्या क्या है नग़्मों की सदाक़त इस से ख़ुद पैदा है असलियत-ए-हाल जिस से मख़्फ़ी रह जाए हुशियार कि
चालाक हैं सब के सब बढ़ते जाते हैं
शाद अज़ीमाबादी
चालाक हैं सब के सब बढ़ते जाते हैं अफ़्लाक-ए-तरक़्क़ी पे चढ़ते जाते हैं मकतब बदला किताब बदली लेकिन हम एक वही सबक़ पढ
मज़मूँ मेरे दिल में बे-तलब आते हैं
शाद अज़ीमाबादी
मज़मूँ मेरे दिल में बे-तलब आते हैं क़ुदसी तबक़-ए-नूर में दबे जाते हैं कुछ और नहीं इल्म मुझे इस के सिवा कहता हूँ वही ज
हर हाल में आबरू-ए-फ़न लाज़िम है
शाद अज़ीमाबादी
हर हाल में आबरू-ए-फ़न लाज़िम है तक़लीद-ए-फ़सीहान-ए-वतन लाज़िम है दरयूज़ा-गरी है ऐब सुन लें अहबाब आप-अपनी ज़बान में स�
शोला-ए-इश्क़ बुझाना भी नहीं चाहता है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
शोला-ए-इश्क़ बुझाना भी नहीं चाहता है वो मगर ख़ुद को जलाना भी नहीं चाहता है उस को मंज़ूर नहीं है मिरी गुमराही भी और �
चराग़ देने लगेगा धुआँ न छू लेना
इरफ़ान सिद्दीक़ी
चराग़ देने लगेगा धुआँ न छू लेना तू मेरा जिस्म कहीं मेरी जाँ न छू लेना ज़मीं छुटी तो भटक जाओगे ख़लाओं में तुम उड़ते
उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
इरफ़ान सिद्दीक़ी
उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया मिरे सफ़ी�
वसंत के बारे में कविता
अनुज लुगुन
वसंत के बारे में कविता लिखने के लिए एक कवि भँवरे की सवारी पर चढ़ा और वह धम्म से गिर पड़ा एक कवि अपनी प्रेमिका की गोद मे
यह पलाश के फूलने का समय है
अनुज लुगुन
(1) जंगल में कोयल कूक रही है जाम की डालियों पर पपीहे छुआ-हुई खेल रहे हैं गिलहरियों की धमा-चौकड़ी पंडुकों की नींद तोड�
चूल्हों की दुनिया
अनुज लुगुन
हम चूल्हों की दुनिया से आए थे जहाँ चूल्हों के लिए आग थी आग के लिए लकड़ी थी लकड़ी के लिए पेड़ थे पेड़ों के लिए जंगल था
बहेलिया का खेल
अनुज लुगुन
कुछ तोतों ने ठान लिया था सब फल हो जाएँ अमरूद कुछ बग़ुलों ने ज़िद लड़ाई सब मेंढक हो जाएँ मछली कुछ बाज़ ने दम ठोका सब मुर�
ग्लोब
अनुज लुगुन
मेरे हाथ में क़लम थी और सामने विश्व का मानचित्र मैं उसमें महान दार्शनिकों और लेखकों की पंक्तियाँ ढूँढ़ने लगा जिन
लकड़हारे की पीठ
अनुज लुगुन
जलती हुई लकड़ियों का गट्ठर है मेरी पीठ पर और तुम मुझे बाँहों में भरना चाहती हो मैं कहता हूँ— तुम भी झुलस जाओगी मे�
पत्थलगड़ी
अनुज लुगुन
हिंदी में लोगों ने एक मुहावरा बनाया—पत्थर फेंकना हिंदी के एक कवि ने लिखा ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ लोगों ने एक फ़िलस्ती�
तुम अगर आओ
अनुज लुगुन
अगर तुम आना चाहो तो आओ पहाड़ियों पर एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए भोर के सूरज की तरह और लीप दो हमारे आँगन में उजासपन के गोबर अ�
बहुत कम बच रहा है ऑक्सीजन
अनुज लुगुन
बहुत कम बच रहा है ऑक्सीजन नाक में मास्क लगाकर तो रोज़ जिया नहीं जा सकता और न ही इसके लिए घर में दुबक कर बैठा जा सकता ह
मैं गीत गाना चाहता हूँ
अनुज लुगुन
मैं घायल शिकारी हूँ मेरे साथी मारे जा चुके हैं हमने छापामारी की थी जब हमारी फ़सलों पर जानवरों ने धावा बोला था हमने
मेरी माँ, मैं और भेड़िए
अनुज लुगुन
उसके दरवाज़े हमेशा जंगल की ओर खुलते रहे और वह बीहड़ों में चलती रही भेड़ियों की पदचाप सबसे पहले वही सुनती है आज भी इस�
औरत की प्रतीक्षा में चाँद
अनुज लुगुन
उस रात आसमान को एकटक ताकते हुए वह ज़मीन पर अपने बच्चों और पति के साथ लेटी हुई थी उसने देखा आसमान स्थिर, शांत और सूने
चाँद चौरा का मोची
अनुज लुगुन
चाँद चौरा का मोची चाँद की टहनी पर अटका है वह कभी भी गिर सकता है अनंत अमावस्या की रात में कितनी अजीब बात है कि चाँदन�
निज स्वदेश ही
श्रीधर पाठक
निज स्वदेश ही एक सर्व-पर ब्रह्म-लोक है। निज स्वदेश ही एक सर्व-पर अमर-ओक है। निज स्वदेश विज्ञान-ज्ञान-आनंद-धाम है। न�
सुंदर भारत
श्रीधर पाठक
(1) भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है शुचि भाल पै हिमाचल, चरणों पै सिंधु-अंचल उर पर विशाल-सरिता-सित-हीर-हार-चंचल मणि-ब
मनू जी
श्रीधर पाठक
मनू जी तुमने यह क्या किया? किसी को पौन, किसी को पूरा, किसी को आधा दिया सरस प्रीति के थल में बोया बिस-अनीति का बिया लु�
उठो भई उठो
श्रीधर पाठक
हुआ सवेरा जागो भैया, खड़ी पुकारे प्यारी मैया। हुआ उजाला छिप गए तारे, उठो मेरे नयनों के तारे। चिड़िया फुर-फुर फिरती
हिंद-वंदना
श्रीधर पाठक
जय देश हिंद, जय देशेश हिंद जय सुखमा-सुख नि:शेष हिंद जय धन-वैभव-गुण खान हिंद विद्या-बल-बद्धि निधान हिंद जय चंद्र-चंद्
भारत-श्री
श्रीधर पाठक
जय जय जगमगित जोति, भारत भुवि श्री उदोति कोटि चंद मंद होत, जग-उजासिनी निरखत उपजत विनोद, उमगत आनँद-पयोद सज्जन-गन-मन-कम�
मेहन की धुनि को सुनिबे कों
श्रीधर पाठक
मेहन की धुनि को सुनिबे कों सनेह सने हिय माँहि सुखारे। सोहैं सलोने-सरूप-सजे पख चित्रित चंद्रिका चारु सँवारे॥ प्रे�
काली घटा का घमंड घटा
श्रीधर पाठक
काली घटा का घमंड घटा, नभ-मंडल तारक-वृंद खिले। उजियाली निशा, छबि शाली दिशा, अति सोहै धरातल फूले फले॥ निखरे सुथरे बन प�
स्मरणीय भाव
श्रीधर पाठक
वंदनीय वह देश, जहाँ के देशी निज-अभिमानी हों। बांधवता में बँधे परस्पर, परता के अज्ञानी हों। निंदनीय वह देश, जहाँ के द
भारत-धरनि
श्रीधर पाठक
(1) बंदहुँ मातृ-भारत-धरनि सकल-जग-सुख-श्रैनि, सुखमा-सुमति-संपति-सरनि (2) ज्ञान-धन, विज्ञान-धन-निधि, प्रेम-निर्झर-झरनि त�
सर्द मौसम में पसीना निकला
कैलाश झा किंकर
सर्द मौसम में पसीना निकला यार मुश्किल से महीना निकला जान जोखिम में हमेशा रहती जीने का कैसा क़रीना निकला हाथ फैल�
किसी किसी की कमाल दुनिया
कैलाश झा किंकर
किसी किसी की कमाल दुनिया बसी हुई है विशाल दुनिया उड़ेगी चिड़िया उड़ान भर कर इधर करेगी वबाल दुनिया बढ़े सफ़र में
पँख होते कहीं उड़ी चिड़िया
कैलाश झा किंकर
पँख होते कहीं उड़ी चिड़िया फिर न पीछे कभी मुड़ी चिड़िया क़ैद-ख़ाने में कुलबुलाती थी अब तो आकाश से जुड़ी चिड़िया
ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे
अहमद फ़राज़
ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे अपने ही साए से हर गाम लरज़ जाता हूँ रास�
जब भी दिल खोल के रोए होंगे
अहमद फ़राज़
जब भी दिल खोल के रोए होंगे लोग आराम से सोए होंगे बाज़ औक़ात ब-मजबूरी-ए-दिल हम तो क्या आप भी रोए होंगे सुब्ह तक दस्त-
अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी
अहमद फ़राज़
अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी इक ग़ज़ल है कि हो रही है अभी मैं भी शहर-ए-वफ़ा में नौ-वारिद वो भी रुक रुक के चल रही है अभ�
यूँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ
अहमद फ़राज़
यूँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ ज़िंदगी हम तिरे हाथों से न मारे जाएँ अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह आ
रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
अहमद फ़राज़
रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है बा
कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
अहमद फ़राज़
कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है ये जानता हूँ
साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले
अहमद फ़राज़
साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले हम को जाना है कहीं शाम से पहले पहले नौ-गिरफ़्तार-ए-वफ़ा सई-ए-रिहाई है अबस हम भी उलझ�
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
अहमद फ़राज़
अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं 'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-स
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
अहमद फ़राज़
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था अपने
करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
अहमद फ़राज़
करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद मैं ज़ख�
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अहमद फ़राज़
उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़ ऐ मर�
दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
अहमद फ़राज़
दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें आज तक अपनी बेकली का सबब ख़ुद भी जाना नहीं कि तुझ से कह
ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
अहमद फ़राज़
ज़िंदगी से यही गिला है मुझे तू बहुत देर से मिला है मुझे तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे दिल ध�
फिर उसी रहगुज़ार पर शायद
अहमद फ़राज़
फिर उसी रहगुज़ार पर शायद हम कभी मिल सकें मगर शायद जिन के हम मुंतज़िर रहे उन को मिल गए और हम-सफ़र शायद जान-पहचान से �
इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
अहमद फ़राज़
इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ तू भी हीरे से बन गया पत्थर हम भी कल जाने क्या से क्या हो
तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ
अहमद फ़राज़
तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता ब�
तेरी बातें ही सुनाने आए
अहमद फ़राज़
तेरी बातें ही सुनाने आए दोस्त भी दिल ही दुखाने आए फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं तेरे आने के ज़माने आए ऐसी कुछ चुप �
आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
अहमद फ़राज़
आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी तू कभी
अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
अहमद फ़राज़
अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था सुनते रहे
दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
अहमद फ़राज़
दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मिरा सख़्त
जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो
अहमद फ़राज़
जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है कि तुम हो ये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि प�
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
अहमद फ़राज़
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो �
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
अहमद फ़राज़
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख तू भी त�
वापसी
अहमद फ़राज़
उस ने कहा सुन अहद निभाने की ख़ातिर मत आना अहद निभाने वाले अक्सर मजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैं तुम जाओ औ�
भली सी एक शक्ल थी
अहमद फ़राज़
भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे �
हमदर्द
अहमद फ़राज़
ऐ दिल उन आँखों पर न जा जिन में वफ़ूर-ए-रंज से कुछ देर को तेरे लिए आँसू अगर लहरा गए ये चंद लम्हों की चमक जो तुझ को पागल
ध्वंस
जगदीश चतुर्वेदी
एक आकाश को भरकर बाज़ुओं में उछालता हूँ किलकारी के साथ ज्वालामुखी-सा धधकता हूँ लावे से सराबोर और कौमार्य-भंग की अतृ
आस्था का अवशेष
जगदीश चतुर्वेदी
गुलमोहरों की बेलें मुरझा गईं— शायद, तुसने विश्वास की कत्थई कमरी को फाड़ दिया! सच—? सुबह, लँगड़ी हवा बपतिस्मा पढ�
रिक्तता का बोध
जगदीश चतुर्वेदी
सूर्य का रथ छिप गया नभ में, मोरपंखी कल्पनाओं को लिए घिर गई फिर से साँझ! साँझ— कितनी शांत, स्निग्धा साँझ! ज्यों, दिव
स्मृति का एक टुकड़ा
जगदीश चतुर्वेदी
कल रात दरिया किनारे तुमने अपने मुलायम हाथ मेरे कंधों पर रख दिए थे चाँदनी की दूधिया सफ़ेदी मुस्कुराई दूब पर बिखर
एकाकी वृक्ष का जीवन
जगदीश चतुर्वेदी
झर गए— सपनों के लहलहाते पात अजाने ही झर गए। ऊँची टहनी पर केवल एक पत्ती बच रही है। कब हवा चले? कब काल के अनगढ़ हाथो�
ओ मेरे घर
शमशेर बहादुर सिंह
ओ मेरे घर ओ हे मेरी पृथ्वी साँस के एवज़ तूने क्या दिया मुझे —ओ मेरी माँ? तूने युद्ध ही मुझे दिया प्रेम ही मुझे दिया
लेकर सीधा नारा
शमशेर बहादुर सिंह
लेकर सीधा नारा कौन पुकारा अंतिम आशाओं की संध्याओं से? पलकें डूबी ही-सी थीं— पर अभी नहीं; कोई सुनता-सा था मुझे कहीं
एक ठोस बदन अष्टधातु का-सा
शमशेर बहादुर सिंह
एक ठोस बदन अष्टधातु का-सा सचमुच? जंघाएँ दो ठोस दरिया ठै रे हुए-से मगर जानता हूँ कि वो बराबर-बराबर बहुत तेज़ रौ में �
प्रेम
शमशेर बहादुर सिंह
द्रव्य नहीं कुछ मेरे पास फिर भी मैं करता हूँ प्यार रूप नहीं कुछ मेरे पास फिर भी मैं करता हूँ प्यार सांसारिक व्यवहा
एक पीली शाम
शमशेर बहादुर सिंह
एक पीली शाम पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्ता शांत मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल कृश म्लान हारा-सा (कि मैं हूँ वह मौन
वाम वाम वाम दिशा
शमशेर बहादुर सिंह
वाम वाम वाम दिशा, समय साम्यवादी। पृष्ठभूमि का विरोध अंधकार-लीन। व्यक्त... कुहाऽस्पष्ट हृदय-भार, आज हीन। हीनभाव, ही�
सींग और नाख़ून
शमशेर बहादुर सिंह
सींग और नाख़ून लोहे के बक्तर कंधों पर। सीने में सूराख़ हड्डी का। आँखों में ׃ घास-काई की नमी। एक मुर्दा हाथ पाँव प�
काल, तुझसे होड़ है मेरी
शमशेर बहादुर सिंह
काल, तुझसे होड़ है मेरी ׃ अपराजित तू— तुझमें अपराजित मैं वास करूँ। इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूँ सीधा तीर-सा, जो �
बात बोलेगी
शमशेर बहादुर सिंह
बात बोलेगी, हम नहीं। भेद खोलेगी बात ही। सत्य का मुख झूठ की आँखें क्या— —देखें! सत्य का रुख़ समय का रुख़ है ׃ अभय जन�
तुमने मुझे
शमशेर बहादुर सिंह
तुमने मुझे और गूँगा बना दिया एक ही सुनहरी आभा-सी सब चीज़ों पर छा गई मै और भी अकेला हो गया तुम्हारे साथ गहरे उतरने �
रात्रि
शमशेर बहादुर सिंह
(1) मैं मींच कर आँखें कि जैसे क्षितिज तुमको खोजता हूँ। (2) ओ हमारे साँस के सूर्य! साँस की गंगा अनवरत बह रही है। तुम कह
चुका भी हूँ मैं नहीं
शमशेर बहादुर सिंह
चुका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैंने प्रेम अभी। जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर। �
हाथ आ कर लगा गया कोई
कैफ़ी आज़मी
हाथ आ कर लगा गया कोई मेरा छप्पर उठा गया कोई लग गया इक मशीन में मैं भी शहर में ले के आ गया कोई मैं खड़ा था कि पीठ पर मे
मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
कैफ़ी आज़मी
मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए नए बशर का कहीं क
की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ
कैफ़ी आज़मी
की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो डूब�
मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली
कैफ़ी आज़मी
मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली इसी तरह से बसर हम ने ज़िंदगी कर ली अब आगे जो भी हो अंजाम देखा जाएगा ख़ुदा तलाश ल
आज सोचा तो आँसू भर आए
कैफ़ी आज़मी
आज सोचा तो आँसू भर आए मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए हर क़दम पर उधर मुड़ के देखा उन की महफ़िल से हम उठ तो आए रह गई ज़िंद�
झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
कैफ़ी आज़मी
झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के ब�
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
कैफ़ी आज़मी
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
सुना करो मिरी जाँ इन से उन से अफ़्साने
कैफ़ी आज़मी
सुना करो मिरी जाँ इन से उन से अफ़्साने सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालो है�
पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाए
कैफ़ी आज़मी
पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाए हम चाँद से आज लौट आए दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं क्या हो गए मेहरबान साए जंगल की हवाएँ आ �
एक लम्हा!
कैफ़ी आज़मी
ज़िंदगी नाम है कुछ लम्हों का और उन में भी वही इक लम्हा जिस में दो बोलती आँखें चाय की प्याली से जब उट्ठीं तो दिल में �
मकान
कैफ़ी आज़मी
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो, तुम भी उठो कोई खिड़की �
दाएरा
कैफ़ी आज़मी
रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे फिर वहीं लौट के आ जाता हूँ बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ रोज़
पशेमानी
कैफ़ी आज़मी
मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ को हवाओं में लहराता आता था दामन कि दामन पकड़ कर बिठा लेगी
नई सुब्ह
कैफ़ी आज़मी
ये सेहहत-बख़्श तड़का ये सहर की जल्वा-सामानी उफ़ुक़ सारा बना जाता है दामान-ए-चमन जैसे छलकती रौशनी तारीकियों पे छाई �
आख़िरी रात
कैफ़ी आज़मी
चाँद टूटा पिघल गए तारे क़तरा क़तरा टपक रही है रात पलकें आँखों पे झुकती आती हैं अँखड़ियों में खटक रही है रात आज छेड�
वो ख़ुश हो के मुझ से ख़फ़ा हो गया
जगत मोहन लाल रवाँ
वो ख़ुश हो के मुझ से ख़फ़ा हो गया मुझे क्या उमीदें थीं क्या हो गया नवेद-ए-शफ़ा चारासाज़ों को दो मरज़ अब मिरा ला-दवा �
सब को गुमान भी कि मैं आगाह-ए-राज़ था
जगत मोहन लाल रवाँ
सब को गुमान भी कि मैं आगाह-ए-राज़ था किस दर्जा कामयाब फ़रेब-ए-मजाज़ था मिस्ल-ए-मह-ए-दो-हफ़्ता वही सरफ़राज़ था जिस की
गुल-ए-वीराना हूँ कोई नहीं है क़द्र-दाँ मेरा
जगत मोहन लाल रवाँ
गुल-ए-वीराना हूँ कोई नहीं है क़द्र-दाँ मेरा तू ही देख ऐ मिरे ख़ल्लाक़ हुस्न-ए-राएगाँ मेरा ये कह कर रूह निकली है तन-ए-�
राह-ओ-रस्म-ए-इब्तिदाई देख ली
जगत मोहन लाल रवाँ
राह-ओ-रस्म-ए-इब्तिदाई देख ली इंतिहा-ए-बेवफ़ाई देख ली सामने तारीफ़ ग़ीबत में गिला आप के दिल की सफ़ाई देख ली अब नहीं
यूँही गर हर साँस में थोड़ी कमी हो जाएगी
जगत मोहन लाल रवाँ
यूँही गर हर साँस में थोड़ी कमी हो जाएगी ख़त्म रफ़्ता रफ़्ता इक दिन ज़िंदगी हो जाएगी देखने वाले फ़क़त तस्वीर-ए-ज़ा�
निकल जाए यूँही फ़ुर्क़त में दम क्या
जगत मोहन लाल रवाँ
निकल जाए यूँही फ़ुर्क़त में दम क्या न होगा आप का मुझ पर करम क्या हँसे भी रोए भी लेकिन न समझे ख़ुशी क्या चीज़ है दुन�
अंजाम ये हुआ है दिल-ए-बे-क़रार का
जगत मोहन लाल रवाँ
अंजाम ये हुआ है दिल-ए-बे-क़रार का थमता नहीं है पाँव हमारे ग़ुबार का पहले किया ख़याल न गुल का न ख़ार का अब दुख रहा है �
जीने में थी न नज़अ के रंज ओ मेहन में थी
जगत मोहन लाल रवाँ
जीने में थी न नज़अ के रंज ओ मेहन में थी आशिक़ की एक बात जो दीवाना-पन में थी सादा वरक़ था बाहमा गुल-हा-ए-रंग-रंग तफ़्स�
मुझे इक्सीर मेरी आह-ए-सोज़ाँ कर के छोड़ेगी
जगत मोहन लाल रवाँ
मुझे इक्सीर मेरी आह-ए-सोज़ाँ कर के छोड़ेगी क़नाअ'त मेरी दर्द-ए-दिल को दरमाँ कर के छोड़ेगी तहय्या है कि अब या मैं रहू�
किस लिए तोड़ते हो आस दीद जमाल यार की
जगत मोहन लाल रवाँ
किस लिए तोड़ते हो आस दीद जमाल यार की उक़्दा-कुशा-ए-अहल-ए-दिल कोई नहीं क़ज़ा तो है वज्ह-ए-सुकून-ए-क़ल्ब-ए-ज़ार है ये ख़�
सरमा-ए-ए'तिबार दे दें तुम को
जगत मोहन लाल रवाँ
सरमा-ए-ए'तिबार दे दें तुम को रंग-ए-हुस्न-ए-बहार दे दें तुम को इस से बेहतर कि नित नए शिकवे हों हर चीज़ का इख़्तियार दे द
फूलों से तमीज़-ए-ख़ार पैदा कर लें
जगत मोहन लाल रवाँ
फूलों से तमीज़-ए-ख़ार पैदा कर लें यक-रंगी-ए-ए'तिबार पैदा कर लें ठहरो चलते हैं सैर-ए-गुलशन को रवाँ पहले दिल में बहार प�
नाला तेरा नाज़ से बाला है
जगत मोहन लाल रवाँ
नाला तेरा नाज़ से बाला है ये राज़ इफ़शा-ए-राज़ से बाला है इंसाँ मा'ज़ूर फ़िक्र-ए-इंसाँ मा'ज़ूर नग़्मा-ए-आवाज़ साज़ स�
अंदाज़ जफ़ा बदल के देखो तो सही
जगत मोहन लाल रवाँ
अंदाज़ जफ़ा बदल के देखो तो सही पाँव से ये फूल मल के देखो तो सही रंग गुल-कारी जबीन सज्दा इक दिन घर से निकल के देखो तो स�
अफ़्लास अच्छा न फ़िक्र-ए-दौलत अच्छी
जगत मोहन लाल रवाँ
अफ़्लास अच्छा न फ़िक्र-ए-दौलत अच्छी जो दिल को पसंद हो वो हालत अच्छी जिस से इस्लाह-ए-नफ़्स ना-मुम्किन हो उस ऐश से हर त
मिलना किस काम का अगर दिल न मिले
जगत मोहन लाल रवाँ
मिलना किस काम का अगर दिल न मिले चलना बेकार है जो मंज़िल न मिले वस्त-ए-दरिया में ग़र्क़ होना बेहतर उस कि नज़र में आ के
हर इक फ़ैसला उस ने बेहतर किया
ख़ालिद महमूद
हर इक फ़ैसला उस ने बेहतर किया मुझे आँख दी तुम को मंज़र किया दिल-ए-ख़ूँ-चकीदा मुनव्वर किया तो आँखों का सहरा समुंदर क
नहीं है अगर उन में बारिश हवा
ख़ालिद महमूद
नहीं है अगर उन में बारिश हवा उठा बादलों की नुमाइश हवा गहे बर्फ़ है गाह आतिश हवा तुझे क्यूँ है दिल्ली से रंजिश हवा
ख़ता गया जो निशाना कमाँ बदलता है
ख़ालिद महमूद
ख़ता गया जो निशाना कमाँ बदलता है नहीं तमीज़-ए-रिहाइश मकाँ बदलता है कहानी ये थी कि सब साथ मिल के रहते हैं फिर इस के ब'
यहाँ से है कहानी रात वाली
ख़ालिद महमूद
यहाँ से है कहानी रात वाली कि वो इक रात थी बरसात वाली कहा था जो वही कर के दिखाया वो बर्क़-ए-बे-अमाँ थी बात वाली बड़ी �
आँखों में धूप दिल में हरारत लहू की थी
ख़ालिद महमूद
आँखों में धूप दिल में हरारत लहू की थी आतिश जवान था तो क़यामत लहू की थी ज़ख़्मी हुआ बदन तो वतन याद आ गया अपनी गिरह मे�
रास्ता पुर-ख़ार दिल्ली दूर है
ख़ालिद महमूद
रास्ता पुर-ख़ार दिल्ली दूर है सच कहा है यार दिल्ली दूर है काम दिल्ली के सिवा होते नहीं और ना-हंजार दिल्ली दूर है अ
शायद कि मर गया मिरे अंदर का आदमी
ख़ालिद महमूद
शायद कि मर गया मिरे अंदर का आदमी आँखें दिखा रहा है बराबर का आदमी सूरज सितारे कोह ओ समुंदर फ़लक ज़मीं सब एक कर चुका �
मुक़ाबला हो तो सीने पे वार करता है
ख़ालिद महमूद
मुक़ाबला हो तो सीने पे वार करता है वो दुश्मनी भी बड़ी पुर-वक़ार करता है जो हो सके तो उसे मुझ से दूर ही रखिए वो शख़्स
हर कमंद-ए-हवस से बाहर है
ख़ालिद महमूद
हर कमंद-ए-हवस से बाहर है ताइर-ए-जाँ क़फ़स से बाहर है मौत का एक दिन मुअय्यन है ज़िंदगी दस्तरस से बाहर है क़ाफ़िले म�
ठंडी ठंडी नर्म हवा का झोंका पीछे छूट गया
ख़ालिद महमूद
ठंडी ठंडी नर्म हवा का झोंका पीछे छूट गया जाने किस वहशत में घर का रस्ता पीछे छूट गया बच्चे मेरी उँगली थामे धीरे धीर�
झपटते हैं झपटने के लिए परवाज़ करते हैं
ख़ालिद महमूद
झपटते हैं झपटने के लिए परवाज़ करते हैं कबूतर भी वही करने लगे जो बाज़ करते हैं वही क़िस्से वही बातें कि जो ग़म्माज़
जहाँ-दार पे वार चलने लगा
ख़ालिद महमूद
जहाँ-दार पे वार चलने लगा ग़ुलामों का दरबार चलने लगा अज़ल से किसी शय में गर्दिश न थी चला मैं तो संसार चलने लगा ख़ुद
अवसाद
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
जैसे सांध्य की लालिमा जल में समा जाती है, हर आकांक्षा, हर स्वप्न, तृण-तुल्य हो बिखर गया है। आशा, जो कभी जीवन की संपदा �
प्रार्थना और चीख़ के बीच
अशोक वाजपेयी
जहाँ तुम थीं अपने नाचते शरीर से अंतरिक्ष को प्रेम जैसे एक संक्षिप्त अनंत में ढालते हुए वहाँ क्या मैं रख सकता हूँ श
लौटकर जब आऊँगा
अशोक वाजपेयी
माँ, लौटकर जब आऊँगा क्या लाऊँगा? यात्रा के बाद की थकान, सूटकेस में घर-भर के लिए कपड़े, मिठाइयाँ, खिलौने, बड़ी होती ब�
पानी क्या कर रहा है
नरेश सक्सेना
आज जब पड़ रही है कड़ाके की ठंड और पानी पीना तो दूर उसे छूने तक से बच रहे हैं लोग तो ज़रा चल कर देख लेना चाहिए कि अपने �
एक वृक्ष भी बचा रहे
नरेश सक्सेना
अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ एक वृक्ष जाएगा अपनी गौरैयों-गिलहरियों से बिछुड़कर साथ जाएगा एक वृक्ष अग्नि में प�
रोशनी
नरेश सक्सेना
सरल रेखाओं में चलती ज़रूर है लेकिन उतनी सरल होती नहीं इंद्रधनुष में किस सफ़ाई से देती है अपने लचीले होने का एहसास
शिशु
नरेश सक्सेना
शिशु लोरी के शब्द नहीं संगीत समझता है अभी वह अर्थ समझता है बाद में सीखेगा भाषा।
रात भर
नरेश सक्सेना
रात भर चलती हैं रेलें ट्रक ढोते हैं माल रात भर कारख़ाने चलते हैं कामगार रहते हैं बेहोश होशमंद करवटें बदलते हैं र�
भूख
नरेश सक्सेना
भूख सबसे पहले दिमाग़ खाती है उसके बाद आँखें फिर जिस्म में बाक़ी बची चीज़ों को छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख वह रिश्तो�
हँसी
नरेश सक्सेना
भयानक होती है रात जब कुत्ते रोते हैं लेकिन उससे भी भयानक होती है रात जब कुत्ते हँसते हैं सुनो क्या तुम्हें सुनाई द
कुछ लोग
नरेश सक्सेना
कुछ लोग पाँवों से नहीं दिमाग़ से चलते हैं ये लोग जूते तलाशते हैं अपने दिमाग़ के नाप के।
कविता की तासीर
नरेश सक्सेना
पाँव जैसे पड़ जाए साँप पर चढ़े ऐसी थरथरी बिच्छु ने मार दिया हो जैसे डंक या बरैयाँ पीछे पड़ गई हों कविता भी पीछे पड़
आघात
नरेश सक्सेना
आघात से काँपती हैं चीज़ें अनाघात से उससे ज़्यादा आघात की आशंका से काँपते हुए पाया ख़ुद को।
समुद्र पर हो रही है बारिश
नरेश सक्सेना
क्या करे समुद्र क्या करे इतने सारे नमक का कितनी नदियाँ आईं और कहाँ खो गईं क्या पता कितनी भाप बनाकर उड़ा दीं इसका �
सीढ़ियाँ कभी ख़त्म नहीं होतीं
नरेश सक्सेना
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जो उतरना भूल जाते हैं वे घर नहीं लौट पाते।
डर
नरेश सक्सेना
चट्टानों के आस-पास फूल उन्हें खिलना सिखाते रहे चट्टाने डरती रहीं उन्हें दिखता रहा फूलों का मुरझाना।
उसे ले गए
नरेश सक्सेना
अरे कोई देखो मेरे आँगन में कट कर गिरा मेरा नीम गिरा मेरी सखियों का झूलना बेटे का पलना गिरा गिरी उसकी चिड़ियाँ देख
पार
नरेश सक्सेना
पुल पार करने से पुल पार होता है नदी पार नहीं होती नदी पार नहीं होती नदी में धँसे बिना नदी में धँसे बिना पुल का अर्�
गूँगे
रांगेय राघव
‘शकुंतला क्या नहीं जानती?' 'कौन? शकुंतला! कुछ नहीं जानती!' 'क्यों साहब? क्या नहीं जानती? ऐसा क्या काम जो वह नहीं कर सकती
ओ ज्योतिर्मयि!
रांगेय राघव
ओ ज्योतिर्मयि! क्यों फेंका है, मुझको इस संसार में। जलते रहने को कहते हैं, इस गीली मँझधार में। मैं चिर जीवन का प्रत�
अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है
जावेद अख़्तर
अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है अभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है हमारे घर को तो उजड़े हुए ज़माना हुआ मगर सुना ह�
वो ज़माना गुज़र गया कब का
जावेद अख़्तर
वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढता था जो इक नई दुनिया लूट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था �
आज मैं ने अपना फिर सौदा किया
जावेद अख़्तर
आज मैं ने अपना फिर सौदा किया और फिर मैं दूर से देखा किया ज़िंदगी-भर मेरे काम आए उसूल एक इक कर के उन्हें बेचा किया ब�
ये तसल्ली है कि हैं नाशाद सब
जावेद अख़्तर
ये तसल्ली है कि हैं नाशाद सब मैं अकेला ही नहीं बर्बाद सब सब की ख़ातिर हैं यहाँ सब अजनबी और कहने को हैं घर आबाद सब भ�
हम तो बचपन में भी अकेले थे
जावेद अख़्तर
हम तो बचपन में भी अकेले थे सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे इक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के इक तरफ़ आँसुओं के रेले थे थीं स�
सच ये है बे-कार हमें ग़म होता है
जावेद अख़्तर
सच ये है बे-कार हमें ग़म होता है जो चाहा था दुनिया में कम होता है ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम हम से पूछो कैसा आलम ह
जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
जावेद अख़्तर
जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है कि
दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं
जावेद अख़्तर
दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं रास्ता रोके खड़ी है यही उलझन कब स
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं
बृज नारायण चकबस्त
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं हवा में उड़ के सैर-ए-आलम-ए-ईजाद करते हैं �
ज़बाँ को बंद करें या मुझे असीर करें
बृज नारायण चकबस्त
ज़बाँ को बंद करें या मुझे असीर करें मिरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते ये कैसी बज़्म है और कैसे उस के साक़ी हैं श
दिल किए तस्ख़ीर बख़्शा फ़ैज़-ए-रूहानी मुझे
बृज नारायण चकबस्त
दिल किए तस्ख़ीर बख़्शा फ़ैज़-ए-रूहानी मुझे हुब्ब-ए-क़ौमी हो गया नक़्श-ए-सुलैमानी मुझे मंज़िल-ए-इबरत है दुनिया अहल-
फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना
बृज नारायण चकबस्त
फ़ना का होश आना ज़िंदगी का दर्द-ए-सर जाना अजल क्या है ख़ुमार-ए-बादा-ए-हस्ती उतर जाना अज़ीज़ान-ए-वतन को ग़ुंचा ओ बर्ग
फ़ना नहीं है मोहब्बत के रंग-ओ-बू के लिए
बृज नारायण चकबस्त
फ़ना नहीं है मोहब्बत के रंग-ओ-बू के लिए बहार-ए-आलम-ए-फ़ानी रहे रहे न रहे जुनून-ए-हुब्ब-ए-वतन का मज़ा शबाब में है लहू म�
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना
बृज नारायण चकबस्त
दर्द-ए-दिल पास-ए-वफ़ा जज़्बा-ए-ईमाँ होना आदमियत है यही और यही इंसाँ होना नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-वफ़ा क्या जानें
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है
बृज नारायण चकबस्त
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है गुनह-गारों में शामिल
न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा
बृज नारायण चकबस्त
न कोई दोस्त दुश्मन हो शरीक-ए-दर्द-ओ-ग़म मेरा सलामत मेरी गर्दन पर रहे बार-ए-अलम मेरा लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्�
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता
बृज नारायण चकबस्त
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा म�
थे कभी हम-नफ़स हमराहों की तरह
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
थे कभी हम-नफ़स हमराहों की तरह मिलते अब महज़ वो बेगानों की तरह इश्क़ की राह ना थी मुक्कमल कभी बे-क़बूल अनसुलझे अफ़सान�
कहो जो है दिल में बात
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
कहो जो है दिल में बात, उनके पयाम से पहले, मत सोचो मोहब्बत में कुछ भी अंजाम से पहले। दिल की बात दिल में न रह जाए हसरत बन�
माँ
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
अंधेरों के जानिब से, जो रोशनी छीन लाए वो माँ होती है। अपने हिस्से का निवाला, जो तुम्हे खिलाए वो माँ होती है॥ धूप में
26 जनवरी करती सवाल
कर्मवीर 'बुडाना'
देश में आज ख़ुशी का कोई एक घर ना था, हर ठिकाना लग रहा बिल्कुल लालकिला था। नज़र ने हर सम्त हर छोर हर साहिल तक देखा, आसमा�
अपनी जगह पर
आग्नेय
सारी चीज़ें हटी हुई हैं अपनी जगह से वृक्ष उदास हैं और अपनी हरीतिमा से ऊब रहे हैं फूल बदरंग हैं और बेमौसम खिल रहे ह�
वह उसे भूल गया
आग्नेय
दु:ख इतना पारदर्शी होता है कोई भी झाँक सकता है उसमें आप अपने दु:ख में इतने दूरस्थ दिखते हैं कि आपका दु:ख एक साधारण घ�
मैं जहाँ खड़ा था
आग्नेय
मैं जहाँ खड़ा था वहाँ दरवाज़ा ही नहीं था जो खुल जाता सिम-सिम कहने से मैं जहाँ जाना चाहता था वहाँ कोई रास्ता ही नहीं
कविताओं का जीवन
आग्नेय
पैरों तले दबती चींटी का जीवन मुझे नहीं चाहिए दुम हिलाते कुत्ते का जीवन मुझे नहीं चाहिए बाड़े में बँधने वाले मवेश�
चाहत
आग्नेय
सुबह उठते ही चिड़ियों के साथ चहचहाना चाहता हूँ दूधवाले से उसकी गायों के नाम पूछना चाहता हूँ अख़बारवाले से नमस्का
अमरता
आग्नेय
समयातीत है वह समय मार नहीं सकता उसको जब तक मैं हूँ समय में
कवि की मृत्यु
आग्नेय
बहुधा कवि मर जाते हैं अच्छे कवि और जल्दी मर जाते हैं कविताओं के खँडहरों में उत्खनन करता हुआ कोई सिरफिरा खोज लेता �
प्रार्थना
आग्नेय
प्रेम सुनता नहीं कोई प्रार्थना वह है स्वयं प्रार्थना किसी की किसी के लिए जो है और नहीं भी है।
दीर्घ जीवन
आग्नेय
मुझे कोढ़ी का दीर्घ जीवन नहीं मिले मुझे रक्त कैंसर रोगी का दीर्घ जीवन नहीं मिले मुझे जीवाश्म बने व्यक्ति का जीवन
आखेट
आग्नेय
तुम उस परिंदे की तरह कब तक डैने फड़फड़ाओगे जिसकी गर्दन पर रखा हुआ है चाहत का चाक़ू उड़ान भरने के पहले ही तुमने खो द
श्रेष्ठ कविता
आग्नेय
कौन-सी कविता श्रेष्ठ है वह कविता टिकी है जो बिना समीक्षा के बिना आलोचना के बिना सिद्धांत के बिना शत्रु-मित्र के य
पूछें वो काश हाल दिल-ए-बे-क़रार का
मेला राम वफ़ा
पूछें वो काश हाल दिल-ए-बे-क़रार का हम भी कहें कि शुक्र है पर्वरदिगार का लाज़िम अगर है शुक्र ही पर्वरदिगार का फिर क्
बेगाना-वार हम से यगाना बदल गया
मेला राम वफ़ा
बेगाना-वार हम से यगाना बदल गया कैसी चली हवा कि ज़माना बदल गया आँखें भी देखती हैं ज़माने के रंग-ढंग दिल भी समझ रहा ह�
जब बहार आई है ज़ंजीर-ब-पा रक्खा है
मेला राम वफ़ा
जब बहार आई है ज़ंजीर-ब-पा रक्खा है अक़रबा ने मुझे दीवाना बना रक्खा है हम-सुख़न ग़ैर से रहना है क़रीना अख़्लाक़ मुझ
क्या कहें वादों पे यक़ीं हम क्यूँ लाते जाते हैं
मेला राम वफ़ा
क्या कहें वादों पे यक़ीं हम क्यूँ लाते जाते हैं धोका खाना पड़ता है धोका खाते जाते हैं ताक़त-ए-ज़ब्त-ए-ग़म दिल से रु�
दिन जुदाई का दिया वस्ल की शब के बदले
मेला राम वफ़ा
दिन जुदाई का दिया वस्ल की शब के बदले लेने थे ऐ फ़लक-ए-पीर ये कब के बदले राहत-ए-वस्ल किसी को तो किसी को ग़म-ए-हिज्र सब्�
मौत इलाज-ए-ग़म तो है मौत का आना सहल नहीं
मेला राम वफ़ा
मौत इलाज-ए-ग़म तो है मौत का आना सहल नहीं जान से जाना सहल सही जान का जाना सहल नहीं हमदर्दी हमदर्दी में जान ही ले कर टल�
बरसों से हूँ मैं ज़मज़मा-परदाज़-ए-मोहब्बत
मेला राम वफ़ा
बरसों से हूँ मैं ज़मज़मा-परदाज़-ए-मोहब्बत आई न जवाबन कभी आवाज़-ए-मोहब्बत इक दर्द मोहब्बत है मिरी हर रग-ओ-पय में हर �
ज़िंदगी ख़ाक में भी थी तिरे दीवाने से
मेला राम वफ़ा
ज़िंदगी ख़ाक में भी थी तिरे दीवाने से अब न उट्ठेगा बगूला कोई वीराने से इस क़दर हो गई कसरत तिरे दीवानों की क़ैस घबर�
कौन कहता है कि मर जाने से कुछ हासिल नहीं
मेला राम वफ़ा
कौन कहता है कि मर जाने से कुछ हासिल नहीं ज़िंदगी उस की है मर जाना जिसे मुश्किल नहीं हाँ ये सारा खेल परवानों की जाँ-ब
देखती आँखों ने देखा है शबिस्तानों में
मेला राम वफ़ा
देखती आँखों ने देखा है शबिस्तानों में जज़्बा मरने का अभी ज़िंदा है परवानों में कितना पुर-हौल है माहौल शब-ए-फ़ुर्क�
उनका रोना
निलय उपाध्याय
किसी अदृश्य लड़ाई पर साँस के तागों से तान रही थी सारा आसमान और ढीला छोड़ रही थी औरतें रो रही थीं कंधों मे कंधा सि�
जा रहा हूँ
निलय उपाध्याय
मैं गाँव से जा रहा हूँ कुछ चीज़ें लेकर जा रहा हूँ कुछ चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ मैं गाँव से जा रहा हूँ किसी सूतक का
निवेदन
निलय उपाध्याय
पीतल के परात में मत खोजना मुझे मत खोजना फूल-बेल-पत्रों के नीचे अँजुरी-भर जल में जैसे अनतफल मेरी लिए पहाड़ पर मत जा�
तुम
निलय उपाध्याय
चूल्हा फूँकते झुकी हुई पीठ हो तुम गोयठे की मद्धिम आँच पर रात को रोटियों-सी गोल करती तुम सघन वृक्ष की टहनी विनम्र
मेरे युग का नायक
निलय उपाध्याय
कुछ भी नहीं अवैध कुछ भी नहीं परहेज़ सफलता की राहों में कुछ भी नहीं अस्वीकार चाहे जैसे हासिल हो—हासिल हो उपलब्धिया
ज़रूरतें
निलय उपाध्याय
पहले तय होंगी उनकी ज़रूरतें फिर मेरा गुनाह मेरी सज़ा तय होगी पुत्र जन्म की ख़ुशी में पुरोहितों के लिए मांस की ज़�
जेबक़तरा
निलय उपाध्याय
मालवानी की चाल में एक महीने के प्रशिक्षण के बाद निकला था जेबक़तरा आज पहला दिन था उसका बोहनी का दिन मुंबई की लोकल म�
जेठ का एक दिन
निलय उपाध्याय
मेरा गला सूख गया है पसीने से भर गई है—देह उमस उगल रही है धरती साँस में लपटें समा जाती हैं हर बार मुझे ज़ोरों से लगी
सुहागरात
निलय उपाध्याय
गाना गाकर बांद्रा यार्ड के बिल में रहने वाले चूहे ने सपने दिखा झोंपड़पट्टी की चुहिया को पटाया विधिवत किया ब्याह और
हार गए गाँव
निलय उपाध्याय
कौन-सा अपना पता बताएँ कौन-सा अपना नाम निकले थे जग जीतने हार गए गाँव बाप रे बाप हार गए गाँव माय रे माय हार गए गाँव
सफ़र
निलय उपाध्याय
बहुत कठिन है यहाँ सवार होना समय के साथ कैसे मिलेगी पाँव भर जगह ऊपर से नीचे तक भरे पायदानों पर खड़े लटककर चल रहे है�
बारिश
निलय उपाध्याय
हवा में उमस थी और अपनी गति से जा रही थी लोकल डिब्बों में भीड़ बहुत अधिक नहीं थी तो कम भी नहीं थी कुछ लोग पढ़ रहे थे अख़�
मेरे सूर्य
निलय उपाध्याय
मेरे लिए कौन नदी निकलेगी कौन पेड़ मेरे लिए फल देगा पश्चिम के पहाड़ की तरह भारी है मेरे दुःख वेतन जैसे पेड़ पर उड़ �
तैरने से पहले
निलय उपाध्याय
तैरने से पहले भर लेना चहाता हूँ दिमाग़ में इन घाटों और अरारों की स्मृति जहाँ से मेरी यात्री भूमिका शुरू होगी यही�
पानी पहुँच गया है
निलय उपाध्याय
वे उठाते हैं कुदाल और एक लकीर खींच देते हैं पृथ्वी की भाग्यरेखा सी ख़ूबसूरत एक लकीर वे कल्पवृक्ष नहीं सोचते नहीं
नव वर्ष नव संकल्प
सुशील कुमार
नूतन प्रभात नूतन किसलय, नूतन रश्मियों का डेरा हो, नूतन हैं वर्ष दिवस नूतन, नूतन ख़ुशियों का बसेरा हो॥ जो भी है टीस वि
ज़िम्मेदारी
सुशील कुमार
एक बार की बात है, जब हमारे स्कूल में वार्षिक उत्सव का आयोजन किया गया। स्कूल के सारे विद्यार्थी ख़ुशी से झूम उठे। हमें
साजन आ जाओ
सुशील कुमार
लगे इक, दिन है बरस हज़ार कि साजन आ जाओ एक बार होठ की लाली कान का झुमका यौवन भरी हिलोरे साजन तेरे बिना ये सारा फीका है श�
बेचैनी
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
यह बेचैनी क्या है? अधूरी आकांक्षा? या पूरी होने का भय? मन की इस बेकली का अंत कहाँ? शायद कहीं नहीं। शायद यही उसका स्व�
संविधान दे के गया कोई
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
ये ज़ीस्त-ए-अंदाज़-ओ-गुफ़्तगू, ये जीने का असरार-ओ-सलीक़ा देके गया कोई। अहसान कैसे चुकाऊँ मैं उस शख़्सियत का, बदतर ज़िंदगी
रहूँ ख़ुद में मलंग इतना, गर्दिश-ए-अय्याम ना आए
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
रहूँ ख़ुद में मलंग इतना, गर्दिश-ए-अय्याम ना आए, तू आए या ना आए, तसव्वुर भरी शाम ना आए। ना बहे अश्क़ तिरी ग़म-ए-जुदाई में इ�
सब सुलझा लगता हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
मसअला कई हैं मेरे ज़ेहन-ओ-दिल में, तू पास आ जाए तो सब सुलझा लगता हैं। हक़ीक़त की ज़मीं ख़्वाबों को देनी ही नहीं, इस बाहर क
माँ तेरा ख़्याल हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
उदास शाम हैं न रंग हैं न छाँव हैं, मैं तन्हा हूँ, न पास शहर हैं न गाँव हैं॥ मैं रो दूँ वक़्त, तुझमें न इतना जोर हैं, हँ�
नक़ली सुबह
कर्मवीर 'बुडाना'
सुबह हुई हैं क्या ये सच हैं या फिर ये भी कोई धोखा है आँखों का। अंधेरा भी कहाँ मरता हैं, हाँ, नक़ली उजाला फैला है। फ़क़त �
तुम निश्चिंत रहना
किशन सरोज
कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र, तुम निश्चिंत रहना धुँध डूबी घाटियों के इंद्रधनु तुम �
गुलाब हमारे पास नहीं
किशन सरोज
नागफ़नी आँचल में बाँध सको तो आना धागों बिन्धे गुलाब हमारे पास नहीं। हम तो ठहरे निपट अभागे आधे सोए, आधे जागे थोड़े
मन की सीमा के पास-पास
किशन सरोज
मन की सीमा के पास-पास तन की सीमा से दूर-दूर, तुमने यों महकाईं मेरी सूनी गलियाँ ज्यों रजनीगन्धा खिले पराए आँगन में।
और कब तक
किशन सरोज
युग हुए संघर्ष करते वर्ष को नव वर्ष करते और कब तक हम प्रतीक्षारत रहें? धैर्य की अन्धी गुफ़ा में प्रतिध्वनित हो लौ
कर दो हड़ताल
योगेंद्र कुमार लल्ला
कर दो जी, कर दो हड़ताल, पढ़ने-लिखने की हो टाल। बच्चे घर पर मौज उड़ाएँ, पापा-मम्मी पढ़ने जाएँ। मिट जाए जी का जंजाल, कर
मेला
योगेंद्र कुमार लल्ला
आओ मामा, आओ मामा! मेला हमें दिखाओ मामा! सबसे पहले उधर चलेंगे जिधर घूमते उड़न खटोले, आप जरा कहिएगा उससे मुझे झुलाए ह�
तोते जी
योगेंद्र कुमार लल्ला
तोते जी, ओ तोते जी! पिंजरे में क्यों रोते जी! तुम तो कभी न शाला जाते, टीचर जी की डाँट न खाते। तुम्हें न रोज़ नहाना पड़त
कमाल
योगेंद्र कुमार लल्ला
दुनिया में कुछ करूँ कमाल, पर कैसे, यह बड़ा सवाल! एक उगाऊँ ऐसा पेड़ जिसमें पत्ते हों दो-चार, लेकिन उस पर चढ़कर बच्चे �
उस दिन जब जीवन के पथ में
जयशंकर प्रसाद
उस दिन जब जीवन के पथ में, छिन्न पात्र ले कंपित कर में, मधु-भिक्षा की रटन अधर में, इस अनजाने निकट नगर में, आ पहुँचा था ए�
अव्यवस्थित
जयशंकर प्रसाद
विश्व के नीरव निर्जन में। जब करता हूँ बेकल, चंचल, मानस को कुछ शांत, होती है कुछ ऐसी हलचल, हो जाता है भ्रांत, भटकता है
हृदय का सौंदर्य
जयशंकर प्रसाद
नदी का विस्तृत वेला शांत, अरुण मंडल का स्वर्ण विलास; निशा का नीरव चंद्र-विनोद, कुसुम का हँसते हुए विकास। एक से एक म�
अरे कहीं देखा है तुमने
जयशंकर प्रसाद
अरे कहीं देखा है तुमने मुझे प्यार करने वाले को? मेरी आँखों में आकर फिर आँसू बन ढरने वाले को? सूने नभ में आग जलाकर य�
वसंत
जयशंकर प्रसाद
तू आता है फिर जाता है। जीवन में पुलकित प्रणय सदृश, यौवन की पहली कांति अकृश, जैसी हो, वह तू पाता है, हे वसंत क्यों तू आ�
निवेदन
जयशंकर प्रसाद
तेरा प्रेम हलाहल प्यारे, अब तो सुख से पीते हैं। विरह सुधा से बचे हुए हैं, मरने को हम जीते हैं॥ दौड़-दौड़ कर थका हुआ ह�
ले चल वहाँ भुलावा देकर
जयशंकर प्रसाद
ले चल वहाँ भुलावा देकर, मेरे नाविक! धीरे-धीरे। जिस निर्जन में सागर लहरी, अंबर के कानों में गहरी— निश्छल प्रेम-कथा क�
वसंत की प्रतीक्षा
जयशंकर प्रसाद
परिश्रम करता हूँ अविराम, बनाता हूँ क्यारी औ' कुंज। सींचता दृग-जल से सानंद, खिलेगा कभी मल्लिका-पुंज। न काँटों की है क
झरना
जयशंकर प्रसाद
मधुर है स्रोत मधुर है लहरी न है उत्पात, छटा है छहरी मनोहर झरना। कठिन गिरि कहाँ विदारित करना बात कुछ छिपी हुई है गह�
अब जागो जीवन के प्रभात
जयशंकर प्रसाद
अब जागो जीवन के प्रभात! वसुधा पर ओस बने बिखरे हिमकन आँसू जो क्षोभ भरे ऊषा बटोरती अरुण गात! अब जागो जीवन के प्रभात!
वे कुछ दिन कितने सुंदर थे
जयशंकर प्रसाद
वे कुछ दिन कितने सुंदर थे? जब सावन-घन सघन बरसते— इन आँखों की छाया भर थे! सुरधनु रंजित नव-जलधर से— भरे, क्षितिज व्याप�
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जयशंकर प्रसाद
अरुण यह मधुमय देश हमारा। जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा॥ सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोह�
उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर
जयशंकर प्रसाद
उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर! करुणा की नव अँगराई-सी, मलयानिल की परछाईं-सी, इस सूखे तट पर छिटक छहर! शीतल कोमल चिर कंपन-सी, द
हे सागर संगम अरुण नील
जयशंकर प्रसाद
हे सागर संगम अरुण नील! अतलांत सहा गंभीर जलधि— तज कर अपनी यह नियति अवधि, लहरों के भीषण हासों में आकर खारे उच्छ्वास�
ग्राम
जयशंकर प्रसाद
टन! टन! टन!—स्टेशन पर घंटी बोली। श्रावण-मास की संध्या भी कैसी मनोहारिणी होती है! मेघ-माला-विभूषित गगन की छाया सघन रसा
आकाशदीप
जयशंकर प्रसाद
(1) “बंदी!” “क्या है? सोने दो।” “मुक्त होना चाहते हो?” “अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।” “फिर अवसर न मिलेगा।”
अमर प्रेम
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
यह प्रेम अमर, अडिग, अविरल, तेरे नाम में समर्पित जल, यह दीप सदा जलेगा प्रिय, तेरे स्मरण का होगा फल। मिट्टी से उठा यह आ�
अजेय
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
हारे क्यों थकान से, डरे क्यों तूफ़ान से। गिर बार-बार सही, फिर भी वार कर सही। राह में अड़चनें सही, हौसला बुलंद कर वही�
उर्मिला का वियोग
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
तुम गए हो दूर जो, प्राण अब तड़प रहे, मेरे हिय में शूल-सा, दर्द है कसक रहे। तुम बिन ये प्रहर सभी, शून्य से प्रतीत हों, नी�
राहों का अकेलापन
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
आसमान को देखूँ, पर रंग सभी धूमिल हैं, धरती से पूछूँ तो उत्तर बड़े निर्जीव हैं। हवा की सरगम भी अब शोर सी लगती है, मन �
हे भारत माँ के सौम्य दूत
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
हे भारत माँ के सौम्य दूत, राष्ट्रवाद के अद्भुत सूत्र। अटल वचन, अडिग थे तुम, सच के पथ के सच्चे पूत। तुम्हारी वाणी मे�
प्रेम
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
प्रेम धरा है, प्रेम गगन है, प्रेम तपन है, प्रेम शयन है। प्रेम श्वास है, प्रेम प्राण है, प्रेम जीवन का संज्ञान है। कि�
तुम्हारी तस्वीर
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
देखी जो मैंने तुम्हारी तस्वीर, छलक उठा मन, हुआ अधीर। मुख चंद्र-सा, नयन कजरारे, जैसे हो फूलों के बीच सितारे। अधरों प�
संघर्ष
कर्मवीर 'बुडाना'
पिता के खुरदरे पैर जैसे ही दहलीज़ पर घर्षण करते थे, घर में वो निढ़ाल जिस्म एक ऊर्जा ले आता था। तिरपाल जैसी चुभती शर्ट
नशेड़ी माटसाब
कर्मवीर 'बुडाना'
वो आज फिर वक्त से निकला हैं, क्या लगता हैं आज स्कूल पहुँच जाएगा। उसकी प्यासी रगें इस उजलत में थी, इस राह ठेका आएगा। �
मधुशाला: एक उन्माद
कर्मवीर 'बुडाना'
गया एक बार मैं अपने सपने का इंटरव्यू देने, उस रास्ते बीच मँझधार नज़र आई मधुशाला अपने, जिसे देख ठिठक गए हर किसी के सपन�
उड़ जाती हो
कर्मवीर 'बुडाना'
जब-जब तुम मेरे अन्तर में बर्क़ सी पड़ती हो, क्षुब्ध हृदय में धनक सी लालिमा बढ़ा जाती हो, घटाकर व्यथा नवप्रभात का संचार
नन्ही-सी बच्ची
कर्मवीर 'बुडाना'
ख़ुशी का मैंने कोई घर नहीं देखा, एक नन्ही-सी बच्ची को मैंने आज रोते देखा। माँ का आँचल भी भीग गया दुःख से, जब ख़ुद के टुक�
तेरे बिना
कर्मवीर 'बुडाना'
तेरे बिना रो पड़ता हूँ तुझें राज़ी करने के लिए, तेरे बिना जीवन मानिंद जहन्नुम हैं, तू नहीं तो जीवन का हर सुख दुःख हैं, �
मुक़द्दस घड़ी हैं 17
कर्मवीर 'बुडाना'
सर्द हवा का सुरूर, धनक की ये ग़ज़ब पैहन छाई हैं, आँखों में चमक लबों पे गीत वाह क्या बहार आई हैं। मिरे तसब्बुरात में जो �
नज़रिया
कर्मवीर 'बुडाना'
बदल दिया नज़रिया इंसानों ने सोचने का, सही और ग़लत को ना पाए समझ, जब सामने थी अपने मंज़िल, तो भूल चुका था मंज़िल पाने का रा�
इमसाल होली
कर्मवीर 'बुडाना'
मज़हब भी खाएँ मिठाई त्यौहारों की एक दूसरे के घर, हर-नफ़स हम एक हैं, तू मेरे घर मैं तेरे घर जीमने आऊँगा। मोबाईल ने भाईच�
कोरोना अब तो रहम कर
कर्मवीर 'बुडाना'
ग़रीबी में कोई कैसे रह लें दीवारों में दिन भर, बेबसी में रोता रहा था निर्धन परिवार रात भर। धनवानों ने तो लूटी तन्हा�
ऑक्सीजन चाहिए अभी
कर्मवीर 'बुडाना'
ख़्वाबों को इतना जल्दी समेट कर न रख अभी, मंज़िलें फिर आएगी, सब्र कर, शौक मत कर अभी। जिस पड़ोस को तारक मेहता शो में देखत�
बदले ज़माने के मंज़र
कर्मवीर 'बुडाना'
आज चश्म-ओ-अब्र से वसुंधरा का शृंगार बरसा हैं, बूढें दरख़्तों की शाख़ों पे भी जवाँ रुत आई हैं। बर्क़ सी धड़कनें गुज़री ह
पारस
कर्मवीर 'बुडाना'
ख़ुशियों को आना था वो आई भी, पर कुछ इस तरह जैसे भगवान रो पड़ा हैं बच्चें में। पिता कोई अलग ही शख़्स होता हैं, वो इस जहाँ
होप
कर्मवीर 'बुडाना'
नन्हीं सी पलके, बोल रही ये भीगी आँखें, मैं बेबस सा क्यूँ खड़ा हूँ चुप, सुनकर ये हज़ार बातें। मैं रोज़ मिलता हूँ और अंदर �
आत्मीयता की डोर
कर्मवीर 'बुडाना'
तुझसे हैं मेरे बख़्त का रिश्ता, तू बस सा गया हैं मेरे दिल-ओ-तसब्बुरात में, प्रकति के घर जब सुबह पैदा होती हैं तेरे प्र
रात में सूरज
कर्मवीर 'बुडाना'
मरुस्थल की रात का लिहाफ़ हैं, उस पे शीतलता का पर्याय गुदड़ा भी बदन के नीचे साफ़ हैं, वो सामने, आँखों की सम्त पेशानी पर बल
मिट्टी और कुर्सी
कर्मवीर 'बुडाना'
मिट्टी का ये मुझ सा गुड़ बदन भौतिक स्वरूप, मैं समय नहीं हूँ, मिट्टी का एक डला सा हूँ बस जिसे सबने जाना ज़िंदादिल मास्�
शुभ दिवस दिवाली
कर्मवीर 'बुडाना'
दीप जल उठे हैं इतने, कि यक़ीं हैं तम हटेगा अमावस का, तू चेहरे पर ख़ुशियाँ रख, चाँद भी आएगा शुभ दिवस का। आज वसुंधरा ने पह
राम-राम
कर्मवीर 'बुडाना'
इंसानियत के नाते मैं हाथ जोड़ता हूँ, इंसान ग़ैर से भी 'राम-राम' करता हैं। मेरी पेशानी पे कोई हसीं हर्फ़ लिखा हैं, बस उसी
आँखों में नमी हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
क्यूँ जा रहे हो यार, मुझमें क्या कमी हैं, झूठा नहीं हूँ मैं, देख, आँखों में नमी हैं। मेरे दिल में बह रही प्रेम की ठंडी
फिरती घिरती छाया
कर्मवीर 'बुडाना'
जिसे भी हैं अपना उल्लू सीधा करना, वो दिखाएगा हमें कोई फ़रेबी सपना। बड़ा इल्म हैं ये वक़्त भरोसे का नहीं, रिश्तों में न
अंधेरे, पनाह दो
कर्मवीर 'बुडाना'
एक ही जन्म में शिद्द्त से करो मोहब्बत, सातों जन्म साथ की मत माँगों सोहबत। बड़ी बेरुखी से गर उसने दिल तोड़ दिया, दि�
बड़ा भाई
प्रवीन 'पथिक'
बहुतों से मिला प्यार मुझे, ख़ुशियाँ भी मिली हर बार मुझे। खाई साथ जीने की कसमें, मानने को; सब तैयार मुझे। एक आया तूफ़ाँ
ये अजीब ज़िन्दगी
प्रवीन 'पथिक'
मुझे पग-पग पर मेरी क़िस्मत को, ठोकर लगती है। सह जाता मैं, उस शूल समझकर। बढ़ जाता उसी रास्ते में, ज़िन्दगी का कोई भूल
हमें साथ रहना है
प्रवीन 'पथिक'
हर बार मुझे ही, नतमस्तक होना पड़ता तेरे समक्ष। तुम नहीं झुकती, क्योंकि हिमालय नहीं झुकता। हर बार मेरी ही, आँखें अश�
धन्य हे उपवन
प्रवीन 'पथिक'
माफ़ करना तू हे उपवन! तुझको कितना ठुकराया था। तेरा बसना-वसंत छोड़, पतझड़ को ही अपनाया था। इसमें न कोई मेरा क़सूर, दु�
वसंत आगमन
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
शीत ऋतु, कुहरे, जाड़े का, सन्नाटे का हुआ अंत। प्रकृति करती शृंगार अरे! देखो आया प्यारा वसंत॥ देखा प्रकृति को आज सु�
अपना हिंदोस्ताँ
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
जिसकी माटी भी मलयज से कमतर नहीं, देश जिससे यहाँ कोई बेहतर नहीं। जिसके मस्तक पे हिमगिरि सुशोभित रहे, जिसके चरणों को
जातियों में बँटा हुआ देश
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
जातियों में बँटा हुआ देश गठ्ठर से अलग हुई उन लकड़ियों जैसा है जिन्हें कोई भी चाहे तब तोड़ सकता है बिना किसी परेशा�
सूर्यास्त को भी करें प्रणाम
गणपत लाल उदय
चलों आज हम ढलते हुए इस सूर्य को करें प्रणाम, साॅंझ हो गई संस्कारों व संस्कृति का करें सम्मान।‌ भानु दिनकर भास्कर द�
वसंत ऋतु सर्वश्रेष्ठ
गणपत लाल उदय
यह वसंत ऋतु लाई फिर से प्यारी-सी सुगन्ध, ये प्रकृति निभाती सबके साथ समान सम्बन्ध। यह जीने की वस्तुएँ सभी को उपलब्ध �
वसंत पंचमी
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
शुक्लपक्ष दिन पञ्चमी, वासंती मधुमास। सरस्वती पूजन सविधि, अरुणिम ज्ञान प्रभास॥ करो कृपा माँ शारदे, मिटा त्रिविध म
बसंत का आगमन
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
जब मधुमास की मधुर गंध है बिखरती, वन-वन, उपवन, भूमि मुस्कान से संवरती। सरसों के खेतों में चंपई झलक है, धरती की चुनरी प�
इन्हीं किन्हीं शब्दों में
हेमन्त कुमार शर्मा
इन्हीं किन्हीं शब्दों में तू और मैं बिखरे हैं, उपेक्षा से पीड़ित हो विराने में निखरे हैं। ऐ टूटे हुए ख़्वाबों, क्य
बुद्धि विवेक सृजन की देवी
उमेश यादव
बुद्धि विवेक सृजन की देवी, ज्ञान का विस्तार है। प्रज्ञा माता, माँ गायत्री, आपकी जय जय कार है॥ नवयुग की अरुणोदय वेल�
सुखद क्षण
प्रवीन 'पथिक'
जब भी तेरे पास आने की कोशिश करता हूँ, तू, एक हवा के झोंको-सा मेरे बदन को छू के निकल जाती हो। तेरी सुगंध हवाओं से मिल �
तेरी प्रतीक्षा में
प्रवीन 'पथिक'
जब से तुझे देखा है तेरी छवि अतःचक्षु से विस्मृत नहीं होती। चाहती है वह सबकुछ जो एक प्रेमी-प्रेमिका के लिए आवश्यक ह�
उनके चेहरे
प्रवीन 'पथिक'
ग़मों की परछाई में, अपनी हर तन्हाई में, दिखते, उनके चेहरे। वो सूनी बाहों में, अपनी हर राहों में, साथ लिए, चलते उनके च
जीवन का इतिहास
प्रवीन 'पथिक'
जीवन! एक कटीली उलझन। स्तिथि, पग-पग पर परीक्षा। पूरी होती, कभी-कभी ही इच्छा। एक-दूजे से होती, अनबनी बातें। घिर जाती
दुःख ही तो है
प्रवीन 'पथिक'
दु:ख! कर्तव्य पथ का बोध कराता है। दु:ख! अपनों के प्रेम की परीक्षा लेता है। दु:ख! दूसरों के दुःखों की अनुभूति कराता है
छोड़ दी मुहब्बत मैंने
प्रवीन 'पथिक'
छोड़ दी मुहब्बत मैंने! पकड़ ली लेखनी। जिससे लिख सकूँ सदियों का संताप, जो हमारे मध्य; चक्की के दो पाटों के बीच, पिसत�
अविचल-पथ
प्रवीन 'पथिक'
छोड़ विसंगति की राहें, सुदृढ़ कर निज दुर्बल बाहें। न तुझसे होगी कभी चूक, तब लक्ष्य होगा तेरे सम्मुख। जो डरकर तू गय�
प्रेम-प्रस्ताव
प्रवीन 'पथिक'
अच्छा! क्या कहा? तुम मुझसे प्रेम करती हो! सचमुच प्रेम करती हो? क्या दुनिया के समक्ष, अपने प्रेम को प्रदर्शित कर सकती
विवशता
प्रवीन 'पथिक'
ग़रीबी ने कर दिया घर में क़ैद! बाहरी चकाचौंध आँखों को कर रही धूमिल; इच्छाएँ दफ़्न हो गईं मज़ार के नीचे। और एक पनारा बन ग
सूना-सूना लगता है
प्रवीन 'पथिक'
तेरे बिन घर अपना ये, सूना-सूना लगता है। फूलों ने खिलना छोड़ दिया, भौरों ने भी मुख मोड़ लिया। पौधे बिन जल के सूख गए, स
माँ शारदे की चरणों में
प्रवीन 'पथिक'
हे माँ! इतनी शक्ति दो, उर में अगाध भक्ति दो। कि तुझसे दूर न जाऊँ मैं, बस तुझको दिल में पाऊँ मैं। हो जाए यदि राह भ्रमित
जीवन के कुछ अवशेष
प्रवीन 'पथिक'
आजकल मन उदास रहता है, तू नहीं होती, एहसास रहता है। मिटा दी मैंने अपनी हर ख़्वाहिश, बस तु ही एक ख़ास रहता है। डर जाता देख
सोचता हूँ
प्रवीन 'पथिक'
सोचता हूँ, कुछ लिख लूँ। लिखना, दर्द को कुरेदता है; या हृदय को झकझोरता है। दोनो स्तिथियों में, आहत होता हृदय ही। जिस
गहरी उदासी
प्रवीन 'पथिक'
तूफ़ान के थपेड़ों के बीच, फँसी मेरी ज़िंदगी! चाहती है आज़ादी; ताकि विचर सके स्वच्छंद आकाश में। बादलों के पीछे, जहाॅं
बहुत दिनों के बाद
प्रवीन 'पथिक'
बहुत दिनों के बाद, लगता है ऐसे; जैसे ज़िंदगी का दायरा सिमट गया हो एक छोटी बूॅंद में। मेघों की भीषण गर्जना, सिसकियों �
दुःख हमें भी हुआ था
प्रवीन 'पथिक'
दु:ख हमें भी हुआ था; जब हमारी साँसें रुकी थी। दर्द तुम्हें भी होगा; जब तुम्हारा व्यापार बंद होगा। भावनाओं का खेल पू�
जिया ही नहीं
प्रवीन 'पथिक'
ज़िंदगी में बहुत कुछ मिल सकता था, लिया ही नहीं! चाहता था खुल कर जीऊँ, पर जिया ही नहीं। घुट-घुट कर जीता रहा, इच्छाओं को द
बातों-बातों में
प्रवीन 'पथिक'
बात भी क्या है! कुत्ते की टेढ़ी पूँछ। या कहूँ कि कुंडली मारे किसी सर्प का दंश। जिसका विष शरीर में नहीं; अंतः में फै�
नव वर्ष मंगलमय हो
प्रवीन 'पथिक'
प्रेमियों के आहत को, हर दिलों के चाहत को। नव वर्ष मंगलमय हो!! खेतों में किसानों को, सीमा पे जवानों को। दिल के दिलदार
आतुर हृदय
प्रवीन 'पथिक'
फिर एक कसक उठी है; हृदय के किसी कोने से। कब आओगे मुझसे मिलने? आलिंगन में भरने को। शांत पड़ गया था अंधड़, डूब गया ख़ाम
अश्रुमय जीवन
प्रवीन 'पथिक'
आज कल मन बहुत उदास है! शायद! कुछ भी नहीं मेरे पास है। दर्द रुलाता है, ऑंखें भर आती हैं, उदासी फिर भी नहीं जाती है। सपन�
तुम्हारे साथ
प्रवीन 'पथिक'
तुम्हारे साथ, चलना चाहता हूॅं, कुछ क़दम। ठहरना चाहता हूॅं, कुछ क्षण। बताना चाहता हूॅं, अपनी जिजीविषा। डूबना चाहता
संबंधों की सार्थकता
प्रवीन 'पथिक'
कथा की प्रासंगिकता, कथ्य के प्रभावशाली होेने से है। शब्दों का जीवंतता, गहरे भाव बोध से होता है। जीवन की अर्थग्राह�
बढ़ने लगी उदासी
प्रवीन 'पथिक'
तुम खो गए हो! जैसे हवाएँ स्पर्श कर निकल जाती हैं। उदासी बढ़ने लगी है; जैसे अँधेरा घहराने लगता है। मन मायूसी के सागर
हर कविता के बाद
प्रवीन 'पथिक'
हर कविता के बाद– कवि की हत्या होती है। हज़ार मरण वह मरता है; और उसे सहर्ष स्वीकार करना पड़ता है। उसकी आत्मा हर अंतर�
दिव्या
प्रवीन 'पथिक'
अंधेरे के सिवा, जीवन में कुछ नहीं है। सुख, आनंद, आह्लाद, सौंदर्यता कुछ भी तो नहीं है। भय मिश्रित आशंका, बेचैनी और अं�
यादों की एक तस्वीर
प्रवीन 'पथिक'
चाहत तो, जैसा रहा ही नहीं कुछ। ऑंखें यूॅं, बीते लम्हों को याद कर; बुनती है एक तस्वीर। जिसमें तुम हो, मैं हूॅं पंछियो
कैसी मायूसी है
प्रवीन 'पथिक'
हर बार कुछ छोड़ जाने को जी चाहता है। हर बार कुछ खो जाने को जी चाहता है। कैसी मायूसी है! जो कभी जाती नहीं। हर बार कुछ
कारण पता नहीं
प्रवीन 'पथिक'
पूरी रात, सो नहीं सका मैं! कारण पता नहीं! शायद! उम्र बढ़ने से नींद प्रायः घटने लगती है। भय मिश्रित चिंता, हावी रहता ह
टूटे सपनें
प्रवीन 'पथिक'
टूट गए हृदय के सपनें, हो गया अश्रुमय जीवन। थक गईं आशा चरण के, वीरान पड़ गया मधुबन। चाह की बहती नदी थी, ख़ुशियों के पंख
कशमकश
प्रवीन 'पथिक'
अजीब कशमकश है यादों की! जिनकी जड़ें गहरी होती हैं; वह टूटता है गहराई से। ऑंखों में तूफ़ान; हृदय में विचारों की आँधी; �
कई रास्ते
प्रवीन 'पथिक'
कई रास्ते फूटते हैं; जीवन के उत्स से। कहीं कोयल मधुर राग छेड़ती है, तो कहीं घुप्प अंधेरा। कहीं झरनों का सुंदर संगी�
सोचा नहीं था
प्रवीन 'पथिक'
सोचा भी नहीं था; बचपन की नादानियाॅं, विकराल रूप धारण कर तांडव नृत्य प्रस्तुत करेंगी। जीवन कितना बदल जाएगा! क्षण भ�
समझ नहीं सका
प्रवीन 'पथिक'
समझ नहीं सका मैं, रिश्तों की बुनियाद का आधार! ऑंखों से बहता प्रेम या अंतःकरण से उमड़ता सागर। अन्यमनस्क सा सोचता हू�
बस! रहो तुम मेरे पास प्रिये
प्रवीन 'पथिक'
जीवन क्या एक पतझड़ है! खिलना और बिखरना है, दुःख का तो आना जाना है। गिरना फिर उठकर चलना है। जब याद तुम्हारी आती है, आँ
आँधी
विजय राही
आँधी आती है जंगल के पेड़ चिपक जाते हैं एक-दूसरे से अपने आपको टूटने से बचते-बचाते हुए वे अपनी डालियों के हाथ हिलाते
ग्वालिन
विजय राही
वह पढ़ती नहीं गाय चराती है कौन जानता है कि गाय चराती है इसलिए पढ़ नहीं पाती हो बाप पिछले साल चेचक से मर गया माँ को फ़
जाना
विजय राही
वह चला गया दुःखी और उदास-सा बिना मेरी तरफ़ देखे-मुस्कुराएँ वह दबे पाँव चला गया आ रही है पानी की आवाज़ स्नान-घर से अन�
तुम्हारे बारे में
विजय राही
सहजन की फलियाँ लेते आना अगर तुम आओ फूलों की सब्ज़ी से मेरा जी भर गया है क़स्बे की हाट में मिलती हैं गंदे नाले की भाजी
याद
विजय राही
सौंफ़ कट रही है मगर उसकी ख़ुशबू नहीं डंठलों में भी उतनी ही ख़ुशबू है जो अभी कुछ दिन और रहेगी हवाओं में तुम्हारे चले
उसका घर
विजय राही
वह कोई अनुपम नहीं होगा और न ही बिल्कुल अलहदा लेकिन मेरी कल्पना में वह ऐसा ही था कभी वह हरी-भरी घाटियों बीच नज़र आत�
जल
विजय राही
स्मृतियों का जल भरा है मेरी आँखों की सुराहियों में यह जल टपकता रहता है लगातार मेरी आँखों की देह से भले ही यह टपके �
तन्हाई से जब उक्ता के बैठ गया
विजय राही
तन्हाई से जब उक्ता के बैठ गया मैं फिर मयख़ाने में आ के बैठ गया पत्थर को पत्थर ही अच्छे लगते हैं सो अपने तबक़े में ज�
किसी से इश्क़ करना चाहिए था
विजय राही
किसी से इश्क़ करना चाहिए था मुझे हद से गुज़रना चाहिए था वो आँखों में उतर कर रह गया है जिसे दिल में उतरना चाहिए था �
है उतना मुख़्तसर क़िस्सा हमारा
विजय राही
है उतना मुख़्तसर क़िस्सा हमारा यहाँ कोई नहीं अपना हमारा यहाँ तुम जो ये सहरा देखते हो ये होता था कभी दरिया हमारा �
पुराने ठाँव से रहती है लिपटी
विजय राही
पुराने ठाँव से रहती है लिपटी ग़रीबी गाँव से रहती है लिपटी हमारे खेत की मिट्टी है साहिब हमेशा पाँव से रहती है लिपट�
आम और पत्तियाँ
मुकेश निर्विकार
टोकरी में रखे आम याद तो करते होंगे पत्तियों के संग-साथ को क्या कभी जाना है तुमने आम और पत्तियों का अंतर्संबंध? सा
रोटी की प्रत्याशा में
मुकेश निर्विकार
मैं मुद्रा के अभाव में निष्कासित हुआ गाँव से और आ खड़ा हुआ शहर में मुद्रा तलाशने इस उम्मीद में कि जो गाँव के खलिहा�
नहीं दे पाओगे
मुकेश निर्विकार
भला कैसे दे पाओगे मुझे मेरे युग से विलग करके कोई एक अन्होता युग मेरे मन माफ़िक़ इसी दुनिया से काटकर जिसमें न बाज़ा�
अभिनय
मुकेश निर्विकार
वह आई ससुराल से सौ-सौ ज़ख़्म सीने में दबाए अनगिनत शिकवा-शिकायतें लिए पीहर में उसने बीमार बाप देखे मुरझाई माँ देख
रौशन है बज़्म-ए-शोला-रुख़ाँ देखते चलें
मख़दूम मुहिउद्दीन
रौशन है बज़्म-ए-शोला-रुख़ाँ देखते चलें इस में वो एक नूर-ए-जहाँ देखते चलें वा हो रही है मय-कदा-ए-नीम-शब की आँख अंगड़ाई
सहर से रात की सरगोशियाँ बहार की बात
मख़दूम मुहिउद्दीन
सहर से रात की सरगोशियाँ बहार की बात जहाँ में आम हुई चश्म-ए-इन्तिज़ार की बात दिलों की तिश्नगी जितनी दिलों का ग़म जि�
एक था शख़्स ज़माना था कि दीवाना बना
मख़दूम मुहिउद्दीन
एक था शख़्स ज़माना था कि दीवाना बना एक अफ़्साना था अफ़्साने से अफ़्साना बना इक परी-चेहरा कि जिस चेहरे से आईना बना �
तुम गुलिस्ताँ से गए हो तो गुलिस्ताँ चुप है
मख़दूम मुहिउद्दीन
तुम गुलिस्ताँ से गए हो तो गुलिस्ताँ चुप है शाख़-ए-गुल खोई हुई मुर्ग़-ए-ख़ुश-इल्हाँ चुप है उफ़ुक़-ए-दिल पे दिखाई नही�
फिर छिड़ी रात बात फूलों की
मख़दूम मुहिउद्दीन
फिर छिड़ी रात बात फूलों की रात है या बरात फूलों की फूल के हार फूल के गजरे शाम फूलों की रात फूलों की आप का साथ साथ फू
ये कौन आता है तन्हाइयों में जाम लिए
मख़दूम मुहिउद्दीन
ये कौन आता है तन्हाइयों में जाम लिए जिलौ में चाँदनी रातों का एहतिमाम लिए चटक रही है किसी याद की कली दिल में नज़र मे
अब कहाँ जा के ये समझाएँ कि क्या होता है
मख़दूम मुहिउद्दीन
अब कहाँ जा के ये समझाएँ कि क्या होता है एक आँसू जो सर-ए-चश्म-ए-वफ़ा होता है इस गुज़रगाह में इस दश्त में ऐ जज़्बा-ए-इश्
आप की याद आती रही रात भर
मख़दूम मुहिउद्दीन
आप की याद आती रही रात भर चश्म-ए-नम मुस्कुराती रही रात भर रात भर दर्द की शम्अ जलती रही ग़म की लौ थरथराती रही रात भर ब
तेरे दीवाने तिरी चश्म ओ नज़र से पहले
मख़दूम मुहिउद्दीन
तेरे दीवाने तिरी चश्म ओ नज़र से पहले दार से गुज़रे तिरी राहगुज़र से पहले बज़्म से दूर वो गाता रहा तन्हा तन्हा सो ग�
उसी चमन में चलें जश्न-ए-याद-ए-यार करें
मख़दूम मुहिउद्दीन
उसी चमन में चलें जश्न-ए-याद-ए-यार करें दिलों को चाक गरेबाँ को तार-तार करें शमीम-ए-पैरहन-ए-यार क्या निसार करें तुझी क�
आज की रात न जा
मख़दूम मुहिउद्दीन
रात आई है बहुत रातों के ब'अद आई है देर से दूर से आई है मगर आई है मरमरीं सुब्ह के हाथों में छलकता हुआ जाम आएगा रात टूटे�
अंधेरा
मख़दूम मुहिउद्दीन
रात के हाथ में इक कासा-ए-दरयुज़ा-गरी ये चमकते हुए तारे ये दमकता हुआ चाँद भीक के नूर में माँगे के उजाले में मगन यही मल
अपना शहर
मख़दूम मुहिउद्दीन
ये शहर अपना अजब शहर है कि रातों में सड़क पे चलिए तो सरगोशियाँ सी करता है वो ला के ज़ख़्म दिखाता है राज़-ए-दिल की तरह
'ग़ालिब'
मख़दूम मुहिउद्दीन
तुम जो आ जाओ आज दिल्ली में ख़ुद को पाओगे अजनबी की तरह तुम फिरोगे भटकते रस्तों में एक बे-चेहरा ज़िंदगी की तरह दिन है
सन्नाटा
मख़दूम मुहिउद्दीन
कोई धड़कन न कोई चाप न संचल न कोई मौज न हलचल न किसी साँस की गर्मी न बदन ऐसे सन्नाटे में इक-आध तो पत्ता खड़के कोई पिघ�
मौत का गीत
मख़दूम मुहिउद्दीन
अर्श की आड़ में इंसान बहुत खेल चुका ख़ून-ए-इंसान से हैवान बहुत खेल चुका मोर-ए-बे-जाँ से सुलैमान बहुत खेल चुका वक़्त �
अभी न रात के गेसू खुले न दिल महका
मख़दूम मुहिउद्दीन
अभी न रात के गेसू खुले न दिल महका कहो नसीम-ए-सहर से ठहर ठहर के चले मिले तो बिछड़े हुए मय-कदे के दर पे मिले न आज चाँद ही �
ये रक़्स रक़्स-ए-शरर ही सही मगर ऐ दोस्त
मख़दूम मुहिउद्दीन
ये रक़्स रक़्स-ए-शरर ही सही मगर ऐ दोस्त दिलों के साज़ पे रक़्स-ए-शरर ग़नीमत है क़रीब आओ ज़रा और भी क़रीब आओ! कि रूह का
तू ने किस दिल को दुखाया है तुझे क्या मालूम
मख़दूम मुहिउद्दीन
तू ने किस दिल को दुखाया है तुझे क्या मालूम किस सनम-ख़ाने को ढाया है तुझे क्या मालूम हम ने हँस हँस के तिरी बज़्म में ऐ
उसी अदा से उसी बाँकपन के साथ आओ
मख़दूम मुहिउद्दीन
उसी अदा से उसी बाँकपन के साथ आओ फिर एक बार उसी अंजुमन के साथ आओ हम अपने एक दिल-ए-बे-ख़ता के साथ आएँ तुम अपने महशर-ए-दार
टूटे हुए तारे
मख़दूम मुहिउद्दीन
नवा-ए-दर्द मिरी कहकशाँ में डूब गई वो चाँद तारों की सैल-ए-रवाँ में डूब गई समन-बरान-ए-फ़लक ने शरर को देख लिया ज़मीन वाल�
नींद
मख़दूम मुहिउद्दीन
ये किस पैकर की रंगीनी सिमट कर दिल में आती है मिरी बे-कैफ़ तंहाई को यूँ रंगीं बनाती है ये किस की जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ र
अगर साथ देते जो
प्रमोद कुमार
अगर साथ देते जो, तुम भी हमारे, तो रख देते क़दमों में, दुनिया तुम्हारे। सरल सुखदायी, सुन्दर सुशील हो, निर्मल हो पावन ज�
राग यह अनुराग का
जानकीवल्लभ शास्त्री
राग यह अनुराग का खेल पानी आग का भोग दुख; सुख-त्याग का कंठ से कढ़ता कि चढ़ता सुर; उतरता सुर! नयन झरते ज्यों गगन बरसते
और कसो तार
जानकीवल्लभ शास्त्री
और कसो तार तार सप्तक में गाऊँ! ऐसी ठोकर दो मिजराब की अदा से गूँज उठे सन्नाटा सुरों की सदा से ठंडे साँचों में मैं ज्�
कविता के बहाने
श्रीविलास सिंह
वातानुकूलित कमरों की बासी शीतलता में जो जन्म लेती है काफ़ी के प्यालों में, आकर ग्रहण करती है सिगरेट के धुएँ से कवि�
आषाढ़ की साँझ
बाबुषा कोहली
अग्नि को नहीं हमने बारिशों को साक्षी मानकर खाई थी क़समें वादियों में बरसती ये बौराई बूँदें स्वप्न को चुभतीं किसी
बा-वफ़ा
बाबुषा कोहली
पानी की गाँठ से बाँध नाता फिर छूट नहीं पाती है नदी नहीं देती दरिया को दग़ा गीली देह में चख आत्मा का नेह नमक का मोल
स्वप्न में प्रेम
बाबुषा कोहली
दूसरे दिनों से ज़रा ज़्यादा ही होती है हरारत उस सुबह की रॉकेट-सा आसमान चढ़ जाता तापमान यकायक भाप के जंगल में तब्दील �
दुःख का प्रतिबिंब
बाबुषा कोहली
यह जो क्षण-क्षण में उबलता है चूल्हे पर रखी चाय की तरह दुःख नहीं है दुःख की महज़ सनसनाहट है ज्यों नुकीला इंजेक्शन बे
चलिए फिर! कुछ और बात करें
बाबुषा कोहली
ऐसा तो अक्सर ही होता है कि पहला प्रेम घाव बन जाता है और दूजा औषध इस धारणा को मानें तो घाव के साथ ही मिट जाती है जड़ी-बू
संगी
बाबुषा कोहली
नदी से बतियाते हुए घाट सिरा देते अपनी पीड़ाएँ रात के एकांत में उदार जल सोख लेता घाट के आस्तिक दुःखों को एक कविता म
प्रेम की गालियाँ
बाबुषा कोहली
तुम्हें औषध मिले, पीर न मिले दृष्टि मिले, दृश्य न मिले नींदें मिलें, स्वप्न न मिले गीत मिलें, धुन न मिले नाव मिले, नद�
अ-भाषा में
बाबुषा कोहली
लोग अपनी भाषा में क्या कहते हैं, उसका बहुत अर्थ नहीं मेरे लिए। जो वे कहते नहीं, मेरे कानों से बच कर निकलता नहीं। सीख
मुझे अपनी नदी को कुछ जवाब देने हैं
बाबुषा कोहली
जिन तितलियों को मैंने आँखों से छू कर छोड़ दिया वे फूल-फूल बैठ कर लौट आईं मेरी कविताओं में महफ़ूज़ रहने जिस प्रेम को छो
ख़ौफ़ उजले का
बाबुषा कोहली
आप मानें या न मानें उजाले का भी एक अलग ही तरह का ख़ौफ़ होता है एकदम से कहाँ नज़र टिक पाती है सूरज पर मन की मोटी परतें तक क
आख़िरी चिट्ठी
बाबुषा कोहली
सुग्गे के पंख-सा दुपट्टा जिसके एक छोर में बँधी रहती स्मृतियों की इलायची हमेशा दूजी गाँठ में सत्तर बरस लड़ने का वादा
अडोल
बाबुषा कोहली
डेल्टा में जमा हो रहते नदी के अवसाद बहने नहीं पाता जल, फड़फड़ा के मर जाता। तरल का वेग नष्ट करने वाले त्रिकोण बन जाते �
वहम
दीपक राही
ज़हन में है वो मेरी, तो ज़हन में ही रहने दो, वास्तविकता में क्या रखा है, अगर वो वहम में है मेरी, तो वहम ही रहने दो। वह�
रात
दीपक राही
रात समंदर-सी, देखो तो दूर तक अँधेरा, अपने में ढेरों कहानियाँ समेटे हुए, बे-परवाह, शांत, अपने आग़ोश में लेकर सुकून देत�
हालात
दीपक राही
मौजूदा हालात का, क्या हम ज़िक्र करें, जो आने वाला है, उसकी फ़िक्र करें, पार्क भी यहाँ शमशान बने, पानी में है लाशें बहे
मैंने जो देखा
दीपक राही
मैंने कच्चे घरों को टूटते देखा, आँसुओं को ज़मीन पर टपकते हुए देखा, तन्हाइयों से ख़ुद को लड़ते हुए देखा, लहरों को किना�
नींद कहाँ आती है
प्रमोद कुमार
अकेला मन उदास हो, और सपनों का दास हो। नींद कहाँ आती है! ख़ूबसूरत जीवनसाथी हो, पर हरदम जज़्बाती हो। नींद कहाँ आती है! �
भाव हमारे
प्रमोद कुमार
उठे जो मन में तुम्हारी ख़ातिर, सदा पवित्र थे भाव हमारे। ना जाने कैसे सहा था हमने, अक्खड़पन भरे ताव तुम्हारे। जीवन प
ड्यूटी की ब्यूटी
प्रमोद कुमार
पिछले चुनाव का यात्रा वृतांत सुनकर ही मिश्रा जी ने इस बार संपन्न होनेवाले पंचायत चुनाव में पिताजी का नाम चुनाव ड्य
आओ बैठो पल-दो-पल
प्रमोद कुमार
मेरा पहला प्यार तुम्हीं थे, जीवन का आधार तुम्हीं थे, चंपा-कुसुम-चमेली जैसी, मधुमय रस-शृंगार तुम्हीं थे। पर छोटी-सी �
जिस दिन समझ लोगे
प्रमोद कुमार
जिस दिन समझ लोगे मेरे प्यार को तुम, मज़ा ज़िंदगी का आने लगेगा। आँखों में सपने सजने लगेंगे, नशा बेख़ुदी का छाने लगेगा।
आ कर तो देखो
प्रमोद कुमार
सृजन के प्रेमगीत गाकर तो देखो, कभी गाँव मेरे आ कर तो देखो। धरती को चुनर धानी सरसों ओढ़ाए, सूरज की लाली जैसे बिंदिया
हवा के हाथ में ख़ंजर है और सब चुप हैं
गोविन्द गुलशन
हवा के हाथ में ख़ंजर है और सब चुप हैं लहू-लुहान मिरा घर है और सब चुप हैं सदाएँ बिखरी पड़ी हैं तमाम आँगन में नज़र नज़�
सँभल के रहिएगा ग़ुस्से में चल रही है हवा
गोविन्द गुलशन
सँभल के रहिएगा ग़ुस्से में चल रही है हवा मिज़ाज गर्म है मौसम बदल रही है हवा वो जाम बर्फ़ से लबरेज़ है मगर उस से लिप�
मुंतज़िर आँखें हैं मेरी शाम से
गोविन्द गुलशन
मुंतज़िर आँखें हैं मेरी शाम से शम्अ रौशन है तुम्हारे नाम से छीन लेता है सुकूँ शोहरत का शौक़ इस लिए हम रह गए गुमनाम
उल्फ़त का दर्द-ए-ग़म का परस्तार कौन है
गोविन्द गुलशन
उल्फ़त का दर्द-ए-ग़म का परस्तार कौन है दुनिया में आँसुओं का तलबगार कौन है ख़ुशियाँ चला हूँ बाँटने आँसू समेट कर उलझ�
आप जब चेहरा बदल कर आ गए
गोविन्द गुलशन
आप जब चेहरा बदल कर आ गए सच तो ये है हम भी धोका खा गए आप अब आए हैं फ़स्ल-ए-गुल के बअ'द फूल जब उम्मीद के मुरझा गए अश्क क्�
दर्द जब जब जहाँ से गुज़रेगा
गोविन्द गुलशन
दर्द जब जब जहाँ से गुज़रेगा क़ाफ़िला हो के जाँ से गुज़रेगा फ़िक्र में आएगा सवाल मिरा और जवाब उस का हाँ से गुज़रेग�
दिल में ये एक डर है बराबर बना हुआ
गोविन्द गुलशन
दिल में ये एक डर है बराबर बना हुआ मिट्टी में मिल न जाए कहीं घर बना हुआ इक लफ़्ज़ बेवफ़ा कहा उस ने फिर इस के बा'द मैं उ�
शख़्सियत उस ने चमक-दार बना रक्खी है
गोविन्द गुलशन
शख़्सियत उस ने चमक-दार बना रक्खी है ज़ेहनियत क्या कहें बीमार बना रक्खी है इस क़दर भीड़ कि दुश्वार है चलना सब का और
तुम पर दाग़ है
ईशांत त्रिपाठी
सोलह वर्षीय एकलौता बेटा हर्शल अपने पिता के डाँट से आहत भीतर ही भीतर चूर हो चुका था। जबसे उसे चेतना मिली तबसे आज तक अ�
चंट लेखिका
ईशांत त्रिपाठी
क्या लिखते हो रंजन भाई!! सच कहूँ तो जो कोई भी आपके लेखन को पढ़ेगा तो इन शब्द-अर्थ और विषय के सौन्दर्य में उसकी तादात्म
मुरझाई तुलसी
ईशांत त्रिपाठी
आज ऐसा मीतेश को क्या हुआ कि लगातार गीता-सार पचासों बार और बार-बार दोहराए ही जा रहा है? आवाज़ मीतेश की सुरीली तो है पर �
आशीर्वाद
ईशांत त्रिपाठी
मयंक कुछेक दिन की छुट्टी मिलते ही अपने घर लौट रहा था। सरकारी कारणों से बस वाले उस समय अनशन पर जमे थे। चूँकि उसका सफ़र �
कब तक?
ईशांत त्रिपाठी
तुम रो रहे हो कुशाग्र! पर किसलिए? अकेले यूँ रोना अच्छा नहीं, यह करके तुम मेरे साथ भी धोखा कर रहे हो। कुशाग्र कुन्दन को
हिंदी प्राण-शृंगार
ईशांत त्रिपाठी
जड़ता के पट टूट गिरें, अब चमक उठा मन द्वार हो, जब से मन में दीप बने है, हिन्दी कवियों के काव्य हो। कौन जरा, क्या व्याध�
छाप
एकांत श्रीवास्तव
मुरुम वाली ज़मीन पर नंगे पाँव चलता हूँ तो तलुवे लाल हो जाते हैं धरती अपना रंग छोड़ देती है किसी वन से गुज़रते हुए �
उपहार
एकांत श्रीवास्तव
नफ़रत में फन काढ़कर फुँफकारती है भाषा धधकती है जंगल में लगी आग की तरह बस प्यार में लीचियों की तरह सुर्ख़ हो जाती �
होली का गीत
एकांत श्रीवास्तव
दुःख से भरा है यह माथा माथे पर लगा दो गुलाल का टीका जलते घरों की लपटों से झुलस गए हैं पेड़ इनसे लिपटकर रोई हैं स्त्�
पिता की समाधि
एकांत श्रीवास्तव
गाँव के घर में पिता की समाधि है बखरी में आँवले के पेड़ के नीचे घर पहुँचता हूँ तो साफ़ करता हूँ समाधि पर झड़े हुए पत्
जिनके पिता नहीं होते
एकांत श्रीवास्तव
जिनके पिता नहीं होते बग़ैर किसी उँगली या हाथ के सहारे के चलते हैं ऐसे बच्चे और पाँव में गड़ा काँटा निकालते हैं स्व�
जन्मदिन
एकांत श्रीवास्तव
आकाश के थाल में तारों के झिलमिलाते दीप रखकर उतारों मेरी आरती दूध मोंगरा का सफ़ेद फूल धरो मेरे सिर पर गुलाल से रँग
बीज से फूल तक
एकांत श्रीवास्तव
आ गया भादों का पानी काँस के फूलों को दुलारता और चैत की सुलगती दोपहरी में पड़ी है मन की चट्टान एक दूब की हरियाली तक �
शरद का गीत
एकांत श्रीवास्तव
गोबर लिपा मेरा शरद का आँगन शरद के आँगन में प्रिया की रँगोली प्रिया की रँगोली में दस-दस रंग दस-दस रंगों में कातिक के �
मैं इस उमीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
वसीम बरेलवी
मैं इस उमीद पे डूबा कि तू बचा लेगा अब इस के बा'द मिरा इम्तिहान क्या लेगा ये एक मेला है वा'दा किसी से क्या लेगा ढलेगा �
मैं आसमाँ पे बहुत देर रह नहीं सकता
वसीम बरेलवी
मैं आसमाँ पे बहुत देर रह नहीं सकता मगर ये बात ज़मीं से तो कह नहीं सकता किसी के चेहरे को कब तक निगाह में रक्खूँ सफ़र �
तू समझता है कि रिश्तों की दुहाई देंगे
वसीम बरेलवी
तू समझता है कि रिश्तों की दुहाई देंगे हम तो वो हैं तिरे चेहरे से दिखाई देंगे हम को महसूस किया जाए है ख़ुश्बू की तरह
वो मुझ को क्या बताना चाहता है
वसीम बरेलवी
वो मुझ को क्या बताना चाहता है जो दुनिया से छुपाना चाहता है मुझे देखो कि मैं उस को ही चाहूँ जिसे सारा ज़माना चाहता ह
तेरी याद
वसीम बरेलवी
मैं तिरी याद को सीने से लगाए गुज़रा अजनबी शहर की मशग़ूल गुज़र गाहों से बेवफ़ाई की तरह फैली हुई राहों से नई तहज़ीब क
दीवाने की जन्नत
वसीम बरेलवी
मेरा ये ख़्वाब कि तुम मेरे क़रीब आई हो अपने साए से झिझकती हुई घबराती हुई अपने एहसास की तहरीक पे शरमाती हुई अपने क़द
खिलौना
वसीम बरेलवी
देर से एक ना-समझ बच्चा इक खिलौने के टूट जाने पर इस तरह से उदास बैठा है जैसे मय्यत क़रीब रक्खी हो और मरने के बा'द हर हर
ख़्वाब नहीं देखा है
वसीम बरेलवी
मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है रात खिलने का गुलाबों से महक आने का ओस की बूंदों में सूरज के समा जाने का चाँ�
बेबसी
वसीम बरेलवी
वक़्त के तेज़ गाम दरिया में तू किसी मौज की तरह उभरी आँखों आँखों में हो गई ओझल और मैं एक बुलबुले की तरह इसी दरिया के �
मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है
वसीम बरेलवी
मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है इसी लिए तो समुंदर पे रहम आता है वो इस तरह भी मिरी अहमियत घटाता है कि मुझ से मिलन�
कहाँ सवाब कहाँ क्या अज़ाब होता है
वसीम बरेलवी
कहाँ सवाब कहाँ क्या अज़ाब होता है मोहब्बतों में कब इतना हिसाब होता है बिछड़ के मुझ से तुम अपनी कशिश न खो देना उदास
फूल ख़ुद अपने हुस्न में गुम है
वसीम बरेलवी
फूल ख़ुद अपने हुस्न में गुम है उस को कब चाहने की फ़ुर्सत है आओ काँटों से दोस्ती कर लें जिन को हमदर्द की ज़रूरत है
मेरी तन्हाइयाँ भी शाएर हैं
वसीम बरेलवी
मेरी तन्हाइयाँ भी शाएर हैं नज़्र-ए-अशआर-ओ-जाम रहती हैं अपनी यादों का सिलसिला रोको मेरी नींदें हराम रहती हैं
दूसरों को मिटाने की धुन में
वसीम बरेलवी
दूसरों को मिटाने की धुन में आदमी ख़ुद को यूँ मिटाता है जैसे चुभने की फ़िक्र में काँटा शाख़ से ख़ुद ही टूट जाता है
यूँ लगे तेरे तज़्किरा से अगर
वसीम बरेलवी
यूँ लगे तेरे तज़्किरा से अगर नाम मेरा हटा दिया जाए जैसे इक फूल की कहानी से ज़िक्र-ए-ख़ुशबू उड़ा दिया जाए
मौत के ब'अद भी तो चलता है
वसीम बरेलवी
मौत के ब'अद भी तो चलता है ज़िंदगी तेरे जब्र का नाटक फूल हँसते हुए ही जाते हैं शाख़ से बाग़बाँ की झोली तक
दर-ब-दर सर झुकाए फिरता है
वसीम बरेलवी
दर-ब-दर सर झुकाए फिरता है आरज़ी इक़्तिदार की ख़ातिर कितना मजबूर हो के जीता है आदमी इख़्तियार की ख़ातिर
आते आते मिरा नाम सा रह गया
वसीम बरेलवी
आते आते मिरा नाम सा रह गया उस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया रात मुजरिम थी दामन बचा ले गई दिन गवाहों की सफ़ में खड़ा
ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
वसीम बरेलवी
ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है समुंदरों ही के लहजे में बात करता है खुली छतों के दिए कब के बुझ गए होते कोई तो है ज
भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे
वसीम बरेलवी
भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे हम आँसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे हमीं ने कर दिया ऐलान-ए-गुमरही वर्ना हमारे प�
वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
वसीम बरेलवी
वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता मगर इन एहतियातों से तअ'ल्लुक़ मर नहीं जाता बुरे अच्छे हों जैसे भी हों सब �
हवेलियों में मिरी तर्बियत नहीं होती
वसीम बरेलवी
हवेलियों में मिरी तर्बियत नहीं होती तो आज सर पे टपकने को छत नहीं होती हमारे घर का पता पूछने से क्या हासिल उदासियो�
मैं ये नहीं कहता कि मिरा सर न मिलेगा
वसीम बरेलवी
मैं ये नहीं कहता कि मिरा सर न मिलेगा लेकिन मिरी आँखों में तुझे डर न मिलेगा सर पर तो बिठाने को है तय्यार ज़माना लेकि
सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ
वसीम बरेलवी
सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ कितना बड़ा मज़ाक़ हुआ रौशनी के साथ शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ कीजे मुझ�
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
वसीम बरेलवी
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत ब'अद का ह�
ख़ुशी का साथ मिला भी तो दिल पे बार रहा
वसीम बरेलवी
ख़ुशी का साथ मिला भी तो दिल पे बार रहा मैं आप अपनी तबाही का ज़िम्मेदार रहा अधूरे ख़्वाब गए दिन अजान अंदेशे मिरी हय�
हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें
वसीम बरेलवी
हादसों की ज़द पे हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें तुम ने मेरे घर न आने की क़स�
शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं
वसीम बरेलवी
शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं फिर वही तल्ख़ी-ए-हालात मुक़द्दर ठहर�
तमाम उम्र बड़े सख़्त इम्तिहान में था
वसीम बरेलवी
तमाम उम्र बड़े सख़्त इम्तिहान में था वो फ़ासला जो तिरे मेरे दरमियान में था परों में सिमटा तो ठोकर में था ज़माने की
न जाने क्यूँ मुझे उस से ही ख़ौफ़ लगता है
वसीम बरेलवी
न जाने क्यूँ मुझे उस से ही ख़ौफ़ लगता है मिरे लिए जो ज़माने को छोड़ आया है अँधेरी शब के हवालों में उस को रक्खा है जो
दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता
वसीम बरेलवी
दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता पहुँचा है बुज़ुर्गों के बयानों से जो हम तक क्
उदासियों में भी रस्ते निकाल लेता है
वसीम बरेलवी
उदासियों में भी रस्ते निकाल लेता है अजीब दिल है गिरूँ तो सँभाल लेता है ये कैसा शख़्स है कितनी ही अच्छी बात कहो कोई
मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है
वसीम बरेलवी
मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है जो दिल में है उसे आँखों से कहलाना ज़रूरी है उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज�
कटे हाथ
अशोक चक्रधर
बग़ल में पोटली दबाए, एक सिपाही थाने में घुसा और सहसा थानेदार को सामने पाकर सैल्यूट मारा, थानेदार ने पोटली की तरफ़ न�
आलपिन कांड
अशोक चक्रधर
बंधुओ, उस बढ़ई ने चक्कू तो ख़ैर नहीं लगाया पर आलपिनें लगाने से बाज़ नहीं आया। ऊपर चिकनी-चिकनी रैक्सीन अंदर ढेर सा�
हँसी
विष्णु खरे
छोटे शहर की रात के साढ़े आठ बज चुके हैं हिंदी प्रचारिणी पुस्तकालय के हॉल में जो मास्टर स्कूली लड़के कुछ लड़कियाँ �
गर्मियों की शाम
विष्णु खरे
लालटेन की कमज़ोर रोशनी की तरह फैल जाती है सिमटने से पहले धूप पुलिस लाइन का मैदान क़वायद के बाद सूना हो चुका होता है क
दोस्त
विष्णु खरे
एक नौजवान पुलिस सब-इंस्पैक्टर से दोस्ती करो। तुम देखोगे कि यह कठिन नहीं है—अपने सिद्धांतों की रक्षा करते हुए भी य�
अंतिम
विष्णु खरे
क्या याद आता होगा मृत्यु के प्रारंभ में मर्मांतक वेदना की लंबी मौत या कृतज्ञ बेहोशी में या उससे कुछ पहले— एक बहुत �
लड़कियों के बाप
विष्णु खरे
वे अक्सर वक़्त के कुछ बाद पहुँचते हैं हड़बड़ाए हुए बदहवास पसीने-पसीने साइकिल या रिक्शों से अपनी बेटियों और उनके टा
स्वीकार
विष्णु खरे
आप जो सोच रहे हैं वही सही है मैं जो सोचना चाहता हूँ वह ग़लत है सामने से आपका सर्वसम्मत व्यवस्थाएँ देना सही है पिछली
उसी तरह
विष्णु खरे
कुछ ऐसा है कि मैं अकेली औरतों और अकेले बच्चों को ज़मीन पर बैठे खाना खाते नहीं देख सकता पता नहीं क्यों मैं एक अनाम उ�
नींद में
विष्णु खरे
कैसे मालूम कि जो नहीं रहा उसकी मौत नींद में हुई? कह दिया जाता है कि वह सोते हुए शांति से चला गया क्या सबूत है? क्या �
अकेला आदमी
विष्णु खरे
अकेला आदमी लौटता है बहुत रात गए या शायद पूरी रात बाद भी घर के ख़ालीपन को स्मृतियों के गुच्छे से खोलता हुआ अगर वे लो�
विलोम
विष्णु खरे
कहना मुश्किल है कि हर वह व्यक्ति जिसके लिए शोक-सभा की जाती है उस शोक का हक़दार होता है भी या नहीं जो शोक उसके लिए मन�
एक चीज़ के लिए
विष्णु खरे
प्रत्येक पुरागाथा-स्थिति में मैंने अपनी कल्पना की है शुरुआत में सब कुछ ठीक रहता है फिर जब मैं अमर्ष में भरकर अपना �
लालटेन जलाना
विष्णु खरे
लालटेन जलाना उतना आसान बिल्कुल नहीं है जितना उसे समझ लिया गया है अव्वल तो तीन-चार सँकरे कमरों वाले छोटे-से मकान मे�
निवेदन
विष्णु खरे
डॉक्टरों मुझे और सब सलाह दो सिर्फ़ यह न कहो कि अपने हार्ट का ख़याल रखें और ग़ुस्सा न किया करें आप— क्योंकि ग़ुस्से के क�
क्रियाएँ
परमानंद श्रीवास्तव
आँखें देख रही हैं जो देखने के लिए बनी हैं आज चूल्हा नहीं जला कान सुन रहे हैं जो सुनने के लिए बने हैं बच्चे की फ़ी�
गाय
परमानंद श्रीवास्तव
कई-कई दिनों तक कुछ भी नहीं दिखाई दिया न पेड़, न पहाड़, न नदियाँ, न जंगल बस्ती भी नहीं दिखी कोई कई-कई दिनों तक सूने �
समय : एक
परमानंद श्रीवास्तव
समय अब पंचांग देखकर नहीं आता न तिथि या मुहूर्त देखकर वह दिल्ली-कराची-लंदन के धमाकों को सुनकर आता है ज़मीन पाँव तल
चौथा शब्द
परमानंद श्रीवास्तव
जब उसने सारा सफ़र पूरा कर लिया वह एक टोकेन के लिए रुका हुआ था टोकेन अर्दली के पास नहीं था इसलिए राष्ट्रपति के पास �
नदी
परमानंद श्रीवास्तव
पथरीली चट्टानों में से चुपके से निकल आती है नदी इतने चुपके से कि उसे याद करना मुश्किल होता है और जब हम उसे भूलना
माँ और बच्चा
परमानंद श्रीवास्तव
माँ बच्चे को बोलना सिखा रही है बच्चा माँ को रूठना इस बात पर कि ठीक कहने के समय बच्चा बोलने से इंकार करता है बच्च�
वह
परमानंद श्रीवास्तव
वह एक साथ पहुँचना चाहता था वीरगंज हावड़ा और भुसावल वह फेंक रहा था अपने को यहाँ-वहाँ लगातार छोड़ता हुआ अपने को �
आश्चर्य
परमानंद श्रीवास्तव
शाम हुई और धुँध-सी छा गई चारों ओर छिप गए नदी तट छिप गए चमकते हुए टीले कितना आश्चर्य कि पूरे-पूरे वृक्ष छिप गए अ
इसी को कहते हैं प्रेम
परमानंद श्रीवास्तव
पूरे-पूरे 'हाँ' के लिए और पूरे-पूरे 'नहीं' के लिए जब वे बहुत ज़ोर दे रहे होंगे ठक-ठक बजती रात में जब वे दिखा रहे होंगे
बूढ़ा
परमानंद श्रीवास्तव
घने जंगलों से गुज़रते हुए बस से ज़रा-सा सिर निकाल कर बूढ़े ने देखा मधुपुर! और ख़ुश हो गया! अचानक उसे लगा वह पहले कभ
नींद और कविता
अरुणाभ सौरभ
जैसे अन्न भूख के लिए नदी पानी के लिए पानी ज़िंदगी के लिए ज़िंदगी तुम्हारे लिए तुम्हारी बाँहें सुकून के लिए तुम कवि�
गाँव की उदासी का गीत
अरुणाभ सौरभ
कहीं चले गए हैं पेड़ की डाल से पंछी उदास हो-होकर नहीं है बसेरा गिद्ध का ताड़ पर बिज्जू आम की डाल से टूट कर ग़ायब हो चुक�
प्यार तुम्हारा
अरुणाभ सौरभ
(एक) तुम्हारी आँखें— महेंद्रू घाट, बाँस घाट तुम्हारे होंठ गोलघर, बिस्कोमान तुम्हारी बाँहें— गांधी मैदान तुम्हा�
कथकही
अरुणाभ सौरभ
वो किसी भूख से ऊपर उठी थी जठरागिन से कितने मौसम बीते घड़ियाँ सुहानी बीतीं काजल से कारी रात बीती बादल से भीगी बात बी�
लुक्का
अरुणाभ सौरभ
शाम की धुँधलकी के बाद गहराता अंधकार आम के घने बगीचे मे पसर कर ऊँघती रात वनबिलाड़ और लोमड़ी के हू हू... हू ऊ... हू हू... में
उस दिन की प्रतीक्षा में
अरुणाभ सौरभ
मुरझा जाएँगे सूखे फूल सारे पानी किसी अनजान लड़की-सा बहने लगेगा मेरे भीतर और ट्रैफ़िक सिग्नल देंगे पेड़ उस रास्ते के �
टूटने का दर्द
प्रवीन 'पथिक'
हृदय और मस्तिष्क में, दीर्घ काल से चल रहा अन्तर्द्वंद आदमी के विचार को शून्य और शिथिल कर देता है। आदमी का दर्द– और �
चंदा रे! ग़ुस्सा मत होना!
कुमार विश्वास
चंदा रे! ग़ुस्सा मत होना! ज़ालिम था वो घना अँधेरा जिसने मेरा आँगन घेरा बनते-बनते फिर से बिखरा तेरे द्वारे का पगफेर�
अभी-अभी एक गीत रचा है तुमको जीते-जीते
कुमार विश्वास
अभी-अभी एक गीत रचा है तुमको जीते-जीते अभी-अभी अमृत छलका है अमृत पीते-पीते अभी-अभी साँसों में उतरी है साँसों की माया
मेरे मन तेरे पागलपन को
कुमार विश्वास
मेरे मन तेरे पागलपन को कौन बुझाए तेरी ठंडी अगन को दुनिया के मेले में, घूमे अकेले तू काहे को यादों से खेले ख़ुद से क�
सच के लिए लड़ो मत साथी
कुमार विश्वास
सच के लिए लड़ो मत साथी, भारी पड़ता है! जीवन भर जो लड़ा अकेला बाहर-अंदर का दु:ख झेला पग-पग पर कर्तव्य-समर में जो प्राण�
बहुत देर से सोकर जागी
कुमार विश्वास
बहुत देर से सोकर जागी दिशा-वधू मौसम के गाँव अत: डरी लज्जित-सी पहुँची छूने दिवस-पिया के पाँव आँखों वाली क्षितिज-रेख
साल मुबारक
कुमार विश्वास
उम्र बाँटने वाले उस ठरकी बूढ़े ने दिन लपेट कर भेज दिए हैं नए कैलेंडर की चादर में इनमें कुछ तो ऐसे होंगे जो हम दोनों
तुम्हें मुझसे पूछना था
कुमार विश्वास
तुम्हें मुझसे पूछना था कि पूछना जगह देना होता है तुम्हें मुझसे पूछना था कि इससे तुम्हें भी जगह मिलती पर तुमने सोच�
बच्चों के क्या नाम रखे हैं?
कुमार विश्वास
भाषण देने कभी गया था मथुरा के कोई कॉलिज में रस्ते भर खाने के पैसे बचा लिए थे। और ख़रीदे थे जो मैंने जन्मभूमि वाले म�
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
कुमार विश्वास
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह? ढेर-सी चमक-चहक चेहरे पर लटकाए हुए हँसी को बेचकर बेमोल वक़्त के हाथों शाम तक उन ह
बोलो रानी क्या नाम करूँ?
कुमार विश्वास
बोलो रानी क्या नाम करूँ? क्या गोपन-गोपन नाद सुनूँ? या जनम-जनम बदनाम करूँ? किरणों की सुर्ख़ अलगनी पर जिस दिन तुम टाँग
माँ
कुमार विश्वास
माँ पालती है पेड़ एक लाड़ से प्यार से दुलार से। माँ सुलाती है लोरी गा पिलाती है दूध लुटाती है तन मन प्राण पेड़ ह�
मैं तो झोंका हूँ हवाओं का उड़ा ले जाऊँगा
कुमार विश्वास
मैं तो झोंका हूँ हवाओं का उड़ा ले जाऊँगा जागती रहना तुझे तुझ से चुरा ले जाऊँगा हो के क़दमों पे निछावर फूल ने बुत से
ख़ुद को आसान कर रही हो ना
कुमार विश्वास
ख़ुद को आसान कर रही हो ना हम पे एहसान कर रही हो ना ज़िंदगी हसरतों की मय्यत है फिर भी अरमान कर रही हो ना नींद सपने सु
हम कहाँ हैं ये पता लो तुम भी
कुमार विश्वास
हम कहाँ हैं ये पता लो तुम भी बात आधी तो सँभालो तुम भी दिल लगाया ही नहीं था तुम ने दिल-लगी की थी मज़ा लो तुम भी हम को आ
बात करनी है बात कौन करे
कुमार विश्वास
बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब क
तुम्हें जीने में आसानी बहुत है
कुमार विश्वास
तुम्हें जीने में आसानी बहुत है तुम्हारे ख़ून में पानी बहुत है कबूतर इश्क़ का उतरे तो कैसे तुम्हारी छत पे निगरानी
दिल तो करता है ख़ैर करता है
कुमार विश्वास
दिल तो करता है ख़ैर करता है आप का ज़िक्र ग़ैर करता है क्यूँ न मैं दिल से दूँ दुआ उस को जबकि वो मुझ से बैर करता है आप �
ये ख़यालों की बद-हवासी है
कुमार विश्वास
ये ख़यालों की बद-हवासी है या तिरे नाम की उदासी है आइने के लिए तो पतली हैं एक का'बा है एक काशी है तुम ने हम को तबाह कर
उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे
कुमार विश्वास
उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे वो मिरा होने से ज़ियादा मुझे पाना चाहे मेरी पलकों से फिसल जाता है चेहरा तेरा ये म�
उन की ख़ैर-ओ-ख़बर नहीं मिलती
कुमार विश्वास
उन की ख़ैर-ओ-ख़बर नहीं मिलती हम को ही ख़ास कर नहीं मिलती शाइ'री को नज़र नहीं मिलती मुझ को तू ही अगर नहीं मिलती रूह म
फिर मिरी याद आ रही होगी
कुमार विश्वास
फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का
पवन ने कहा
कुमार विश्वास
पवन ने कहा सौंप दो मुझे अपना सब सत्व तमस व रजत चाहती हूँ मैं स्वयं से जोड़ना तुमको यही होगी गति उत्तम शब्द सार्थक
कोई दीवाना कहता है
कुमार विश्वास
कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है। मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है॥ मैं तुझसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर क�
ग़रीब लोग
ऋतुराज
ग़रीब लोगों की आँखों में दूरबीन लगी होती है वे दूर से ही देख लेते हैं कच्चे-पक्के जामुन, खजूर, खिरनियाँ, उन्हें दूर �
लिख सकते हो क्या
ऋतुराज
निराशा के कई रंग हैं जिसे कभी का नष्ट हो जाना चाहिए था वह अभी तक जीवित है जो भुला दिया गया था फिर से याद आ रहा है जो �
मैं उस आदमी को जानता हूँ
ऋतुराज
मैं उस आदमी को जानता हूँ नित्य नई आशा में वह बिछाता है अपनी चादर फटे-चीकट दुशाले को ओढ़कर सर्दी में कहता है अगर ईश्
मरे हुए लोग
ऋतुराज
मरे हुए लोग अभी तक यहाँ से गए नहीं हैं जीवित लोग उन्हें उठाए फिर रहे हैं कहना बहुत आसान है कि वे ख़ुद मरे थे न कि उन�
अँधेरे में प्रार्थना
ऋतुराज
ले चलो मुझे इस लोक से दूर कहीं जहाँ निर्धन धनवानों को चुनते नहीं जहाँ मूर्ख और पंगु नहीं बनते बुद्धिमान जहाँ निर्�
जीवन की कला
ऋतुराज
कला में जीवन की वासना नहीं होती तो वह जीवन की पुनर्रचना कैसे करती? नशे में अधिक नशे की इच्छा की तरह कला का प्रेम और प�
शरीर
ऋतुराज
सारे रहस्य का उद्घाटन हो चुका और तुम में अब भी उतनी ही तीव्र वेदना है आनंद के अंतिम उत्कर्ष की खोज के समय की वेदना अ�
हवा पानी
ऋतुराज
जिनकी हवा होती है वे पानी पर भी अपना अधिकार कर लेते हैं न जाने कहाँ से छिपकर अचानक उनके पास चली आती है हवा मेरे सूख�
माँ के नाम एक दिन
ऋतुराज
बहुत जटिल और कुटिल है विश्व समाज पहले तो स्त्री को अकारण प्रताड़ित अपमानित करता है क और फिर मनाता है मातृ दिवस कह�
दौड़ते हुए
ऋतुराज
बहुत अच्छा अवसर है हत्यारे के निकट आने का अगर अब तुमने उसकी प्रशंसा में कुछ कहा तो उसे उसका बचपन याद आ जाएगा जब वह �
याद
ऋतुराज
याद एक चिड़िया है कभी उड़कर पास चली आती है कभी दूर जाकर ओझल हो जाती है बुलबुलों की तुतलाहट मैनाओं का शोर कौडिल्ल�
एक मुश्किल किताब जैसी थी
विकास जोशी वाहिद
एक मुश्किल किताब जैसी थी ज़िंदगी इक अज़ाब जैसी थी हम को तो ख़ार ही मिले लेकिन ये सुना था गुलाब जैसी थी घूँट दर घूँ
हम अलग सी एक ख़ुशबू जानते हैं
विकास जोशी वाहिद
हम अलग सी एक ख़ुशबू जानते हैं हैं बरहमन और उर्दू जानते हैं काम चुप रह के किया करते हैं लेकिन रात के सब राज़ जुगनू ज�
सफ़र में अब नहीं पर आबला-पाई नहीं जाती
विकास जोशी वाहिद
सफ़र में अब नहीं पर आबला-पाई नहीं जाती हमारी रास्तों से यूँ शनासाई नहीं जाती रहें हम महफ़िलों में या रहें दुनिया क
साथ तेरा अगर नहीं होता
विकास जोशी वाहिद
साथ तेरा अगर नहीं होता हम से इतना सफ़र नहीं होता धूप है राह में उसूलों की इस में कोई शजर नहीं होता लोग क्या क्या ख�
सहा उम्र भर पर जताया नहीं
विकास जोशी वाहिद
सहा उम्र भर पर जताया नहीं तिरा ज़ख़्म हम ने दिखाया नहीं अज़ल से खड़े हैं वफ़ाएँ लिए किसी ने हमें आज़माया नहीं मि�
ये बार-ए-ग़म उठा कर देखते हैं
विकास जोशी वाहिद
ये बार-ए-ग़म उठा कर देखते हैं तुम्हें भी आज़मा कर देखते हैं बड़ा है ज़ो'म इस पागल हवा को दिए हम भी जला कर देखते हैं �
संवाद से पहले
राजकुमार कुंभज
संवाद का सिलसिला यों ही शुरू नहीं होता कि किसी दर्ज़ीं की तरह सुई-धागा लेकर बैठ जाओ और मेरे रूमाल पर तुम अपना नाम लि
बच्चा रोता है
राजकुमार कुंभज
एक शरीफ़ औरत एक शरीफ़ आदमी से टेलीफ़ोन पर पूछ रही है क्या प्रोग्राम है आज रात का? चुप ही रहना है या इरादा है बात का? �
वे मुझसे झूठ बोलते हैं
राजकुमार कुंभज
वे मुझसे झूठ बोलते हैं और मैं उनका भरोसा करता हूँ कि वे मुझसे झूठ बोलते हैं वे मुझसे झूठ बोलते हैं कहते हैं कि कल स�
भेड़िया ख़ुश है
राजकुमार कुंभज
दिन क़साई के छुरे जैसा और रात जैसे शराब पीकर पागल हुआ हाथी पॉकेटमार ने मार लिया है वसंत बढ़ती आती हैं ठंडी हवाएँ जै�
हमारा चेहरा वापिस करो
राजकुमार कुंभज
हम थे और हमें जानते थे वे मगर यह तथ्य अच्छी तरह जानते हुए भी वे नहीं जान रहे थे हमें... यह जान रहे थे हम कि वे नहीं जान �
वक़्त ख़ूब लगता हैं
कर्मवीर 'बुडाना'
नए-नए कोई भी हो सवाल, रटने में वक़्त ख़ूब लगता हैं। अभी-अभी तो शुरू हुई हैं कक्षा अपनी, साथियों संग गप-शप करने में वक़्त
यक-ब-यक शोरिश-ए-फ़ुग़ाँ की तरह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
यक-ब-यक शोरिश-ए-फ़ुग़ाँ की तरह फ़स्ल-ए-गुल आई इम्तिहाँ की तरह सेहन-ए-गुलशन में बहर-ए-मुश्ताक़ाँ हर रविश खिंच गई कमा�
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं �
फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए फिर अपनी नज़र शायद ता-हद्द-ए-नज़र जाए सहरा पे लगे पहरे और क़ुफ़्ल पड़े बन पर अब शहर-ब
सितम सिखलाएगा रस्म-ए-वफ़ा ऐसे नहीं होता
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
सितम सिखलाएगा रस्म-ए-वफ़ा ऐसे नहीं होता सनम दिखलाएँगे राह-ए-ख़ुदा ऐसे नहीं होता गिनो सब हसरतें जो ख़ूँ हुई हैं तन �
तुझे पुकारा है बे-इरादा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तुझे पुकारा है बे-इरादा जो दिल दुखा है बहुत ज़ियादा नदीम हो तेरा हर्फ़-ए-शीरीं तो रंग पर आए रंग-ए-बादा अता करो इक अ�
सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं हम लोग सुर्ख़-रू हैं कि मंज़िल से आए हैं शम-ए-नज़र ख़याल के अंजुम जिगर के दाग�
तिरी उमीद तिरा इंतिज़ार जब से है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तिरी उमीद तिरा इंतिज़ार जब से है न शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है किसी का दर्द हो करते हैं तेरे नाम रक़म गिला �
चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई का
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई का रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ आज अ�
हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए काफ़िरों की नमाज़ हो जाए दिल रहीन-ए-नियाज़ हो जाए बेकसी कारसाज़ हो जाए मिन्नत-ए-चारा-साज�
हर सम्त परेशाँ तिरी आमद के क़रीने
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हर सम्त परेशाँ तिरी आमद के क़रीने धोके दिए क्या क्या हमें बाद-ए-सहरी ने हर मंजिल-ए-ग़ुरबत पे गुमाँ होता है घर का बह�
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं तुम क्य�
बोल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे बोल ज़बाँ अब तक तेरी है तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा बोल कि जाँ अब तक तेरी है देख कि आहन-गर की
याद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ा�
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी
हज़ार दर्द शब-ए-आरज़ू की राह में है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हज़ार दर्द शब-ए-आरज़ू की राह में है कोई ठिकाना बताओ कि क़ाफ़िला उतरे क़रीब और भी आओ कि शौक़-ए-दीद मिटे शराब और पिलाओ
ज़िंदगी का ठीक है कुछ तय-सा पैमाना नहीं होता
कमलेश भट्ट 'कमल'
ज़िंदगी का ठीक है कुछ तय-सा पैमाना नहीं होता, किंतु जैसे लोग मर जाते हैं, मर जाना नहीं होता। कुछ तो फैलें होठ, आँखों �
इससे बेहतर तो यही होगा कि पत्थर से कहो
कमलेश भट्ट 'कमल'
इससे बेहतर तो यही होगा कि पत्थर से कहो, प्यास की बात कभी भी न संमदर से कहो! किसने छीना है वजूद उसका, बनाया बंजर, जानन�
अंतिम अरदास
सवाई सिंह शेखावत
लौटते हुए कवि लौटा देता है स्रष्टा को दिक् और काल तुकबंदी की पुरानी आदत कला और साँस मिट्टी और नियति मृत्यु के चर�
दिल्ली
सवाई सिंह शेखावत
कितनी नई है और पुरानी भी यह दिल्ली हर हमलावर का रुख़ किए हुए दिल्ली की ओर जिधर भी दिखें कसी हुई जीन सजे हुए घुड़सवा
पुराने जूते
सवाई सिंह शेखावत
पुराने जूते सुखद और उदार हैं किसी पुराने आत्मीय की तरह अपनी अकड़ और विन्यास भूलकर वे पाँवों के अनुरूप ढल जाते हैं इ
तुम जब हँसती हो
सवाई सिंह शेखावत
तुम जब हँसती हो तो आ जाती है धूप में अनोखी चमक जल में विरल तरलता हवा में अद्भुत उल्लास गुलाबों में सिहरन पेड़ों में
पीहर से लौटकर पत्नी
सवाई सिंह शेखावत
बड़े दिनों बाद पीहर से लौटी है पत्नी और मुझे बेतरह याद आ रहा है महीनों पहले खाई अदरक, प्याज़ और हरी मिर्च के बघार वाल�
ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे
बशीर बद्र
ग़ज़लों का हुनर अपनी आँखों को सिखाएँगे रोएँगे बहुत लेकिन आँसू नहीं आएँगे कह देना समुंदर से हम ओस के मोती हैं दरिय
कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते
बशीर बद्र
कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते किसी की आँख में रह कर सँवर गए होते सिंगार-दान में रहते हो आइने की तरह किसी के हाथ से ग�
भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा
बशीर बद्र
भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा फिर याद बहुत आएगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम जब धू�
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
बशीर बद्र
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है यूँही रोज़ मिलने की आरज�
भ्रम
नरेश मेहता
तुम्हें भ्रम है, कि ये कविताएँ मेरी हैं; नहीं, ऐसा नहीं है। शायद यही हुआ होगा कि मैंने तुम्हें अपनी भाषा में रखकर द�
यायावर से
नरेश मेहता
ले गए तुम कई बार साथ में हमें अपनी यात्राओं पर चित्रकूट, वृंदावन, सौराष्ट्री सागर-तट या कहीं और भी, पर यह कौन-सी यात�
धूप की भाषा
नरेश मेहता
धूप की भाषा-सी खिड़की में मत खड़ी होओ प्रिया! शॉल-सा कंधों पर पड़ा यह फाल्गुन चैत्र-सा तपने लगेगा! केश सुखा लेने के बा�
देखना, एक दिन
नरेश मेहता
देखना— एक दिन चुक जाएगा। यह सूर्य भी, सूख जाएँगे सभी जल एक दिन, हवा चाहे मातरिश्वा हो नाम को भी नहीं होगी एक दिन, न�
माँ
नरेश मेहता
मैं नहीं जानता क्योंकि नहीं देखा है कभी— पर, जो भी जहाँ भी लीपता होता है गोबर के घर-आँगन, जो भी जहाँ भी प्रतिदिन दुआ
महायोनि
नरेश मेहता
एक अश्व है जो द्यौ और पृथिवी के बीच सिंह बना क्षितिज पर खड़ा कैसे पुरुष-भाव से ब्रह्मांड का अवलोकन करता हिनहिना रह
उत्सव-नक्षत्र
नरेश मेहता
कहाँ है? अन्यत्र कहाँ है?? इस पृथिवी से बड़ा उत्सव-नक्षत्र और कहाँ है??? गायत्री वर्ण वाली उज्ज्वल दिशाओं के, वेद औष�
वृक्ष-बोध
नरेश मेहता
आज का दिन एक वृक्ष की भाँति जिया और प्रथम बार वैष्णवी संपूर्णता लगी। अपने में से फूल को जन्म देना कितना उदात्त हो�
आश्वासन
नरेश मेहता
बड़ी देर तक हवा और वृक्ष बतियाते रहे। हवा की हर बात पर वृक्ष पेट पकड़-पकड़ कर हँसता रहा। और तभी हवा को ध्यान आया अप�
पुरुष
नरेश मेहता
हमें जन्म देकर ओ पिता सूर्य! ओ माता सविता! क्या इसीलिए तुम मार्तंड हो कि अब तुम प्रकाश के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ज�
पीले फूल कनेर के
नरेश मेहता
पीले फूल कनेर के! पथ अगोरते। सिंदूरी बडरी अँखियन के फूले फूल दुपेर के! दौड़ी हिरना बन-बन अँगना— बेंतवनों की चोर म�
स्वभाव
नरेश मेहता
कुत्ते— सिर्फ़ क्वाँर में ही हो पाते हैं आदमी जब कि आदमी वर्ष भर क्वाँर में ही बना रहता है।
आग्रह
नरेश मेहता
द्वार पर जो भी गुहार देता है। वैष्णव है। अयाचित अतिथि यह करपात्री है। किंतु दाता है, न जाओ किसी के स्वरूप पर। स्व�
हाँ! आज
अतुल कनक
आज माता-पिता की शादी की सत्तावनवीं वर्षगाँठ थी और मैं बचता रहा माँ को बधाई देने से बधाई देना तो दूर की बात है आज उल�
ये ज़माना
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
क्या कहूँ इस ज़माने को मैं, हर तरफ़ एक नया अफ़साना है, कभी सच्चाई के नक़ाब में, कभी झूठ का तराना है। दिल की बात कहने से भ�
वसंत ऋतू
सुनीता प्रशांत
हुई है कुछ आहट-सी रुन झुन करती आई हवा जागी है कोई उमंग-सी गगन भी है मुसकाया पीत वसन धरे धरा ने कलियों से शृंगार किया
प्रतिध्वनि
अरुण देव
एक शाम भीतर की उमस और बाहर के घुटन से घबराकर निकल पड़ा नदी के साथ-साथ नदी जो नगर के बाहर धीरे-धीरे बहे जा रही है जो ब
संघर्ष
अरुण देव
एक बड़ा परदा है काला उसमें छोटे-छोटे छेद हैं रौशनी फूट रही है चला जाता एक लंबा जुलूस है शोक में डूबा एक बच्चा पीछे म�
मधुमास
अरुण देव
इतवार कब फिसल गया पता ही नहीं चला थक कर लौटती हो तुम टूट कर गिरा रहता हूँ मैं कभी प्याली तुम पकड़ाती हो कभी चाय मै�
एहसास
डॉ॰ कुमार विनोद
एक बूढ़ी स्त्री ने जब अपनी दवा की पर्ची के साथ अपने बेटे के तरफ़ एक मुड़ा-तुड़ा नोट भी बढ़ाया तो अहसास हुआ कि ये दुनिया �
पिकासो की चित्रकला
नलिन विलोचन शर्मा
जटिलतम चित्रकला सीख ली जा सकती है, सिर्फ़ अभ्यास ज़रूरी है। तुम्हारी बेढंगी रेखाओं को सीखना क्या? वे सीखी नहीं जात�
सिद्धि
नलिन विलोचन शर्मा
सिद्धों के भी कैंसर होता है। उनके दिलों की भी धड़कनें बंद होती हैं। हम बगुला बग़ल झाँकते। वे हंस हो जाते हैं।
अली अकबर ख़ाँ
नलिन विलोचन शर्मा
सरोद पर तुमने था बजाया, मैं समझा नहीं। मैंने देखा, पीतल और लोहे से तुमने मधु निचोड़ा: सारा कड़वापन दूर हो गया, मधु व�
एक नापसंद जगह
नलिन विलोचन शर्मा
एक दिन यहाँ मैंने एक कविता लिखी थी, यहाँ जहाँ रहना मुझे नापसंद था और रहने भेज दिया था। जगह वह भी, जहाँ रहना अच्छा लगत
धारा-लेखन
नलिन विलोचन शर्मा
सत्तावन की हवा-गाड़ी लक्ष्य तक पहुँच कर रह गई। दो-चार वर्षों में दो मुँह होंगे या दो पूँछ, एक मुँह और एक पूँछ नहीं ह�
हम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह
जाँ निसार अख़्तर
हम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह हम ने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह ख़ुद-ब-ख़ुद नींद सी आँखों में घुली जात
अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए
जाँ निसार अख़्तर
अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए अपनी नज़र में आप को रुस्वा किया न जाए हम हैं तिरा ख़याल है तेरा जमाल है इक पल भ
चलेगी जब मोहब्बत की कभी चर्चा मिरे पीछे
डॉ॰ भावना
चलेगी जब मोहब्बत की कभी चर्चा मिरे पीछे तुम्हें भी याद आएगा मिरा चेहरा मिरे पीछे थकी आँखें बुझी सूरत मगर इक हौसला
कहोगे तुम नहीं जितना वो अब उतना समझता है
डॉ॰ भावना
कहोगे तुम नहीं जितना वो अब उतना समझता है समय की नब्ज़ को अब पेट का बच्चा समझता है भले खो जाए वो अंधा किसी अंजान रस्त
फिर से हसीन वक़्त की बस्ती में आ गए
डॉ॰ भावना
फिर से हसीन वक़्त की बस्ती में आ गए मेरे तमाम शे'र जो सुर्ख़ी में आ गए तक़दीर सूखे पत्तों की भी क्या है दोस्तो थोड़�
धूप से तपते सफ़र में छाँव की बातें भली
डॉ॰ भावना
धूप से तपते सफ़र में छाँव की बातें भली पनघटों पर छपछपाते पाँव की बातें भली हर क़दम पर जो सफ़र में हौसला देता रहा आ �
हुनर-ए-ज़ख़्म-नुमाई भी नहीं
राग़िब अख़्तर
हुनर-ए-ज़ख़्म-नुमाई भी नहीं सिला-ए-आबला-पाई भी नहीं दर्द-ए-सर अब तिरे होने का सबब अब तो वो दस्त-ए-हिनाई भी नहीं मैं �
गाँव में अब गाँव जैसी बात भी बाक़ी नहीं
राग़िब अख़्तर
गाँव में अब गाँव जैसी बात भी बाक़ी नहीं यानी गुज़रे वक़्त की सौग़ात भी बाक़ी नहीं तितलियों से हल्के फुल्के दिन न ज
कुछ बादल कुछ चाँद से प्यारे प्यारे लोग
राग़िब अख़्तर
कुछ बादल कुछ चाँद से प्यारे प्यारे लोग डूब गए जितने थे आँख के तारे लोग कुछ पाने कुछ खो देने का धोका है शहर में जो फि�
थकन को जाम करें आरज़ू को बादा करें
राग़िब अख़्तर
थकन को जाम करें आरज़ू को बादा करें सुकून-ए-दिल के लिए दर्द का इआदा करें उभरती डूबती साँसों पे मुन्कशिफ़ हो जाएँ सु�
चौंक उट्ठा हूँ तिरे लम्स के एहसास के साथ
राग़िब अख़्तर
चौंक उट्ठा हूँ तिरे लम्स के एहसास के साथ आ गया हूँ किसी सहरा में नई प्यास के साथ तब भी मसरूफ़-ए-सफ़र था मैं अभी की मा�
विनय
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
पथ पर मेरा जीवन भर दो, बादल हे, अनंत अंबर के! बरस सलिल, गति ऊर्मिल कर दो! तट हों विटप छाँह के, निर्जन, सस्मित-कलिदल-चुंब
राम की शक्ति-पूजा
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
रवि हुआ अस्त : ज्योति के पत्र पर लिखा अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर आज का, तीक्ष्ण-शर-विधृत-क्षिप्र-कर वेग-प्रखर,
जुही की कली
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
विजन-वन वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी—स्नेह-स्वप्न-भग्न— अमल-कोमल-तनु तरुणी—जुही की कली, दृग बंद किए, शिथिल—पत्रांक
उक्ति
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
कुछ न हुआ, न हो। मुझे विश्व का सुख, श्री, यदि केवल पास तुम रहो ! मेरे नभ के बादल यदि न कटे— चंद्र रह गया ढका, तिमिर रात �
प्रेम-संगीत
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
बम्हन का लड़का मैं उसको प्यार करता हूँ। जात की कहारिन वह, मेरे घर की है पनहारिन वह, आती है होते तड़का, उसके पीछे मैं
मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा?
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा? स्तब्ध, दग्ध मेरे मरु का तरु क्या करुणाकर खिल न सकेगा? जग के दूषित बीज नष्ट कर, पुलक-स्�
जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ, आओ, आओ। आज अमीरों की हवेली किसानों की होगी पाठशाला, धोबी, पासी, चमार, तेली खोलेंगे अँधेरे का ता
अट नहीं रही है
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
अट नहीं रही है आभा फागुन की तन सट नहीं रही है। कहीं साँस लेते हो, घर-घर भर देते हो, उड़ने को नभ में तुम पर-पर कर देते ह�
गर्म पकौड़ी
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
गर्म पकौड़ी— ऐ गर्म पकौड़ी! तेल की भुनी, नमक-मिर्च की मिली, ऐ गर्म पकौड़ी! मेरी जीभ जल गई, सिसकियाँ निकल रहीं, लार की
दग़ा की
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
चेहरा पीला पड़ा। रीढ़ झुकी। हाथ जोड़े। आँख का अँधेरा बढ़ा। सैकड़ों सदियाँ गुज़रीं। बड़े-बड़े ऋषि आए, मुनि आए, कवि आ
राजे ने अपनी रखवाली की
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
राजे ने अपनी रखवाली की; क़िला बनाकर रहा; बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं। चापलूस कितने सामंत आए। मतलब की लकड़ी पकड़े हुए। क�
सरोज-स्मृति
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
ऊनविंश पर जो प्रथम चरण तेरा वह जीवन-सिंधु-तरण; तनय, ली कर दृक्-पात तरुण जनक से जन्म की विदा अरुण! गीते मेरी, तज रूप-ना�
हमारे साहित्य का ध्येय
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
आज हमारे साहित्य को देश तथा साहित्यिकों के समाज में वह महत्व प्राप्त नहीं, जो उसे राजनीति के वायुमंडल में रहने वाल�
छोड़ दो, जीवन यों न मलो
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
छोड़ दो, जीवन यों न मलो। ऐंठ अकड़ उसके पथ से तुम रथ पर यों न चलो। वह भी तुम-ऐसा ही सुंदर, अपने दुख-पथ का प्रवाह खर, तुम
छलके छल के पैमाने क्या
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
छलके छल के पैमाने क्या! आए बेमाने माने क्या! हलके-हलके हल के न हुए, दलके-दलके दल के न हुए, उफले-उफले फल के न हुए, बेदान
फूटे हैं आमों में बौर
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
फूटे हैं आमों में बौर, भौंर वन-वन टूटे हैं। होली मची ठौर-ठौर, सभी बंधन छूटे हैं। फागुन के रंग राग, बाग़-वन फाग मचा है
उत्साह
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
बादल, गरजो!— घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ! ललित ललित, काले घुँघराले, बाल कल्पना के-से पाले, विद्युत-छवि उर में,कवि नवजीवन
मरा हूँ हज़ार मरण
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
मरा हूँ हज़ार मरण पाई तब चरण-शरण। फैला जो तिमिर-जाल कट-कटकर रहा काल, अँसुओं के अंशुमाल, पड़े अमित सिताभरण। जल-कलकल-
भजन कर हरि के चरण मन
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
भजन कर हरि के चरण, मन! पार कर मायावरण, मन! कलुष के कर से गिरे हैं देह-क्रम तेरे फिरे हैं, विपथ के रथ से उतरकर बन शरण का �
कौन तम के पार?
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
कौन तम के पार?—(रे, कह) अखिल-पल के स्रोत, जल-जग, गगन घन-घन-धार-(रे, कह) गंध-व्याकुल-कूल-उर-सर, लहर-कच कर कमल-मुख-पर हर्ष-अल�
सुख का दिन डूबे डूब जाए
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
सुख का दिन डूबे डूब जाए। तुमसे न सहज मन ऊब जाए। खुल जाए न मिली गाँठ मन की, लुट जाए न उठी राशि धन की, धुल जाए न आन शुभान�
हम लोटते हैं वो सो रहे हैं
अमीर मीनाई
हम लोटते हैं वो सो रहे हैं क्या नाज़-ओ-नियाज़ हो रहे हैं क्या रँग जहाँ में हो रहे हैं दो हँसते हैं चार रो रहे हैं दु
गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं
अमीर मीनाई
गले में हाथ थे शब उस परी से राहें थीं सहर हुई तो वो आँखें न वो निगाहें थीं निकल के चेहरे पे मैदान साफ़ ख़त ने किया कभ
तुम पर मैं लाख जान से क़ुर्बान या-रसूल
अमीर मीनाई
तुम पर मैं लाख जान से क़ुर्बान या-रसूल बर आएँ मेरे दिल के भी अरमान या-रसूल क्यों दिल से मैं फ़िदा न करूँ जान या-रसूल
हल्क़े में रसूलों के वो माह-ए-मदनी है
अमीर मीनाई
हल्क़े में रसूलों के वो माह-ए-मदनी है क्या चाँद की तनवीर सितारों में छनी है कह दे मिरे ईसा से मदीने में ये कोई अब जा�
आँसू मिरी आँखों में नहीं आए हुए हैं
अमीर मीनाई
आँसू मिरी आँखों में नहीं आए हुए हैं दरिया तिरी रहमत के ये लहराए हुए हैं अल्लह री हया हश्र में अल्लाह के आगे हम सब क�
मिरे बस में या तो या-रब वो सितम-शिआर होता
अमीर मीनाई
मिरे बस में या तो या-रब वो सितम-शिआर होता ये न था तो काश दिल पर मुझे इख़्तियार होता पस-ए-मर्ग काश यूँ ही मुझे वस्ल-ए-य�
जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए
अमीर मीनाई
जब से बुलबुल तू ने दो तिनके लिए टूटती हैं बिजलियाँ इन के लिए है जवानी ख़ुद जवानी का सिंगार सादगी गहना है इस सिन के �
ओस
सोहन लाल द्विवेदी
हरी घास पर बिखेर दी हैं ये किसने मोती की लड़ियाँ? कौन रात में गूँथ गया है ये उज्ज्वल हीरों की कड़ियाँ? जुगनू से जगम�
उठो उठो
सोहन लाल द्विवेदी
पत्ती डोलीं, चिड़ियाँ बोलीं, हुआ सवेरा, उठो उठो! छाई लाली, अहा निराली मिटा अँधेरा, उठो उठो! आलस त्यागो, प्यारे जागो,
भारत
सोहन लाल द्विवेदी
भारत तू है हमको प्यारा, तू है सब देशों से न्यारा। मुकुट हिमालय तेरा सुंदर, धोता तेरे चरण समुंदर। गंगा यमुना की है�
कौन?
सोहन लाल द्विवेदी
किसने बटन हमारे कुतरे? किसने स्याही को बिखराया? कौन चट कर गया दुबक कर घर-भर में अनाज बिखराया? दोना ख़ाली रखा रह गया �
वंदना के इन स्वरों में
सोहन लाल द्विवेदी
वंदना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो। वंदिनी माँ को न भूलो, राग में जब मत्त झूलो, अर्चना के रत्नकण में, एक कण �
ज़मीनी रंगत
निवेदिता
हम बेकार ही तलाशते रहे रंगों को आसमाँ में, नज़र नीचे हो भी जाए तो भी ना जाती, कद से नीचे के जहान में, खड़ी थी एक दिन, ब�
एक सवाल
निवेदिता
छोटा सा है, एक ख़्याल, उफान मचाता एक सवाल। याद है रखना या भूल है जाना, पढ़े जा चुके पन्नों का फ़साना? लोग कहे वो बीता प�
डोरी से बंधी आज़ाद पतंग
निवेदिता
सोच रही हूँ, क्यों ना आज अपना परिचय दे दूँ। मैं पतंग, हाँ वही आसमान में उड़ने वाली, ऊँचाइयों को छूने वाली। सोच रही ह�
शांत नदी
निवेदिता
एक अध्याय का प्रारम्भ, और धारा फूट जाती है, कई ढलानों को पार कर, टकराती-चोट खाती, लड़खड़ाती संभलती टूटती बिखरती, फिर
खो रही दिशाएँ
प्रवीन 'पथिक'
खो रही है गौरैया, काल के धुँध में। सूख रहे हैं पौधें, जल के अभाव में। मर रही हैं मछलियाॅं, दूषित हुए तालाब से। भयाकु
चिंता
प्रवीन 'पथिक'
हर समय एक भय मिश्रित चिंता, रहती है मन में। जैसे कोई आ रहा हो मेरे पास कोई दुःसंवाद सुनाने। या संकेत कर रहा हो; जीवन
तुझ को सोचा तो खो गईं आँखें
नक़्श लायलपुरी
तुझ को सोचा तो खो गईं आँखें दिल का आईना हो गईं आँखें ख़त का पढ़ना भी हो गया मुश्किल सारा काग़ज़ भिगो गईं आँखें कित
माना तिरी नज़र में तिरा प्यार हम नहीं
नक़्श लायलपुरी
माना तिरी नज़र में तिरा प्यार हम नहीं कैसे कहें कि तेरे तलबगार हम नहीं सींचा था जिस को ख़ून-ए-तमन्ना से रात-दिन गुल
जब दर्द मोहब्बत का मिरे पास नहीं था
नक़्श लायलपुरी
जब दर्द मोहब्बत का मिरे पास नहीं था मैं कौन हूँ क्या हूँ मुझे एहसास नहीं था टूटा मिरा हर ख़्वाब हुआ जब से जुदा वो इ�
ज़हर देता है कोई कोई दवा देता है
नक़्श लायलपुरी
ज़हर देता है कोई कोई दवा देता है जो भी मिलता है मिरा दर्द बढ़ा देता है किसी हमदम का सर-ए-शाम ख़याल आ जाना नींद जलती ह
तमाम-उम्र चला हूँ मगर चला न गया
नक़्श लायलपुरी
तमाम-उम्र चला हूँ मगर चला न गया तिरी गली की तरफ़ कोई रास्ता न गया तिरे ख़याल ने पहना शफ़क़ का पैराहन मिरी निगाह से �
कोई झंकार है नग़्मा है सदा है क्या है
नक़्श लायलपुरी
कोई झंकार है नग़्मा है सदा है क्या है तू किरन है के कली है के सबा है क्या है तेरी आँखों में कई रंग झलकते देखे सादगी ह
अपना दामन देख कर घबरा गए
नक़्श लायलपुरी
अपना दामन देख कर घबरा गए ख़ून के छींटे कहाँ तक आ गए भूल थी अपनी किसी क़ातिल को हम देवता समझे थे धोका खा गए हर-क़दम प
मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ
नक़्श लायलपुरी
मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ मिरी पहचान है शे'र-ओ-सुख़न से मैं अपनी क़द्र-ओ-क़ीमत
वो नज़रों से मेरी नज़र काटता है
जतिन्दर परवाज़
वो नज़रों से मेरी नज़र काटता है मोहब्बत का पहला असर काटता है मुझे घर में भी चैन पड़ता नहीं था सफ़र में हूँ अब तो सफ�
गुम-सुम तन्हा बैठा होगा
जतिन्दर परवाज़
गुम-सुम तन्हा बैठा होगा सिगरेट के कश भरता होगा उस ने खिड़की खोली होगी और गली में देखा होगा ज़ोर से मेरा दिल धड़का
सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र ख़ून में तर
जतिन्दर परवाज़
सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र ख़ून में तर शहर से जंगल ही अच्छा है चल चिड़िया तू अपने घर तुम तो ख़त में लिख देती �
यूँही उदास है दिल बे-क़रार थोड़ी है
जतिन्दर परवाज़
यूँही उदास है दिल बे-क़रार थोड़ी है मुझे किसी का कोई इंतिज़ार थोड़ी है नज़र मिला के भी तुम से गिला करूँ कैसे तुम्ह�
यार पुराने छूट गए तो छूट गए
जतिन्दर परवाज़
यार पुराने छूट गए तो छूट गए काँच के बर्तन टूट गए तो टूट गए सोच समझ कर होंट हिलाने पड़ते हैं तीर कमाँ से छूट गए तो छूट
आदमी और तकलीफ़ें
अच्युतानंद मिश्र
मैंने कहा : भई! आदमी दस हज़ार साल पुराना है और तकलीफ़ें उसकी उससे भी पुरानी कि जब आदमी आदमी नहीं था तकलीफ़ें तब भी �
नाम में क्या रखा है?
अच्युतानंद मिश्र
फ़ोन पर एक अपरिचित-सी आवाज़ आई कहा हैलो! आप कैसे हैं? मैंने कहा ठीक हूँ, आप कौन? उन्होंने कहा वह ‘निर्भय’ बोल रहे हैं ‘�
ये दिन
अच्युतानंद मिश्र
हत्याएँ होती हैं रक्तहीन मृतक के सिरहाने हम रख जाते हैं फूल कोमल सुंदर चुप रहकर फूल बढ़ाते हैं मृतक का सम्मान एक �
प्यार
अच्युतानंद मिश्र
मैंने जाना प्यार को जैसे पक्षी जानते होंगे आकाश को एक धुँधली सुबह मैंने देखा उसे... वह धुले काँच के गिलास की तरह साफ�
बीस बरस
अच्युतानंद मिश्र
उदास रौशनी के पार एक जगमगाता शहर था पानी के पुलों पर थिरकते सपनों से भरी चमकीली पुतलियाँ थीं अँधेरी रातों में सित
शाम
अच्युतानंद मिश्र
अभी एक पत्ती गिरेगी और शाम हो जाएगी एक बच्चा गेंद के पीछे दौड़ेगा कबूतर लौटकर आएँगे और सामने की डाल पर बैठ जाएँगे उ�
इतने में
अच्युतानंद मिश्र
बेटी के रोने की आवाज़ सुनाई देती है सामने ख़ाली दूध का डिब्बा दिखता है मुझे पत्नी की छाती याद आती है बहुत कठिन है स�
शराब के नशे में
अच्युतानंद मिश्र
शराब के नशे में धुत्त एक आदमी दुतकारता है ज़िंदगी को कहता है लौट जाऊँगा मैं अपने घर तीन आँगन वाले अपने घर वहाँ धू�
किया जाना था बहुत कुछ
अच्युतानंद मिश्र
जबकि ख़र्च किया जाना था पूरा जीवन उसे बचाने की जुगत में लगा रहा अपने गिर्द फैले उदास समय को देखता रहा— वसंत की तरह
डर
अच्युतानंद मिश्र
डर दर‍असल एक अँधेरा है जब सूरज बुझने लगता है अपनी माँ की गोद से चिपटा एक बच्चा डरने लगता है माँ चुपके से उठती है ज�
भूख
अच्युतानंद मिश्र
मेरी माँ अभी मरी नहीं उसकी सूखी झुलसी हुई छाती और अपनी फटी हुई जेब अक्सर मेरे सपनों में आती हैं मेरी नींद उचट जाती
शहर
अच्युतानंद मिश्र
सफ़ेद कपोत से बच्चे उतर रहे थे दौड़ रहे थे— घर की तरफ़ एक बच्चे के हाथ में डंडे से बँधा एक चुंबक था वह समूची पृथ्व�
कला ऐसे ही मरती है
अच्युतानंद मिश्र
चेहरे पर भय करुणा दुःख और विषाद के साथ थोड़ी तड़प और ज़्यादा बेचैनी मिलाती हुई वह लालबत्ती पर खड़ी हर गाड़ी पर देती है
बड़े कवि से मिलना
अच्युतानंद मिश्र
बड़े कवि से मिलना हुआ वे सफलता की कई सीढ़ियाँ चढ़ चुके थे हम साथ-साथ उतरे औपचारिकतावश उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा फिर
बच्चे धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं
अच्युतानंद मिश्र
अमेरिकी युद्धों में मारे गए, यतीम और जिहादी बना दिए गए असंख्य बच्चों के नाम सच के छूने से पहले झ�
महाभारत
अच्युतानंद मिश्र
महाभारत मात्र एक ऐतिहासिक महाकाव्य नहीं है—उसमें वर्तमान भी है, हम सबका वर्तमान। वर्तमा�
कायर मत बन
नरेंद्र शर्मा
कुछ भी बन, बस कायर मत बन! ठोकर मार! पटक मत माथा!— तेरी राह रोकते पाहन! कुछ भी बन, बस कायर मत बन! ले-दे कर जीना, क्या जीना?
कौन हो तुम
नरेंद्र शर्मा
कौन हो तुम, कामिनी? अचल हिम-गिरि-शिखर-सी, चंचला सौदामिनी? कौन हो तुम, कामिनी? प्रतीक्षा ऐसी कि लोचन देख पथ पथरा गए, ब�
राहें
नरेंद्र शर्मा
कुहरा छाया है गिरि-वन पर, गिरि-शिखरों पर; नहीं रहा आकाश आज आकाश, घिरे हैं बादल धौरे; मैं नीचे समतल पठार पर चला जा रहा�
होली
नरेंद्र शर्मा
खेल रहा होली, शर भर भर तेजस का तूणीर! बेध रहा भूरज की देही सूरज अमित अधीर! प्राणशक्ति का धनुष बनाया, तेज-बीज के बान! �
युग की संध्या
नरेंद्र शर्मा
युग की संध्या कृषक वधू-सी किसका पंथ निहार रही? उलझी हुई समस्याओं-सी बिखरी लटें सँवार रही! धूलि धूसरित अस्त-व्यस्त
मानव
नरेंद्र शर्मा
आनत शिर नहीं रेंगते हम पृथ्वी तल पर! क्या नहीं प्राप्त है हमें युगल युगवाही कर? उपजा नवान्न, निर्मित कर घर, अर्जित
तुम से
नरेंद्र शर्मा
तुम से जीवन का क्षण-क्षण गुंजित, कण-कण अनुरंजित है! तुम मानस में स्वर-रूप-रंग-रस बन कर लहराई हो, अनदेखे अंतर्शतदल पर
मेरा मन
नरेंद्र शर्मा
मर्मरित हरित अगणित तरुओं के वन-सा मेरा मन है, जड़ जमी हुई है मिट्टी में, शिखरों पर मरकत-घन है! धरती करती रहती पोषण, सू
नारी
नरेंद्र शर्मा
संचरण हित पुरुष की इच्छा प्रबल होने लगी! देख अतिविस्तार, इच्छा— शक्ति-बल खोने लगी! प्रकृति अति-गतिप्रिय पुरुष के
जीवनशक्ति
नरेंद्र शर्मा
चिंतन-विचार, भावना-भक्त, या त्यागमयी कर्मानुरक्ति; हैं मार्ग अनेक एक मुझ तक मैं अखिल-व्याप्त जीवनीशक्ति! दो अधिक�
पत्नी के प्रति
नरेंद्र शर्मा
चीर कुहासे को सुहासिनी सुषमा-स्वर्णकिरण— आईं तुम मेरे जीवन में, तन्वी ज्योतिवरण! आईं कंपित, किंतु अशंकित धर सुकु�
कामना
नरेंद्र शर्मा
सिंधु नित अनंत उर्मिजाल डालता, छाँह ही मिली, न प्राप्य इंदु की कला! प्रेम की तृषा न प्रेम प्राप्त कर सकी, हृदय भी सदै
मधुमालती
नरेंद्र शर्मा
मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती! किरण-कन तन पर गिराती, शारदीया चंदिरा-सी; कौन है, कर धन्य जो मधुभार मुझ पर डालती? मेरे �
आज
नरेंद्र शर्मा
आज परिणति पा रहे हैं जन्म जन्मांतर! यह युगांतर है, न क्षण लघु एक भयकातर! क्या न मानव-सभ्यता ही भूमिजा पावन? क्या न इस
परिणति का फल
नरेंद्र शर्मा
वर्णों की क्वणित किंकणी छंदों की छम छम छागल धारण कर, कविता मेरी, तुम नाचो कर मन पागल! अधरों पर ललित गीति बन, प्राणो�
बुझने न दो चराग़-ए-वफ़ा जागते रहो
मंसूर उस्मानी
बुझने न दो चराग़-ए-वफ़ा जागते रहो पागल हुई है अब के हवा जागते रहो सज्दों में है ख़ुलूस तो फिर चाँदनी के साथ उतरेगा �
आँखों से मोहब्बत के इशारे निकल आए
मंसूर उस्मानी
आँखों से मोहब्बत के इशारे निकल आए बरसात के मौसम में सितारे निकल आए था तुझ से बिछड़ जाने का एहसास मगर अब जीने के लिए
इस शहर में चलती है हवा और तरह की
मंसूर उस्मानी
इस शहर में चलती है हवा और तरह की जुर्म और तरह के हैं सज़ा और तरह की इस बार तो पैमाना उठाया भी नहीं था इस बार थी रिंदो�
हालात क्या ये तेरे बिछड़ने से हो गए
मंसूर उस्मानी
हालात क्या ये तेरे बिछड़ने से हो गए लगता है जैसे हम किसी मेले में खो गए आँखें बरस गईं तो सुकूँ दिल को मिल गया बादल त�
दुनिया समझ रही है कि पत्थर उछाल आए
मंसूर उस्मानी
दुनिया समझ रही है कि पत्थर उछाल आए हम अपनी प्यास जा के समुंदर में डाल आए जो फाँस चुभ रही है दिलों में वो तू निकाल जो
उड़ने की आरज़ू में हवा से लिपट गया
नुसरत मेहदी
उड़ने की आरज़ू में हवा से लिपट गया पत्ता वो अपनी शाख़ के रिश्तों से कट गया ख़ुद में रहा तो एक समुंदर था ये वजूद ख़ु�
अँधेरी रात को दिन के असर में रक्खा है
नुसरत मेहदी
अँधेरी रात को दिन के असर में रक्खा है चराग़ हम ने तिरी रहगुज़र में रक्खा है ये हौसला जो अभी बाल-ओ-पर में रक्खा है तु�
यहाँ हवा के सिवा रात भर न था कोई
नुसरत मेहदी
यहाँ हवा के सिवा रात भर न था कोई मुझे लगा था कोई है मगर न था कोई थी एक भीड़ मगर हम-सफ़र न था कोई सफ़र के वक़्त जुदाई का
आप तो इश्क़ में दानाई लिए बैठे हैं
नुसरत मेहदी
आप तो इश्क़ में दानाई लिए बैठे हैं और दिवाने हैं कि रुस्वाई लिए बैठे हैं हम ख़ाना-ए-हिज्र में यादें तिरी रक़्साँ ह�
सहरा सहरा भटक रही हूँ मैं
नुसरत मेहदी
सहरा सहरा भटक रही हूँ मैं अब नज़र आ कि थक रही हूँ मैं बिछ रहे हैं सराब राहों में हर क़दम पर अटक रही हूँ मैं क्यूँ नज
जो मुश्किल रास्ते हैं उन को यूँ हमवार करना है
नुसरत मेहदी
जो मुश्किल रास्ते हैं उन को यूँ हमवार करना है हमें जज़्बों की कश्ती से समुंदर पार करना है हमारे हौसले मजरूह करना च
अरहर की दाल
इब्बार रब्बी
कितनी स्वादिष्ट है चावल के साथ खाओ बासमती हो तो क्या कहना भर कटोरी थाली में उड़ेलो थोड़ा गर्म घी छोड़ो भुनी हुई प�
घर
इब्बार रब्बी
यहाँ साड़ी माँगती, फ़ीस माँगती बहन है। घड़ी माँगता, रोज़गार ढूँढ़ता भाई है। यहाँ कुछ भी नहीं माँगती माँ है। और कुछ �
जड़ता का गीत
इब्बार रब्बी
वह जड़ों तक आलस में डूबा हुआ, आँधी के दौरान पत्ती तक नहीं हिलाता हुआ, फुनगी की मक्खी को नियति मानता हुआ, वह जड़ता का �
थैला
इब्बार रब्बी
बस में भीड़ पैर पर पैर मुँह पर मुँह हाथ पर पेट पेट पर जाँघ जाँघ पर पीठ भीड़ में हाय फँस जाता है बीच में थैला अड़ जात
सड़क पर
इब्बार रब्बी
उसने सड़क पर हवा का पीछा किया हवा की सब्ज़ साड़ी हिल नहीं रही थी हवा के साथ बच्चा था यह बहुत अच्छा था।
दिल्ली की बसों में
इब्बार रब्बी
सौर से निकलते ही, पायदान पर खड़ा हो गया; दिल्ली की इन बसों में, मैं बूढ़ा हो गया। जो मुल्क को खचड़े की तरह दौड़ा रहे �
बिंदी
इब्बार रब्बी
ग़ुसलख़ाने में लगी है पता नहीं कब से? कौन भूल गई, नहाते-नहाते— साबुन का झाग आँखों से पोंछती माथे से छुटाकर लगा गई �
कवि की पत्नी
इब्बार रब्बी
बच्चों के लिए जेलर पति के लिए होटल है कवि की पत्नी। मूँग की दाल पकाती है टमाटर में नहाती है। महँगाई की तरह तुनकमिज
बहन
इब्बार रब्बी
क्या हो गया है मुझे? बड़ी बहन हो गई क्यों इतनी बड़ी! नाम से उसके ब्याह भागते हैं दूर। चुराकर छोटे भाई के प्रेमपत्र स
कवि की मृत्यु पर
इब्बार रब्बी
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के लिए ऐसे ही छपते रहे अख़बार बच्चे खेलते रहे शोक-सभा होती रही तुम नहीं
दफ़्तर में खिलौना
इब्बार रब्बी
सड़क, स्टेशन पार कर लेट हुई ट्रेन का इंतज़ार कर गाड़ी में धक्के खाता ऊँघता और गालियाँ देता दौड़ता, लिफ़्ट फलाँगता
दरवाज़े
इब्बार रब्बी
खोलना, बंद करना; सारे-सारे दिन, सारी-सारी रात; और करने को क्या है हमारे पास। सिर्फ़ दरवाज़े मिले हैं खोल लिए तो बंद,
खँडहर-सा घर
निवेदिता
ख़ाली सा शहर, जिसमें एक खँडहर-सा घर। दरारों का जाल, आधी पूरी सी दीवार। टूटी-सी खिड़की पर तकती नज़र झाँकती सुनी राहों �
हरियाली कविताएँ
कर्मवीर 'बुडाना'
सागर की लहरों को उतरता देख यूँ लगता हैं जैसे कोई टूटा पंख हवा के झूले से लिपटकर कवि के हाथों को छूना चाहता हो, एक मा�
निवेदन
फणीश्वरनाथ रेणु
फिर बासी आँसुओं की फुहार में नहा आई पुजारिन, सवेरे-सवेरे— हरसिंगार तले! पूजा के साज सजे, मंदिर की सीढ़ियों पर पदचा
नूतन वर्षाभिनंदन
फणीश्वरनाथ रेणु
नूतन का अभिनंदन हो प्रेम-पुलकमय जन-जन हो! नव-स्फूर्ति भर दे नव-चेतन टूट पड़ें जड़ता के बंधन; शुद्ध, स्वतंत्र वायुम�
सुंदरियो!
फणीश्वरनाथ रेणु
सुंदरियो-यो-यो हो-हो अपनी-अपनी छाती पर दुद्धी फूल के झूले डाल लो! नाच रोको नहीं! बाहर से आए हुए इस परदेशी का जी साफ़ �
इमर्जेंसी
फणीश्वरनाथ रेणु
इस ब्लॉक के मुख्य प्रवेश-द्वार के समान हर मौसम आकर ठिठक जाता है सड़क के उस पार चुपचाप दोनों हाथ बग़ल में दबाए साँस
अग्रदूत
फणीश्वरनाथ रेणु
‘हमारा सब कुछ चला गया!’ —रो उठा सर्वहारा! बांग्ला देश के आगत एक जन ‘तुम्हारा सब कुछ चला गया?’ नहीं-नहीं-नहीं, कुछ भी
जागो मन के सजग पथिक ओ!
फणीश्वरनाथ रेणु
मेरे मन के आसमान में पंख पसारे उड़ते रहते अथक पखेरू प्यारे-प्यारे! मन का मरु मैदान तान से गूँज उठा थकी पड़ी सोई-सून
यह फागुनी हवा
फणीश्वरनाथ रेणु
यह फागुनी हवा मेरे दर्द की दवा ले आई... ई... ई... ई मेरे दर्द की दवा! आँगनऽऽ बोले कागा पिछवाड़े कूकती कोयलिया मुझे दिल स
लाल पान की बेगम
फणीश्वरनाथ रेणु
‘क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?’ बिरजू की माँ शकरकंद उबाल कर बैठी मन-ही-मन कुढ़ रही थी अपने आँगन में।
चंद्रग्रहण
मदन वात्स्यायन
सूरज डूबा और रात हो आई। जैसे किसी लजीली नई बहू ने घूँघट खींच लिया हो, चाँदी के बूटों वाला! और उग आई गोली बड़ी इंदु त�
वाणी
मदन वात्स्यायन
घ्राण, सुनने में बड़ा पशु; विहग दृष्टि (व याद?) में, आदमी सबसे बड़ा है वाक् में (औ' स्वाद में?) वाक्-दुर्बल मनुज बोदा है।
स्वतंत्रता
रामनरेश त्रिपाठी
एक घड़ी की भी परवशता कोटि नरक के सम है। पलभर की भी स्वतंत्रता सौ स्वर्गों से उत्तम है। जब तक जग में मान तुम्हारा तब �
प्रार्थनाएँ जंगल की
अरविंद चतुर्वेद
आकाश में चिड़ियाँ नहीं, उड़ती हैं प्रार्थनाएँ जंगल की। कई बार अकेले-अकेले, जोड़े में या क़तारों में टापू पर, पहाड़ �
औरत और कविता
अरविंद चतुर्वेद
कविता में चहचहाती हुई दाख़िल होती है एक बच्ची जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है जवान होने तक वह उदास हो जाती है कवित�
नहीं है जगह
अरविंद चतुर्वेद
आप जो चले आ रहे हैं इस तरह दनदनाते हुए नाक पर चश्मा चढ़ाए ऐंठी हुई गरदन ग़ुरूर में ‘हेलो ब्रदर’ कहकर ऐसे तो नहीं घु
सुंदर चीज़ें शहर के बाहर हैं
अरविंद चतुर्वेद
कभी-कभी ही पता लगता है कि सुंदर चीज़ें शहर के बाहर हैं मसलन, ऊबे हुए या शोर में डूबे हुए लोग जब कहीं घूमने जा रहे हो�
अमरता
अरविंद चतुर्वेद
है तो मिट्टी की ही मूरत कच्ची मिट्टी की। उम्र की धूप में तपी दु:खों की आँच में पकी है तो मिट्टी की ही मूरत! यह आपका ह
आँकड़ों का सच
अरविंद चतुर्वेद
पिछले साल से इस साल पैंतीस बलात्कार कम हुए यानी बर्बरता कम हुई है और सभ्यता की ओर अग्रसर हुआ है नगर जीने के अनुकूल
शहर आ गया
अरविंद चतुर्वेद
सारी रात चलने के बाद सुबह एक पहर दिन चढ़ा होगा जब बस की खिड़की से दिखाई पड़ा सड़क के बीचोंबीच कुचलकर मरा एक कुत्ता
मुझे तीन दो शब्द
अज्ञेय
मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ। एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ, और दूसरा : जिसे कह सकूँ किंतु दर्द मेरे से �
तुम हँसी हो
अज्ञेय
तुम हँसी हो—जो न मेरे होंठ पर दीखे, मुझे हर मोड़ पर मिलती रही है। धूप—मुझ पर जो न छाई हो, किंतु जिसकी ओर मेरे रुद्ध ज�
क्योंकि तुम हो
अज्ञेय
मेघों को सहसा चिकनी अरुणाई छू जाती है तारागण से एक शांति-सी छन-छन कर आती है क्योंकि तुम हो। फुटकी की लहरिल उड़ान श�
जैसे तुझे स्वीकार हो
अज्ञेय
जैसे तुझे स्वीकार हो। डोलती डाली, प्रकंपित पात, पाटल-स्तंभ विलुलित, खिल गया है सुमन मृदु-दल, बिखरते किंजल्क प्रमुद
छंद
अज्ञेय
मैं सभी ओर से खुला हूँ वन-सा, वन-सा अपने में बंद हूँ शब्द में मेरी समाई नहीं होगी मैं सन्नाटे का छंद हूँ।
जन्म-दिवस
अज्ञेय
एक दिन और दिनों-सा आयु का एक बरस ले चला गया।
अपना दिल पेश करूँ अपनी वफ़ा पेश करूँ
साहिर लुधियानवी
अपना दिल पेश करूँ अपनी वफ़ा पेश करूँ कुछ समझ में नहीं आता तुझे क्या पेश करूँ तेरे मिलने की ख़ुशी में कोई नग़्मा छे�
ताज-महल
साहिर लुधियानवी
ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही तुझ को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से बज़्�
ये देश है वीर जवानों का
साहिर लुधियानवी
ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का इस देश का यारो क्या कहना ये देश है दुनिया का गहना यहाँ चौड़ी छाती व
ग़ैरों पे करम अपनों पे सितम
साहिर लुधियानवी
ग़ैरों पे करम अपनों पे सितम ए जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर रहने दे अभी थोड़ा सा भरम ए जान-ए-वफ़ा ये ज़ुल्म न कर हम चाहने
धोबी
मोहन राणा
चमकती हुई धूप सुबह की चीरती घने बादलों को चुपचाप देखते भूल गया मैं आकाश को दुखते हुए हाथ को, पानी में डबडबाते प्रत�
चकमक
मोहन राणा
हम पास होकर भी टटोलते अपने स्पर्श को कभी छू लेना मन भर था पर अब नहीं रही वह सीमा हमारी देह पर जैसे कुछ अनजान गमक उपस्�
तीसरा पहर
मोहन राणा
मैंने तारों को देखा बहुत दूर जितना मैं उनसे वे दिखे इस पल में टिमटिमाते अतीत के पल अँधेरे की असीमता में, सुबह का पी
तब नाव नहीं थी
मोहन राणा
तब नाव नहीं थी हमारी यात्रा पत्तों की तरह थी अंतहीन धरती तब एक स्लेट थी स्पर्श से याद रखते थे हम उन रास्तों पर आवा�
पानी का रंग
मोहन राणा
यहाँ तो बारिश होती रही लगातार कई दिनों से जैसे वह धो रही हो हमारे दाग़ों को जो छूटते ही नहीं बस बदरंग होते जा रहे है�
कुछ कहना
मोहन राणा
कुछ कहना क्या उचित है अपने बारे में, इतना ही पर्याप्त है नीली आँखों वाली काले रंग की चिड़िया हूँ मेरे पंखों में सिम
यह जगह काफ़ी है
मोहन राणा
दो पतों के बीच लापता भूगोल में लिख बंद कर दिया पढ़ना मैंने चेहरा एक नाम दूसरा फिर तीसरा, मेरी तुम्हारी कहानी रह गई क
प्रेम में पगी
महेश चंद्र पुनेठा
इन दिनों— च्यूरे के फूल के मकरंद-सी मिठास है उसकी बोली में। पूनम की चाँदनी में झिलमिलाती झील-सी चमक है उसकी आँखों
अमर कहानी
महेश चंद्र पुनेठा
न उस राजा के कारण न पारदर्शी पोशाक के कारण न उस पोशाक के दर्ज़ी के कारण न चापलूस मंत्रियों के कारण न डरपोक दरबारिय�
पहली कोशिश
महेश चंद्र पुनेठा
मैं न लिख पाऊँ एक अच्छी कविता दुनिया एक इंच इधर से उधर नहीं होगी गर मैं न जी पाऊँ कविता दुनिया में अँधेरा कुछ और बढ़ ज
दुःख की तासीर
महेश चंद्र पुनेठा
पिछले दो-तीन दिन से बेटा नहीं कर रहा सीधे मुँह बात मुझे बहुत याद आ रहे हैं अपने माता-पिता और उनका दुःख देखो ना! कित
माँ का अंतर्द्वंद्व
महेश चंद्र पुनेठा
माँ मैं नहीं समझ पाया तुम्हारे देवता को बचपन से सुनता आया हूँ उसके बारे में पर उसका मर्म नहीं समझ पाया कभी होश सँभ
ओड़ा का पत्थर
महेश चंद्र पुनेठा
बहुत बाद में गाढ़ा जाता है खेत के बीचोबीच लेकिन बहुत पहले पड़ जाती है नींव इसकी दिलों के बीच जैसे दिलों की खाइयाँ उ�
पहाड़ टूटना
महेश चंद्र पुनेठा
नहीं... नहीं... मुझे इल्ज़ाम न दो मैं कहाँ टूटता हूँ आदमी पर आदमी टूट रहा है मुझ पर। मेरे बाल मेरी खाल मेरी हड्डी मेर
जीवन में किताबें
महेश चंद्र पुनेठा
कुछ लोग जीवन भर कुछ किताबों को इतना बाँचते हैं इतना बाँचते हैं कि उनमें लिखे कुछ ज़िंदा शब्दों का भी दम निकल जाता
दाल
महेश चंद्र पुनेठा
दाल बस केवल दाल कहाँ गई भट की चुड़कानी कहाँ पिसे भट की सब्ज़ी कहाँ भट का भटिया कहाँ मसूर-गहत के डुबके कहाँ माँस-ककड़�
गाँव में सड़क
महेश चंद्र पुनेठा
अब पहुँची हो सड़क तुम गाँव जब पूरा गाँव शहर जा चुका है सड़क मुस्कुराई सचमुच कितने भोले हो भाई पत्थर, लकड़ी और खड़िया तो
कन्या-पूजन
महेश चंद्र पुनेठा
अल्ट्रा साउंड की रिपोर्ट आने के बाद से घर का माहौल ही बदला-बदला है सास-ससुर के व्यवहार में आ गई है थोड़ी नरमी पति क�
अपनी ज़मीन
महेश चंद्र पुनेठा
पहाड़ इसलिए पहाड़ है क्योंकि जितना फैला है वह आसमान में उससे अधिक धँसा है कहीं अपनी ज़मीन में।
साहस है तुम्हारे भीतर
महेश चंद्र पुनेठा
तुम मुझे अच्छी लगती हो इसलिए नहीं— कि तुम्हारी मुस्कान में है दिशाओं के खुलने की-सी उजास कि तुम्हारी नज़रों में ह
सीखना चाहता हूँ
महेश चंद्र पुनेठा
नदी के पास नहीं है कोई क़लम न ही कोई तूलिका न ही हथौड़ा छेनी फिर भी लिखती है नई इबारत बनाती है नए-नए चित्र गड़ती है नई
सोया हुआ आदमी
महेश चंद्र पुनेठा
कितना दयनीय लगता है बस के सफ़र में सोया हुआ आदमी पैंडुलम की तरह झूलती हुई उसकी गर्दन बाईं ओर से घूमती हुई अक्सर दा�
एक और पृथ्वी है औरत
महेश चंद्र पुनेठा
दरवाज़ों खिड़कियों में लटक गए हैं पर्दे मेज़ में नया मेज़पोश कुर्सियों में गद्दियाँ तरतीब से सज गई हैं मेज़-कुर्�
शब्द
महेश चंद्र पुनेठा
क्या तुम्हें डर नहीं लगता उन शब्दों के इस्तेमाल से जिनका कोई मेल नहीं तुम्हारे जीवन से शब्द कोई गेंद नहीं कि जिनस�
ज़िंदगी
जावेद आलम ख़ान
एक पल की ज़िंदगी उदास सन्नाटे में खनकी पायल की महीन आवाज़ जैसी सुनसान अँधेरे उगलते वीराने से दिखती दूर गाँव में �
वो जो मैं हूँ
जावेद आलम ख़ान
किसी वीरान खंडहर का धन हूँ किसी जन्मांध का काला स्वप्न हूँ आज़ादी के लिए छटपटाती इच्छाओं का कोष्ठक हूँ मैं ख़ुद ह�
बारिश
जावेद आलम ख़ान
खिड़की से बूँदें देखकर लहकी लड़की भीगने के लिए जब तक छत पर पहुँची बारिश रुक चुकी थी उसके तलवे सहलाने के लिए रह गई थ�
तुम्हारी आँखें
प्रेमशंकर शुक्ल
तुम्हारी आँखों में विश्वास धीरज और करुणा से मिला देह-जल है उनके नीचे का स्याह भाग बार-बार क्षमा के बैठने से स्याह �
लोकगीत
प्रेमशंकर शुक्ल
मेरे कंठ ने अभी जिस सुगंधित-कोमल लोकगीत का स्पर्श पाया। वह एक मेहनतकश सुंदर स्त्री के होंठ से फूटा है पहली बार। इ�
माँ को
प्रेमशंकर शुक्ल
धूप में सुखाने का चलन है माँ को हमने कभी धूप में तो नहीं सुखाया फिर इतना क्यों सूख गई है माँ! माँ सूखती रही और हमें प�
कच्चा प्रेम
प्रेमशंकर शुक्ल
आम पृथ्वी के तन और सूरज के मन से बना फल है पृथ्वी आम में मीठे रस भरती है और सूरज उसे पकाता है आम ऐसा मीठा फल है पककर ज�
दिए बेचती औरत
प्रेमशंकर शुक्ल
बड़े शहर के चौराहे पर दिए बेचती औरत धूप में अपने आदमी को छाँह में बैठने के लिए कहती है और धूप में बैठी रहती है ख़ुद दि�
अभिनय
प्रेमशंकर शुक्ल
एक दिन मैंने अपनी पत्नी के सामने अपनी पत्नी के ग़ुस्से का अभिनय किया हँसते-हँसते हो गई वह लहालोट इस तरह एक स्त्री अ�
बड़ी माँ
प्रेमशंकर शुक्ल
अचानक एक दिन उस काया को ढोने में पंचतत्वों ने मनाही की और आत्मा ने कहा— कि अब चलना चाहिए देखते-देखते उसके चेहरे क�
हमारे गाँव की शाम
प्रेमशंकर शुक्ल
खेतों से हर शाम घास का गट्ठर लिए लौटते हैं माँ-पिता चूजों के लिए चोंच में दाने दबाए टेढ़ी लकीरों में लौटते हैं पक्ष
बचे बच्चे
प्रेमशंकर शुक्ल
पृथ्वी की आयु में बच्चे बारहमासी बसंत हैं बच्चों की हँसी-ख़ुशी से ही धरती पर फूल खिलते हैं फूलों में रंग नहीं खिलते
कवि
भवानी प्रसाद मिश्र
क़लम अपनी साध, और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध। यह कि तेरी-भर न हो तो कह, और बहते बने सादे ढंग से तो बह। जिस तरह हम बो�
आसमान ख़ुद
भवानी प्रसाद मिश्र
आसमान ख़ुद हवा बनकर नहीं बहता जैसे हवा उसमें बहती है ऐसे जीवन भी ख़ुद नहीं बन जाता मौत मौत उसमें रहती है कहीं पहल�
बुनी हुई रस्सी
भवानी प्रसाद मिश्र
बुनी हुई रस्सी को घुमाएँ उल्टा तो वह खुल जाती है और अलग-अलग देखे जा सकते हैं उसके सारे रेशे मगर कविता को कोई खोले ऐ
बच्चों की तरह
भवानी प्रसाद मिश्र
बच्चे की तरह हँसे और जब रोए तो बच्चे की तरह ख़ालिस सुख ख़ालिस दुख न उसमें ख़याल कुछ पाने का न मलाल इसमें कुछ खोने क�
प्रिया के लिए
पवन कुमार मीना 'मारुत'
प्रिय पत्नी पवित्र प्रेम पारावार पाकर, जीवन पहेली प्रियतम पार किया है। परिवार पालन पोषण प्रेरणा पति की, सुख संग ज�
हमदर्द
पवन कुमार मीना 'मारुत'
मित्र-मित्र की कही जान जान जरा जवान, मेरे मीत-मीत का कठिन कर्त्तव्य कहान। वफ़ादार विश्वसनीय विवेकी विचारक, सच्चाई �
अंतर्मन की खोज
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
खोज रहा हूँ ख़ुद को भीतर, मौन लहर में गूँज समाई। भाव शिलाएँ चुपचाप खड़ीं, बूँद-बूँद रसधार बहाई॥ अंतःपुर की जाली झाँ
नसीब अपना जला चुके हैं
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
नसीब अपना जला चुके हैं, चराग़ कोई बुझा न पाए ग़मों का साया जो पड़ चुका है, वो अब कभी भी हटा न पाए उदास आँखों में रौशनी
कहीं पे चंदर उदास बैठा
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
कहीं पे चंदर उदास बैठा, कहीं सुधा भी बुझी पड़ी है मगर ये क़िस्मत का खेल देखो, न बात कोई सुनी पड़ी है वो एक लम्हा था सिर
बहुत दूर तक
प्रवीन 'पथिक'
बहुत दूर तक, देखता हूॅं उस मानव को। जो बुन रहा अपनी मायाजाल। उसमें फँसना नहीं चाहता, फाँसना चाहता है। अपने पास रहन�
जो अब भी न तकलीफ़ फ़रमाइएगा
जिगर मुरादाबादी
जो अब भी न तकलीफ़ फ़रमाइएगा तो बस हाथ मलते ही रह जाइएगा निगाहों से छुप कर कहाँ जाइएगा जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा मि�
वो जो रूठें यूँ मनाना चाहिए
जिगर मुरादाबादी
वो जो रूठें यूँ मनाना चाहिए ज़िंदगी से रूठ जाना चाहिए हिम्मत-ए-क़ातिल बढ़ाना चाहिए ज़ेर-ए-ख़ंजर मुस्कुराना चाहि�
इश्क़ में ला-जवाब हैं हम लोग
जिगर मुरादाबादी
इश्क़ में ला-जवाब हैं हम लोग माहताब आफ़्ताब हैं हम लोग गरचे अहल-ए-शराब हैं हम लोग ये न समझो ख़राब हैं हम लोग शाम से
आँखों में बस के दिल में समा कर चले गए
जिगर मुरादाबादी
आँखों में बस के दिल में समा कर चले गए ख़्वाबीदा ज़िंदगी थी जगा कर चले गए हुस्न-ए-अज़ल की शान दिखा कर चले गए इक वाक़ि�
तबीअत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
जिगर मुरादाबादी
तबीअत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है मिरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है सहर होने को है बेदार शबनम होत�
शब-ए-फ़िराक़ है और नींद आई जाती है
जिगर मुरादाबादी
शब-ए-फ़िराक़ है और नींद आई जाती है कुछ इस में उन की तवज्जोह भी पाई जाती है ये उम्र-ए-इश्क़ यूँही क्या गँवाई जाती है ह
शरमा गए लजा गए दामन छुड़ा गए
जिगर मुरादाबादी
शरमा गए लजा गए दामन छुड़ा गए ऐ इश्क़ मर्हबा वो यहाँ तक तो आ गए दिल पर हज़ार तरह के औहाम छा गए ये तुम ने क्या किया मिर�
सभी अंदाज़-ए-हुस्न प्यारे हैं
जिगर मुरादाबादी
सभी अंदाज़-ए-हुस्न प्यारे हैं हम मगर सादगी के मारे हैं उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ जिस ने हँस हँस के दिन गुज़ारे �
पुण्य
मदन लाल राज
भरी दोपहरी में एक सज्जन ने– घर के आँगन में पक्षियों के लिए, सकोरे में पानी भरा। तभी दरवाज़े पर एक शुष्क आवाज़ आई। किस�
गिद्ध
मदन लाल राज
गिद्ध, नोंचने में सिद्ध। दूर-दूर तक प्रसिद्ध। आजकल वह भी सोचने लगा है। मुझ से अच्छा तो आदमी नोंचने लगा है। आकाश
हमारा पतन
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
जैसा हमने खोया, न कोई खोवेगा ऐसा नहिं कोई कहीं गिरा होवेगा एक दिन थे हम भी बल विद्या बुधिवाले एक दिन थे हम भी धीर वी�
भारत
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
तेरा रहा नहीं है कब रंग ढंग न्यारा। कब था नहीं चमकता भारत तेरा सितारा॥ किसने भला नहीं कब जी में जगह तुझे दी। किसकी �
जगाए नहीं जागते
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
भाग जागते हैं कर्म-रत कीर्ति-भाजनों के, भव में अभागे आलसी हैं भीख माँगते। खोल-खोल थके, पर आँख खुलती है नहीं, सर्वदा स
विबोधन
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
खुले न खोले नयन, कमल फूले, खग बोले। आकुल अलि-कुल उड़े, लता तरु पल्लव डोले। रुचिर रंग में रँगी, उमगती ऊषा आई। हँसी दिग�
यंत्र
मदन लाल राज
सुबह का होना चिंताओं का समीकरण। फिर शुरू होती है, घटा-गुणा, भाग-दौड़। लगातार गतिशीलता बढ़ाती है दिल की धड़कन। मशी�
आत्मबोध
प्रवीन 'पथिक'
इस क़दर ज़िंदगी को जिए जा रहा था, कि हर क़दम पर मेरा साथ दोगे। पाथेय बनकर सदा रहोगे मेरे साथ; ऑंचल की छाँव की तरह। लेकिन
माँ ने पढ़ी दुनिया
श्वेता चौहान 'समेकन'
कभी कभी वो मुझे देर तक निहारती है, माँ मेरी परेशानियाँ पहचानती है। माँ पढ़ती है, मेरी आँखें, मेरा चेहरा और मन, वो जा�
मझधार
श्वेता चौहान 'समेकन'
मैं प्रेम की कश्ती हूँ, मेरा जीवन मझधार में है! हे प्रिय! तुम माँझी बनो, हमें चलना उस पार है! प्रेम न ठहरे सागर जैसा, क
बदलता दौर
बिंदेश कुमार झा
कल जो भगा रहा था मुझे, आज वह मुझे बुला रहा है। कल जिस ने रुलाया था, आज वही हँसा रहा है। यह ज़िंदगी का बदलता दौर है, जहा�
मकड़ी
प्रवीन 'पथिक'
अपने कटु मनोभावों का जाल, बुनती हुई मकड़ी! सोद्देश्य– निमग्न अवस्था में कुएँ के अंतिम छोर तक; पहुॅंच गई है। अप्रत�
फिर से नवसृजित होना
कमला वेदी
मनुष्य को जवाँ और ज़िंदा बनाए रखती है छोटी-छोटी ख़ुशियाँ छोटे-छोटे एहसास जीने को ज़रूरी है थोड़ी-सी चाह थोड़ी-सी प्यास
फिर फिर जीवन
रोहित सैनी
अगर कभी तुम्हें लगे अकेले ही पर्याप्त हो तुम अपने लिए जब लगे अकेले जीवन जिया जा सकता है, मुश्किल नहीं! तब अपनी जान क�
गाँव की छाँव
राजेश राजभर
अब नहीं रहना चाहता, कोई गाँव में, आम, नीम, पीपल, महुआ की छाँव में। क्या यही यथार्थ है! हमारे गाँव का! शहर जा रहा, हर आदमी
मैं प्रवासी मज़दूर
राजेश राजभर
भूख से लथपथ– जीवन पथ पर, मिटने को मजबूर, मैं प्रवासी मज़दूर– मेरी आत्मनिर्भरता ख़त्म हो गई! मज़दूरी मौन हों गई! महामा
अभिमत
राजेश राजभर
सत्य का सत्कार हो, भू-धरा पर मानवता का शृंगार हो, भू-धरा पर। रह न जाए आखिरी -पंक्ति विरान, जन-जन का सम्मान हो-भू-धरा पर�
बुढ़ापा
राजेश राजभर
तितर-बितर भई डाली-डाली, झर गई सगरो पाती, चौथेपन की राह कठिन है– कौन जलाए साँझ की बाती। आँखों में सैलाब उमड़ता चढ़त�
नदी की धारा
राजेश राजभर
जल ही जल निर्मल पावन अखण्ड अलौकिक मन भावन हे सरिता, तटिनी, तरंगिणी, जीवनदायिनी निर्झरिणी। उदगम अनन्त अद्भुत संक�
जा रही हूँ छोड़ उपवन - कविता - श्वेता चौहान 'समेकन'
श्वेता चौहान 'समेकन'
जा रही हूँ छोड़ उपवन, फिर कभी न आऊँगी। लौटना असंभव मेरा अब, हूँ तिरस्कृत बार-बार। अब न मुझको बाँध सकेंगी, प्रिय! तुम�
समझो जीवन मुस्कान खिले
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
पूर्ण सकल मन आश विभव सुख, जब ख़ुशियों का अंबार खिले। हर उदास मुख महके राहत, समझो जीवन मुस्कान खिले। काश हृदय अभिलाष
हूँ कुदाल मैं
उमेश यादव
हूँ कुदाल मैं, बड़ा निराला, खेती का औज़ार हूँ। मेरे अन्दर बहुमुखी प्रतिभा, कृषकों का हथियार हूँ॥ लोहे की चपटी फलक मे�
तेरे बाद कुछ भी ना था
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
तेरे बाद कुछ भी ना था, दिल में फिर भी धड़कन रही, हर इक बात में तू था, साँसों में तेरी उलझन रही। ख़्वाबों में जो रंग भर�
घना धुँध
प्रवीन 'पथिक'
जीवन गहराता जा रहा, एक घने धुँध से। मन व्याकुल है; जैसे पिंजरे में बंद कोई पक्षी हो। हृदय आहत है; अपने ही द्वारा किए
दिल में मेरे कोई भूचाल सा ठहर गया
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
दिल में मेरे कोई, भूचाल-सा ठहर गया, बस रह गया वो याद में, ख़्याल-सा ठहर गया। बात कोई आ उठी, कि तीर सी वो है लगी, ग़ुस्सा उत
मानसून आया
अविनाश ब्यौहार
झाड़ी-झुरमुट-पेड़ हैं मानसून आया। लगी चाँदनी चंदन जैसे। होता है अभिनंदन जैसे॥ झोला भर भर है देखा परचून आया। म�
कविता और कवयित्री
संजय राजभर 'समित'
मैंने पूछा– "तू इतनी उदास क्यूॅं है?" तो वह अपनी आँखें झुका ली। आप बीती कैसे बयाँ करती वो आँखों से अश्कों को ही छुपा
बारिशों के आँसू
मदन लाल राज
ऐसे भी लोग हैं जो दूसरों की चिताओं पर अपनी रोटी सेक लेते हैं। पर वो कहाँ मिलेंगे जो बारिशों में भी आँसू देख लेते है
तुम मेरे सबसे समीप हो
बिंदेश कुमार झा
तुम मेरे सबसे समीप हो फिर शब्दों की ध्वनि का क्या? आत्मप्रेम का सम्मान मिलता है, फिर व्यथा को साहस ही क्या? यह जीवन �
सुनो प्रिय
बिंदेश कुमार झा
यह जो तुम्हारा मेरा प्रेम है, यह काग़ज़ों तक सीमित नहीं। पुष्पों के सुगंध से भी परिभाषित नहीं॥ यह जो तुम्हारा समर्प
बसंत का त्यौहार
बिंदेश कुमार झा
शीत के प्रताप प्रभाव हो रहा व्याकुल संसार, प्रसन्नता का आयाम लेकर आया बसंत का त्यौहार। सो रही कलियाँ उठ रही है अँ
क्या तुम नहीं जानते
बिंदेश कुमार झा
क्या तुम नहीं जानते पर्वतों के पीर को, व्याकुल संसार के संपन्न तस्वीर को। क्या तुम नहीं जानते जलती हवा के शरीर क
यमुना
बिंदेश कुमार झा
सदियों से यमुना और कारखानों के बीच के संबंध बिगड़ते जा रहे हैं। शायद वैश्वीकरण ने यमुना के उपकारों को भुला दिया है�
अहंकार
बिंदेश कुमार झा
गगन के हृदय में अंकित सितारा अपनी यश-गाथा का विस्तार कर रहा, इतराकर सूरज से बैर किया है सूर्य की लालिमा मात्र से कह�
तुम में और मुझ में कौन है बेहतर?
बिंदेश कुमार झा
तुम में और मुझ में कौन है बेहतर ऊँची पर्वतों की चोटी यह धरती का लघु कण, राजकुमार का शयन कक्ष या योद्धाओं का रण? तुम �
नन्हा-सा पौधा
बिंदेश कुमार झा
धरती की छत तोड़कर, एक पौधा बेजान-सा आकार, सूर्य की लालिमा से प्रोत्साहित उठ रहा है देखने संसार। बादलों ने चुनौतिय�
कौन जीता है, कौन मरता है
बिंदेश कुमार झा
अनंत नभ के नीचे, अपनी गति से चलता है, निरंतर असफल प्रयास से जो नहीं ठहरता है। जो अश्रु नहीं, लहु पीता है, वही जीता है�
आत्म विश्लेषण
बिंदेश कुमार झा
आसमान से पूछी गहराई, सोए समुद्र से उसकी लंबाई। तारों से उनकी गिनती, सूरज से उसकी परछाई। मिला जवाब तब मुझे, जब मैंने
अंदर का इंसान और पिंजरे का चूहा
बिंदेश कुमार झा
आज का दिन बाक़ी दिनों से अलग होने वाला था। एक बड़ा प्रोजेक्ट था और आज उसकी प्रस्तुति थी ऑफिस में। यह कितना महत्वपूर्�
पहली बार बारिश
बिंदेश कुमार झा
पहली बार बारिश कहाँ हुई थी? मिट्टी की गोद में, गर्भ के विरोध में, वैज्ञानिकों के शोध में— नहीं मालूम। आख़िरी कब हो
शर्मिंदगी
राजेश राजभर
मौन हो! तुम कौन हो? क्यों छिपते हो, शर्मिंदगी की आड़ में। एक नारी ही तो "नग्न" हुई, आज भरे बाज़ार में! मौन हो! तुम कौन ह�
लिखूँ तो मैं लिखूँ क्या
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
लिखूँ तो मैं लिखूँ क्या? जो बोले, पर मौन रहे। जो जल जैसा हो थिर-थिर, पर भीतर ही भीतर बहे। जिसमें रूप न कोई दिखे, ना को�
सहर को सहर नहीं कहता
हेमन्त कुमार शर्मा
परहेज़ करता है वह खिलखिलाने से, कि अपने मन की सरे-आम बताने से। यूँ चुप रहता है और आँखों से ख़ूब बोलता है, जाने क्या आत�
सिन्दूर के बदले
पवन कुमार मीना 'मारुत'
युद्ध यादें दे जाता है कड़वी-कड़वी यादें। ले जाता है साया दुधमुँहें बच्चों के सिर से बाप का। और दे जाता है सिन्दूर �
आँधी आई है
अविनाश ब्यौहार
बदहवास सा मौसम लगता आँधी आई है। बेमौसम है पानी बरसा। कुँआ-ताल है जल को तरसा॥ शाकिनी-डाकिनी जैसी लगती मँहगाई है।
तू ज़िंदा है!
संजय राजभर 'समित'
उठ चल! और लड़ गर साँस लेता हुआ तू ज़िंदा है तो याद रख तुझे आगे बढ़ना ही पड़ेगा, गर थक गया है तो माँझी को देख गर अंधा है �
माँ की महर
पवन कुमार मीना 'मारुत'
माता ममतामयी मूरत मनोहर मान, मन-मन्दिर महान मध्य में महर-महर। मानवता मधुरता महानता महीश्वरी, माता मन मत दुखाओ दिल �
जाल
मदन लाल राज
मकड़ी सिद्धहस्त है, ख़ुद जाल बनाने में। फिर तरकीब लगाती है, शिकार को फँसाने में। अपने रसायन से वो बेतोड़ जाल बुनत�
अधूरे शब्द
प्रवीन 'पथिक'
धुंधलका होते ही बनने लगती विरह की कविताएँ एक छवि तैर जाती है ऑंखों में दिनभर की बेचैनी, आक्रोश, तपन केंद्रित हो जा�
जो पहले था आज नहीं है
बिंदेश कुमार झा
आसमान आज भी बरस रहा है, कल पानी बरसा रहा था, आज आग है। आसमान भी काला है, चंद्रमा भी सफ़ेद चादर ओढ़ा होगा, आज उसमें भी दा
शाश्वत-संबंध
प्रवीन 'पथिक'
कितने अरसे बीत गए! लड़ते-झगड़ते रूठते और मनाते हुए, ना तुम बदली! ना मैं ही बदला। वो संयोग पक्ष के लम्हें, आज भी यथाव�
काश!
प्रवीन 'पथिक'
बहुत दिन हुए उनसे मिले हुए, देखा नहीं बहुत दिनों से। बात तो फाल्गुन के पहले बयार से ही शुरू हुई थी। मिले, आषाढ़ के प�
तन्हाई
पवन कुमार मीना 'मारुत'
उमड़कर उदासी उन्मुनी उलझन-सी, उदास उधर उसे इधर इसको करत। वह वहाँ तड़पती तुम तमा तरसते, उदासी उनकी दिल दहलाती मन मरत। �
हिंसा: एक जघन्य अपराध
पवन कुमार मीना 'मारुत'
आदिम मानव जंगल में रहता, कम थी मति मानुष में। चर्म चबाकर भूख मिटाकर, नग्न व धावत था वन में। बेबस था मजबूर परन्तु, अभी
जंगल के पेड़
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
जंगल में लगे हुए हरे-भरे, समृद्ध पेड़ों को काटने के लिए आया लकड़हारा, लेकिन हुआ यूँ कि— पेड़ों ने दिखाई एकता और उस ल
मौन में प्रेम की वाणी हो तुम
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
जब नयन मौन होकर पुकारें तुम्हें, उन दृगों की कहानी हो तुम। छाँव बनकर मेरे पथ में चलो, इस धरा की रवानी हो तुम। शब्द ब
तू मेरी अन्तर्नाद बनी
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
तू सुरभित पुष्पों-सी कोमल, मैं तेरा मधुमास बना। तू जलती दीपक की लौ-सी, मैं उसका विश्वास बना। तू सागर की शांत लहर-सी,
जीवन एक पुस्तक
अजय कुमार 'अजेय'
जीवन अनुभव की किताब जिसमें कुछ रचनाऍं। सुख दुःख की रची इबारत शीर्षक विरत कथाऍं। जीवन में शीतलता लाती भोर हवा रव�
तुम चाँद की बातें करते हो
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
तुम चाँद की बातें करते हो, शहरों की सड़के ठीक नहीं, झरने पहाड़ जीव ये जंगल, क्या जीवन का प्रतीक नहीं। काट रहे हो जंग
मौन का भी अर्थ है
श्वेता चौहान 'समेकन'
मौन का भी अर्थ है। ग़र समझ तुम जाओगे। शब्द से मौन का, निहितार्थ अधिक पाओगे। बात करती है नज़र भी, इनसे भी संवाद हो। चा
आया है सावन
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
बादल उड़ते हैं जल लेकर, दो-एक? ना, पूरा दल लेकर। ज्यों पड़ी तप्त भू पर दृष्टि, करते शीतल, करके वृष्टि। लगता है आया पृ�
स्मृति के झूंडों में
हेमन्त कुमार शर्मा
किसी ठिकाने का नहीं, बरबस आँखें छलक पड़ी। बादल घने थे हृदय पर, बूँदे पलकों से ढलक पड़ी। होश में कब था, और न होने की आ
दिशाहीन पथिक
प्रवीन 'पथिक'
कुछ विचित्र-सा हो गया हूॅं मैं! कुछ चकित, द्रवित, अन्यमनस्क-सा। स्मृतियाॅं पीछा नहीं छोड़ रही मेरा प्रश्न कभी उलझ क
पाकर तुमको, हमारी क़िस्मत क्या होगी
सुनील खेड़ीवाल 'सुराज'
पाकर तुमको, हमारी क़िस्मत क्या होगी, है तो ख़्वाब हसीन, हक़ीकत क्या होगी। आ तो गए है, तेरी जुस्तुजू में यहाँ तक, वाप�
तुम्हीं तो हो
प्रवीन 'पथिक'
हर सुबह मेरे ख़्वाबों में आकर मुझे अपनी सुगंधों से भर देने वाली तुम ही तो हो। तुम्हारा आहट पाकर ही तो, पंछी बोलते है�
एक ख़ुशनुमा शाम
प्रवीन 'पथिक'
इसी नदी के किनारे एक ख़ुशनुमा शाम सूर्य लालिमा लिए छिप रहा था। संध्या के आँचल में, चिड़ियों का कलरव, झिंगुरों की झं�
वन्दनीय भारत
पवन कुमार मीना 'मारुत'
(1) वन्दना वर वतन विधाता की करते हैं, विश्व विख्यात बुद्ध भारत-भूमि का था लाल। मध्यम मार्ग महानायक ने निकाला न्यारा,
ईश्वर और नैतिकता
सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
ईश्वर है या नहीं, कोई नहीं जानता। कुछ ईश्वर के अस्तित्त्व को मानते हैं और कुछ ईश्वर के अस्तित्त्व को काल्पनिक कहक�
व्यर्थ बहता जीवन
पवन कुमार मीना 'मारुत'
पदार्थ प्यारा प्राणों से समझो सुहृद सब, मृग-मरीचिका मरुस्थल माय कहा है। इतराता इंसान परवाह प्राण की नहीं, रंगहीन �
अधूरी कविताएँ
प्रवीन 'पथिक'
आख़िरी साँसों तक पूर्ण नहीं होता जीवन का उपन्यास। कुछ शेष रह जाती हैं, प्रेम कविताएँ; छंद नहीं बनते उस क्षण के, टूट �
थोड़ी-सी रोशनी
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
पलकों पर ठहरी नमी अब शब्द नहीं खोजती, बस रिसती है अनकहे अपराध-भाव की तरह। भीतर का शोर इतना भारी हो गया है कि मौन भी
पाप की कमाई
महेश कुमार हरियाणवी
नफ़रत का बनकर व्यापारी क्यों पाप की करे कमाई। अनमोल है क़ीमत साँसों की जो व्यर्थ ही रोज़ गँवाई॥ ना दान दिया ना मान कि
अपनी हिन्दी
प्रवीन 'पथिक'
जब छोटा था, सीखा हिन्दी, हुआ बड़ा तो छोड़ चला। जिसकी छाया में पला बढ़ा, उसी से निज मुख मोड़ चला। हिन्दी हमारी माता ह
न आदि न अंत
प्रवीन 'पथिक'
हर रोज़ एक वही विचार आता है मेरे मन में; उसी रंगीन चिड़िया की भाँति जो मेरे नीम के पेड़ पर लगे घोंसले में चुपके से आत�
यही बुद्ध हैं
सुरेन्द्र प्रजापति
एक शब्द जो बड़ी क्रूरता से उछाला गया घृणा की आग पर तपाया गया उड़ाया गया उपहास तीखे वचनों से दूरदुराया गया "दुर हटो! द�
आदमी टूट जाता है
प्रवीन 'पथिक'
बहुत कुछ टूट जाता है, छूट जाता है; जब आदमी ख़ुद से रूठ जाता है। एक खालीपन से, उसका जीवन भर जाता है। जब वह खो जाता है, क�
हनुमत अमृतवाणी
महेश कुमार हरियाणवी
जय राम भक्त हनुमान जी, जय सेवक लखन महान की। जय ज्ञान के दीप ईमान की, महाबली वीर हनुमान की॥ अमर अजर अचरज है माया, वज्�
अवगुण सदा रहे हैं
हेमन्त कुमार शर्मा
अवगुण सदा रहे हैं, निश्चय भी सदा रहा। लाख बार गिर जाऊँ, फिर उठना है, मन में यह सदा रहा है, निश्चय भी सदा रहा है। भाव�
अधर पर सँवारूँ तुझे
चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव 'ज़ानिब'
साँझ की तीर पर बैठकर निहारूँ तुझे, स्वप्न की ओट से मैं पुकारूँ तुझे। भाव मेरे सिमटते रहें मौन में, शब्द बनकर अधर पर �
एक और अर्थ
अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
कभी-कभी एक स्मृति अपना चेहरा उतारकर हमारी तरफ़ रख देती है, और हम समझते हैं ये हम हैं। पर वो हम नहीं— हमारी सम्भाव�
नन्हें क़दम
डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
नन्हे क़दमों से धरती पर, सपनों का विस्तार, हँसी में झरते मोतियों-सा, निर्मल उसका प्यार। मुट्ठी में सूरज बाँध चले, चाँ

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